“मार्क्सवादी चिंतक” की अभिनव पैंतरेबाजियां और हमारा जवाब [3]

प्रोलेटेरियन ऑर्गनाइसिंग कमेटी, सीपीआई (एमएल)

कॉर्पोरेट के नए हिमायती क्या हैं और वे क्रांतिकारियों से किस तरह लड़ते हैं [तीसरी किश्त]

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[I]

“मार्क्सवादी चिंतक” की अक्‍टूबर क्रांति के बारे मूर्खतापूर्ण अभिनव बातें

जैसा कि सभी को ज्ञात है कि मौजूदा किसान आंदोलन को लेकर शुरू हुई बिगुल मंडली से बहस अब व्‍यावहारिक-राजनीतिक दायरे से निकल कर सैद्धांतिक बहस के क्षेत्र में प्रवेश कर चुकी है। इस टोली ने इस मुतल्लि‍क अपने बचाव में ‘बेजोड़’ हमले किये हैं। आइए, बिना देरी किये उनमें से कुछेक (इस अंक के लिए तैयार किये गये, जबकि बाकी का जवाब हम अगले अंक में ही दे पायेंगे) को एक-एक कर देखें, वे नये हमलें क्‍या हैं।

आइए, पहले रूसी अक्‍टूबर क्रांति वाली बहस को लें, जिसमें ये लिखते हैं :

”पटना के दोन किहोते अपने मौजूदा लेख में बताते है कि रूस में जब समाजवादी क्रान्ति हुई तो मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में “समूची किसान आबादी” साथ आयी। लेकिन अक्तूबर क्रान्ति में समूची किसान आबादी सर्वहारा वर्ग के साथ क्यों आई थी इस ऐतिहासिक सन्दर्भ को हमारे माटसाब  गोल कर देते हैं और अक्तूबर क्रान्ति के लिए गांवों में बने वर्ग संश्रय को आज के पूंजीवादी भारत और भारतीय समाजवादी क्रान्ति पर थोपने पर आमादा हो जाते हैं। अक्तूबर 1917 में रूस में हुई क्रान्ति एक ऐसी समाजवादी क्रान्ति थी जिसमें विशिष्ट ऐतिहासिक परिस्थितियों के चलते ग्रामीण क्षेत्र में मुख्य रूप से जनवादी कार्यभारों को ही पूरा किया गया था। अक्तूबर 1917 में हुई रूसी समाजवादी क्रान्ति में रैडिकल बुर्जुआ भूमि कार्यक्रम को लागू किया गया जिसके पीछे तमाम वस्तुगत व मनोगत कारण मौजूद थे। (बोल्‍ड हमारा)  

अर्थात, ये मानते हैं कि कुलकों के साथ कोई मोर्चा बना था, क्‍योंकि गांवों में कुलक भी थे। तो यही हैं इनके तथाकथित ज्ञान का भंडार! यह साफ-साफ गांवों में बने वर्ग-संश्रय की बात लिखते हैं। इसके बाद इनकी लिखी किसी अन्‍य बात के बारे में माथापच्‍ची करने की जरूरत रह जाती है क्या?

दरअसल ये जो भी लिखते हैं उसका मतलब यह निकलता है कि अक्‍टूबर क्रांति एक समाजवादी क्रांति के रूप में शुरू से ही इस तरह के वर्ग-संश्रय की नीति ले चुकी थी क्‍योंकि इसे देहातों में मुख्‍य रूप से जनवादी कार्यभारों को पूरा करना था। इसी के साथ इनकी बातों से यह अर्थ भी नि‍कलता है कि अक्‍टूबर क्रांति में जो वर्ग-संश्रय या जनवादी कार्यभार आदि पूरा किया गया, उसके पीछे वस्‍तुगत और मनोगत दोनों कारण थे। पाठक ‘मनोगत’ के बारे में ध्‍यान देंगे। फिर वह हम पर तोहमत लगाते हैं कि तत्‍कालीन रूस और आज के भारत की स्थितियों की तुलना आप कैसे कर सकते हैं और साथ में यह भी पूछते हैं कि हम यह क्‍यों नहीं कहते हैं कि रूस की तरह भारत में भी समाजवादी क्रांति, जनवादी क्रांति के कार्यभारों को पूरा करेगी या फिर हम भारत में क्रांति के स्‍टेज को नव जनवादी क्रांति क्‍यों नहीं मान लेते हैं?

दरअसल बिगुल मंडली की पन्‍ने रंगने की आदत है, भले ही उसमें काम की बात (ठीक वह बात जिस पर बहस हो रही है) कुछ भी न हो। यह वही मंडली है जो अपने को ”मार्क्‍सवादी चिंतक” के अलावे इतिहास लेखन पर शोध करने का दावा भी करता है। इसकी एक बानगी ऊपर है। रूसी अक्‍टूबर क्रां‍ति के वास्‍तविक घटनाक्रम (बस हेडलाइन नहीं) को गहराई से जानने वाले बता देंगे कि ऊपर इन्‍होंने जो कहा है वह सही नहीं है। यह दरअसल इतिहास को देखने व समझने के तरीके को लेकर ठीक उसी लकवा रोग से ग्रस्‍त होने का परिणाम है जिसकी चर्चा हम बार-बार कर रहे हैं, यानी प्रोफेसराना तरीका, तोतारटंत करने वाला तरीका और पहले से तैयार उत्‍तरपुस्तिका से कट-पेस्‍ट करना आदि। इन्‍होंने आंदोलन में इतनी महीनी से कचरा फैला रखा है कि अधिकांश लोगों को पता भी नहीं चलता है कि वे किस तरह अज्ञानता के कैंसर से शिकार हो रहे हैं।  ‍  

फिलहाल, हमें उपरोक्‍त संदर्भ में सिर्फ इतना कहना है कि लेनि‍न की शुरूआती रणनीति गरीब किसानों को कुलकों से अलग करने की नीति थी, न कि इसके विपरीत। यानी, शुरू से ही पूरी किसान आबादी को साथ लेने की कोई नीति कतई नहीं थी। दरअसल इसे इस तरह कहना भी सही नहीं है, क्‍योंकि उन्‍हें साथ लिया नहीं गया था बल्कि अचानक अर्थात जुलाई के प्रथम सप्‍ताह में घटित कोर्निलोव घटना में बोल्‍शेविकों की हुई विजय के बाद अचानक तेज हुई क्रांतिकारी परिस्थितियों के बहाव में कुलक साथ आ गए और लेनिन भी इन असाधारण द्रुत गति से बदलती परिस्थितियों के अनुसार किसान विद्रोहों की उठती लहरों के साथ सर्वहारा क्रांति को अनोखे तरह से मिलाते हुए अस्‍थायी सरकार और पूंजीपति वर्ग का तख्‍ता पलटने में कामयाब रहे। लेकिन एक पल के लिए भी गांवों में कोई अन्‍य तरह का वर्ग-संश्रय कायम नहीं किया और न ही हमने  ‘द ट्रुथ’ के 12वें अंक में कुछ ऐसा लिखा है जिससे यह अर्थ निकाला जा सके कि हम किसी ऐसे संश्रय के बनने की बात कर रहे हों। अप्रैल से लेकर अक्‍टूबर तक कभी भी गावों में नये वर्ग-संश्रय बनाने की कोई सैद्धांतिक रणनीति नहीं बनायी गयी थी।[1] ऐसा हुआ था यह सोचना भी मूर्खता की पराकाष्‍ठा होगी। एकमात्र जुलाई के बाद ही लेनिन मूलत: किसानों की जमीन की भूख से प्रेरित जनवादी क्रांति के किसी एक और संस्‍करण के बारे में संभावना व्‍यक्‍त करते हैं, लेकिन इस तरह नहीं कि नया वर्ग-संश्रय बनाना होगा। दरअसल लेनिन किसान विद्रोहों और सर्वहारा क्रांति के मिलन के बारे में सोंच रहे थे और ठीक ऐसा ही हुआ। लेनिन इसके बाद इसके बारे में लिखते भी हैं।[2]

पूरी किसान आबादी के साथ वर्ग-संश्रय इस कारण से भी पूर्व कल्पित नहीं था कि समाजवादी क्रांति को जनवादी कार्यभार पूरे करने हैं। देहातों में समाजवादी क्रांति को कुछ समय के लिए मुल्‍तवी करने और किसान आबादी की जमींदार विरोधी कारवार्ईयों की लहर पर सवार होते हुए सर्वहारा क्रांति के साथ इसके अनोखे मिलन के बारे में सोचने का मतलब वर्ग-संश्रय करना नहीं है। यह ठीक वही मिथ्याआरोप की पद्धति है जो ये महाशय हमारे साथ अपना रहे हैं। ठीक यही पद्धति वे लेनि‍न पर भी आजमाते हैं।    

स्‍पष्‍ट है, देहात में अक्‍टूबर क्रांति करने के लिए वर्ग-संश्रय की बात पूरी तरह कोरी बकवास और गलत है। लेनिन किसानों के विद्रोह पर सर्वहारा क्रांति को सवार करने की नीति पर चले, न कि नया वर्ग-संश्रय कायम किया। हम पाते हैं कि पल-पल बदलती परिस्थितियों के बीच लेनिन इसे करने में सफल होते हैं। वर्ग संश्रय की बात है ,तो हम जानते हैं वह ग्रामीण सर्वहारा और अर्ध-सर्वहारा के साथ शहरी सर्वहारा वर्ग के बीच था जो अंतिम समय तक कायम रहा। यहां तक कि मध्‍यवर्गीय किसानों से भी किसी तरह के वर्ग संश्रय की वकालत अक्‍टूबर क्रांति करने के लिए नहीं की गयी। ये ”मार्क्‍सवादी चिंतक” की तरह के लोग ही हैं जो यह कहते हैं कि लेनि‍न ने अवसरवादी तरीका से कभी ये किया कभी वो किया। ऐसे लोग लेनिन की नेतृत्‍व शैली में मौजूद असाधारण कार्यनीतिक लचीलेपन के बारे में दरअसल कुछ भी नहीं जानते हैं। जो इतिहास को समझने का मतलब बस तथ्‍यों को आंकड़ों की तरह रट लेना समझते हैं, वे इसी तरह से इतिहास के साथ स्‍वयं अनाचार करते हैं और इसकी तोहमत दूसरों पर लगाते हैं।

सर्वहारा क्रांति और किसान विद्रोह का यह अनोखा मिलन ठीक-ठीक किस तरह किया जाना मुमकिन था इसके बारे में पहले से ही सोचना या तय करना संभव ही नहीं था। इसलिए लेनिन पूरे घटनाक्रम पर नजर रखते हुए सही समय का इंतजार करते हैं न कि कोई वर्ग-संश्रय कायम करते हैं और न ही पहले से समाजवादी क्रांतिकारी पार्टी के भूमि कार्यक्रम को अपनाने के बारे में निर्णय करते हैं। ये सब फालतू किस्‍म का प्रस्‍तुतीकरण है। दरअसल पूरे घटनाक्रम पर बारीक नजर रखना और पल-पल बदलती परिस्थितियों के मध्‍य हर ठोस वि‍कास के अनुरूप कदम उठाना लेनिन की प्रतिभा की वह खासियत थी जिसे समझने में ऐस लोग भूल करते हैं। अप्रैल थेसि‍स में ही लेनिन की उस तीक्ष्‍ण समझ की झलक मिल जाती है जिसमें हम यह साफ-साफ देख सकते हैं वे आगे तीव्र गति से होने वाली असाधारण तूफानी घटनाओं के बारे में अंदाजा लगा चुके थे। इसलिए जैसे ही वह ठोस रूप से प्रकट होता है लेनिन संघर्ष का गियर बदलने में कोई देरी नहीं करते हैं। जिस तरीके से ऊपर नये वर्ग-संश्रय के बारे में कहा गया है उसके पीछे लेनिन को अत्‍यंत महीनी से गंदी रोशनी में पेश करने की मंशा भी हो सकती है। जहां तक हम स्‍वयं इस संबंध में क्‍या मानते हैं यह बताने का सवाल है, तो अब तक यह साफ हो गया है कि हमारे अनुसार रूस में जनवादी कार्यभार को पूरा करने की दृष्टि से न तो समाजवादी क्रांति के चरण में कोई बदलाव लाया गया और न ही नया वर्ग-संश्रय ही बनाया गया।

हम भारत के संदर्भ में भी यह कह रहे हैं कि यहां समाजवादी क्रांति करने के लिए देहातों में सर्वहारा वर्ग के ग्रामीण सर्वहारा और गरीब किसानों पर ही भरोसा करना चाहि‍ए और उनके बीच का वर्ग-संश्रय ही क्रांति और क्रांति के उपरांत भी कायम रहेगा। धनी किसानों के साथ इसलिए वर्ग-संश्रय नहीं कायम हो जाएगा कि वे कॉर्पोरेट के प्रति विरोध का भाव रखते हैं। धनी किसानों के साथ छोड़ि‍ये, समूचे मध्‍य वर्ग के साथ भी ऐसा कोई स्‍थायी वर्ग संश्रय कायम नहीं हो सकता है। बाकी हम उनके कॉर्पोरेट विरोध को या बाजार आदि के प्रति विरोध को बड़ी पूंजी के फ्रंट और उनकी शक्ति में आये बिखराव के रूप में देखते हैं और इसलिए इसे काफी महत्‍व भी देते हैं।

हमारी यह बात सौ फीसदी सच निकली है कि जब ऐसे मूर्ख तथा रट्टूमल चिंतकों के समक्ष इतिहास के नुकीले मोड़ों को समझने का प्रश्‍न आता है तो वे बुर्जुआ प्रोफेसर की तरह इतिहास के तथ्‍यों के साथ आंकड़ों की तरह पेश आते हैं। इसलिए जैसे ही कोई नयी ऑरिजिनल बात सामने आ जाए तो फिर ये आंकड़ों की तरह इतिहास में सेट या फिट करने लगते हैं और इनके पल्‍ले कुछ नहीं पड़ता है। फिर न ये लेनिन को समझ सकते हैं और न ही किसी और को। वैसे भी जिसे क्रांति छोड़ बाकी कुछ भी करना हो, ऐसे व्‍यक्ति को ऐसी क्रांतिकारी, उसमें भी ऑरिजिनल बातें कभी समझ में नहीं आएंगी यह तय है। क्‍या मेंशेविकों को या प्‍लेखानोव को लेनि‍न की लीक से हटकर बनायी कोई भी रणनीति या कार्यनीति कभी भी समझ में आयी, क्रांति के बाद भी?        

आइए, आगे बढ़ें। ये आगे जो लिखते हैं और जिस तरह से पहले कही बात से जोड़ते हैं उससे हमारे द्वारा कही बात अपने आप पुष्‍ट हो जाती है –

रूस में प्रशियाई पथ से भूमि सुधार लागू हुए। इसकी शुरुआत 1860-61 में भूदास प्रथा के औपचारिक ख़ात्मे से हुई थी और 1907-08 के स्तोलिपिन सुधारों तक रूसी कृषि में पूँजीवादी विकास विचारणीय स्तर तक पहुँच चुका था। हालांकि अभी पूंजीवादी विकास के साथ बड़ी ज़मीन्दारी और सामन्ती उत्पादन सम्बन्ध आंशिक रूप से क़ायम थे और अलग-अलग परिमाण में ग़रीब किसान आबादी की अस्वतन्त्रता भी अभी देखी जा सकती थी। रूसी क्रान्ति बेहद विशिष्ट परिस्थितियों में सम्पन्न हुई। प्रथम विश्वयुद्ध, आर्थिक विसंगठन और अकाल की परिस्थितियों और साथ ही सोवियत आन्दोलन के स्वतःस्फूर्त उभार के कारण पहले फरवरी 1917 में जनता के उभार ने ज़ार की सत्ता को उखाड़ फेंका और जनवादी क्रान्ति के कार्यभार को पूरा करने की शुरुआत की। लेकिन क्रान्तिकारी शक्तियों की कमज़ोरी के कारण सत्ता सोवियतों के हाथ में नहीं आ सकी और बुर्जुआ आरज़ी सरकार और सोवियतों की सत्ता के रूप में एक ‘दोहरी सत्ता’ (dual power) अस्तित्व में आई, जिसमें से आरज़ी सरकार बुर्जुआ वर्ग की तानाशाही का प्रतिनिधित्व कर रही थी, जबकि सोवियत सत्ता मज़दूरों और किसानों की जनवादी तानाशाही का। बुर्जुआ आरज़ी सरकार में मुख्य शक्तियां बुर्जुआ व पेटी-बुर्जुआ पार्टियां थीं, जिनमें कैडेट पार्टी जैसी पूंजीवादी पार्टी के अलावा, मेंशेविक व समाजवादी-क्रान्तिकारी (नरोदवादी) भी शामिल थे। इस आरज़ी सरकार ने युद्ध से मुक्ति, यानी शान्ति, रैडिकल बुर्जुआ भूमि सुधार, और भूख और अकाल से मुक्ति का वायदा पूरा नहीं किया और संविधान सभा तक इंतज़ार करने का झुनझुना व्यापक किसान आबादी और मज़दूर व सैनिक आबादी को थमा दिया। इस मामले में सबसे बड़ा विश्वासघात समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी ने किया जो कि एक रैडिकल बुर्जुआ भूमि कार्यक्रम पेश तो कर रही थी, लेकिन किसानों द्वारा उसे लागू किये जाने का विरोध कर रही थी। वहीं युद्ध में रूस की भागीदारी रूसी समाज और अर्थव्यवस्था के लिए विनाशकारी साबित होती जा रही थी। …. बोल्शेविकों का गांवों की ग़रीब और मंझोली किसान आबादी में राजनीतिक आधार बेहद सीमित था। यही स्थिति‍ भारत में मौजूद है। किसान आबादी में सबसे ज़्यादा आधार समाजवादी-क्रान्तिकारी पार्टी का था और उसका कार्यक्रम एक रैडिकल बुर्जुआ भूमि सुधार का था, जैसा कि हमने ऊपर उल्लेख किया है। ‘अप्रैल थीसिस’ में लेनिन ने स्पष्ट किया कि रूस फरवरी 1917 की जनवादी क्रान्ति के बाद अब समाजवादी क्रान्ति की मंजिल में है, हालांकि इस क्रान्ति को कई जनवादी कार्यभार पूरे करने होंगे और पहला कार्य होगा ‘समाजवाद की ओर कुछ कदम’ बढ़ाकर रूस को सिर पर खड़े आर्थिक विनाश और आपदा से बचाना। अब समाजवादी क्रान्ति ही अपूर्ण जनवादी क्रान्ति को भी बचा सकती थी और समाजवाद की ओर कुछ आरंभिक कदम के साथ समाजवादी व्यवस्था के निर्माण की शुरुआत भी कर सकती थी, अन्यथा उसका भी गला घोंट दिया जाना तय था, जैसा कि कोर्निलोव मसले से सिद्ध हो गया था।”

ये पूरा विवरण सही है, लेकिन ऊपर कही बातों के साथ मिला कर देखेंगे तो कुल मिलाकर कुछ इस तरह की तस्‍वीर उभरती है जिसमें मानो अप्रैल से ही नये वर्ग-संश्रय की नीति कायम कर ली गई थी और भूमि‍ समितियों के जमीन दखल और शहरों में कारखाना दखल के स्‍वत:स्‍फूर्त आंदोलन तेज हुए तो इस नीति के तहत दोनों आंदोलनों को तात्‍वि‍क शक्ति मानते हुए एक साथ सहयोजित कर लिया गया। यानी पहले से ही वर्ग संश्रय की नीति कायम थी और उचित अवसर आने पर लेनिन ने उसे जमीन पर उतार दिया। यह सुनने में ही भद्दा मालूम पड़ता है। इतना ही कहा जा सकता है कि यह प्रस्‍तुतीकरण गलत है।

वस्‍तुगत और मनोगत कारणों के बारे में, जिसकी वजह से लेनिन को पूरी किसान आबादी के साथ वर्ग-संश्रय करना पड़ा (जैसा कि ये मानते हैं), ये लिखते हैं –

”एक तो रूस में जो भूमि सुधार हुए थे, वे प्रशियाई पथ से हुए युंकर-शैली के भूमि सुधार थे, जो कि किसानों की ज़मीन की भूख को शान्त नहीं करते, बल्कि सामन्ती ज़मीन्दारों को ही पूँजीवादी भूस्वामी में तब्दील होने का अवसर देते हैं। इसके अलावा यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि ये प्रशियाई शैली के भूमि सुधार भी रूस में अभी परिपक्व नहीं हुए थे। दूसरा कारण मनोगत था और वह था रूसी किसान आबादी में बोल्शेविक पार्टी का बेहद सीमित आधार। बोल्शेविक राजनीति और विचारों ने रूस के सर्वहारा वर्ग के उन्नततम हिस्से में अपना प्राधिकार क़ायम कर लिया था, लेकिन किसान आबादी में अभी भी नरोदवादियों के राजनीतिक वंशज, यानी कि समाजवादी-क्रान्तिकारियों का ही ज़्यादा आधार था। क्रान्ति के दौरान किसान आबादी कुछ सीमित प्रश्नों पर (भूमि क़ब्ज़ा करने और शान्ति के मुद्दे पर) बोल्शेविकों के साथ आई क्योंकि इन प्रश्नों पर समाजवादी-क्रान्तिकारियों का ढुलमुल रवैया सामने आ गया था। लेकिन उस वक़्त भी किसानों की व्यापक बहुसंख्या समाजवादी क्रान्ति के कार्यक्रम पर राज़ी नहीं थी।”

यहां भी एक गलत चित्रण किया गया है। अगर भूमि सुधार भी परिपक्‍व नहीं हुआ था (हालांकि वे अन्‍य जगह लिख चुके हैं कि वहां तो इतनी विकसित पूंजीवादी खेती थी कि उसमें कॉर्पोरेट पूंजी का प्रवेश हो चुका था), अगर वहां के लगभग भूस्‍वामी 1917 के अक्टूबर में भी सामंती ही बने हुए थे (ऐसा लगता है कि वे कृषि‍ में प्रशियन विधि और युंकर शैली के पूंजीवादी विकास को भी अपनी विशिष्‍ट शैली में ही समझते हैं), कृषि में पूंजीवादी विकास भी परिपक्‍व नहीं हुआ था और बोल्‍शेविकों का देहातों में आधार भी नहीं था, और अगर ये ही नया वर्ग-संश्रय कायम करने के मुख्‍य कारण थे, तो लेनिन को ये बातें तो पता थीं फिर उन्‍होंने क्‍यों अप्रैल में समाजवादी क्रांति के चरण को पूरा करने के लिए तैयारियों की घोषणा की? इस तरीके से तो इसकी व्‍याख्‍या करना भी मुश्किल हो जाएगा। इन्‍होंने पूरी तरह गड़बड़झाला कर के रख दिया है। हम यही बार-बार कह रहे हैं कि जब आप इतिहास को महज तथ्‍यों का आंकड़ा समझेंगे और यही समझ कर इतिहास का मूल्‍यांकन करेंगे तो ठीक यही होगा।

दरअसल लेनिन जब सर्वहारा वर्ग के साथ ग्रामीण सर्वहारा और गरीब किसानों के बीच वर्ग-संश्रय की बात करते हैं तो इसका एक मजबूत आधार था। लेनिन देहातों में जमींदारों की जमीन व संपत्‍ति‍ की जब्‍ती कार्रवाइयों में यह साफ देख रहे थे कि गरीब किसानों की एक स्‍वतंत्र और अलग तरह की पहलकदमी भी प्रकट हो रही है जो कि स्‍पष्‍टत: बोल्‍शेविकों के प्रत्‍यक्ष प्रभाव की वजह से हो रही थीं। लेनिन ठीक इसी बात पर भरोसा कर रहे थे और यही चीजें गरीब किसानों के साथ वर्ग-संश्रय का आधार थीं। यही कारण है कि लेनि‍न 1917 के अत्‍यंत महत्‍वपूर्ण अप्रैल पार्टी कांफ्रेंस में पार्टी द्वारा पारित कि‍ये जाने वाले प्रस्‍तावों में ये निम्‍नलिखित बिंदु शामिल करते हैं और पार्टी इन्‍हें पारित भी करती है।

The party must support the initiative of those peasant committees which in a number of localities in Russia are handing over the livestock and agricultural implements of the landowners to the peasants organised in those committees, to be used in a socially regulated manner for the cultivation of all the land.” (point no. 8 of the resolution) and “The party of the proletariat must advise the rural proletarians and semi-proletarians to strive to convert every landed estate into a fair-sized model farm to be run on public lines by the Soviets of Agricultural Labourers’ Deputies under the direction of agricultural experts and with the application of the best technique.” (point no. 8 of the resolution) and againThe separate and independent organisation of the agricultural proletariat must be undertaken immediately and everywhere, both in the form of Soviets of Agricultural Labourers’ Deputies (as well as of separate Soviets of deputies of the semi-proletarian peasantry) and in the form of proletarian groups or factions within the general Soviets of Peasants’ Deputies, in all local and municipal government bodies, etc.” (point no. 7 of the resolution)  ( LCW, 24, p. 288-289)         

यहां यह स्‍पष्‍ट हो जाता है कि लेनिन जिस वर्ग-संश्रय की बात कर रहे थे वह हवा में नहीं टिका था। इससे यह भी स्‍पष्‍ट हो जाता है कि पूरी किसान आबादी के साथ सर्वहारा वर्ग का समाजवादी क्रांति के चरण में कोई वर्ग-संश्रय कायम नहीं था और अप्रैल में लेनिन हरचंद कोशिश कर रहे होते हैं कि गरीब किसानों को अलग से, कुलकों से ही नहीं मध्‍यवर्गीय किसानों से भी अलग, संगठित किया जा सके। 

अप्रैल थेसिस में सर्वहारा वर्ग के साथ गरीब किसानों के वर्ग-संश्रय को पूरे तौर पर देख सकते हैं

”The specific feature of the present situation in Russia is that the country is passing from the first stage of the revolution—which, owing to the insufficient class-consciousness and organisation of the proletariat, placed power in the hands of the bourgeoisie—to its second stage, which must place power in the hands of the proletariat and the poorest sections of the peasants.” (LCW, 24, page 21)

जाहिर है इसमें कहीं भी हमको पूरी किसान आबादी के साथ वर्ग-संश्रय की बात नहीं मिलेगी, न ही अप्रैल थेसिस के अन्‍य बिंदुओं में ही मिलेगी। एक और उदाहरण लें  –

“The masses must be made to see that the Soviets of Workers’ Deputies are the only possible form of revolutionary government, and that therefore our task is, as long as this government yields to the influence of the bourgeoisie, to present a patient, systematic, and persistent explanation of the errors of their tactics, an explanation especially adapted to the practical needs of the masses.” (ibid, p. 22-23)   

अप्रैल थेसिस के बिंदु नंबर 6 में यह और भी स्‍पष्‍टता से रखी गई है 

The weight of emphasis in the agrarian programme to be shifted to the Soviets of Agricultural Labourers’ Deputies…” (ibid)

आइए, अब दूसरी बात की खोज करें कि क्‍या कभी बाद में पूरी किसान आबादी के साथ वर्ग-संश्रय कायम हुआ था? हम पाते हैं कि नहीं ऐसा कभी भी नहीं हुआ था। जब हम अपनी खोज को आगे बढ़ाते हैं तो पाते हैं कि जून के प्रथम सप्‍ताह में प्रकाशि‍त पुस्तिका (Revision Of The Party Programme) में भी सर्वहारा वर्ग और गरीब किसानों के बीच के वर्ग-संश्रय की बात ही प्रमुखता से बनी रहती है। 3 जुलाई की घटना और उसके बाद कोर्निलोव मसले के बाद तैयार किये गये DRAFT RESOLUTION ON PRESENT POLITICAL SITUATION में इस वर्ग-संश्रय को प्रकट करने की भाषा में थोड़ा परिवर्तन आता है, लेकिन पूरी किसान आबादी के साथ वर्ग-संश्रय की बात करने के विपरीत सीधे सर्वहारा वर्ग के हाथ में सत्‍ता को दिये जाने की जरूरत पर जोर दिया जाता है। यानी गरीब किसानों के सीधे समर्थन से सर्वहारा राज्‍य व सत्‍ता की बात की जाती है और दूसरी तरफ आम आह्वान में मजदूर वर्ग के साथ ‘किसानों’ का नाम आता है। यहां कुछ शिफ्ट देखा जा सकता है लेकिन वह वही है जिसकी बात हम कर रहे हैं, अर्थात सर्वहारा क्रांति को किसान क्रांति से मिलाने की कार्यनीति, जबकि पुराना वर्ग-संश्रय और भी अधिक ठोस रूप से व्‍यक्‍त होता है। लेनिन यह लिखते हैं –

”The historic significance of the Kornilov revolt is that with extraordinary force, it opened the people’s eyes … The Kornilov revolt has proved for Russia what has been proved throughout history for all countries, namely, that the bourgeoisie will betray their country and commit any crime to retain both their power over the people and their profits. The workers and peasants of Russia have no other alternative than the most determined struggle against, and victory over, the landowners and the bourgeoisie …Only the urban working class can lead the people, i.e., all working people, into such a struggle and to such a victory, provided all state power passes into its hands and provided it is supported by the peasant poor.” (LCW, 25, p. 321-22, bold ours)

इस तरह हम अगर मान लेते हैं कि इसमें सर्वहारा और गरीब किसानों के बीच के वर्ग-संश्रय की अभिव्‍यक्ति में थोड़ा परिवर्तन है, तो भी पूरी किसान आबादी के साथ वर्ग-संश्रय की बात कहीं भी नहीं है। गरीब किसानों के समर्थन को सर्वहारा सत्‍ता की जीत की एक शर्त के रूप में पेश किया गया है, यानी पुराने वर्ग-संश्रय का ही और ठोसीकरण होता है। लेनिन की कार्यनीतिक लचीलापन को समझने वाले लोग यह जानते हैं कि अगर आम आह्वान मजदूरों और किसानों दोनों के नाम प्रेषित है तो एक महत्‍वपूर्ण बात है और यह कार्यनीति शिफ्ट को दिखाता है। पूरे किसान समुदाय के असंतोष के शीर्ष पर सवार होने की नीति यहां साफ देखी जा सकती है। कुल मिलाकर दो चीजें होती हैं; एक यह कि क्रांति की तैयारी का शांतिपूर्ण काल खत्‍म हो जाता है, और दूसरा यह कि गरीब किसानों को अलग से संगठित करने की शांतिपूर्ण काल वाली नीति पर फिलहाल विराम लग जाता है, इसकी जगह क्रांति को संगठित करने की तैयारी का निर्णय लिया जाता है और पूरी पार्टी मशीनरी व क्षमता को इस कार्यभार के लिए लगा दिया जाता है। इस तरह पूरी किसान आबादी के गुस्‍से व आक्रोश को सर्वहारा वर्ग द्वारा सत्‍ता हासिल करने की रणनीति के साथ अनोखे तरीके से मिला दिया जाता है। इसमें वर्ग-संश्रय वाली बात पूरी तरह गलत है। पूरी किसान आबादी को साथ लाने के लिए वर्ग-संश्रय की बात का कोई वजूद नहीं है। देहातों में लेनिन की पार्टी का आधार अपेक्षाकृत रूप से कमजोर था यह बात सही है लेकिन इस कारण से नया वर्ग-संश्रय बनाया गया यह सरासर गलत है। लेनिन लिखते हैं कि हमने जितनी तेजी से क्रां‍ति के बढ़ने की उम्‍मीद की थी वह उससे कहीं अधिक तेजी से आगे बढ़ रही थी। और यही कारण है कि जुलाई के बाद क्रांति को आगे बढ़ाने की अलग से कोई जरूरत नहीं रह गयी थी, अपितु मुख्‍य काम यह रह गया था कि जितनी जल्‍दी हो सत्‍ता पर कब्‍जा करने हेतु तेजी से क्रांति संगठित करने की तैयारी की जाए। इसके लिए किसानों, मजदूरों तथा आम अवाम के बहुमत को मेहनत और लगन के बल पर अपनी ओर किया जाए। जुलाई प्रदर्शनों में ”सारी सत्‍ता सोवियत को” के नारे के पूरे जोर-शोर से आने के बाद चारों तरफ पूरे रूस में इसके गूंजने का मतलब बिल्‍कुल साफ था कि बोल्‍शे‍विकों ने क्रांति को संगठित करने का निर्णय जुलाई में ही कर लिया था।

लेनिन लिखते हैं –

“The real mistake of our Party on July 3-4, as events now reveal, was merely that the Party considered the general situation in the country less revolutionary than it proved to be, that the Party still considered a peaceful development of political changes possible through an alteration in the Soviets’ policies, whereas in reality … peaceful development was no longer possible. This erroneous view, however, which was sustained only by the hope that events would not develop too fast, our Party could not have got over other than by participating in the popular movement of July 3-4 with the slogan “All power to the Soviets” and with the aim of making the movement peaceful and organised.”(LCW, 25, p. 321, DRAFT RESOLUTION ON PRESENT POLITICAL SITUATION)

इसमें हम देख सकते हैं कि लेनिन हर जगह मजदूर वर्ग के सत्‍ता में आने की बात कर रहे हैं, वहीं गरीब किसानों को इस सत्‍ता के समर्थन में आने की बात कहते हैं और पूरे किसान समुदाय और मजदूर वर्ग का एक साथ आम आह्वान करते हैं। वे पार्टी कार्यक्रम वाले इस लेख का इस तरह अंत करते हैं –

”The whole course of events, all economic and political conditions, everything that is happening in the armed forces, are increasingly paving the way for the successful winning of power by the working class, which will bring peace, bread and freedom and will hasten the victory of the proletarian revolution in other countries.”

यहां यह बात याद रखनी चाहि‍ए कि इस फौरी कार्यक्रम को लेनिन सितंबर के प्रथम सप्‍ताह में लिखते हैं। यानी, अक्‍टूबर क्रांति से चंद दिनों पहले ही।

तो कम से कम अब यह स्‍पष्‍ट हो जाना चाहिए कि हमारा स्‍वघोषित ”मार्क्‍सवादी चिंतक” और ”इतिहासकार” कितना बड़ा ‘मार्क्‍सवादी’ है, कितना बड़ा ‘चिंतक’ है और कितना बड़ा ‘इतिहासकार’ है! इसकी सारी डींगे दरअसल प्रोफेसराना हैं, इसीलिए नकली हैं और अत्‍यंत भोंडी हैं। दरअसल जैसे लेनिन की एक खास तथा सबसे प्रतिभावान रणनीति को यह नकली इतिहासकार पूरी किसान आबादी के साथ वर्ग-संश्रय बनाने जैसी कार्रवाई के रूप में पेश कर रहा है, वैसे ही कोई अन्‍य इसी आधार पर पूरी अक्‍टूबर क्रांति को ही समाजवादी के बदले जनवादी क्रांति बताने लगता है। बेचारे लेनिन!

[II]

किसान बुर्जुआजी के बारे में पन्‍ने रंगता बेचारा हमारा “मार्क्‍सवादी चिंतक”

पाठकों ने देखा होगा कि हमारा ‘मार्क्‍सवादी चिंतक’ किसान बुर्जुआजी के बारे में लेनिन के उद्धरणों की खोज कर-कर के कई पन्‍ने रंगता है और जाहिर है पूरी तरह थक जाता है। लेकिन भला किस लिए? यह साबित करने के लिए कि : 

”हमारे देश के धनी फार्मर व कुलक बाकायदा पूंजीवादी किसान हैं, जोकि न सिर्फ नियमित तौर पर उजरती श्रम का शोषण करते हैं, बल्कि मुनाफे को अधिकतम बनाने के मकसद से विनियोजित बेशी मूल्य को पूंजी में रूपान्तरित कर पूंजी संचय करते हैं, विस्तारित पुनरुत्पादन करते हैं, अपनी पूंजी का वैविध्यकरण कर उसे सूद पर चलाते हैं, अन्य आर्थिक गतिविधियों में लगाते हैं, ज़मीनें ख़रीदते हैं, वाणिज्यिक उपक्रमों में लगाते हैं।” 

तो क्‍या हमने इससे भिन्‍न कहा था? आइए, देखते हैं हमने क्‍या लिखा है या हम क्‍या मानते हैं। ‘द ट्रुथ’ के 12वें अंक में हमने धनी किसानों के बारे में एक बार फिर से अपनी अवस्थिति स्‍पष्‍ट की है। हमने लिखा है –

”We generally call them capitalist elements or peasant bourgeoisie who mainly thrive on labour and property of the rural poor and a section of this have been constantly converting themselves into rural capitalists that constitutes its upper most and super rich or topmost crust.” (इसके हिंदी अनुवाद के लिए नीचे फुटनोट देखें)[3]

हमलोगों ने यह भी लिखा है कि धनी किसानों की यह सबसे ऊपरी परत वास्‍तव में किन रूपों में अस्तित्‍वमान है। हमने लिखा:   

”The thin uppermost stratum of rich farmers who are more a class of agri-business entrepreneurs than farmers, ‘dabbling into different agro-processing industries. They are also seed-fertiliser-pesticide sellers, petrol-diesel dealers, brick kiln owners, tractor-bike-agricultural implements dealers, commission agents and directors of cooperative sugar mills and cooperative banks.” ( इसके हिंदी अनुवाद के लिए नीचे फुटनोट देखें)[4]

कोई भी देख सकता है कि हम जिसे ग्रामीण पूंजीपति कहते हैं वे वहीं हैं जिनके बारे में हमारा ”मार्क्‍सवादी चिंतक” कहता है। लेकिन ठहरिये! बहस यहां से शुरू हो जाती है। वह बहस यह है कि ग्रामीण पूंजीपति का यह संस्‍तर धनी किसानों का सबसे उन्‍नत व विकसित हिस्‍सा है या पूरा धनी किसान ही है। हमारा मानना है कि ग्रामीण पूंजीपति वर्ग धनी किसान वर्ग में से निकला हुआ सबसे विकसित, संपन्‍न और उन्‍नत संस्‍तर है, जबकि हमारा ”मार्क्‍सवादी चिंतक” मानते हैं कि पूरा का पूरा धनी किसान तबका ही ग्रामीण पूंजीपति बनाता है। इनमें मौजूद परिमाणात्‍मक फर्क को ये नहीं मानते हैं ,जबकि हमारा मानना है कि ऐसा फर्क मौजूद है और यह एक महत्‍वपूर्ण बात है। हम मानते हैं कि अलग संस्‍तरों में बंटे अलग-अलग धनी किसानों की पूंजि‍यों की मात्रा में या उनके द्वारा हस्‍तगत किये जाने वाले बेशी मूल्‍य तथा उसके विनियोजन आदि में अंतर मौजूद है, और हम यह भी देख सकते हैं कि यह अंतर आर्थिक संकट के लगातार गहरे रूप में बने रहने के कारण लगातार बढ़ता ही जा रहा है। 21वीं सदी के दूसरे दशक के उत्तरार्ध से धनी किसानों का एक हिस्‍सा कृषि क्षेत्र में अधिकाधिक समय से पैर जमाये संकट के परिणामस्‍वरूप उपज की बिक्री की विकट समस्‍या के कारण लगातार गिरते लाभ दर तथा इस तरह लगातार हो रहे घाटे से त्रस्‍त हो ‘उजड़ने’ के डर से भयभीत है।[5] धनी किसानों का यह संस्‍तर आज अपने ही तबके के सबसे ऊपरी, उन्‍नत, धनी तथा पूंजी से मजबूत संस्‍तर से भिन्‍न राजनीतिक व्‍यवहार करने लगा है। कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कि दीर्घावधि संकट के दौर में धनी किसानों के बीच पूंजी तथा विस्‍तारित उत्‍पादन के मामले में मौजूद अंतर काफी बढ़ चुका है जो भविष्‍य में और बढ़ेगा और इनके बीच का आपसी अंतर्विरोध भी तेज होगा, खासकर कॉर्पोरेट यानी बड़ी पूंजी के द्वारा कृषि क्षेत्र को पूर्ण रूप से विजित करने की दृष्टि से इस पर की जा रही चढ़ाई के आलोक में यह अंतर्विरोध अत्‍यंत तीखा भी हो सकता है। जहां इसके सबसे संपन्‍न तबके के लिए बड़ी पूंजी के आगमन का अर्थ उनके लिए विस्‍तारित उत्‍पादन को और ज्‍यादा बढ़ाने का एक सुअवसर है, तो कम संपन्‍न धनी किसानों के लिए प्रतिस्‍पर्धा में उनके पूंजी विस्‍तार की स्थिति में निरपेक्ष सिकुड़न है।

इस तरह इनके द्वारा धनी किसानों के बारे में दी गई परिभाषा में कोई लचीलापन नहीं है। इनके अनुसार, जो भी किसान अपनी पूंजी बढ़ा पाता है वह पूंजीपति है और इसलिए, ये कहते हैं, कि भले ही गंभीर संकट के पहले ही दौर के झोंके में वह उजड़ जाए, लेकिन उसके और उसके अपेक्षाकृत स्‍थाई रूप से पूंजीपति बन चुके तबकों में कोई फर्क नहीं करना चाहिए। इनकी समझ छोटे और बड़े के बीच फर्क करने की है ही नहीं। उत्‍पादन संबंध के अलावे ये कुछ भी देखना नहीं चाहते। आखिर, ये सुपर क्रांतिकारी जो ठहरे!

लेकिन यह गलत है, क्‍योंकि मात्रा की भूमिका होती है हम जानते हैं। छोटे पैमाने और बड़े पैमाने और पूरी तरह से सर्वजनीन बन जाने वाले माल उत्‍पादन में फर्क होता है हम जानते हैं। उसी तरह छोटी पूंजी और बड़ी पूंजी के बीच के फर्क का एकाधिकारी पूंजी और साम्राज्‍यवाद के उदय से सीधा रिश्‍ता है। इसी तरह एक स्‍तर के केंद्रीकरण व संकेंद्रण से दूसरे तथा और ऊंचे स्‍तर के केंद्रीकरण व संकेंद्रण के बीच फर्क का क्‍या महत्‍व है हम जानते हैं। और इन सबका उत्‍पादन के सामाजीकरण और फिर समाजवादी क्रांति तथा समाजवाद के उदय की भौतिक तैयारी के संबंध में क्‍या महत्‍व है यह भी जानते हैं।

ये हमारे द्वारा किये जा रहे फर्क के पीछे के कारण को और इसके महत्‍व, दोनों में से किसी को नहीं समझते हैं। और जाहिर है, ये इस बात को भी नहीं समझते हैं कि लेनिन किसानों के बीच से वर्ग विभेदीकरण के कारण उभरने वाले किसान पूंजीपतियों के मामले में अलग-अलग समय में अलग-अलग बातें क्‍यों करते हैं। इनका जिस तरह का दिमाग है, लेनिन से जुड़े इन महीन विषयों को ये समझ ही नहीं सकते हैं। यह इनके वश में नहीं है। दरअसल लेनिन जब भी वर्ग-संघर्ष और उसके तात्‍कालिक निशाने व दायरे के संदर्भ में बात करते हैं, तो वे परिमाणात्‍मक अंतर को ध्‍यान में रखते होते हैं। वहीं अगर वे उत्‍पादन संबंधों के संदर्भ में विचार करते हैं तो इस परिमाणात्‍मक अंतर को अलग कर देते हैं। इसका सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि हम देखते हैं कि लेनिन प्राय: गरीब किसानों के दायरे से बाहर के सभी किसानों, सिर्फ धनी किसानों को ही नहीं, सभी किसानों को पूंजीपति ही मानते हैं, क्‍योंकि उत्‍पादन संबंधों या किसी खास आर्थिक केटेगरी के संदर्भ में उन पर विचार करते समय इसके सिवाय और कोई दूसरा रास्‍ता भी नहीं होता है।[6] इसी तरह जब वे अलग-अलग स्‍तर के किसानों को समाजवाद के अलग-अलग काल में उनके उपयोग की दृष्टि से या फिर वह समाजवाद के उद्देश्‍यों की पूर्ति के मार्ग में कितना बाधा पैदा कर सकता है, कब-कब कर सकता है आदि की दृष्टि से विचार करते हैं, तो वे धनी किसानों तक को कह देते हैं कि हमें उनसे भी कोई दिक्‍कत नहीं अगर वे अपना बेशी उत्‍पाद सर्वहारा वर्ग के राज्‍य को सौंप देते हैं और दूसरों के श्रम को लूट कर मुनाफा कमाने की हठ नहीं करते हैं।[7] इसी तरह लेनिन यहां तक कह देते हैं कि धनी किसान और बड़े किसान यानी कुलक जिस तरह की उत्‍पादन पद्धति में लगे हैं यानी उजरत श्रम के आधार पर जिस उत्‍पादन पद्धति में लगे हैं, लेकिन अगर वे उसके बारे में पुनर्विचार करते हैं तो मार्क्‍सवादी उनके लिए भी कुछ कर सकते हैं।[8] जाहिर है, लेनिन ऐसे वक्‍त में इनके बारे में उत्‍पादन संबंध को सामने रखकर बात नहीं कर रहे होते हैं, बल्कि वे इस संभावना पर विचार कर रहे होते हैं कि इसके साथ खुली लड़ाई को हम टाल सकते हैं या नहीं, और टाल सकते हैं तो किस तरह और‍ कि‍तने दिनों तक टाल सकते हैं आदि, आदि। वे जब इस दृष्टि से बात करते हैं तब और जब वे उत्‍पादन संबंध के बतौर बात करते हैं तब, उनके द्वारा शब्‍दों और भावों का चयन अलग-अलग हो जाता है, लेकिन उनका मूल भाव कभी नहीं बदलता है। हम देख सकते हैं कि मध्‍यवर्गीय किसानों के बारे में बात करते हुए भी लेनिन इसी तरह की विधि अपनाते हैं। हम इसे नहीं समझेंगे तो लेनिन के कुलकों के बारे में दो तरह के वक्‍तव्‍यों की व्‍याख्‍या करना मुश्किल हो जाएगा। और जो लोग लेनिन की उपरोक्‍त विधि को नहीं जानते हैं या समझते हैं, उन्‍हें लगेगा कि लेनिन कभी यह तो कभी वह कहते रहते हैं और ऐसे लोग अक्‍सर यह मानते हैं कि लेनिन बहुत अवसरवादी थे और जब जैसी जरूरत होती थी वे उसी के अनुसार बोल देते थे।

इसी तरह जब हमारा ”मार्क्‍सवादी चिंतक” हम पर गालियों की वर्षा करते हुए कहता है हमने लेनिन के इन वक्‍तव्‍यों को (हमारे द्वारा उद्धृत वक्‍तव्‍यों को) कहीं से खोज निकाला है तो दरअसल वे एक और तरीके से लेनिन को नीचा दिखाने की ही कोशिश करता है, मानो कहना चाहता है कि लेनिन ने ये बातें यूं ही बेमतलब के कही थीं, जबकि यह खुद नहीं जानता है कि लेनिन अलग-अलग ढंग की बातें कब और क्‍यों करते हैं। दरससल लेनिन की विधि का इन्‍हें कोई अंदाजा ही नहीं है। हमारे समय के स्‍वघोषित ”मार्क्‍सवादी चिंतक” और ”मार्क्‍सवादी इतिहासकार” का यही स्‍तर है।

इसी तरह मार्क्‍स भी कभी छोटे किसानों को छोटे पूंजीपति के नाम से बुलाते हैं, लेकिन कब? तब , जब वे उस छोटे किसान को भूस्‍वामियों से जमीन किराया पर लेकर पूंजीपतियों के केटेगरी में पाते हैं। तब मार्क्‍स अपने विश्लेषण के निमित्‍त उसे उसी केटेगरी में रखने के लिए बाध्‍य होते हैं जिस केटेगरी में वह पूंजीपति को रखते हैं जो उजरत श्रम के द्वारा लाभ कमाने के लिए ही नहीं विस्‍तारित उत्‍पादन करने के लिए किराया पर जमीन लेता है। एंगेल्‍स भी यही विधि अपनाते हैं जब वे अपने समय में किसानों के अलग-अलग संस्‍तरों पर विचार कर रहे होते हैं। वे एक तरफ बड़े किसानों के प्रति सहानुभूति दिखाते हैं जब वे यह देखते हैं कि बड़ी पूंजी के समक्ष इसका कोई अस्तित्‍व नहीं है और उजड़ जाने के लिए अभिशप्‍त है, लेकिन जैसे ही वे उन पर उत्‍पादन संबंध की दृष्टि से विचार करते हैं वे बिल्‍कुल ही सख्‍त हो जाते हैं। लेकिन इधर जिस विधि और दृष्टि से हमारा ”मार्क्‍सवादी चिंतक” इन सब पर विचार करता है वह एक तोतारटंत तरीके से पढ़ाई के बल पर निकाला गया तरीका है। बहुत लोगों को लग सकता है कि ये मूर्ख हमें गाली देते हैं, वास्‍तविकता यह है कि ये अंतत: हमारे शिक्षकों को बदनाम कर रहे होते हैं।

लेकिन पूरी बहस का यह सार बना रहता है, क्‍योंकि लेनिन स्‍वयं मानते हैं कि खाते-पीते किसान जो किसान बुर्जुआजी हैं उससे ही विकसित हो पूंजीवादी किसान या ग्रामीण पूंजीपति निकलता है और वे इसके कारणों पर भी इसी संदर्भ में विचार करते हैं। और मजेदार बात यह है कि हम इसके लिए उसी उद्धरण को यहां पेश कर रहे हैं जिसे ‘मार्क्‍सवादी चिंतक’ ने अंधे की तरह या बिना पढ़े या सोचे-विचारे हमारे साथ बहस में हमारे खिलाफ उद्धृत किया है जो हमारे पक्ष में है और इनकी मूर्खता के खिलाफ है। देखि‍ए जिसे उद्धरण को इसने हमारे खिलाफ पेश किया है ,उसमें लेनिन क्‍या लिखते हैं :

“The differentiation of the peasantry, which develops the latter’s extreme groups at the expense of the middle “peasantry”, creates two new types of rural inhabitants. The feature common to both types is the commodity, money character of their economy. The first new type is the rural bourgeoisie or the well-to-do peasantry. These include the independent farmers who carry on commercial agriculture in all its varied forms… then come the owners of commercial and industrial establishments, the proprietors of commercial enterprises, etc. The combining of commercial agriculture with commercial and industrial enterprises is the type of “combination of agriculture with industries” that is specifically peculiar to this peasantry. From among these well-to-do peasants a class of capitalist farmers is created (bold ours)

अगर लेनिन की उपरोक्‍त बातों पर हम गौर करें, तो क्‍या लेनिन वही बात नहीं कह रहे हैं जो हम कह रहे हैं? हां, एक फर्क है, वह यह है कि हम जिसे किसान बुर्जुआजी या खाते-पीते किसान कहते हैं, लेनिन उसे ग्रामीण पूंजीपति कह रहे हैं। और हम जिसे ग्रामीण पूंजीपति और पूंजीपति (एक दूसरे के समानार्थक शब्‍द की तरह) कह रहे हैं लेनिन उसे पूंजीपति वर्ग और पूंजीवादी किसान कह रहे हैं। अगर इस छोटे अंतर को छोड़ दें, जिसमें शब्‍दों का मामूली अंतर है लेकिन सार रूप में कोई अंतर मौजूद नहीं है, तो हमारी बात में और लेनिन की बात में कोई अंतर नहीं है। एक बार देखें कि हमने क्‍या कहा है –

‘द ट्रुथ’ के 12वें अंक में हमने लि‍खा जिसकी आलोचना में इन्‍होंने दर्जनों पन्‍ने रंग डाले यह है :

”What exactly, in short, is our stand on rich peasants? Firstly, we don’t take them per se as rural bourgeoisie. We generally call them capitalist elements or peasant bourgeoisie who mainly thrive on labour and property of the rural poor and a section of this has been constantly converting themselves into rural capitalists that constitutes its upper most and super rich or topmost crust.”

कोई भी जिसमें सकारात्‍मक ढंग से बहस करने की इच्‍छा है और समझने-समझाने के लिए बहस करना चाहता है, उसे तुरंत ही यह समझ में आ जाएगा कि हम वही कह रहे हैं जो उपरोक्‍त उद्धरण में लेनिन कह रहे हैं। लेनिन की नजर में किसानों के बीच वर्ग-विभेदीकरण के कारण पहले ग्रामीण पूंजीपति और खाते-पीते किसान (हमारे शब्‍दों में किसान बुर्जुआ और खाते-पीते[9] किसान, जाहिर है दोनों के पीछे का सार अर्थ समान है) बनते हैं जो मूलत: व्यापार के लिए खेती करते हैं और उनकी खेती का चरित्र भी मुद्रा और माल उत्‍पादन होता है, जैसा कि पूंजीपति वर्ग का होता है। लेकिन ये स्‍वतंत्र किसान होते हैं जो कॉमर्शियल लाइन पर खेती करते हैं और मुनाफा कमाते हैं। इसका जो ऊपरी तबका है, जो विस्‍तारित उत्‍पादन में बहुत आगे बढ़ जाता है, अर्थात इन खाते-पीते किसानों के सबसे उन्‍नत व ऊपरी तबके का कमर्शियल एंव इंडस्‍ट्रीयल एसटेबलिशमेंट (व्‍यापारिक व औद्योगिक प्रतिष्‍ठानों) के साथ गठबंधन बन जाता है या उनका आपस में विलय हो जता है। दूसरे शब्‍दों में, एक का दूसरे में विस्‍तार यानी एकाकार हो जाता है। एकमात्र तब जाकर पूंजीपति वर्ग का यानी सच्‍चे अर्थों में पूंजीवादी किसानों के एक वर्ग का उदय होता है। भारत में भी ऐसे सच्‍चे अर्थों वाले पूंजीवादी किसानों का वर्ग है जो गांव के खाते-पीते धनी किसानों के सबसे समुन्‍नत हिस्‍सा है और आम तौर पर धनी किसानों के संवर्ग में ही शामिल माना जाता है। धनी किसान के संवर्ग के रूप में ये बहुधा चर्चित हैं। हमने इन्‍हें ही अलग करके देखने की कोशिश की है और हम मानते हैं कि हमारा यह करना सही है, क्‍योंकि धनी किसानों के इन दोनों संस्‍तरों में आज फर्क करना जरूरी हो गया है ताकि दोनों के व्‍यवहार में जो फर्क दिखाई दे रहा है और जिसके भविष्‍य में आर्थिक संकट की गहराई और उसका दायरा बढ़ने के साथ और बढ़ने के आसार हैं, उसे सर्वहारा वर्ग के विचार-विमर्श के दायरे में लिया जाए ताकि बड़ी पूंजी के सहयोगियों में होने वाली कमी पर नजर रखी जा सके। इस संबंध में हमारे और लेनि‍न के बीच जो फर्क है वह मात्र इतना है कि हम जिस खाते-पीते किसानों को किसान बुर्जुआजी कहते हैं, लेनिन उसे ग्रामीण बुर्जुआजी कहते हैं। जाहिर है यह फर्क कोई ऐसा फर्क नहीं है जिसे खत्‍म करने की जरूरत भी है। यह हो ही सकता है कि हम किसी चीज को जिस नाम से पुकारते हैं ठीक उसी चीज को कोई दूसरा दूसरे नाम से पुकार सकता है। मुख्‍य सवाल दोनों नामों के पीछे के सार का है जो अगर समान है तो हम अलग-अलग नाम से भी पुकारें तो चलेगा। नाम को लेकर पूरी दुनि‍या के कम्‍युनिस्‍टों के बीच फर्क है हम जानते हैं। नामों के अंदर के सारतत्‍व को भूल कर महज नाम पर आधारित होकर गाली गलौज करना दुनिया में कहीं नहीं होता है। हमारे देश में भी नहीं होता है, सिवाये हमारे समय के स्‍वघोषित ”मार्क्‍सवादी चिंतक” की अभिनव टोली को छोड़कर जिसके सामने आज अपनी विरासत को बचाने का कार्यभार आ खड़ा हुआ है। और ठीक इसी कारण से वे सड़कछाप भाषा व आचरण करने से भी नहीं कतरा रहा है।

जो भी हो, सत्‍य फिर भी नहीं बदलता है। उसे भारी भरकम मिट्टी के नीचे दफन करने से भी उसके अस्‍ति‍त्‍व पर कुछ फर्क नहीं पड़ता है। धनी किसान के प्रश्‍न पर हमें बौना साबित करने के लिए इस टोली ने जितने पन्‍ने रंगे हैं उसका अंतत: यही सार निकलता है जिसकी हम ऊपर न जाने कितनी बार चर्चा कर चुके हैं। यानी, इतिहास के साथ अनाचार हम नहीं यह स्‍वघोषित ‘चिंतक’ कर रहा है और अपनी प्रतिष्‍ठा बचाने के लिए पूरी दुनि‍या में बदहवास हो धमाचौकड़ी मचा रहा है। इस विषय पर और अलग से तथा और अधिक विचार करना या बहस करना महज पन्‍ना रंगना है जिसके लिए अब और अधिक समय निकालना समय की फिजूलखर्ची होगी। इसलिए, हम इस प्रश्‍न पर बहस को विराम देते हैं।

[III]

श्रमशक्ति के मूल्‍य के आंकलन का सवाल : रट्टू तोते की तरह तर्क करता है “मार्क्‍सवादी चिंतक”

नोट : निम्‍नलिखित उद्धरण कहां से लिया गया है और हम उसे यहां क्‍यों दे रहे हैं, इस पर विचार इस लेख को पूरा करने के बाद या कहीं बीच में करेंगे। इसलिए पहले पाठकों से हमार अनुरोध है कि इसे एक बार पढ़ लें और याद रखें।  

“जैसा कि माओ ने बताया था, समाजवादी समाज में अभी तीन महान अन्तरवैयक्तिक असमानताएं यानी मानसिक और शारीरिक श्रम, उद्योग और कृषि और गांव और शहर में अन्तर मौजूद होता है। जब तक यह अन्तर मौजूद होता है तब तक पूंजीवादी श्रम विभाजन भी मौजूद होता है; कुशल और अकुशल के बीच का अन्तर मौजूद होता है; बुर्जुआ अधिकार भी तब तक मौजूद रहते हैं। जाहिर है कि जब तक श्रम विभाजन मौजूद रहेगा तब तक विनिमय सम्बन्ध और विनिमय मूल्य बने रहेंगे। माल का अस्तित्व बना रहेगा क्योंकि अभी भी वस्तुओं का उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य दोनों बने रहेंगे। लिहाजा, अभी भी माल उत्पादन बना रहेगा और उजरती श्रम का अस्तित्व भी बरकरार रहेगा क्योंकि लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त नहीं करेंगे बल्कि अपने श्रम के उत्पाद का मोल हासिल करेंगे। जब तक विनिमय सम्बन्ध बने रहेंगे तब तक श्रम के उत्पाद के हस्तगतीकरण का तत्व मौजूद रहेगा। और हम मार्क्स से इस बात को जानते हैं कि अलगाव की आर्थिक परिघटना का मूल और कुछ नहीं बल्कि श्रम के उत्पाद का हस्तगतीकरण है। यह पूरी स्थिति, जैसा कि हमने पहले बताया है, समूचे समाजवादी संक्रमण काल में मौजूद रहती है।”

क्‍या समाजवाद में आवश्‍यक श्रम और अतिरिक्‍त श्रम का भेद मिट जाता है या उसका स्‍वरूप और अंतर्वस्‍तु बदल जाता है? मार्क्‍स के इस पर क्‍या विचार थे? क्‍या समाजवाद में बिना विनिमय में गये मजदूर अपनी खर्च हुई श्रमशक्ति की भरपाई कर सकते हैं? अगर ‘हां’ तो कैसे? समाजवाद में श्रमशक्ति माल इसलिए नहीं है क्‍योंकि पूंजीपति वर्ग नहीं है जो उसे खरीद सकता है, लेकिन फिर भी खर्च की जा चुकी श्रमशक्ति की भरपाई के लि‍ए मजदूर को मालों के विनिमय में जाना होता है। तो क्‍या मजदूर को उसके श्रम के मूल्‍य रूप का आंकलन किये बिना ही श्रम शक्ति की भरपाई के लिए जरूरी वस्‍तुएं मजदूरों को प्राप्‍त होती हैं? ऐसे अनेकों सवाल हैं जिसका उत्‍तर हमारे और मार्क्‍सवादी चिंतक के वास्‍तविक पक्ष को समझने के लिए जरूरी था और है, लेकिन हमारा ”मार्क्‍सवादी चिंतक” इन प्रश्‍नों के उत्‍तर तो छोड़ि‍ए इन प्रश्‍नों को पेश भी नहीं कर पाता है। यही नहीं, इस अहम प्रश्‍न पर संजीदगी से विमर्श शुरू करने की तमीज भी उसे नहीं है। वह बस इस सही बात को दुहराता रहता है कि समाजवाद में श्रम शक्ति माल नहीं होती है और उसकी खरीद-बिक्री नहीं होती है। इतने सारे उद्धरण पेश करने के बावजूद वह इससे एक कदम आगे नहीं बढ़ा पाता है।   

आइए, इसे समझने की शुरुआत करते हैं। सबसे पहले तो यह समझ लें कि श्रम के मूल्‍य का सार रूप में अर्थ श्रमशक्ति का मूल्‍य ही होता है। दूसरी बात, श्रमशक्ति माल नहीं रह जाने से दो चीजें मूल रूप से होती हैं; एक, मजदूरी को तय करने में इसकी रेग्‍युलेटर वाली भूमिका खत्‍म हो जाती है और दूसरा, श्रमशक्ति रूपी माल के मूल्‍य का नियम अर्थात श्रमशक्ति रूपी माल के दायरे से मूल्‍य के नियम का अस्तित्‍व गायब हो जाता है।

पूंजीवाद में श्रमशक्ति को पूंजीपति खरीदता है। यह उसके लिए उपयोग मूल्‍य होता है। श्रमशक्ति में अपने मूल्‍य से ज्यादा मूल्‍य पैदा करने गुण होता है जो पूंजीपति की जरूरत है। यानी श्रमशक्ति पूंजीपति के लिए अपने मूल्‍य से ज्‍यादा मूल्‍य पैदा करने वाला माल है। लेकिन ऐसा सिर्फ श्रमशक्ति रूपी माल के श्रम प्रक्रिया में लगने यानी उसके क्रियाशील रूप में आने के बाद ही हो सकता है। श्रम प्रक्रिया में मजदूर द्वारा निष्‍पादित कुल श्रम आवश्‍यक श्रम और बेशी श्रम में विभाजित हो जाता है। आवश्‍यक श्रम वाला भाग मजदूरी बनता है जो उसके स्‍वयं के पुनरुत्‍पादन के लिए जरूरी उतने ही श्रम वाली वस्‍तुओं के मूल्‍य के बराबर यानी उतने ही श्रम की लागत वाली वस्‍तुओं के बराबर होता है। यह श्रमशक्ति के मूल्‍य के बराबर होता है इसलिए उसका समतुल्‍य कहलाता है। इस तरह यहां श्रमशक्ति और खर्च हुई श्रमशक्ति की भरपाई के लिए जो जरूरी वस्‍तुएं (जिंदा रहने के लिए जरूरी उपभोग की वस्‍तुएं) मजदूर के हाथ लगती हैं वे दोनों ही माल होती हैं और उनका स्‍वामी पूंजीपति होता है। इसी के साथ मजदूर द्वारा उत्‍पादित माल में लगा बेशी श्रम जिसका कोई मूल्‍य मजदूर को नहीं मिलता है बेशी मूल्‍य बनाता है और इसे पूंजीपति हड़प लेता है। यह बेशी मूल्‍य भी उसी श्रम शक्ति के खर्च करने से बना है। इस तरह वास्‍तव में श्रमशक्ति के खर्च होने से जो कुल श्रम उत्‍पाद में आता है या लगता है उसके एक हिस्‍से का ही मूल्‍य पूंजीपति चुकाता है लेकिन इसे श्रम का मूल्‍य बताकर श्रम के एक भाग की चोरी करता है। हम देख सकते हैं कि मजदूरी के माध्‍यम से भी ठीक यही काम किया जाता है। यही कारण है कि पूंजीवाद में मजदूर जिन मालों का उपयोग खुद को जिंदा रखने के लिए करते हैं उसके दाम में उतार-चढ़ाव आने से श्रमशक्ति के मूल्‍य यानी मजदूरी में भी उतार-चढ़ाव आता है और यह सामान्‍य तौर पर ऐसा होना लाजिमी है।

मार्क्‍स श्रम और श्रम शक्ति के मूल्‍य के बारे में निम्‍नलिखि‍त बातें कहते हैं –

“What economists therefore call value of labour, is in fact the value of labour-power, as it exists in the personality of the labourer, which is as different from its function, labour, as a machine is from the work it performs… “

यानी, मार्क्‍स के पूर्व के तथा समकालीन अर्थशास्‍त्री जिसे श्रम का मूल्‍य कहते थे वह दरअसल श्रमशक्ति का मूल्‍य ही था। हालांकि उनके विश्‍लेषण से भी अंतत: यही बात साबित होती थी, लेकिन वे इसे समझ नहीं पाये।

फिर मार्क्‍स कहते हैं –

“All the slave’s labour appears as unpaid labour. In wage labour, on the contrary, even surplus labour, or unpaid labour, appears as paid. There the property-relation conceals the labour of the slave for himself; here the money-relation conceals the unrequited labour of the wage labourer.”  

यानी, उजरत श्रम के अंतर्गत श्रम-प्रक्रिया और माल उत्‍पादन की पद्धति इस प्रकार काम करती होती है कि श्रम के मूल्‍य के रूप में बेशी श्रम यानी अनपेड लेबर आवश्‍यक श्रम की आड़ में छुप जाता है और इसी तरह मुद्रा संबंध यानी श्रम के मूल्‍य का मुद्रा रूप से जुड़ा संबंध भी उजरत श्रमिक के अपुरस्‍कृत श्रम को छुपा लेता है।

इसलिए मजदूरी क्‍या है? यह सर्वप्रथम तथा इस रूप में श्रमशक्ति के मूल्‍य को श्रम के मूल्‍य में पेश करने या परिणत करने वाली केटेगरी है ताकि अनपेड लेबर को पेड लेबर की आड़ में छुपने का अवसर मिल सके। इसके बिना पूंजीवादी उत्‍पादन नहीं हो सकता है। पूंजीपति श्रमशक्ति का मूल्‍य देता है जबकि प्रतीत ऐसा होता है मानो उसने मजदूर के पूरे श्रम का मूल्‍य दिया है। इसी तरह बेशी श्रम की चोरी को मजदूरी की पूंजीवादी व्‍यवस्‍था या प्रथा छुपा लेती है। इसलिए पूंजीवाद में मजदूरी पूंजीपति और मजदूर के बीच के सामाजि‍क संबंध की एक अभिव्‍यक्ति होती है।

वहीं, समाजवाद में क्‍या होता है? सर्वप्रथम यह कि, क्‍योंकि एक मजूदर की मजदूरी सामाजिक श्रम के आधार पर यानी कुल सामाजिक श्रम को अनुदत्‍त एक मजदूर के वैयक्तिक अंश की लागत यानी कुल सामाजिक श्रम में मजदूर के वैयक्तिक अंश वाले श्रम के लागत यानी मूल्‍य से तय होती है, इसलिए समाजवाद में मजदूरी पूरे समाज के बीच के, मजदूरों के आपस के संबंधों को प्रकट या व्‍यक्‍त करती है और इसलिए मजदूर की श्रम शक्ति के खर्च से निष्‍पादित श्रम का कोई भी भाग छुपता नहीं है और इसलिए श्रम की चोरी का कोई सवाल ही पैदा नहीं होता है। यही अर्थ है श्रमशक्ति के माल नहीं होने का। लेकिन हमारे और ‘मार्क्‍सवादी चिंतक” के बीच दिक्‍कत भी ठीक यहीं से शुरू होती है। वह दिक्‍कत ऐसे शुरू होती है।

जैसे ही हम सामाजिक श्रम के लागत या मूल्‍य की बात करते हैं (समाजवाद यानी साम्‍यवाद की पहली मंजिल में हमें ऐसा ही करने के लिए बाध्‍य होना पड़ता है, क्‍योंकि हम मूल्‍य के रूप के बिना हम काम नहीं चला सकते और भौतिक साधनों की प्रचुरता कायम किये बिना इस बाधा पर हम हम विजयी नहीं हो सकते हैं, यानी तब तक हमें किसी न‍ किसी रूप में बुर्जुआ मानक के आधार पर ही आपस में विनिमय करना पड़ता है), वैसे ही हमें खर्च हुई कुल मानव श्रमशक्ति के उस हिस्‍से के मूल्‍य के आंकलन के बारे में विचार करना पड़ता है, चाहे हम बात सामाजिक श्रम की ही क्‍यों न कर रहे हों, क्‍योंकि श्रम के मूल्‍य का सार श्रमशक्ति का मूल्‍य ही होता है। साम्‍यवाद की पहली मंजिल में श्रम के एक रूप का विनिमय उतनी मात्रा के दूसरे श्रम से करना पड़ता है। यानी, मूल्‍य के नियम के आधार पर ही यानी मूल्‍य के रूप में ही श्रम का एक दूसरे के साथ विनिमय होता है। हम जानते हैं कि समाजवाद में श्रम निजी के बदले सामाजिक हो जाता है। लेकिन सामाजिक श्रम अंततोगत्‍वा खर्च हुई मानव श्रम शक्ति ही है या मानव श्रम शक्ति के ही खर्च होने का परिणाम है। इसलिए ही तो समाजवाद के अंतर्गत मुख्‍य आर्थिक नियम उत्‍पादकों की अधिकतम जरूरतों की पूर्ति होता है और इसका अर्थ यही है कि मानव श्रमशक्ति की लागत यानी उसका मूल्‍य लगातार बढ़ता जाता है। अर्थात, पूरे समाज की श्रम शक्ति के पुनरुत्‍पादन पर ज्‍यादा से ज्‍यादा खर्च किया जाता है जबकि पूंजीवाद में श्रमशक्‍ति का मूल्‍य भौतिक रूप से न्‍यूनतम की तरफ या उससे भी नीचे की ओर शिफ्ट करता रहता है। और, वह मालों के दाम ऊपर-नीचे होने के साथ स्‍वयं भी दोलन करते हुए इस न्‍यूनतम से भी नीचे चला जाता है, अक्‍सर दोलित होता रहता है। ”मार्क्‍सवादी चिंतक” के समक्ष दिक्‍कत यह पैदा हो गई है कि हम जिस ढंग से बात प्रस्‍तुत कर रहे हैं वह किसी किताब में नहीं लिखी है और जैसा कि हम जानते हैं वह रट्टू तोता है और इसलिए इसके दिमाग में वही जाता है जो वह रटता है, जिसके कारण वह किसी ऑरिजिनल ढंग से कही बात पर विचार ही नहीं कर सकता है। 

मार्क्‍स समाजवाद में मजदूरी की पूंजीवाद की सीमाओं से मुक्ति की बात उठाते हैं। पूंजीवाद की वह सीमा क्‍या है? वह सीमा यही है कि मजदूरी को पूंजीवाद में श्रम के सिर्फ एक भाग को व्‍यक्‍त करना होता है जो ज्‍यादातर न्‍यूनतम की तरफ अग्रसर रहता है। यानी, पूंजीवाद की सीमा श्रमशक्ति के मूल्‍य को वह न्‍यूनतम दायरे में सीमि‍त रखती है और इसीलिए उसके श्रम की उत्‍पादकता का स्‍तर चाहे जो भी हो मजदूर का व्‍यक्तित्‍व ठूंठ होता जाता है। उसके परि‍वार का भी बुरा हाल होता है। हम जैसे ही मजूदर के निजी श्रम को सामाजिक श्रम में बदल देते हैं जैसा कि समाजवाद में होता है, वैसे हम उसके श्रम पर कुल सामाजिक श्रम में मजदूर के अनुदत्‍त हिस्‍से के रूप में विचार करने लगते हैं और ठीक यह चीज मजदूरी को, जो खर्च हुई श्रमशक्ति का मूल्‍य है, निर्बाध बना देती है, जैसा कि मार्क्‍स कहते है। इस बात का सार इस बात में निहित है कि समाजवाद में श्रम शक्ति के मूल्‍य, जो किसी भी श्रम के मूल्‍य का सार है, का अस्तित्‍व खत्‍म होने के बजाय पूंजीवाद की सीमा खत्‍म होती जाती है, क्‍योंकि मजदूरी उसका उत्‍तरोत्‍तर अतिक्रमण करते हुए श्रम की उत्‍पादकता की सीमा और इसलिए प्रचुरता की मौजूदा सीमा के भीतर निर्बाध हो जाती है। जब प्रचुरता की सीमा का अंत हो जाएगा, यानी प्रचुरता का समाज बन कर उठ खड़ा होगा, तो श्रम का मूल्‍य रूप तथा इसी के साथ मूल्‍य के सारे रूपों का अंत हो जाएगा और तब श्रमशक्ति का मूल्‍य भी इसी के साथ अपना अस्तित्‍व खो देगा। तब मजदूरी भी नहीं रहेगी, समानता के अधिकार के किसी मानक के बिना ही जो जिसकी क्षमता है वह समाज को देगा और जिसकी जितनी जरूरत है वह समाज से ले लेगा। इसके पहले श्रमशक्ति माल नहीं होते हुए भी अपने मूल्‍य रूप से मुक्‍त नहीं हो सकती है। हां, अंतर्वस्‍तु और रूप में यह सब कुछ, पूंजीवाद में विद्यमान रूप में बड़ी भू‍मिका निभाता है,    अंदर से बदल जाता है, क्‍योंकि बदली हुई परिस्थितियों में कोई श्रम के अतिरिक्‍त समाज को कोई कुछ दे नहीं सकता है और उपभोग की वस्‍तुओं के अतिरिक्‍त कोई और दूसरी चीज व्‍यक्तियों के स्‍वामित्‍व में जा नहीं सकता है, जैसा कि मार्क्‍स कहते हैं।

समाजवाद की मंजिल में यह होना लाजिमी और सही है कि मजदूरी पूंजीवाद द्वारा लादी गयी सीमाओं से अपने को क्रमश: आजाद करती जाती है और वह मौजूदा समय के समाज की वर्तमान उत्‍पादकता की सीमा में उत्‍पादकों द्वारा की जाने वाली खपत को अधिकतम सीमा तक बढ़ाती है,.. यानी कुल सामाजिक श्रम में से सामाजिक कल्‍याण के मद एवं खर्च के लिए बनी आम निधियों के लिए होने वाली जरूरी कटौतियों के बाद जो कुछ भी बचता है वह मजदूरों के जीवन की जरूरतों की अधिकतम संतुष्टि के लिए मजदूरी का हिस्‍सा बनता है। वहीं दूसरी तरफ मजदूरों के व्‍यक्तित्‍व के पूर्ण विकास को यह स्थिति सुनिश्चित करती है। मार्क्‍स लिखते हैं :

”The emancipation of wages from the limitations of capitalism enables them to be extended “to that volume of consumption, which is permitted on the one hand, by the existing productivity of society . . . and on the other hand, required by the full development of his (the worker’s) individuality”. (Marx, Capital, Vol. III, Kerr edition, p. 1,021.)”

परंतु आइए, फिर से शुरू करते हुए यह देखें कि मार्क्‍स इसे किस तरह से पेश करते हैं।

समाजवाद में सामाजिक श्रम के आधार पर मजदूरी का आकलन यानी समाज को दिये गये श्रम का भुगतान ठीक-ठीक कैसे होता है? और इसका क्‍या मतलब है? मार्क्‍स की व्‍याख्‍या को ध्‍यान से देखें तो इसका जवाब यह कि ‘वैयक्तिक उत्‍पादकों को – आम निधियों में कटौतियों के बाद – समाज से ठीक उतना ही मिलता है जितना कि वह उसे देता है।’ मार्क्‍स आगे कहते हैं कि ‘जितना वह समाज को देता है वह कुल सामाजिक श्रम में उसका व्‍यक्तिगत अंश है, यानी कुल सामाजिक श्रम को अनुदत्‍त उसका वैयक्तिक अंश होता है। मि‍साल के तौर पर, सामाजिक काम का दिन वैयक्तिक काम के घंटो का योग है; वैयक्तिक उत्‍पादक का वैयक्तिक श्रम काल सामाजिक काम के दिन को अनुदत्‍त उसका भाग है, उसमें उसका अंश है।’

सामाजिक श्रम को अनुदत्‍त उसका यह भाग (आम सामाजिक निधियों में कटौती के बाद) एक तरह का प्रमाण पत्र है जो इस बात को तय करता है कि उसने समाज को कितना दिया है। जहां तक ‘‍क्‍या दिया’ का सवाल है उसका उत्‍तर यह है कि बदली स्थितियों में यानी समाजवाद में, कोई भी श्रम के अतिरिक्‍त समाज को और कुछ दूसरा दे ही नहीं सकता है। फिर इसके आधार पर सामाजिक भंडार से वह उतनी ही लागत (मूल्‍य) की वस्‍तुएं पाता है या पा सकता है जितनी लागत (मूल्‍य) का श्रम उसके द्वारा खर्च हुआ है। यानी, समाज को उसने एक रूप में श्रम की जितनी मात्रा दी है, उतनी ही वह दूसरे रूप में वापस पाता है। यानी, सामाजिक निधि‍यों में की गई जरूरी कटौतियां और फिर उसके बाद बचे सामाजिक श्रम को अनुदत्‍त उसका भाग क्रमश: सामाजिक बेशी श्रम हैं और मजदूर को जिंदा रहने के लिए (समाजवाद में लगातार बेहतर स्थिति में जिंदा रहने के लिए) प्राप्‍त होने वाला आवश्‍यक श्रम है। शब्‍दों से न घबरायें, क्‍योंकि बदले हुए हालात में यहां (समाजवाद में) कोई पूंजीपति नहीं है जो मजदूर की श्रमशक्ति को उसके न्‍यूनतम मूल्‍य पर खरीदने के लिए मौजूद है और न ही बेशी श्रम को  हड़पने के लिए ही यहां उपस्थित है। अंतर्वस्‍तु और रूप के यहां पूरी तरह बदल जाने की बात मार्क्‍स करते हैं और कहते हैं कि बदली हुई परिस्थितियों में हम जिस समाज में हैं वहां यानी समाजवादी समाज में ‘अपने श्रम के अलावा कोई कुछ दे नहीं सकता, और दूसरी ओर, उपभोग की वैयक्तिक वस्‍तुओं के अतिरिक्‍त व्‍यक्तियों के स्‍वामित्‍व में और कुछ जा नहीं सकता।’ सामाजिक निधि में की गई कटौतियां पूंजीवादी बेशी श्रम के विपरीत सामाजिक बेशी श्रम है, यानी वह कुल सामाजिक श्रम का वह भाग है जो अंतत: पूरे समाज में, जिसमें हर उत्‍पादक शामिल है, सामाजिक कल्‍याण मद व खर्च के रूप में सामूहिक एवं अप्रत्‍यक्ष रूप में मजदूर वर्ग के पास ही फिर से वापस आ जाता है। और इसलिए मजदूर के द्वारा किये गये श्रम का कोई भी भाग किसी और के द्वारा हस्‍तगत नहीं किया जाता है। इसलिए समाजवाद में न तो श्रमशक्ति को खरीदने वाला कोई रह जाता है और इसीलिए न ही श्रम शक्ति माल (नही) बनती है।

तो पाठक साथियों, पूरा मामला इस तरह से प्रकट होता है, न कि उस तरह से जिस तरह से हमारा ”मार्क्‍सवादी चिंतक” हमें बताता है। वह इस प्रक्रिया को शायद ही समझ पाता है कि समाजवाद में श्रमशक्ति माल नहीं होती है तो ठीक-ठीक किस तरह इसकी पूर्वशर्तें पूंजीवादी उत्‍पादन पद्धति के तहत पूरी होती हैं।     

समाजवाद में मालों के विनिमय के द्वारा श्रमशक्ति की भरपाई कैसे होती है, यह ऊपर मार्क्‍स द्वारा समझाने की विधि से स्‍वत:स्‍पष्‍ट होता जाता है जिसमें यह बात देय नहीं है कि हम अगर श्रम के मूल्‍य रूप पर यानी सामाजिक रूप से श्रमशक्ति के मूल्‍य पर बात करते हैं तो इसका मतलब श्रमशक्ति माल बन जाती है। हमारा ”मार्क्‍सवादी चिंतक” ठीक इसके उल्‍ट, मार्क्‍स के तरीके से अलग, बिल्‍कुल विपरीत छोर से इसे समझता है और इसलिए पहले से ही मान लेता है कि समाजवाद में श्रमशक्ति माल नहीं है और इसलिए ही रट्टू तोते की तरह कहता रहता है कि इसका आंकलन तो क्‍या इसके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता है, क्‍योंकि हम अगर ऐसा करते हैं तो फिर यह भी मानना होगा कि श्रमशक्ति माल है, उजरत श्रम है।

लेकिन पाठक बंधुओं यहां पहुंच कर हमारा सामना एक विचित्र स्थिति से होता है। यहां एक मूर्खता की सीमा तक को पार करने वाली एक ऐसी ‘द्वंद्वात्‍मक’ विधि सामने आती है जिसमें एक तरफ इसके मूल्‍य के बारे में बात करने से ही श्रमशक्ति माल बन जाती है, लेकिन दूसरी तरफ उसे सीधे-सीधे माल मानने या मानने की घोषणा करने से वह माल नहीं बनती है। है न विचित्र बात! पाठक ठीक समझ रहे हैं, हम इस लेख के ऊपर में शुरू में ही दिये गये उद्धरण की बात कर रहे हैं जो इस महान ‘मार्क्‍सवादी चिंतक’ की इसकी अपनी पत्रिका ‘दिशा संधान’ से लिया गया है। इसमें यह व्‍यक्ति इस बात को बड़े गर्व से मानता है और इसकी घोषणा करता है कि समाजवाद के पूरे दौर में श्रम, उजरत श्रम बना रहेगा यानी दूसरे शब्‍दों में श्रमशक्ति माल बनी रहेगी। सवाल यह है कि यह आदमी फिर किस मुंह से यहां चिल्‍ला रहा है कि समाजवाद में उजरत श्रम का अंत हो जाता है, माल के रूप में श्रमशक्ति का अंत हो जाता है आदि आदि। तो क्‍या यह संभव है कि कि यह मार्क्‍सवादी चिंतककुछ भी नहीं मानता हो सिर्फ बहस में दूसरे को हीन और मूर्ख सिद्ध करने के लिए ही इतनी बहस करता हो? यह निस्‍संदेह विचित्र बात है लेकिन हमें इसे स्‍वीकार करना पड़ेगा, अन्यथा भला यह कैसे हो सकता है कि वह खुद कुछ और ही मानता है (जैसे कि श्रमशक्ति समाजवाद के पूरे ऐतिहासिक काल में एक माल बनी रहती है) और दूसरे व्‍यक्ति के साथ बहस में बिल्‍कुल उल्‍टी ही बात के लिए आसमान सिर पर उठा रखा हो (जैसे कि पहले की ठीक उल्‍टी बात) और इस मूल चारित्रिक बात को छिपाने के लिए इतना बड़ा तूफान खडा कर रखा हो? हे भगवान! हमें इसके लिए माफ करना लेकिन शायद यही सच है। उसके बहस करने के तरीके से भी हम ठीक इसी निष्‍कर्ष पर पहंचते हैं। क्‍या यह सिर्फ दूसरे को मूर्ख सिद्ध करने और खुद को चिंतक के रूप में स्थापित करने के लिए अपने कुछ चेलों से इतना बड़ा वितंडा करवाता है? सच में, बड़ी भयानक बात है!

फिलहाल हमे यह कहते हुए इस नामाकुल चीज पर टिप्‍पणी करना बंद करेंगे कि एक बार फिर से हमारी कहीयह बात सचसाबित हुई कि यह व्‍यक्ति रटता है समझता नहीं है। वहीं तक समझता है जहां तक यह रटता है। यह इस मंडली के ज्ञान की अंतिम सीमा है और यह इससे एक इंच भी आगे नहीं बढ़ता है।   

लेकिन हम कर ही क्‍या सकते हैं? इसलिए आइए, विमर्श को आगे बढ़ाएं।

हम इस पर विचार कर रहे थे कि समाजवाद में खर्च हुई श्रमशक्ति की भरपाई कैसे होती है। यह अजीबोगरीब चिंतक हमारा जवाब देने के लिए उद्धरणों से पन्‍ने रंगता जाता है लेकिन बस ”श्रम शक्ति को मूल्‍य बोलने से ही यह माल बन जाती है” या ‘समाजवाद में श्रम शक्ति माल नहीं होती है” आदि वाक्‍यों की रट लगाने के अलावा और कुछ भी नहीं करता है जिससे यह पता चले कि वह इस प्रश्‍न की देहरी तक भी पहुंचा है या नहीं। बहुत से बहुत वह बार-बार सामाजिक श्रम का नाम लेता है, बस। इस तरह एक बार फिर से यही साबित होता है कि वह सिर्फ तोतारटंत करता है और समझता कुछ भी नहीं है। हम यहां पाठकों से यह कहना चाहते हैं कि आप इसके लेख के इस हिस्‍से को पूरे धैर्य से पढ़ जाइए, एक बार नहीं बार-बार पढ़ जाइए, और इस प्रश्‍न का उत्‍तर खोजने की कोशिश कीजिए कि समाजवाद में, जहां श्रम शक्ति माल नहीं है और मजदूर उत्‍पादन के साधनों के स्‍वामी हैं, वहां खर्च हुई श्रमशक्ति की भरपाई कैसे की जाती है। हम दावा करते हैं कि आपको इसका कोई रत्‍ती भर जवाब नहीं मिलेगा। आपको मिलेगा तो बस यह यह तातारटंत कि ‘समाजवाद में श्रम शक्ति माल नहीं होती है इसलिए इसके आंकलन का सवाल भी नहीं है’; कि ‘अगर इसका आंकलन किया गया या इसका नाम भी लिया गया, तो श्रमशक्ति माल बन जाएगी’; कि श्रमशक्ति का एक भौतिक रूप होता है और एक सामाजिक रूप होता है’ और पता नहीं इसी तरह की रटी हुई न जाने कितनी चीजें यह बकता रहता है लेकिन जिसे असल में समझता बिल्‍कुल ही नहीं है।   

आइए, फिर से मार्क्‍स के पास लौटें –

मार्क्‍स गोथा कार्यक्रम की आलोचना में लिखते हैं – ”यहां हमारा वास्‍ता उसक कम्‍युनिस्‍ट समाज से नहीं है, जो अपनी ही बुनियादों पर विकसित हुआ है, बल्कि इसके विपरीत, उससे है, जो पूंजीवादी समाज से उदित हो रहा है; इस प्रकार जो आर्थिक, नैतिक और बौद्धिक, हर मानी में अभी भी उस पुराने समाज की छापें लिए हुए है जिसके गर्भ से वह निकला है। इस प्रकार वैयक्तिक उत्‍पादकों को – कटौतियों के बाद – समाज से ठीक उतना ही मिलता है जितना कि वह उसे देता है। उसने समाज को जो दिया है, वह उसके श्रम का वैयक्तिक अंश है। मिसाल के तौर पर, सामाजिक काम का दिन वैयक्तिक काम के घंटो का योग है; वैयक्तिक उत्‍पादक का वैयक्तिक श्रम काल सामाजिक काम के दिन को अनुदत्‍त उसका भाग है, उसमें उसका अंश है। उसे समाज से एक प्रमाण पत्र मिलता है कि उसने इतना श्रम प्रदान किया है (आम निधियों के लिए उसके श्रम की कटौती के बाद), और इस प्रमाण पत्र से उसे सामाजिक भंडार से इतनी ही लागत की उपभोग की वस्‍तुएं मिल जाती हैं जितनी लागत का श्रम खर्च हुआ है। समाज को उसने एक रूप में श्रम की जितनी मात्रा दी है, उतनी ही वह दूसरे रूप में वापस पा जाता है।” (कार्ल मार्क्‍स, ”गोथा कार्यक्रम की आलोचना”, बोल्‍ड हमारा)

बोल्‍ड में लिखे शब्‍दों पर गौर करें, तो यहां स्‍पष्‍ट हो जाता है कि सामाजिक भंडार से जो उसे मिलता है वह उसके द्वारा खर्च किये गये श्रम की लागत यानी लागत मूल्‍य ही है। इस तरह यहां श्रम के मूल्‍य रूप के बिना समाजवाद में वितरण का सवाल उठ खड़ा होता है। क्‍योंकि उपभोग की वस्‍तुओं के क्षेत्र में अभी भी बुर्जुआ अधिकार का साम्राज्‍य कायम रहता है, यानी मालों के तुल्‍य मूल्‍यों के विनिमय का सिद्धांत ही चलता है। समाजवाद में और पूंजीवाद में फर्क सिर्फ इतना होता है कि जहां समाजवाद में ”मालों के विनिमय में तुल्‍य मूल्‍यों के विनिमय का अस्तित्‍व केवल औसत पर” टिका होता है, वहीं दूसरे में यह ”हर अलग-अलग मामले में” होता है। ये सारी बातें मार्क्‍स की हैं।

इसका अर्थ है कि समाजवाद में हालांकि श्रम का मूल्‍य रूप बना रहता है, क्‍योंकि साम्‍यवाद की पहली मंजिल में ‘समान अधिकार’ वास्‍तव में ‘बुर्जुआ अधिकार’ ही होता है, लेकिन श्रम शक्ति माल के रूप में अपना अस्तित्व खो देती है। हमारे स्‍वघोषित ”मार्क्‍सवादी चिंतक” ने क्‍योंकि यह तोतारटंत तो कर लिया है कि वितरण का आधार सामाजिक श्रम होता है, लेकिन क्‍योंकि वह यह समझ नहीं पाया है कि यह वास्‍तव में होता कैसे है, इसलिए पन्ना दर पन्‍ना रंगने के बाद भी प्रश्‍न के मर्म तक नहीं नहीं पहुंच सका। अगर वह समझता तो हमे गाली देने के बदले इस पर विचार करता कि अगर श्रम के अलग-अलग रूपों का आपस में विनिमय उसके मूल्‍य रूप में नहीं होता तो आखिर कैसे होता है। तब एक ही सूरत बचती है कि लोग अपनी क्षमता के अनुसार श्रम करते, और जरूरत के अनुसार सामाजिक भंडार से ले लेते। जाहिर है, तब विनिमय का कोई मानक नहीं होता और लोग बिना किसी मानक के ही समाज में लेन-देन करते। यह साम्‍यवाद में ही संभव होगा या यह कह सकते हैं कि ऐसा जब संभव होगा तब वह समाज साम्‍यवाद में पहुंच गया रहा होगा। लेकिन जब तक यह नहीं होता है (जिसके होने की शर्त है कि भौतिक साधनों के रूप में प्रचुरता का समाज कायम हो, जो कि समाजवाद की मंजिल में अभी तक कहीं संभव नहीं हो पाया है) यानी किसी मानक (समानता का अधिकार एक बुर्जुआ मानक है, यानी सामाजिक श्रम भंडार के एक अनुदत्‍त हिस्‍से अथवा अंश के रूप में किसी वैयक्तिक श्रम का इसकी बराबर मात्रा वाले दूसरे श्रम से विनि‍मय का अधिकार) के बिना लेन-लेन करने योग्‍य आर्थिक प्रगति और भौतिक साधनों की प्रचुरता जब तक कायम नहीं होता है, तब तक इसका अर्थ यही है कि हमें श्रम के मूल्‍य रूप में एक तरह के श्रम का दूसरे तरह के श्रम से विनिमय करना होगा और तब जिसका अर्थ यह है कि माल का नियम यहां काम करेगा, यानी उपभोग के क्षेत्र में विनिमय को सही तरीके से लागू होने के लिए श्रमशक्ति माल नहीं होते हुए भी सामाजिक तौर पर उपलब्‍ध ब्‍ध्‍या कुल मानव श्रम शक्ति की इसके मूल्‍य के रूप में गणना करनी होगी, क्‍योंकि श्रम की लागत या उसका मूल्‍य अंततोगत्‍वा श्रमशक्ति का ही मूल्‍य होता है। मार्क्‍स से लेकर स्‍तालिन तक इसके बारे में अलग-अलग तरह से लिख चुके हैं। ”श्रम के मूल्‍य” का कोई और अर्थ नहीं हो सकता है। समाजवाद में उपभोग के क्षेत्र में विनिमय पर विचार करते हुए श्रम के मूल्‍य का सार श्रमशक्ति का मूल्‍य ही है, गोकि बदले हुए स्‍वरूप और अंतर्वस्‍तु के साथ, क्‍योंकि, जैसा कि मार्क्‍स कहते हैं, ”प्रकट है कि यहां वही सिद्धांत चलता है जो मालों के विनिमय को – जहां तक कि यह विनिमय समान मूल्‍यों  का है – नियमित करता है। अंतर्वस्‍तु और रूप यहां बदल गये हैं, क्‍योंकि बदली हुई परिस्थितियों में अपने श्रम के अलावा कोई कुछ दे नहीं सकता, और क्‍योंकि, दूसरी ओर, उपभोग की वैयक्तिक वस्‍तुओं के अतिरिक्‍त व्‍यक्तियों के स्‍वामित्‍व में और कुछ जा नहीं सकता। किंतु जहां तक वैयक्तिक उत्‍पादकों की वस्‍तुओं के वितरण का सवाल है, माल के तुल्‍य मूल्‍यों के विनिमय का सिद्धांत ही चलता है – एक रूप में श्रम की एक मात्रा का दूसरे रूप में श्रम की उतनी ही मात्रा से विनिमय होता है।” 

एक बार फिर दुहरा दें कि ,किसी उत्‍पादक की श्रम शक्ति का मूल्‍य और वह मूल्‍य जो उसकी श्रम शक्ति पैदा करती है – इनके बीच का अंतर बेशी मूल्‍य होता है। दूसरे शब्‍दों में, उसकी श्रम शक्ति के नियत समय तक के लिए खर्च होने से पैदा हुआ कुल श्रम ,आवश्‍यक श्रम और बेशी श्रम में बंट जाता है। जहां पूंजीवाद में आवश्‍यक श्रम स्‍वयं मजदूरों के जीवन निर्वाह के लिए जरूरी उपभोग की वस्‍तुओं में लगे श्रम के बराबर होता है वहीं बेशी श्रम उसकी श्रम शक्ति के द्वारा पैदा किये गये उत्‍पाद में लगा वह श्रम है जिस पर पूंजीपति वर्ग कब्‍जा कर लेता है और यह पूरी तरह अनपेड रहता है। पूंजीवाद में आवश्‍यक श्रम की मात्रा भौतिक रूप से संभव एक न्‍यूनतम मात्रा होती है, जबकि समाजवाद में यह भौतिक रूप से संभव, जो अब तक हुई आर्थिक प्रगति के स्‍तर से तय होगा, अधिकतम मात्रा की तरफ बढ़ती जाती है। इसके अतिरिक्‍त, इसके बाद बचा हुआ उत्‍पादित श्रम यानी बेशी श्रम, जो खर्च हुई श्रम शक्ति का ही प्रतिफल होता है, का समाजवाद में अलग-अलग तरह की सामाजिक निधियों (social fund) के हवाले हो जाता है जिसका उपयोग भी अंतर समाज का एक हिस्‍सा होने के नाते उत्‍पादक के उपयोग में ही आता है और इस तरह उत्‍पादक अपने कुल श्रम का मालिक स्‍वयं होता है। मार्क्‍स की कही बातों का यही सार है।

दरअसल यह समझना जरूरी है कि उत्‍पादक उन्‍हीं चीजों का उपभोग नहीं करता है, जो वह पैदा करता है, अपितु पहले से किसी और तरह के श्रम से उत्‍पादित वस्‍तुओं का उपभोग करता है। यानी, जो चीज मजदूर पैदा करता है और जिसे वह खाकर जिंदा रहता है, दोनों अलग-अलग है और इसलिए आवश्‍यक श्रम की गणना उसके द्वारा उत्‍पादित वस्‍तुओं के अर्थात उत्‍पादित वस्‍तुओं में संघनित श्रम के मूल्‍य रूप से होता है और उनके बीच समीकरण बैठाना ही पड़ता है।

अंत में हम ”मार्क्‍सवादी चिंतक” की पत्रिका से लिया गया उपरोक्‍त उद्धरण यहां फिर से देने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं, क्‍योंकि यह वास्‍तव में एक ऐसी बात है जो एक नयी बहस का विस्‍फोट कर सकती है। इसलिए आइए, इसका ‘आनंद’ लीजिए जिसमें यह कहा गया है कि समाजवाद के पूरे ऐतिहासिक काल में श्रम एकमात्र उजरत श्रम ही बना रहेगा यानी श्रम शक्ति माल बनी रहेगी। लेकिन इन शब्‍दों को लेखक ”मार्क्‍सवादी चिंतक” अभी-अभी हमारे साथ बहस में ठीक इसके विपरीत बात कह रहा था। इस बात के मजे लीजि‍ए कि हम सब इसके गवाह हैं कि हां, ठीक ऐसी ही बात है।    

“जैसा कि माओ ने बताया था, समाजवादी समाज में अभी तीन महान अन्तरवैयक्तिक असमानताएं यानी मानसिक और शारीरिक श्रम, उद्योग और कृषि और गांव और शहर में अन्तर मौजूद होता है। जब तक यह अन्तर मौजूद होता है तब तक पूंजीवादी श्रम विभाजन भी मौजूद होता है; कुशल और अकुशल के बीच का अन्तर मौजूद होता है; बुर्जुआ अधिकार भी तब तक मौजूद रहते हैं। जाहिर है कि जब तक श्रम विभाजन मौजूद रहेगा तब तक विनिमय सम्बन्ध और विनिमय मूल्य बने रहेंगे। माल का अस्तित्व बना रहेगा क्योंकि अभी भी वस्तुओं का उपयोग मूल्य और विनिमय मूल्य दोनों बने रहेंगे। लिहाजा, अभी भी माल उत्पादन बना रहेगा और उजरती श्रम का अस्तित्व भी बरकरार रहेगा क्योंकि लोग अपनी आवश्यकता के अनुसार प्राप्त नहीं करेंगे बल्कि अपने श्रम के उत्पाद का मोल हासिल करेंगे। जब तक विनिमय सम्बन्ध बने रहेंगे तब तक श्रम के उत्पाद के हस्तगतीकरण का तत्व मौजूद रहेगा। और हम मार्क्स से इस बात को जानते हैं कि अलगाव की आर्थिक परिघटना का मूल और कुछ नहीं बल्कि श्रम के उत्पाद का हस्तगतीकरण है। यह पूरी स्थिति, जैसा कि हमने पहले बताया है, समूचे समाजवादी संक्रमण काल में मौजूद रहती है।” ( पेज न. 32, दिशा संधान, अंक-1, अप्रैल-जून 2013, बोल्‍ड हमारा)

एक और देखें –

”इससे पहले कि हम अलगाव को खत्म करने की कम्युनिस्ट परियोजना के दूसरे चरण की बात करें एक बात को स्पष्ट कर देना ज़रूरी है। समाजवाद केपूरे ऐतिहासिक संक्रमण काल के दौरान उत्पादन प्रक्रिया और श्रम प्रक्रिया में निहितअलगाव पूरी तरह ख़त्म नहीं हो सकता है। क्योंकि समाजवादी संक्रमण के दौरान भी उत्पादों के हस्तगतीकरण का एक पहलू मौजूद होता है। अभी भी उजरती श्रम मौजूद होता है; अभी हर किसी को उसके श्रम के अनुसार वेतन मिलता है; अभी ‘सभी से उनकी क्षमता के अनुसार, और सभी को उनकी आवश्यकता के अनुसार’ का कम्युनिस्ट सिद्धान्त लागू नहीं होता है। (वही, पेज 29, बोल्‍ड हमारा ) 

जबकि हम जानते हैं कि इसके बारे में कामरेड स्‍तालिन का कहना था। वे कहते हैं – … the system of wage labour no longer exists.  

[अगले अंक में जारी]


[1] बात बिल्‍कुल दूसरी है। लेनिन अप्रैल में हुई पार्टी कांफ्रेंस में लिखते हैं – ”The fate and the outcome of the Russian revolution—unless the incipient proletarian revolution m Europe exercises a direct and powerful influence on our country—will depend on whether the urban proletariat succeeds in rallying the rural proletariat together with the mass of rural semi-proletarians behind it, or whether this mass follows the lead of the peasant bourgeoisie, which is gravitating towards an alliance with Guchkov and Milyukov, with the capitalists and landowners, and towards the counter-revolution in general.” (LCW, Volume 24, p. 297).

We can also have a look at the points no. 7, 8 and 9 stated in resolution written by Lenin and passed In view of the class situation and balance of forces by the Conference of the Bolshevik party in April 1917 a few days later after Lenin place his famous April Thesis  – “7) The separate and independent organisation of the agricultural proletariat must be undertaken immediately and everywhere, both in the form of Soviets of Agricultural Labourers’ Deputies (as well as of separate Soviets of deputies of the semi-proletarian peasantry) and in the form of proletarian groups or factions within the general Soviets of Peasants’ Deputies, in all local and municipal government bodies, etc., 8) The party must support the initiative of those peasant committees which in a number of localities in Russia are handing over the livestock and agricultural implements of the landowners to the peasants organised in those committees, to be used in a socially regulated manner for the cultivation of all the land; 9) The party of the proletariat must advise the rural proletarians and semi-proletarians to strive to convert every landed estate into a fair-sized model farm to be run on public lines by the Soviets of Agricultural Labourers’ Deputies under the direction of agricultural experts and with the application of the best technique. 

[2] Lenin while deliberating on how the Leadership in the revolutionary proletarian International movement passed to the Russians, he vividly recounts why it was easier for the Russians than for the advanced countries to begin the Proletarian Revolution, even when historical conditions were much more matured in western capitalist countries. He writes – “It was easier for us to begin, … because the unusual … political backwardness of the tsarist monarchy gave unusual strength to the revolutionary onslaught of the masses. Secondly, Russia’s backwardness merged in a peculiar way the proletarian revolution against the bourgeoisie with the peasant revolution against the landowners. That is what we started from in October 1917, and we would not have achieved victory so easily then if we had not. As long ago as 1856, Marx spoke, in reference to Prussia; of the possibility of a peculiar combination of proletarian revolution and peasant war. (p.316, vol 39 LCW)

[3] हम प्राय: इन्‍हें बुर्जुआ तत्‍व या फिर किसान बुर्जुआजी कहते हैं जो मूलत: ग्रामीण गरीबों के श्रम और संपत्ति पर फलते-फूलते हैं और जिसका एक हिस्‍सा लगातार अपने को ग्रामीण पूंजीपति में बदलता रहता है जो इसका सबसे ऊपरी तथा सबसे धनी परत बनाता है।”

[4]  ”धनी किसानों का यह छोटा सबसे ऊपरी संस्‍तर एक वर्ग के बतौर किसान से ज्‍यादा ऊपर-ऊपर एग्रो-प्रोसेसिंग उद्योगों में निमग्‍न एग्री बिजनस इंटरप्रेन्‍योर अधिक हैं। वे बीज-खाद-कीटनाशकों के विक्रेता, पेट्रोल-डीजल के व्‍यापारी, ईंट भट्ठों के मालिक, ट्रैक्‍टर-बाइक-कृषि औजारों के व्‍यापारी, कमीशन एजेंट और सहकारी चीनों मिलों तथा बैंकों के निर्देशक आदि भी हैं।”  

[5] इसका अर्थ लोग यह नहीं समझें कि हम यह मानते हैं कि वे बस उजड़ने वाले हैं या उजड़ने के कगार पर हैं। जब वे वास्‍तव में उजड़ जाएंगे और उजड़कर गरीब या मध्‍य किसान की पांत में आ जाएंगे, तो बात अलग होगी और तब वे धनी किसान नहीं रह जाएंगे। इसी के साथ हम यह भी स्‍पष्‍ट कर दें कि जब हम धनी किसानों में अलग-अलग संस्‍तर होने की बात करते हैं तो इसका यह मतलब भी नहीं है कि उनके साथ हमारे विरोध व संघर्ष की रणनीति के मामले में कोई बदलाव आएगा। तो फिर हम ऐसा क्‍यों कर रहे हैं? ऐसा हम धनी किसानों के विभिन्‍न संस्‍तरों के बीच पनपने वाले उनके आपसी अंतर्विरोधों का युद्धरत या युद्धरत स्थिति में आने के लिए कोशिश करने वाले सर्वहारा वर्ग तथा इसके सहयोगियों की राजनीति को आगे बढा़ने तथा मुख्‍य निशाने को यथासंभव छोटा करने के लिए कार्यनीतिक लचीलेपन का अधिकतम उपयोग करने के इरादे से करते हैं। जाहिर है,सुधारवादियों को इसकी चिंता नहीं होती है, क्‍यों‍कि वे सुधारवादी राजनीति के लिए युद्धरत रहने वाले जीव हैं। 

[6] “In October we confined ourselves to sweeping away at one blow the age-old enemy of the peasants, the feudal landowner, the big landed proprietor. This was a struggle in which all the peasants joined. At this stage the peasants were not yet divided into proletarians, semi-proletarians, poor peasants and bourgeoisie.(Lenin, Proletarian Revolution and Renegade Kautsky)

[7] “We have nothing against you either, but hand over your surplus grain, don’t profiteer and don’t exploit the labour of others. Until you do so we shall hit you with everything we’ve got. We are taking nothing from the working peasants; but we shall completely expropriate all those who employ hired labour and who grow rich at the expense of others” (p.211, LCW, Vol-29)

[8]And the last statement I would like to quote is the argument about the rich peasants, the big peasants, the kulaks as we call them in Russia, peasants who employ hired labour. Unless these peasants realise the inevitability of the doom of their present mode of production and draw the necessary conclusions, Marxists cannot do anything for them. Our duty is only to facilitate their transition, too, to the new mode of production.” (p.210 LCW Vol 28, bold ours)

[9] ‘द ट्रुथ’ के 12वें अंक के पेज देखें जहां हम इसका जिक्र करते हैं। वह यह है – ”Now, according to us, if the well-to-do peasants are not going to be immediately hit hard, why are they so much vocal?……”

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