कार्पोरेट के नए हिमायती क्‍या हैं और वे क्रांतिकारियों से किस तरह लड़ते हैं [1]

पी.आर.सी., सी.पी.आई. (एम.एल.)

यह लेख ‘आह्वान’ पत्रिका में छपी आलोचना की प्रति आलोचना है, जो मूलतः ‘यथार्थ’ पत्रिका, अंक 11 (मार्च 2021) में प्रकाशित हुई है। आलोचना को पाठक इस लिंक पर जा कर पढ़ सकते हैं। इस प्रति आलोचना का अंग्रेजी संस्करण पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें। इस लेख की दूसरी किश्त को हिंदी व अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए क्रमशः यहां और यहां क्लिक करें।

[प्रथम किश्त][1]

मुख्य बात पर आने से पहले मैं आपका परिचय माओवादी कार्यकर्ताओं के एक समूह के मुखिया “बुद्धिजीवी कुनबे” से कराना जरूरी समझता हूं जिन्होनें हाल के दिनों में या कहें एक अरसे से क्रांतिकारियों को ‘शिक्षित’ करने की प्रचंड ज़िम्मेदारी अपने सिर ओढ़ी हुई है।[2] वे प्रकांड एवं मशहूर शिक्षक हैं। पाठक पूछ सकते हैं – इसमें क्या खास बात है? असल में वे कोई मामूली शिक्षक नहीं, अपितु अन्य शिक्षकों से भिन्न, “पैदाइशी” शिक्षक हैं; और हर पैदाइशी शिक्षक की तरह, जैसा कि इस कुनबे का हर सदस्‍य अपने को समझता है, इसके हर सदस्य में दूसरों को शिक्षित करने की अथक अतृप्य कामना है। किसी बहस के दौरान तर्क-वितर्क में उनकी दिलचस्पी अत्यल्प होती है। शिक्षण का उनका तरीका किसी शिकारी सरीखा है। साथ ही उद्दंड शिकारी की नैसर्गिक ‘प्रतिभा’ से लैस ये ‘शिक्षक’ मानते हैं कि उन्हें किसी के बारे में कैसी भी जुबान इस्तेमाल करने (अक्सर गालियों की हद तक वमनकारी) और खुद को ‘शिक्षक’ (या शिकारी) सिद्ध करने हेतु कोई भी हरबा अख़्तियार करने का पैदाइशी हक है। सालों तक इस परंपरा में प्रशिक्षित और पूर्ण दीक्षित होने की प्रक्रिया में उन्होने दूसरों (विपक्षियों) पर झपट्टा मारने की एक कपटपूर्ण रीति भी अपना ली है जिसका एक कुत्सित पैटर्न स्पष्टता से दृष्टिगोचर होता है। यह पैटर्न क्या है? यह है, जब कोई और विकल्प न बचे तो हर मैदान में अपने कार्यक्रम के अनुरूप अपनी पसंद का अखाड़ा तैयार कर वहां विपक्षी पर टूट पड़ना। किसी शिकारी के अंदाज में ही वे जहां गलतियां न हों वहां आविष्कार कर लेते हैं। आखिर ‘शिक्षक’ शिक्षा देने का लोभ संवरण ये कैसे करें! उनके द्वारा पीआरसी की हालिया आलोचना[3] में पाठक इस पैटर्न को भलीभांति देख सकते हैं। खैर, हम ऐसी आलोचनाओं से सुपरिचित हैं। हमें ऐसी दुर्दांत ‘कामना’ पर ऐतराज भी नहीं – यह तो क्रांतिकारी जीवन का हिस्सा है और हमें इससे भी अधिक का तजुरबा है। ऐसे ‘शिक्षकों’ से सुलझने का तरीका आना चाहिए जो हमें आता भी है। जहां तक इस ‘शिक्षक कुनबे’ का सवाल है हम पाठकों को बताना चाहते हैं कि हमारा-इनका सामना पहली बार नहीं हो रहा है और आंदोलन की स्थिति को देखते हुये अंतिम भी प्रतीत नहीं होता है।

मुख्य बिन्दु पर आते हुये सबसे पहले मैं पाठकों से क्षमा चाहूंगा, क्योंकि यह पोलेमिकल लेख लंबा, और किश्तों में, होगा। यह पहली किश्त पीआरसी के लेख को गलत संदर्भ में उद्धृत करने, गलत उद्धृत करने और विकृतिकरण तथा अपने शब्द हमारे मुंह से ‘कहलवाने’ की उनकी ‘पद्धति’ को उदाहरण सहित उजागर करती है। पहली किश्‍त का यही मुख्‍य उद्देश्‍य है। इन उदाहरणों की उनकी आलोचना में हर ओर भरमार है। अतः इनकी सफाई काफी जगह और वक्त लेने वाली है। किन्तु इसके साथ ही साथ मुख्य विषय की संक्षिप्त चर्चा भी इसमें है। लेकिन सर्वांगीण सैद्धान्तिक एवं राजनीतिक विवेचना अगली कड़ी में होगी जिसमें इस त्वरित पहली किश्त के सार-संक्षेप और बाकी विषयों (जैसे सोवयत संघ में सत्‍ताधारी मजदूर वर्ग की किसानों के प्रति नीति का इतिहास भी होगा) का विस्तारपूर्वक वर्णन भी शामिल होगा। हम पाठकों से इसलिए भी क्षमा मांगना चाहते हैं कि अगली किश्‍त भी लंबी और इतिहास के उद्धरणों से भरी होगी। 

कृषि क़ानूनों तथा किसान आंदोलन पर ‘शिक्षक कुनबे’ की अवस्थिति, एक संक्षिप्‍त चर्चा

आगे बढ़ने से पूर्व कृषि क़ानूनों एवं किसान आंदोलन पर इनकी अवस्थिति जानना आवश्यक है, सिर्फ इसलिए नहीं कि इससे बहस के मुद्दे या इसकी रूपरेखा स्पष्ट होगी (वह तो होगी ही) बल्कि आरंभ में ही यह साफ कर देने के लिए भी कि वे दरअसल क्या हैं, और कुछ हद तक यह भी स्पष्ट करने के लिए कि वे पीआरसी जैसे क्रांतिकारी संगठनों से इस अंदाज में क्यों भिड़ते हैं। खैर, नवीन कृषि क़ानूनों और वर्तमान में जारी किसान आंदोलन पर उनकी समझ क्या है हम इस पर आते हैं।

वे वर्तमान किसान आंदोलन का मुख्यतः इस समझ के साथ विरोध करते हैं कि यह पूरी तरह कुलक आंदोलन है और आवश्यक वस्तुओं की जमाखोरी पर रोक हटाने वाले कानून को छोड़कर नवीन क़ानूनों के जरिये कृषि में कॉर्पोरेट पूंजी का प्रवेश न तो गरीब एवं मध्यम किसानों के लिए हानिकारक है न ही कृषक खेती व गांवों के लिए अहितकर है। बल्कि वे तो यह भी कहते हैं कि कुछ मायनों में पहले दो कानून गरीब व निम्न मध्यम किसानों के लिए किसी हद तक हितकारी भी हो सकते हैं। क्या नए क़ानूनों के अंतर्गत कांट्रैक्ट खेती गरीब व मध्यम किसानों के संपत्तिहरण की दर को तेज या धीमा करेगी? इस पर वे काफी मशक्‍कत करके सोची-समझी अस्पष्टता बनाये रखते हैं।[4] इस हेतु वे गोलमोल बात करने का वाक्छल अपनाते हैं – नवीन क़ानूनों और तदजनित नवीन पेशागतपद्धति का ठोस विश्लेषण प्रस्तुत करने के बजाय वे इन क़ानूनों के परिणाम जनित पेशागतपद्धति को भारत में दशकों से टुकड़ों में जारी कांट्रैक्ट खेती की पेशागतपद्धतियों व अनुभवों के समान ठहरा देते हैं। इस प्रकार वे यह असपष्ट अवस्थिति लेते हैं कि यह नवीन क़ानूनों से छोटे किसानों की संपत्तिहरण की दर तेज होगी ही, यह सुनिश्चित रूप से कहना नामुमकिन है। वे यह भी कहते हैं कि संपत्तिहरण की दर तेज या धीमी कुछ भी हो सकती है। इस तरह वे इस पर कुछ भी ख्याली अंदाज लगाने की जगह खाली छोड़ देते हैं। ये ऐसा क्‍यों करते हैं? शायद इसलिए कि इस अवस्थिति के जरिये वे कॉर्पोरेट पूंजी के खिलाफ छोटे किसानों के दिनों दिन बढ़ते दृढ़ निश्चय पर ठंडा पानी डल जाए।[5]

जहां तक पहले दो कृषि क़ानूनों से न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व मंडियों पर आसन्न खतरे का संबंध है वे इस पर प्रसन्नता जताते हैं। वे इसकी व्‍यावख्‍या इससे तरह से करते हैं जिसका अर्थ यह है कि इससे गरीब किसानों व मजदूर वर्ग को लाभ होगा, क्योंकि वे सोचते हैं (जिसके पक्ष में काफी तर्क भी दिये गए हैं) कि एमएसपी एवं मंडी व्यवस्था के विघटन व किसान आंदोलन के पराभव से कुलकों की कमर टूटेगी और खाद्य सामग्रियों के दाम निश्चित रूप से गिरेंगे, क्‍योंकि कृषि उत्‍पादों की एमएसपी के कारण कृषि‍ उत्‍पादों की ऊंची ‘फ्लोर प्राइस’ खत्‍म हो जाएगी । उनकी नजर में इससे भी अधिक अहम बात यह है कि एमएसपी व मंडी व्यवस्था को नेस्तनाबूद कर ये नवीन कानून धनी किसानों की आर्थिक ताकत की रीढ़ तोड़ देंगे और अगर एमएसपी न रहे तो कॉर्पोरेट पूंजी का व्यापक दखल देहाती प्रतिक्रिया की ताकतों को कड़ी चुनौती देगा और उसका साम्राज्य उसके भारी बहाव में बह कर बरबाद हो जायेगा।

उनके विचारों का सार संक्षेप यही है। इसे थोड़ी और गहनता से जांचे तो हम पाएंगे कि उनके अनुसार कृषि में कॉर्पोरेट पूंजी का दखल उत्पादक शक्तियों का विकास और धनी किसानों के मुक़ाबले गरीब किसानों व ग्रामीण मजदूरों की मदद कर ग्रामीण भारत में बुर्जुआ शासन के किले की मजबूत दीवार बनी प्रतिक्रियावादी शक्तियों को समाप्त करने में सहायक होगा। वे कहते हैं कि देहाती गरीबों तथा देहाती अमीर किसानों के हितों में यहां कोई समानता नहीं है। पर जरा रुकिए! हमारे ‘शिक्षकों’ के अनुसार कुछ समानतायें तो फिर भी हैं। कॉर्पोरेट पूंजी के खिलाफ ग्रामीण गरीबों एवं अमीर किसानों के बीच न सही, अमीर किसानों के खिलाफ कॉर्पोरेट पूंजी और ग्रामीण गरीबों में तो जरूर हैं! आखिर पहला दूसरे का मददगार जो ठहरा! यह एक अनोखी खोज है, पर इसका अर्थ क्या है? इसका अर्थ वही है जैसा कि पहले कहा गया है, कि वे आम तौर पर पूंजीवाद व खास तौर पर पूंजीवादी कृषि की भारतीय कृषि में अभी भी एक अग्रगामी भूमिका मानते हैं जबकि दरअसल आज पूंजीवाद का अस्तित्व ही निरंतर क्रांतिकारी संकट को जन्म दे रहा है। उनके तर्क उन्‍हें किस मंजिल पर ला पटके हैं हम देख सकते हैं। यह एक वस्तुगत विवेचना का विषय है कि कृषि क़ानूनों पर उनके विचारों को खुद गरीब किसान कैसे देखते हैं। संभवतः वे उन्हें दौड़ा लेंगे! अतः गरीब किसानों और कॉर्पोरेट पूंजी के बीच तो कोई संयुक्‍त मोर्चा नहीं बनता दिखता है। लेकिन कॉर्पोरेट पूंजी व कृषि क़ानूनों की उनकी अप्रत्‍यक्ष या प्रत्‍यक्ष वकालत को देखें, तो एक तरफ उनके कुनबे और दूसरी तरफ कॉर्पोरेट पूंजी व मोदी सरकार के मध्य हम कुछ समान हितों की एक ठोस जमीन पाते हैं। उनकी समझछारी इसे साफ-साफ इंगित करती प्रतीत होती है। मोदी भी तो हमारे ‘शिक्षकों’ के ही सुर ताल में बारंबार कह रहे हैं कि ये कानून गरीब एवं लघु किसानों के लाभ के लिए हैं। हमारा कहना यह नहीं कि हमारे शिक्षकों की मोदी सरकार व कॉर्पोरेट पूंजी के साथ सांठगांठ है पर दोनों के बीच संयुक्त मोर्चे का एक ठोस आधार तो मौजूद है ही। सवाल है, मोदी के फासि‍स्‍ट शासन ने जैसे तमाम सामाजिक वर्गों की पुरानी स्थिति‍ बिगाड़ दी है और पुराने तमाम समीकरण अस्थिर कर दिए हैं, वैसे ही क्‍या यह भी मोदी शासन के समय की एक अतिविशष्‍ट घटना या इसका उत्‍पाद होगा? इस अर्थ में, हम निश्चित रूप से यह नहीं बता सकते हैं और कोई भी इसे पहले से नहीं बता सकता है कि ऐसी ‘समानतायें’ आगे चलकर क्या रूप लेंगी और इन भद्रजनों को किन पुरानी-नई राहों पर ले जाएंगी।

कृषि क़ानूनों की असलियत, हमारी अवस्थिति  

खैर, इन कृषि क़ानूनों की असलियत क्या है? संक्षेप में, नवीन क़ानूनों द्वारा प्रतिपादित कॉर्पोरेट खेती या (उसकी पूर्वगामी) कॉर्पोरेट नियंत्रण में कांट्रैक्ट खेती पूंजीवादी खेती का ही द्वितीय चरण है जो उस प्रथम चरण की ही निरंतरता में है जिसने पहले तीन-चार दशकों में गरीब-मध्यम किसानों की बरबादी की शाहराह में कई मील के पत्थर गाड़े हैं। इसी कड़ी में यह दूसरा चरण भी गरीब, लघु, मध्यम तथा छोटी दौलत वाले थोड़े अमीर हिस्से सहित पूरी किसान आबादी (सर्वाधिक अति-धनिकों की एक बारीक परत को छोड़कर जो वास्तविक अर्थों में अमीर-सम्पन्न किसानों के बीच से उभरते असली देहाती बुर्जुआ हैं) की बरबादी की लहर साबित होगी।[6] इसीलिए हमने पूंजीवादी कृषि के इस द्वितीय चरण के आगाज को हरित क्रांति भाग – 2 का नाम दिया है जिसकी जद पहले भाग की जद से बहुत बड़ी है ये नवीन कानून पुरानी स्थिति का बस दोहराव मात्र नहीं, कृषि में पूंजीवाद की ऐतिहासिक मंजिल के अनुरूप पूरे देहात को कॉर्पोरेट पूंजी के हाथ सौंपने हेतु नए इरादों व शक्तियों से लैस हैं। इसीलिए हम कहते हैं कि मोदी सरकार यहां रुकेगी नहीं बल्कि इन्हीं इरादों के अनुरूप और नए कानून लाएगी। कॉर्पोरेट पूंजी अपने विजय अभियान में पूरे देहात खास तौर पर गरीब किसानों को रौंदेगी, उनके साथ बेहद क्रूरतम व्यवहार करेगी और उन्हें निपट कंगाल बना शहरों में ला पटकेगी जहां वे बेरोजगार सर्वहारा की रिजर्व फौज में शामिल हो पूर्णतया ‘निशस्त्र’ सर्वहारा वर्ग की पहले से ही गिरती मजदूरी दरों को और भी नीचे की ओर धकेलेगी। यहीं पर हम कृषि क़ानूनों और श्रम क़ानूनों (लेबर कोड) में मौजूद नजदीकी रिश्ते को आसानी से देख सकते हैं। दोनों मिलकर सम्पूर्ण मेहनतकश वर्ग को बदतरीन तरीके से गुलामी में धकेलते हैं। देहात में बुर्जुआ-फासिस्ट राज्य का मकसद कृषि पर आधारित आबादी की तादाद घटाना है प्रथम तौर पर 35% तक लाना (लगभग 60% से) और शहरों में मकसद उन्हें बेरोजगार युवा मजदूरों से पाट देना है जो अपनी श्रमशक्ति सस्ती से सस्ती दर पर बेचने को विवश होंगे। पर हमारे ये ‘शिक्षक’ सज्जन कहते हैं कि कॉर्पोरेट गरीबों के हितों पर चोट नहीं न करेंगे। कृषि क़ानूनों पर उनके विचार मुख्यतः इसी धुरी के चारों और घूमते हैं। यह शर्मनाक है, पर यही वह असली बात है जिससे यह समझा जा सकता है कि मौजूदा जारी किसान आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में सर्वहारा वर्ग के क्रांतिकारी कार्यभारों की पीआरसी की प्रस्तुति पर उन्‍होंने एक वहशी अंदाज में एवं भयंकर तरीके से हमला क्यों बोला।

लेकिन इस पर अभी इतना ही, और आगे बढ़ते हैं।

अपनी पसंद की पिच तैयार करना

जैसा कि सभी को ज्ञात होगा, हाल ही में ‘शिक्षकों के कुनबे’ ने मौजूदा किसान आंदोलन पर पीआरसी के नजरिए की एक आलोचना प्रस्तुत की है। इस आलोचना की पद्धति वही है जिसकी हमने आरंभ में ही चर्चा की है। पीआरसी की पुस्तिका (“किसानों की मुक्ति और मजदूर वर्ग”) या इसकी फेसबुक पोस्ट से उन्होने बहुत कम उद्धृत (गलत उद्धृत पढ़ें) किया है पर जितना भी किया है वह बामकसद गलत, तोड़मरोड़कर या संदर्भ रहित ढंग से किया है ताकि अपनी पसंद से निश्चित की गई पिच और अपने निर्धारित ‘पाठ्यक्रम’ के आधार पर आलोचना की जमीन वे तैयार कर सकें। पूरी आलोचना में बस यही है। आइये देखते हैं कैसे।

बहुतों ने पीआरसी की पुस्तिका पढ़ी है पर इन ‘शिक्षकों’ के अलावा किसी ने नहीं कहा, और संभवत: न ही कोई कहेगा कि यह “सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों[7] के इतिहास” और “किसान प्रश्न पर मार्क्सवादी-लेनिनवादी सिद्धांतों” को प्रस्तुत करती है या उसके बारे में है। जिन्होने इसे पढ़ा है वे इसकी पुष्टि करेंगे कि इसमें इन प्रश्नों पर एक पैरा तो क्या एक पूरा वाक्य भी नहीं कहा गया है। किसान प्रश्न के इतिहास पर न कोई चर्चा है और न ही इस संबंध में मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, स्टालिन के कोई उद्धरण दिये गए हैं। पर इससे ‘शिक्षकों’ को क्या, उन्‍हें पीआरसी पुस्तिका के लेखक पर जानबूझकर या अज्ञानतावश इतिहास के विकृतिकरण का आरोप मढ़ना था[8] और उन्‍होंने ठीक यही किया है।  

और इस तरह ‘वे’ हमें ध्वस्त करने हेतु आलोचना का ‘अश्वमेध यज्ञ’ आरंभ करते हैं। कभी लगता है कि वे हमें नहीं किसी और की आलोचना कर रहे हैं। हम एक ओर भौंचक्के और विस्मित हैं, तो दूसरी ओर हमें यह सोचकर चिंता भी होती है कि उनकी मानसिक स्थिति ठीक-ठाक तो है न!

फिर, हमारे ‘शिक्षक’ कहते हैं कि सर्वहारा राज्य के अंतर्गत सामूहिक फार्मों में गठित किसानों को ‘उचित दामों’ का पीआरसी का नारा धनी किसानों की पूंछ में कंघी करने वाला भ्रामक नारा है।[9] हमने सर्वहारा के अधिनायकत्व में सामूहिक फार्मों को “उचित दामों” की चर्चा इस लेख में बाद में करते हुये दिखाया है कि हमारे ‘शिक्षकों’ को खुद इस बारे में अभी बहुत शिक्षा की जरूरत है। पर अभी पाठकों द्वारा उनसे इतना ही पूछना ही दिलचस्प होगा कि क्या वे सर्वहारा के अधिनायकत्व में सामूहिक किसानों को “उचित दामों” के हमारे “भ्रामक नारे” से इंकार करते हैं? क्या सर्वहारा राज्य में किसानों को ऐसे उचित दाम नहीं मिलेंगे? पाठक यह जानकर आश्चर्यचकित होंगे कि वे इस ”भ्रामक नारे” से इंकार नहीं करते। उन्होने भी इस तथ्य का कतई खंडन नहीं किया कि किसानों को उचित दाम दिए जाएंगे या सोवियत यूनियन में दिया गया था। दरअसल वे इससे इंकार कर ही नहीं सकते। लेकिन सवाल है, फिर ये नारा भ्रामक कैसे हो गया? ”इसलिए क्योंकि पीआरसी के लेखक ने यह नहीं बताया कि ये दाम ठीक-ठीक कितने होंगे” – हमारे ‘शिक्षक’ कहते हैं! घोर आश्‍यर्च की बात है! “क्योंकि पीआरसी के लेखक ने नहीं बताया कि ये ठीक कितने होंगे” अतः वे समझते हैं कि वे पीआरसी के लेखक के मुंह में अपने शब्द डाल सकते हैं और साथ में यह भी दावा कर सकते हैं कि पीआरसी सर्वहारा अधिनायकत्व के अंतर्गत सामूहिक किसानों को “लाभकारी दामों” (जो उनके अनुसार लागत से 40-50% ऊपर हैं) का वादा करता है! पाठक कृपया याद रखें कि ये शब्द (किसानों को लाभकारी मूल्य की बातें) पीआरसी के लेखक के नहीं, इन नमूनों के हैं और फिर अपने शब्दों के आधार पर ये कहते हैं कि पीआरसी ने इतिहास का विकृतिकरण किया है। कितनी धूर्तता! फिर भी वे हमें बदनाम करने में असफल रहे हैं।

इसमें पीआरसी के लेखक की आखिर ‘गलती’ क्‍या है जिसका उपयोग उन्होने कुछ भोले पाठकों (उन्हें भी अब असली बात समझ आ ही गई होगी) को यह भरोसा दिलाने के लिए किया कि या तो पीआरसी को इतिहास का कोई ज्ञान नहीं या लाभकारी दामों की हिमायत में वे इसे जानबूझकर विकृत कर रहे हैं? ये तो राई का पर्वत बनाने का भी मामला नहीं कहा जा सकता। ये तो शून्य में से पर्वतों का पर्वत बनाने का मामला है! अगर पीआरसी के लेखक ने कोई ‘गलती’ की है (अगर इसे गलती कहा जाये) तो बस इतनी कि उसने सामूहिक फार्मों से संबंधित ‘उचित दामों’ के पीछे के या उससे जुड़े इतिहास की विस्तार से चर्चा किए बिना ही आज के किसान आंदोलन की एमएसपी की मांग या एमएसपी पर सम्पूर्ण उपज की खरीद गारंटी की मांग के संदर्भ में अपने विचारों और राजनीतिक अभियान को स्पष्ट करने हेतु इसका जिक्र भर किया। वे कहते हैं कि पीआरसी के लेखक ने इसे छिपाया। लेकिन सवाल है, किसलिए? “धनी किसानों की पूंछ में कंघी करने के लिए” – ये कहते हैं; अजीब बात है। लगता है कि वे अपना मानसिक संतुलन खो बैठे हैं। जब पीआरसी उपज की बिक्री सहित किसानों की लंबे अरसे से चली आ रही सभी तरह की तकलीफ़ों के वास्तविक समाधान के लिए सर्वहारा राज्य और सामूहिक फार्म बनाने का आह्वान करती है और इस बात को उस बहस का मुद्दा बनाती है जो इसके बगैर अभी तक बेमकसद थी तो इसमें छिपाने वाली बात क्या है? सर्वहारा राज्य तो खुद में ऐसी बात है जिसका जिक्र होते ही शोषकों को दौरे पड़ने लगते हैं। पीआरसी का लेखक इसका जिक्र करके फिर और क्या छिपा रहा था? हां, वह इस संदर्भ में “उचित दामों” के इतिहास में नहीं गया क्योंकि वह उसके मुख्य विषय से भटकाव होता।

अब इन इल्जामों की बात भी ठोस ढंग से कर लेते हैं कि ‘पीआरसी धनी किसानों या कुलकों की पूंछ में कंघी कर रही है’ या ‘पीआरसी धनी किसानों और कुलकों को सर्वहारा क्रांति करने का आह्वान’ कर रही है (ये फिर से उनके अपने शब्द हैं, पीआरसी के लेखक के नहीं); या फिर इस बात को लें कि ‘पीआरसी गरीब किसानों को धनी किसानों की दुम बनाने में जुटा रही है’। ये सब सिर्फ पीआरसी को बदनाम करने के प्रयास हैं। अगर पीआरसी एमएसपी का उसके पुराने स्‍वरूप में समर्थन करती तो सर्वहारा अधिनायकत्व में सामूहिक फार्म और “उचित दाम” का प्रश्न क्यों उठाती? हम जो कह रहे हैं वह यह कि कृषि उपजों की लागत से 40-50% अधिक दामों की मांग आज इसलिए गलत मांग बन जाती है क्योंकि हम एक ऐसे समाज में रहते हैं जिसमें पूंजीवादी पद्धति से उत्पादन होता है और पूंजीवादी सामाजिक सम्बन्धों के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति की तरक्की का रास्ता गलाकाट पूंजीवादी स्पर्धा में टिकने की उसकी क्षमता से निर्धारित होता है, और यह कि यहां पूंजीवादी बाजार के नियम होते हैं जिसके फलस्‍वरूप किसानों को लागत से ऊपर कोई भी दाम दूसरों के लिए उपभोग के मालों के और भी ज्‍यादा अथवा ऊंचे दामों में परिवर्तित हो जाते हैं एवं अन्य कई प्रतिगामी परिघटनाओं को जन्म देते हैं। समाजवाद में अगर सामूहिक फार्म के किसानों को उपज के दाम लागत से ऊपर भी मिलते हैं तब भी वे मूलतः पूंजीवादी मुनाफा नहीं होते हैं और इस कारण अन्य प्रतिगामी परिघटनाओं को वे जन्म नहीं देते हैं या नहीं देंगे। सामूहिक फार्मों के किसानों को दिये जाने वाले ‘दामों’ के वास्तविक तथ्य स्‍वयं इसकी पुष्टि करते हैं। इस लेख में हमने आगे इसकी समुचित विस्तार से चर्चा की है और आवश्यकतानुसार अगली किश्तों में सर्वांगीण विवेचना प्रस्तुत की जायेगी। पर आइए पहले यह देखें कि पीआरसी ने किसान आंदोलन या धनी किसानों के बारे में ऐसा क्या लिखा है जिसे वे ‘धनी किसानों की पालकी का कहार’ बनना कहते हैं।

पीआरसी ने मौजूदा कॉर्पोरेट विरोधी अड़ियल और समझौताहीन किसान आंदोलन में प्रकट हुए चंद नए लक्षणों का विश्लेषण करते हुये दिखाया है कि इन नए लक्षणों ने इस आंदोलन को एक अंदरूनी द्वंद्वात्मक अंतर्विरोधी गति प्रदान कर दी है जिसके समाधान की अनिवार्य शर्त पूंजीवाद का उन्मूलन है अतः उस रूप में इसका अंतर्य क्रांतिकारी है जो स्वयं इसके बाहरी प्रतिक्रियावादी स्वरूप के विपरीत और उससे टकराव में है और लगातार उसे तोड़ रहा है। अंतर्य और बाह्य स्‍वरूप के इस द्वंद्व को पीआरसी ने उचित ही महत्‍व दिया है। इसकी आंतरिक गति का विश्लेषण करते हुये ही पीआरसी ने यह दिखाने की कोशिश की है कि अगर यह किसान आंदोलन कॉर्पोरेट पूंजी के खिलाफ अपने हमले को और तीखा करते हुए आगे बढ़ता जाएगा और अगर साथ ही मजदूर वर्ग भी इसमें भावी शासक वर्ग और भावी सर्वहारा राज्य के अगुआ के रूप में राजनीतिक व वैचारिक हस्तक्षेप करता है तो यह एक क्रांतिकारी आंदोलन का रूप अख़्तियार कर सकता है या कम से कम आम जनता के असंतोष के सामान्य एवं विशेष प्रश्नों के केंद्र के रूप में उभरकर सर्वहारा व किसान विक्षोभ का मिलन बिन्दु और इस ओर लक्षित नये सामाजिक शक्ति संतुलन की धुरी बन सकता है। द्वंद्ववादी तथा ऐतिहासिक मौतिकवादी विकास के विज्ञान के मद्देनजर सर्वाधिक महत्‍व की बात यह है कि इसके कारणों व कारकों को बाहर से आयातित करने की जरूरत यहां नहीं है। ये आंदोलन के अंदर ही मौजूद हैं और इनसे ओतप्रोत हो लगातर द्वंद्व में हैं। पीआरसी ने विस्तार से इनकी चर्चा (हालांकि कोई सही ही यह मांग कर सकता है कि इसमें कुछ और व्याख्या व स्पष्टीकरण की आवश्यकता है) के जरिये दिखाया है कि इसके सारतत्व और इसके बाहरी स्वरूप के बीच का यह अंतर्विरोध इस आंदोलन को एक संक्रमणकालीन चरण बना रहा है जिसकी जड़ें इसकी अंतर्वस्तु या अंतर्य में हैं। इसकी अंतर्वस्तु का इसके बाहरी स्वरूप से यह टकराव इसे पुराने और प्रधानतः कुलक व धनी किसान आंदोलन से एक नई जागृति वाले आंदोलन में तब्दील कर रहा है। यही अंतर्विरोध इसे पुराने और नए के बीच ‘विच्छेद’ के उग्र वातावरण के सांचे में ढाल रहा है जो इसके निरंतर बदलते और अस्थिर राजनीतिक तथा सामाजिक व्यवहार में प्रतिबिम्बित हो रहा है। पर ऐसा करते हुये हम किसी ऐसे विचलन का कतई शिकार नहीं हुए हैं जिसका इल्जाम हमारे ये ‘शिक्षक’ हम पर आयद कर रहे हैं। हम उन्हें चुनौती देते हैं कि वे पुस्तिका से कोई पूर्ण उद्धरण देकर इसे दिखायें। उनका तरीका जाहिर है। पीआरसी ने जो लिखा है उस पर चर्चा-बहस के जरिये उसका तार्किक एवं ठोस खंडन अन्यथा सहमति पर पहुंचने के बजाय उनकी भागीदारी वाली अन्य सभी बहसों की तरह यहां भी उनका निशाना छद्म आधारों पर हमें ही नहीं लेनिन तक को भी बदनाम कर (इसे हम अगली किश्त में दिखाएंगे) येनकेन प्रकारेण हमें धराशायी करना है जैसा कि हमने ऊपर दिखाया है। इस हेतु हमारे ‘शिक्षकों’ को हमेशा कुछ ऐसा ‘सृजित’ करना पड़ा है जो हमको धराशायी करने का पसंदीदा अखाडा तैयार करने में मदद कर सके। यही उनके इस तरह के रुग्‍न लड़ाकूपन के पीछे का रहस्य है।

आगे हम पीआरसी की पुस्तिका और 3 किश्तों में लिखित फेसबुक पोस्ट से उद्धृत करेंगे ताकि सभी पाठक खुद यह फैसला कर पायें कि धनी किसानों के संदर्भ में पीआरसी की राजनीतिक दिशा क्या है और यह भी कि हमारे ‘शिक्षक’ इसे किस तरह तोड़ते-मड़ोरते हैं।

धनी किसानों और किसान आन्दोलन पर पीआरसी की समझ

सबसे पहले मैं पीआरसी की पुस्तिका से उद्धृत करना चाहूंगा। इसकी प्रस्तावना के अंतिम भाग में आन्दोलनरत किसानों का आह्वान कुछ इस तरह से किया गया है –

“अंत में, इस प्राक्‍कथन के माध्‍यम से हम … दुहराना चाहते हैं कि किसानों को इस आंदोलन को पूंजीवाद के खात्‍मे तक चलाना चाहिए, क्‍योंकि इससे कम में उनकी मुक्ति संभव नहीं है। पूंजीवादी कृषि की अब तक की संपूर्ण यात्रा ने एकमात्र यही दिखाया है कि व्‍यापक तथा मेहनतकश किसानों का पूंजीवाद में कोई भविष्‍य नहीं है। आइए! किसानों द्वारा कार्पोरेट के विरूद्ध अपनी जीवन-रक्षा के लिए शुरू किये गये इस आंदोलन को हम कार्पोरेट की जननी पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के विरूद्ध मोड़ें और इसे समाज और इतिहास, दोनों के रंगमंच से हटाने का संघर्ष बना दें। देश की बहुसंख्‍यक आबादी वाला मजदूर वर्ग भी जल्‍द ही इस लड़ाई की अग्रिम पंक्ति में और इसके शीर्ष पर खड़ा होगा और किसानों के साथ अविचल तथा बिना भटके मैदान में डटा मिलेगा।” (बोल्ड हमारा)  

क्या इसे धनी किसानों का पिछलग्गू बनना कहा जा सकता है? आइये पुस्तिका के कुछ और उद्धरण देखें।

“पूंजीवादी शोषण की सोच व विचारधारा के आधार पर संचालित कृषि के कुप्रभावों के आगोश में जा फंसे किसान (एक अत्‍यंत छोटी लेकिन धनी किसान आबादी को छोड़कर#[10]) आज कृषि से बाहर हो जाने के खतरे को देख गुस्‍से और दर्द से चीत्‍कार कर उठे हैं। निर्णायक वर्चस्व की ओर कार्पोरेट के बढ़ते कदमों ने अलग-अलग संस्तरों में बंटे होने के बावजूद पूरे किसान समुदाय को एकताबद्ध कर दिया है (आज हम ये कह सकते हैं कि इसने अन्य सभी तबकों के शोषित और उत्पीड़ित जनता को भी एकजुट कर दिया है#)। यह पूर्व के कृषि क्रांतिकारी किसान आंदोलनों की टूटी कड़ी को एक भिन्न (सर्वहारा वर्गीय) अंतर्य के साथ जोड़ने वाले उसके एक नये दौर की ओर इंगित करता है तथा उसके लिए एक सर्वथा नया क्षितिज खोलता है।”

मैं यहां पुस्तिका का एक पूरा अनुच्छेद उद्धृत करना चाहूंगा ताकि पीआरसी की उन धनी किसानों के बारे में समझ और साफ तौर से प्रकट हो सके जिसका अस्तित्व (ज़ाहिर है, धनी किसानों के रूप में बचे रहना#) भी खतरे में है क्योंकि उन्हें लगता है कि नए कृषि कानूनों के आने के बाद कृषि क्षेत्र में उनकी कीमत पर कॉर्पोरेटों का वर्चस्व कायम हो जाएगा।   

“आंदोलन की अंतिम जीत के लि‍ए और कार्पोरेट द्वारा की जाने वाली तबाही दोनों से बचने के लिए (अपेक्षाकृत रूप से कम धनी किसानों के एक हिस्से के समक्ष#) एक ही रास्‍ता बचा है – मजदूर वर्ग और गरीब किसानों के साथ मिलकर पूंजीवाद के विरूद्ध अविचल लड़ाई। ग्रामीण मजदूर वर्ग और गरीब किसानों का मार्ग तय है। उन्हें अपनी नियति पता है कि उन्हें सर्वहारा वर्ग के संग चलना है। मुख्‍य रूप से ये मंझोले और धनी किसान ही हैं जिन्‍हें यह सोचना है कि बड़े पैमाने के पूंजीवादी उत्पादन तथा कार्पोरेट वर्चस्व के समक्ष बुरी तरह मिट जाने से ये कैसे बच सकते हैं। इस प्रश्‍न का सामना आज किसानों में एकमात्र अकेले वही कर रहे हैं। हमें उन्‍हें स्‍वतंत्र रूप से इस पर विचार करने का अवसर देना चाहिए। सर्वहारा वर्ग द्वारा सुझाये रास्‍ते को न मानने की स्थिति में हम यही कहना चाहेंगे कि उन्हें उनके भाग्य पर छोड़ देना चाहिए। बस इतना कहेंगे कि मौजूदा आंदोलन के क्रांतिकारी अंतर्य के उभार (भावी सर्वहारा राज्‍य के अंतर्गत व उसके रास्‍ते पर चल कर किसानों की मुक्ति के मार्ग के उभार) को रोकना अब मुश्किल ही नहीं असंभव है, क्योंकि इसकी सौ प्रतिशत गारंटी स्वयं पूंजीवादी उत्पादन व्यवस्था की मानवद्रोही अराजकता ने कर दी है जो दिनों-दिन भयानक रूप लेती जा रही है और जिसने पूरे ग्रामीण अंचल के सामने इस एकमात्र रास्ते के अमल के अलावा और कोई बेहतर विकल्प नहीं रख छोड़ा है। इतिहास की आगे की यात्रा का यही प्रशस्‍त पथ है और पूरी मानवजाति को अपनी मुक्ति के वास्‍ते आज नहीं तो कल इसी रास्‍ते से गुजरना है। ” (बोल्ड हमारा)

क्या ये धनी किसानों के साथ समझौते की नीति है या उनका नेतृत्व करने की नीति है जिससे हम आंदोलन के बैनर के पीछे छुपे दुश्मनों को, अगर वे हैं तो, बेनकाब कर सकेंगे? हम जानते हैं और कई जगह हमने लिखा भी है कि आंदोलन के अगले (उंचे स्तर के) चरण में ऐसे कई दुश्‍मनों की असलियत सामने आएगी और वे आंदोलन से भाग खड़े होंगे या भाग खड़ा होने के लिए मजबूर होंगे। हमने लिखा है कि अगर यह आंदोलन अपनी मांगों को ले कर अडिग रहता है और संघर्ष और तीखा होता है जिससे किसानों और बुर्जुआ वर्ग के बीच के पुराने सामंजस्‍यपूर्ण चट्टानी रिश्‍ते में दरारें आ जाएं, तो सबसे पहले ये बुर्जुआ पार्टियां, जो आज संघर्षरत किसानों की समर्थक बन रही हैं, और इनके नेतृत्‍व में चलने वाला अत्यंत धनी किसानों का एक तबका भी बेनकाब हो आंदोलन से भाग खड़ा होगा। फिर वे सभी इस फासीवादी सरकार के साथ मिलकर आंदोलन रत किसानों के दमन में शामिल हो जाएंगे। लेकिन इसकी पूर्वशर्त किसान आंदोलन का तीखा होता जाना है। ये विपक्षी दल किसानों का समर्थन इसीलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि किसान मोदी को चुनाव में सत्ता से बाहर कर देंगे और इन्‍हें सत्‍ता में ले आएंगे जिसके बाद ये भोले-भाले किसान अपनी आज की मांगों के बारे में सब कुछ भूल जाएंगे। हमारी समझ से यह अभी संभव या कम से कम आसानी से होने वाला नहीं लगता है। आंदोलन की मांगों का क्रांतिकारी अंतर्य ऐसा होने नहीं देगा, बशर्ते आंदोलन और तीखा हो और इन मांगों पर किसान अडिग बने रहें। ऊपर दिए गये अनुच्छेद में, असल में, सभी संभावित दुश्मनों और कमजोर तत्वों को एक खरी लेकिन समय और वक्‍त की नाजुकियत को देखते हुए अप्रत्‍यक्ष चेतावनी दे दी गई (जो एक ही साथ मेहतनकश किसानों को इशारे करने जैसा भी है) कि अगर वे इस पूंजी के साम्राज्य को उखाड़ फेकने के लिए (क्योंकि उन्हें खुद लगता है कि कृषि कानूनों से उनका भविष्य भी खतरे में है) मजदूर वर्ग के नेतृत्व के साथ नहीं आते हैं तो उन्हें उनके भाग्य पर छोड़ देना होगा। इसमें उन तक कई तरह के संदेश एक साथ भेजे जा रह हैं जिसमें यह गंभीर संदेश भी शामिल है कि जैसे विभिन्‍न तरीकों से पिछले दिेनों में धनी किसानों के हाथों गरीब किसानों की बर्बादी हुई है, ठीक वैसे ही अब कॉर्पोरेट कंपनियों के हाथों ये धनी किसान बर्बाद और बेदखल कर दिए जाएंगे। क्या इस दस्तावेज़ में यह बात धनी किसानों को साफ-साफ बताई गई है? हां, काफी साफ और सीधे तौर पर। आइये देखें –

“वर्ग सचेत मजदूर और समझदार गरीब किसान उनसे कहेगा – ‘आप ठीक समझ रहे हैं। पूंजीवाद इसी तरह काम करता है। पूंजीवादी विकास इसी तरह के विकास को कहा जाता है। पूंजी का स्वाभाविक चरित्र मुट्ठी भर बड़े से बड़े पूंजीपतियों के पास या उनके ट्रस्टों में केंद्रीकृत होने की है। कृषि क्षेत्र में कार्पोरेट के आगमन से मचने वाली यह चीख-पुकार इसका ही उदाहरण है। यह पूंजीवादी व्‍यवस्‍था में छोटी ‘मछलियों’ के बड़ी ‘मछलियों’ द्वारा भोजन बना लि‍ये जाने के नियम का ही विस्‍तारि‍त रूप है जिसमें समस्‍त ‘मछलियों’ (यानी छोटी और बड़ी मछलियों दोनों#) का सामना अब ‘शार्कों’ और ‘मगरमच्छों’ से होने वाला है जिसका परिणाम पूंजीवाद के रहते समस्‍त ‘मछलियों’ के विरूद्ध ही होगा।”

उपरोक्त कथन को पढने के बाद क्या कोई कह सकता है कि पीआरसी केंद्रीकरण के सवाल को बर्बाद हो रही बड़ी मछलियों के दृष्टिकोण से उठा रही है? नहीं, बिलकुल नहीं। जब हम सर्वहारा वर्ग के राज और सामूहिक खेती की बात करते हैं, तो इसका सबसे पहले अर्थ यही है कि हम यह सवाल भावी शासक सर्वहारा वर्ग के दृष्टिकोण से प्रस्तुत कर रहे हैं जो उन किसानों की एक गरिमामय और समुचित जीवन की मांग को पूरा करने की पूर्ण गारंटी करता है जो शोषण की प्रवृति को त्याग कर सर्वहारा राज्य के बैनर तले सामूहिक खेती के लिए संगठित होंगे। गरिमामय जीवन में “उचित दाम” की गारंटी भी आती है जो कि सामूहिक खेतों के किसानों को दी जाएगी जब तक कि वे एक ऊंचे स्‍वरूप के सामाजिक संगठन का प्रतिनिधित्‍व करने वाले राजकीय फार्मों और भविष्य के किसान कम्यूनों के लिए तैयार नहीं हो जाते। क्या ऐसी प्रस्तुति बेदखली के मुद्दे को धनी किसानों के दृष्टिकोण से उठाना या उनका पिछलग्गू होना कहा जा सकता है? ऐसा केवल उन्हें लग सकता है जो दरअसल सर्वहारा राज्य और सर्वहारा क्रांति के खिलाफ हैं। हालांकि खेती से बेदखली के सवाल को छोटे किसानों के दृष्टिकोण से उठाना भी इस सवाल का सर्वहारा वर्गीय क्रांतिकारी प्रस्तुतीकरण नहीं है। हमने देखा है कि कैसे छोटे व गरीब किसानों के दृष्टिकोण से सवाल को प्रस्तुत करते हुए हमारे ‘शिक्षक’ कॉर्पोरेटों के पैरों में जा गिरे हैं। यहां एकमात्र सही प्रस्तुतिकरण तभी होगा जब हम सर्वहारा क्रांति को सामने रखते हुए किसानों के मुद्दे के समाधान की बात करेंगे चाहे वो कृषि कानूनों का मामला हो या न्यूनतम समर्थन मूल्य का। मुद्दों को केवल पूंजीवादी सामाजिक संबंधों के दायरे में देखने से हम यकीनन अर्थवाद में जा फसेंगे जिससे एक ऐसी गंभीर और विस्फोटक परिस्थिति में, जो पूरे देश में एक क्रांतिकारी संकट को जन्म देने की संभावना से परिपूर्ण है, हम केवल अधूरे सुधारवादी मांगों तक सीमित रह जाने के लिए अभिशप्‍त होंगे, या फिर कॉर्पोरेट के हितों की वकालत करते भी पाये जा सकते हैं।   

केवल एक क्रांतिकारी प्रस्तुतीकरण के साथ ही हम सम्पूर्ण मानवजाति और पूरी ग्रामीण आबादी को मौजूदा व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़े होने का आह्वान कर सकते हैं क्योंकि केवल यही (सर्वहारा राज्य स्थापित करने का रास्ता) सबों की मुक्ति का आखि‍री विकल्प या रास्‍ता है। आज के समय इस के बिना कोई कहना, यानी आंशिक मांगों को इन बातों के आगे भिड़ा देना निश्‍चय ही क्रातिकारी प्रस्‍तुतीकरण नहीं है। 

पुस्तिका में हमने दृढ़ता से और लगातार आंदोलन में मौजूद क्रांतिकारी अंतर्य की बात की है जिसके बारे में हमने कहा है कि मौजूदा पूंजीवादी संकट की गहराई और इसके विस्‍तार को देखते हुए आंदोलन को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। आखिर यह अंतर्य किन वर्गों का प्रतिनिधित्व करता है? बेशक इसमें खेतिहर मजदूरों से ले कर गरीब किसानों तक की पूरी गरीब ग्रामीण आबादी शामिल है जो कि ग्रामीण आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है। यह ध्‍यान रहे कि इस अंतर्य के केंद्र में धनी किसानों के होने की तो बात ही छोड़ दीजिए, इसमें मध्यम किसान वर्ग भी शामिल नहीं है। इसलिए केवल हमारे ‘शिक्षकों’ जैसे बेईमान लोग ही कहेंगे कि मौजूदा किसान आंदोलन में सर्वहारा वर्ग के कार्यभार के बारे में पीआरसी द्वारा किया गया प्रस्‍तुतीकरण क्रांतिकारी प्रस्तुतीकरण नहीं है। बार-बार एक ही बात को दोहरा कर वे भोले-भाले पाठकों को धोखा देना चाहते हैं और इसलिए उन्होंने पुस्तिका में धनी किसानों पर लिखी पीआरसी की मुख्‍य बातों को कहीं उद्धृत नहीं किया है लेकिन लगातार यह कहते रहे कि ‘पीआरसी धनी किसानों को सर्वहारा क्रांति करने के लिए ललकारता है।’ हमारे इन गिरे हुए ‘शिक्षकों’ ने हमें ध्वस्त करने और पाठकों को बेवकूफ़ बनाने का यही रास्ता लिया है।

आइए, धनी किसानों पर पीआरसी की समझ को और साफ करने के लिए कुछ और उदाहरण देखें –

“वे (धनी किसानों का वो हिस्सा जो किसानों के अन्य तबकों की तरह अंततः पूंजीवादी खेती की अतार्किकता का शिकार हो गया है#) इसके लिए जिम्‍मेवार स्थिति (कॉर्पोरेट वर्चस्व वाली लूट की परिस्थिति#) को पलटना भी चाहते हैं, लेकिन अतीत (जिसमें वे छोटी मछलियों के शिकारकर्ता थे#) और निजी पूंजी के प्रति मोह के कारण उन्‍हें मजदूर वर्ग के नेतृत्‍व और सर्वहारा राज्‍य की बात से डर लग सकता है और इसलिए वे आगे बढ़ने से ज्‍यादा पीछे की ओर प्रवृत्त हैं। लेकिन भविष्‍य का खौफ भी उन पर हावी है जो इन्‍हें सर्वहारा वर्ग के समीप लाता है। इसलिए एकमात्र समय के साथ ही अतीत का यह बोझ दूर होगा (या नहीं होगा#)। कार्पोरेट वर्चस्‍व के दुष्‍परिणामों का अहसास जैसे-जैसे गहराएगा वैसे-वैसे वे बाकी चीज भी समझ जाएंगे। जैसे आज वे नये तेवर और नये अंतर्य वाली मांगों के साथ लड़ने के लिए आगे आए हैं, वैसे ही आगे बाकी बातों के लिए भी स्‍वाभाविक रूप से तैयार होते जाएंगे।” (बोल्ड हमारा) 

केवल एक निहायती बेवकूफ़ और शातिर शख्स को ही लग सकता है कि ये धनी किसानों का पिछलग्गू होना है। मुख्यतः यह आज के धनी किसानों के उस एक हिस्से का विवरणमात्र है जो पूंजीवादी खेती के दूसरे चरण, जिसमें कॉर्पोरेटों का वर्चस्व होगा और वे इस दूसरे दौर के सिरमौर होंगे, का विरोध करने के लिए बाध्य हो गए हैं। हमारे महान ‘शिक्षक’ कहेंगे कि वे केवल अपने मुनाफे का हिस्सा बचाने के लिए लड़ रहे हैं। तो इससे क्या? किसानों का कौन सा तबका अपना मुनाफा सुरक्षित करने की बात नहीं सोचता है, भले ही वह इसमें सफल न हो पाये? पूंजीवादी वातावरण में घिरे होने से इसके अतिरिक्‍त और कुछ दूसरा हो भी नहीं सकता है जब तक कि सर्वहारा वर्ग का आंदोलन और उसकी विजय की घड़ी नजदीक नहीं आती है या कम से कम उसके द्वारा इसके निमित करारा राजनीतिक व वैचारिक संघर्ष नहीं चल रहा हो। आज दोनों में से हम एक को करने में भी सक्षम नहीं हैं। यही नहीं, कोई करने की कोशिश कभी करे तो हम उससे सीखने के बजाए उसका विरोध करने में ज्‍यादा दिलचस्‍पी दिखाते हैं। आज धनी किसानों के अस्तित्व को (धनी किसान बने रहने को) खतरे में डालती इन परिस्थितियों में उसकी शुरूआती प्रतिक्रिया आखिर और कैसी होगी? और कौन कह रहा है कि उनमें परिवर्तन हो गया है या हो जाएगा या वे रातों रात या सुदूर भविष्य में क्रांतिकारी हो जाएंगे? हम सिर्फ इतना कह रहे हैं कि सब कुछ इस पर निर्भर करता है कि कॉर्पोरेट के साथ उनका टकराव तथा मुकाबला किस तरह आगे बढ़ता है और मौजूदा बुर्जुआ समाज के मौजूदा संकट को और ज्‍यादा गहराने में वे क्‍या भूमिका अदा करते हैं। पीआरसी के लेखकों ने केवल इतनी बात कही है। और इसलिए पीआरसी जहां संपूर्णता में किसानों की इस नई जागृति का स्वागत करती है वहीं वह इसे क्रांतिकारी जागृति के पैमाने से दूर मानती है। हां, हम इसके क्रांतिकारी परिवर्तन की कामना करते हैं और इसके लिए हर संभव प्रयास भी कर रहे हैं। लेकिन ये कई चीज़ों के साथ साथ मजदूर वर्ग की राजनितिक वैचारिक चेतना और अपनी नेतृत्वकारी भूमिका में आने की उनकी तैयारी पर भी निर्भर करता है। पीआरसी के लेखक ने केवल यही लिखा है और हम अपनी इस बात को दृढ़ता से कहते हैं कि अगर मजदूर वर्ग सर्वहारा क्रांति करने और मौजूदा संकट को अपने पक्ष में इस्तेमाल करने के लिए सशक्त व तैयार नहीं है, अर्थात अगर पूंजीवाद को नहीं हटाया गया तो संघर्षरत किसान चाहें जितनी बहादुरी से लड़ लें कॉर्पोरेट कब्जे के खतरे को रोकना नामुमकिन होगा और है। पीआरसी ने इसी केंद्रीय विचार से और कृषि क्षेत्र में होने वाली तबाही के मद्देनजर धनी किसानों के एक स्‍ंस्‍तर में उत्‍पन्‍न उनकी मनःस्थिति पर प्रकाश डाला है जो सन्निकट कॉर्पोरेट कब्जे के खतरे के कारण भयानक उथल-उथल से गुजर रही है।      

पीआरसी मानता है कि धनी किसानों का एक कम धनी तबका है जो अत्यंत धनी किसानों के तबके से अलग है, क्योंकि वे कृषि के कॉर्पोरेटीकरण का खतरा सीधे महसूस कर रहे हैं और इसके खिलाफ लड़ाई के मैदान में हैं। आइये देखें धनी किसानों के इस तबके की बदली हुई मनःस्थिति के बारे में पीआरसी का क्या कहना है जिनका चरित्र, पीआरसी के अनुसार, अभी तुरंत नहीं बदला है, और न ही बदल सकता है।

“…आज का धनी किसान भी पुराने समय का धनी किसान नहीं है, जो पूंजीवादी कृषि और बाजार के प्रसार से लाभान्वित तो हो रहा था लेकिन इसके भावी बुरे परिणामों के प्रति पूरी तरह अनजान और अनभिज्ञ बना हुआ था। इन्हें तब पूंजीवादी कृषि में एकमात्र लाभ ही लाभ नजर आता था और दूर-दूर तक अपना कोई बड़ा प्रतिद्वंद्वी नहीं दिखता था। पूंजीवादी कृषि का लाभ उठाते हुए वे इस बात से बेखबर थे कि वे पूंजीवादी रास्‍ते पर आगे-आगे चलते हुए जिस पूंजीवादी कृषि को गहरा और विस्‍तृत बना रहे हैं वह विकसित होकर बड़ी कार्पोरेट पूंजियों को कृषि में प्रवेश दिलाएगी और दैत्‍याकार प्रतिद्वंदी ला खड़ा करेगी। इस तरह वे भविष्‍य से बेखबर स्वयं अपनी भावी तबाही का मार्ग प्रशस्‍त कर रहे थे। वे इस बात से अनजान थे कि यही पूंजीवादी कृषि अपने विकास के अगले चरण में उनके अस्तित्‍व को संकटग्रस्‍त कर देगी। आज वह समय आ गया है। कार्पोरेट का खेती में प्रवेश वास्तविक और आसन्‍न बन चुका है और इससे उत्‍पन्‍न प्रतिकूलताओं ने इनके मन में उथल-पुथल मचाना शुरू कर दि‍या है। भविष्य में ये प्रतिकूलताएं और बढ़ेंगी और इसी के साथ इन पर संकटों की आमद भी बढ़ेगी। इससे गरीब किसानों का ही नहीं धनी किसानों का भी पूंजीवादी व्‍यवस्‍था पर से विश्‍वास हिलेगा और हिल रहा है। इस आंदोलन में उनकी अभी तक की भूमिका स्‍वयं इसका गवाह है।”

क्या यह धनी किसानों का पिछलग्गू होना है? नहीं, बिल्कुल नहीं। यह उनमें आ रहे बदलावों का संज्ञान लेना और उसे सामने लाना कहते हैं। जो महान क्रांतिकारी लोग आज के धनी किसानों को, जो गरीब व मध्‍य किसानो के साथ ना सिर्फ शोषणकारी रिश्तों से बल्कि अन्‍य तरह के गहरे सामाजिक संबंधों से भी गहराई से जुड़े हैं, रूस के सौ साल पहले के कुलकों से तुलना कर रहे हैं जिनके पास कॉर्पोरेटीकरण का कोई कड़वा अनुभव नहीं था, इन लोगों को स्‍थाई और ढांचागत संकट में फंसा मौजूदा पूंजीवाद नहीं दिखता है जिसमें हर दरमियानी तबका अपने अस्तित्व के ऊपर मंडराते खतरे को महसूस कर रहा तथा झेल रहा है। यह उस क्रांतिकारी परिस्थिति की आमद को दिखाता है जो सभी तबकों को, यहां तक कि सबसे पिछड़े और सामाजिक तौर पर प्रतिक्रियावादी तबकों को भी शिक्षि‍त कर रहा है, चेतनासंपन्‍न बना रहा है, भले ही मृत्‍यु के भय से। हालांकि यह बिना कहे और तयशुदा बात है कि धनी किसानों के व्‍यवहार में आए इन बदलावों को बढ़ा-चढ़ाकर कर देखना और इनके बदले हुए राजनीतिक व्यवहार से यह अनुमान लगा लेना कि ये सर्वहारा वर्ग द्वारा सामने लाये गये विकल्प को खुशी-खुशी अपना लेंगे एक बहुत बड़ी भूल होगी जो कि मेहनतकश किसानों और सर्वहारा वर्ग तक के राजनीतिक-वैचारिक निरस्त्रीकरण की तरफ ले जाएगा। लेकिन इसी के साथ यह भी सच है कि इन बदलावों को, जो कि राजनीतिक रूप से अत्‍यंत महत्वपूर्ण हैं, मानने से इंकार करने या इन्‍हें नज़रअंदाज़ कर देने का अर्थ है मौजूदा किसान आंदोलन की राज्‍य से जारी भिड़ंत के ठीक बीचोंबीच, और खासकर पूंजीवादी व्यवस्था के लगातार गहराते वैश्विक संकट के मध्‍य में, हमें सशक्त करने वाले महत्वपूर्ण रणनीतिक कदमों से, जो कि हमें बड़ी ग्रामीण आबादी के संयुक्त कार्रवाई को आगे बढ़ाने और साथ ही भूतपूर्व दुश्मन के एक हिस्‍से को तटस्थ करने में मदद करेगा, ऐसी तमाम चीजों से स्‍वयं को दूर कर लेना या उससे पूरी तरह भटक जाना। निस्‍संदेहये बातें या चीजें सिर्फ उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं जो निर्भीक हो कर क्रांति के लिए तैयारी करने के बारे में सोच रहे हैं। लेकिन उनके लिए जो मानते हैं कि सर्वहारा क्रांति में अभी कम से कम दो या तीन पीढ़ियां खपने वाली हैं, उनके लिए ये बातें बेमतलब की बाते हैं। वे ठीक ही इन बातों में अपना दिमाग नहीं लगाते और आर्थिक प्रस्तुतीकरण से संतुष्ट रहते हैं।

इसके बारे में पीआरसी साफ कहता है कि – 

“मुख्‍य बात यहां यह निकलती है कि मजदूर वर्ग और शोषित-उत्‍पीड़ि‍त किसान समुदाय दोनों के सामने एक दूसरे का सहयोगी बनने और बनाने का कार्यभार लंबित है। समय की मांग है कि शोषित-उत्‍पीड़ि‍त किसानों के विशाल तबके को जितनी जल्‍दी हो सके सर्वहारा क्रांति और भावी सर्वहारा राज्य के पक्ष में खड़ा होना चाहिए … इस वर्तमान किसान आंदोलन ने दोनों के समक्ष इस कार्यभार को पूरी शिद्दत से और नये दौर की विशेषताओं के साथ न सिर्फ रेखांकित किया है, अपितु परिभाषित भी करने का काम किया है।” (बोल्ड हमारा)  

अंत में पीआरसी किसान आंदोलन के प्रति समर्थन का आधार भी साफ तौर पर रेखांकित करती है। आइए देखें, वे क्‍या हैं –

“हमारी पार्टी, जो मजदूर वर्ग का एक अगुआ दस्ता है, उपरोक्त शोषणमुक्त समाज बनाने के कार्यक्रम और इसके लिए (पूंजीवाद को उखाड़ फेकने और सर्वहारा वर्ग का राज कायम करने की लड़ाई और सभी उत्पादन के साधनों का समाजीकरण करके किसानों को सामूहिक खेती में ले जाना, आदि का लक्ष्य जो इस पुस्तिका में जगह-जगह वर्णित व लिखा है#) एक साथ मिलकर संघर्ष करने के आह्वान के आधार पर कार्पोरेट के खिलाफ उनके जीवन-मरण के संघर्ष में आंदोलनरत किसानों के साथ एक चट्टान की तरह अपनी पूरी क्षमता के साथ खड़ी है।” (बोल्ड हमारा)

पीआरसी आगे कहती है कि – 

“हम (पीआरसी की केंद्रीय कमिटी#) अपनी पार्टी और मजदूर वर्ग की तरफ से आंदोलनरत किसानों तक यह संदेश पहुंचाना चाहते हैं कि ‘बड़ी पूंजी से अस्तित्व-रक्षा की जारी किसानों की लड़ाई का मजदूर वर्ग स्वयं अपनी लड़ाई के रूप में इस आधार पर समर्थन करता है कि वे (संघर्षरत किसान#) इसे अंतिम जीत तक जारी रखेंगे और यह समझेंगे कि पूंजीपति वर्ग की सत्ता को हटाए बिना और इसके मानवद्रोही खेल से पूरी तरह बाहर आये बिना न तो किसानों का और न ही समाज या मानवजाति का ही कुछ भला होने वाला है। इसलिए हम किसी भी तरह से पूंजीवादी व्यवस्था के रहते हुए जीवन की बुनियादी समस्‍याओं तथा गर्दिश से उनकी मुक्ति पाने की उम्मीद का प्रसार किसानों के बीच नहीं करना चाहते हैं, क्योंकि यह सरासर झूठ होगा।” (बोल्ड हमारा)

पाठक साथियो! आप खुद ही फैसला करें और बताएं, क्या यह पिछलग्गू बनने की दिशा है?

लेकिन रुकिए, हम किसानों पर पीआरसी की फेसबुक पोस्ट (तीन किश्तों में किये गये पोस्ट) के भी कुछ उद्धरण पेश करना चाहते हैं। पहली ही पोस्ट में हमने आंदोलन का मूल्यांकन और उसके प्रति अपना नजरिया रखा है (जो पहले ही अनुच्छेद में दिया गया है) जो इस प्रकार है –

“अपने वर्तमान स्वरूप में, जहां तक यह आंदोलन और इसमें शरीक आम किसान कुलकों और बड़े धनी किसानों के नेतृत्व‍ में यानी कृषि क्षेत्र के बुर्जुआ वर्ग के पीछे-पीछे चल रहे हैं, वहां तक और उन अर्थों में इस आंदोलन की सीमा और आंदोलन की मांगों की अतार्किकता दोनों तुरंत प्रकट हो जाती हैं, और इस अर्थ में इसका बाह्य प्रतिक्रियावादी स्‍वरूप सामने आता है कि वह पूंजीवाद से चिपके रहते हुए ही उसे पीछे हटने के लिए बाध्य‍ करने की बात करता है। लेकिन इसका अंतर्य इस अर्थ में क्रांतिकारी है कि इसकी मांगें स्‍वयं इसे पूंजीवाद के दायरे से बाहर खींच ले आने को आतुर हैं और तभी तक अतार्किक प्रतीत होती हैं जब तक इसका नेतृत्‍व बड़े धनी किसान या कुलक कर रहे हैं। यहां मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका इस आंदोलन के बाह्य स्‍वरूप और इसके अंतर्य के बीच के अंतर्विरोध को तेज करने में निहित है, न कि इसका मूर्खतापूर्ण समर्थन या विरोध करने में। इस आंदोलन में मजदूर वर्गीय हस्‍तक्षेप करने के पहले यह समझना अत्‍यावश्‍यक है कि इसके प्रतिक्रियावादी बाह्य स्‍वरूप का कारण इसका पूंजीवादी समर्थक नेतृत्‍व है, जबकि इसकी मांगे अपने अंतर्य में पूंजी के तर्कों के विरूद्ध हैं। आंदोलन की सबसे महत्‍वपूर्ण बात इसकी अभी तक समझौताविहीन गति है जिसने बाह्य आवरण और अंतर्य के बीच इस दिलचस्‍प अंतर्विरोध के हल को मजदूर वर्ग के लिहाज से एक अत्‍यंत दिलचस्‍प मोड़ पर ले आया है। हम पाते हैं कि किसान और कॉरपोरेट दोनों ही पीछे हटने को तैयार नहीं हैं। अगर किसान अपनी मांगों पर अड़े रहते हैं तो देश की राजनीति में एक क्रांति‍कारी परिस्थित‍ि के आगाज से इनकार करना असंभव है। जो लोग भी इसका जाने-अनजाने मूर्खतापूर्ण तरीके से यानी इस आंदोलन के क्रांतिकारी सार को समझे बिना ही, समर्थन में ऊलजलूल तरीके से चीखे-चिल्‍लाये जा रहे हैं, वे अंतत: इस क्रांतिकारी परिस्थिति की आमद से कन्‍फ्यूज ही होंगे और ऐन मौके पर इधर-उधर भटकते पाये जाएंगे। संभवत: बिना पूर्व मानसिक तैयारी के क्रां‍तिकारी परिस्थिति के आगमण पर इसके धूल और गुब्‍बार में कहीं खो जाएंगे। वहीं जो इसका सार संकलन किये बिना ही सिर्फ इसके बाह्य स्‍वरूप को देखकर इसका जड़तापूर्ण तरीके से एकांगी विरोध कर रहे हैं, उनके लिए सबसे बड़ा खतरा यही है कि वे बूरी तरह अलगाव में चले जाएंगे और वे भी इसके मूर्खतापूर्ण समर्थन करने वालों की तरह ही क्रांतिकारी परिस्थिति में इधर-उधर खड़े हो महज दांत पीसते नजर आएंगे।”

और फिर से, तीसरी (समापन) किश्त में लिखी इन मुक्‍तसर बातों को पढ़ें –

“कारपोरेट खेती की जगह किसान समाजवादी कृषि के तहत सर्वहारा राज्‍य के साथ कॉन्ट्रैक्ट खेती करके ही वर्तमान दुर्दशा से बाहर निकल सकते हैं। वे अपने आंदोलन को उस ओर मोड़ने में जितनी देर करेंगे, उनकी दुर्गति उतनी तेजी से उनका नाश करती जाएगी। यह किसानों के हाथ में है कि वे मजदूर वर्ग के इस प्रस्‍ताव को ठुकराते हैं या स्‍वीकारते हैं। अगर वे अपने बड़े धनी किसान नेताओं पर, जो पूंजीवाद के परिणामों से पूंजीवाद को दूर किये बिना ही लड़ना चाहते हैं, और कारपोरेटपक्षी नीतियों को सरकार पर दबाव बनाकर रद्द कराने का ख्‍वाब पाले हुए हैं, बिना सोचे-समझे भरोसा रखते है तथा मजदूर वर्ग द्वारा बताई गई दिशा में अपने संघर्ष को नहीं ले जाते हैं, तो जल्‍द ही उनका सत्‍यानाश (विनाश) हो जाएगा। खासकर गरीब किसान जल्‍द ही आने वाले समय में सर्वहारा की पातों में शामिल होने के लिए बाध्‍य होंगे। चाहे आज हो या कल, चाहे पूरी तरह उजड़ कर हों या फिर भावी सर्वहारा राज्‍य के सहयात्री (सामूहिक) किसान के रूप में, लेकिन उनका भविष्‍य सर्वहारा एवं मजदूर वर्ग के साथ ही जुड़ा हुआ है। पूंजीवाद पर इसकी (सर्वहारा की) जीत में ही उनकी जीत है। अगर किसान आंदोलन मजदूर वर्ग के इस प्रस्‍ताव पर, जो मजदूरों की तात्‍कालिक मांगों के आधार पर नहीं स्‍वयं उनकी (किसानों की) मांगों के आधार पर उनके लिए अंतिम समाधान पेश करता है, विचार करते हैं तभी और एकमात्र तभी हम सच्‍चे अर्थों में मजदूर-किसान एकता की बात कर सकते हैं।  भले ही मजदूर वर्ग कारपोरेट द्वारा किसान वर्ग के द्वारा बलात लूटने की कार्रवाई का तब भी विरोध करता रहेगा। लेकिन जब तक गरीब किसानों का व्‍यापक हि‍स्‍सा बड़े धनी किसानों की बुर्जुआ वर्ग व राज्‍य की राजनीति का हिस्‍सा और उनका प्‍यादे बने रहेंगे, तब तक मजदूर-किसान एकता की बात महज एक नारा ही बनी रहेगी।”

हम देख सकते हैं कि यह कहना कि पीआरसी धनी किसानों को क्रांति के लिए ललकार रहा है या गरीब किसानों और मजदूर वर्ग को धनी किसानों का पिछलग्गू बनाने की बात करता है सरासर झूठ और निराधार है।

हम सीधे इस मुद्दे पर आते हैं। पाठकों को यह जान कर शायद घोर आश्‍चर्य हो कि उनको सबसे ज्यादा क्रोध हमारे इस आह्वान से हुआ जिसमें हमने सर्वहारा राज्य को संघर्षरत किसानों की मुक्ति के एकमात्र रास्ते के रूप में पेश किया और उसे किसान आंदोलन पर चल रही बहस में शामिल कर दिया जो हम जानते हैं कॉर्पोरेट और उसकी दलाल मोदी सरकार के खिलाफ जनाक्रोश का आज प्रस्थान बिंदु बन गया है।उन्होंने इसे ही पीआरसी पर अपने हमले का केंद्र बिंदु बनाया है। हालांकि यह भी सच है कि हमारे इस आह्वान से इंकार करने की हिम्मत वे नहीं जुटा पाए। वे इससे इंकार नहीं कर सके कि एकमात्र भावी सर्वहारा राज्य ही आंदोलनरत भारतीय किसानों की मांगों और समस्याओं को मुकम्‍मल हल कर सकता है। तब उन्होंने बड़ी चालाकी से इसे झुठलाने के लिए यह बेबुनियाद आरोप लगाया कि पीआरसी ने सोवियत रूस में हुए समाजवादी प्रयोगों के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है ताकि वे अपने हमले के लिए मनचाही पिच तैयार कर सकें और फिर पीआरसी का यह कह कर मजाक उड़ाया कि हमें ‘सर्वहारा क्रांति संपन्न करने की हड़बड़ी’ है। पीआरसी की ‘सर्वहारा क्रांति‍ करने की इस हड़बड़ी’ से भी वे बुरी तरह तिलमिला उठे हैं, मानो हमने उनकी किसी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो। यह दिखाता है कि पीआरसी के इस आह्वान ने उनके किसी नाजूक मर्मस्‍थल पर चोट किया है। लेकिन इससे उत्‍पन्‍न बेचैनी में उन्होंने पीआरसी पर एक बड़ा खुशनुमा आरोप मढ़ दिया जो हमारे लिए एक तमगा से कम नहीं है।वे कहते हैं कि हम सर्वहारा क्रांति के लिए हड़बड़ी में हैं। उन्होंने यह माना कि हमें ‘हड़बड़ी’ तो है लेकिन सर्वहारा क्रांति के लिए, ना कि किसी और मकसद के लिए। यहां हमारे ‘शिक्षक’ शत प्रतिशत सही साबित हुए हैं। हमें यह आरोप खुशी-खुशी मंज़ूर है, महानुभावों! यह सही है कि पीआरसी कम्‍युनिस्‍ट आंदोलन में आप जैसे सुधारवादियों की भरमार के बावजूद, अन्‍य और दूसरी कमजोरियों के बावजूद सर्वहारा क्रांति‍ के लिए आने वाले पहले सुअवसर को भुनाने की ताक में है। लेकिन निश्चिंत रहिए, हम जल्‍दी में जरूर हैं, लेकिन विवेकपूर्ण तरीके से जल्‍दी में हैं। आप जैसा चाहते हैं हम वैसी गलती नहीं करने वाले हैं। वैसे हम जानते हैं कि आप इतने तिलमिलाए हुए क्यों हैं। पाठकों, असल में इस आह्वान से उनके कई तरह के मंसूबों पर एक साथ पानी फिर गया है जिसमें एक तो स्‍वयं कई पीढ़ियों को सर्वहारा क्रांति की तैयारी में खपा देने का इनका अति प्रसिद्ध मंसूबा भी शामिल है। उनकी नई समाजवादी क्राति का फलसफा कितना लेनिनवादविरोधी है हम अगली किश्‍त में दिखाएंगे, लेकिन अभी हम मात्र इतना कहना चाहते हैं कि उनके ऐसे मंसूबे उनके इस विश्वास के तालमेल में हैं कि भारत में पूंजीवाद अभी भी एक प्रगतिशील भूमिका अदा कर सकता है और इसीलिए क्रांति की संभावना को इतना सन्निकट देखने या इसे तत्काल चिंता का विषय मानने की ये जरूरत ही महसूस नहीं करते हैं। हम पहले यह इशारा कर चुके हैं कि उनके कृषि कानूनों पर उनके अब तक लिखे लेखों के आधार पर वे यह मानते प्रतीत होते हैं कि कृषि में कॉर्पोरेटों की एंट्री उत्पादक शक्तियों के विकास और ग्रामीण भारत में प्रतिक्रियावाद के अंत में मददगार साबित होगी। स्‍वाभाविक है कि पहले वे इन सारी ‘पूर्व-शर्तों की पूर्ति’ सुनिश्चित होने तक इंतजार करेंगे, खंदकें खोदेंगे और केवल ये सब होने के बाद ही सर्वहारा क्रांति के पथ पर आगे बढ़ेंगे। इनका यही फलसफा है। कितने चालाक और स्‍मार्ट हैं ये लोग! दो कौड़ी के इस फलसफे को वे लेनिनवाद के नाम पर खपाते हैं!!  महाशय, हम आपके सुनियोजित योजना पर पानी फेरने के लिए दिल से माफ़ी मांगते हैं! लेकिन इससे ज्यादा (माफी के अतिरिक्‍त) हम आपकी और कुछ मदद नहीं कर सकते। हम आगे की ऐसी गुस्‍ताखियों के लिए भी आज ही इकट्ठा माफी मांग ले रहे हैं।

किसान आंदोलन पर चल रही बहस में क्‍या और कितने मत हैं?

किसान आंदोलन पर परस्‍पर विरोधी या अलग-अलग मतों का एक लंबा वर्णपट (स्पेक्ट्रम) है, हालांकि उन्हें दो मूल सवर्गों में बांटा जा सकता है। पहला, समर्थन का और दूसरा विरोध का। फिर हम यह भी देख सकते हैं कि इन दो संवर्गों के बीच कई अलग-अलग सोच व दिशा हैं जो कि सर्वहारा वर्ग की नेतृत्वकारी भूमिका या उसकी क्रांतिकारी पार्टी की भूमिका को लेकर आधारित हैं। हमारी नज़र में कृ‍षि क्षेत्र पर कॉर्पोरेट नियंत्रण से उत्‍पीड़ि‍त सभी तबकों के किसानों का इस तरह एक साथ उठ खड़ा होना और सौ दिनों से भी अधिक समय तक कृषि में कॉर्पोरेटों के प्रवेश को सुनिश्चित करने वाले कानूनों के खिलाफ डटे रहना (अभी भी यह जारी है और उम्मीद है कि आगे लंबे समय तक चलेगा) तथा आगे भी हर हाल में डटे रहने की बात करना कोई मामूली घटना या कार्रवाई नहीं है। यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक-राजनीतिक कार्रवाई व घटना है, क्योंकि यह ना केवल कॉर्पोरेट के खिलाफ है बल्कि मूल रूप से पूंजीवादी खेती के दूसरे चरण के आगाज़ के खिलाफ है जो पूरी व्‍यवस्‍था को क्रांतिकारी संकट में ला पटक सकता है। तीन-चार दशक पहले पूंजीवादी कृषि के शुरू हुए प्रथम चरण ने पहले से ही लंबे समय से चले आ रहे कृषि के संकट को और गहरा बना दिया है (जो पहली बार 90 के दशक में किसानों की आत्महत्याओं के रूप में तीखे तौर पर प्रकट हुआ)। इस दौर में धनी किसानों के तबके को फायदा हुआ जिसकी कीमत आर्थिक तबाही के रूप में गरीब, निम्न मध्यम और मध्यम किसानों को चुकानी पड़ी। लेकिन आज संकट और भी गहरा है तथा उत्‍तरोत्‍त्‍र गहराता जा रहा है। कृषि में कॉर्पोरेट के प्रवेश का अर्थ बड़ी पूंजी का प्रवेश है जो कि पूंजीवादी खेती का अवश्यंभावी नतीजा है। इसलिए आगे आने वाला और गहरा संकट भी इसका स्‍वाभाविक परिणाम ही है। आखिर एक पूंजीवादी-फासीवादी राज्य के पास इतने बड़े दीर्घकालिक कृषि संकट का क्या हल है? इसके पास केवल ऐसे उपाय ही बचे हैं जिनसे कृषि क्षेत्र में बड़ी कॉर्पोरेट कंपनियों का प्रवेश होगा तथा लूट मार मचेगी जिसे ही कृषि क्षेत्र में विकास कहा जाएगा। इसके अलावा इनके पास करने को कुछ और नहीं बचा है। फलस्वरूप किसानों का एक बड़ा हिस्सा, जो पिछले दशक से ही आर्थिक संकट और कंगाली की मार झेल रहा है, खेती से बाहर और बेदखल होगा, इसमें तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए।

किसान आंदोलन के जरिए किसान क्या चाहते हैं और ये बुर्जुआ राज्य उन्हें क्या दे सकता है? ये कुछ ऐसे महत्वपूर्ण सवाल हैं जिनका जवाब हर उस व्‍यक्ति को खोजना चाहिए जो मौजूदा किसान आंदोलन को ले कर क्रांतिकारी सर्वहारा वर्ग के कार्यभारों को तय व रेखांकित करना चाहता है। इन सवालों के सही जवाब ही हमें सही दिशा दिखा सकते हैं और किसान आंदोलन में सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी भूमिका को सुदृढ़ कर सकते हैं। किसान क्या चाहते हैं और ये बुर्जुआ राज्‍य इन्‍हें क्‍या दे सकता है? किसान नए कृषि कानूनों को रद्द करवाना चाहते हैं जिसका अर्थ है कि वे खेती में कॉर्पोरेट के प्रवेश को रोकना चाहते हैं। असल में इसका मतलब है कि वे पूंजीवादी खेती की अग्रगति को बीच में ही रोकना चाहते हैं। क्या संघर्षरत किसान ये करने में सफल होंगे? नहीं, अगर वे पूंजीपतियों के राज्‍य को उखाड़-फेकने की तरफ नहीं बढ़ते हैं। लेकिन हां, अगर वे पूंजीवाद के खात्‍मे की ओर कदम बढ़ाते हैं। अगर ये बुर्जुआ राज्य दबाव में आ कर इन कृषि कानूनों को रद्द भी कर देता है तो भी वह इसे दूसरे रास्ते से लागू करेगा। क्या हो सकते हैं ये दूसरे रास्ते? किसानों के बीच ‘शांति’ बहाल करने और इसी तरह के अन्य दूसरे कानूनों को लाने से ले कर कॉर्पोरेटों को चोर दरवाजे से प्रवेश दिलाने तक सरकार कोई भी दूसरा रास्ता ले सकती है। सब कुछ परिस्थितियों पर निर्भर करता है और सर्वहारा वर्ग की एक क्रांतिकारी पार्टी, अगर सच में वह क्रातिकारी है, तो उसे ऐसी किसी परिस्थिति के आगमण को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए जो आंदोलन को पीछे ले जाने का काम करती हो। किसान आंदोलन के प्रति एकमात्र यही क्रांतिकारी समझ या नजरिया हो सकता है। दरअसल अगर सर्वहारा वर्ग की कोई पार्टी है या इसकी हिमायत वाला कोई ग्रुप है तो वर्तमान किसान आंदोलन में इसके अतिरिक्‍त और कोई दूसरा काम इसके लिए इससे ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण नहीं हो सकता है।  

किसानों को अपनी मुक्ति के लिए निस्‍संदेह पूंजीवाद को जड़मूल से हटाना होगा। अपने दुर्दिन को रोकने के लिए इन किसानों के पास और कोई उपाय नहीं है। क्या कॉर्पोरेट को रोकने का कोई और रास्ता है? नहीं। पूंजीवादी शोषण को और साथ ही हर तरह के शोषण को खत्म किये बिना यह संभव नही है। लेकिन क्या ये ख्याल (पूंजीवाद को उखाड़ फेकने का) किसानों के ज़हन में खुद-ब-खुद आ जाएगा? नहीं, कभी नहीं। केवल सर्वहारा वर्ग ही है जिसे इसकी मुकम्‍मल समझ है‍ कि सर्वहारा क्रांति क्‍यों अवश्‍यंभावी है और होकर रहेगी जो पूंजीवादी व्यवस्था का खात्मा करेगी और फिर एक ऐसा सर्वहारा राज्य स्थापित करेगी जो किसानों की समस्याओं को संज्ञान में लेते हुए उन्हें हमेशा हमेशा के लिए खत्‍म करेगा। और यह सब बिना किसी संकट या शोषण के होगा। सर्वहारा वर्ग की अगुआ ताकतों को किसानों के बीच इस चेतना को ले जाना होगा। सवाल है, क्या ये चीजें किसान आंदोलन के लिए नई चीजें नहीं हैं? क्‍या यह एक नई परिघटना नहीं है जो कृषि में कॉर्पोरेटों के प्रवेश के विरूद्ध होने की वजह से कई तरह की सकारात्‍मक संभावानाओं से भरी हुई है? यह सच है कि न सिर्फ यह परिघटना नई है, इसके प्रति रिस्‍पांस भी नये ढंग का है। नई परिघटना यह है कि पूंजीवादी खेती के दूसरे चरण की शुरुआत हो चुकी है और इसके प्रति नया रिस्‍पांस यह है कि किसान आंदोलन बाह्य स्‍वरूप में चाहे जितना पुराना प्रतीत होता हो, इसकी मांगों का अंतर्य नया है और क्रांतिकारी संभावनाओं से परिपूर्ण है। पहले के किसान आंदोलनों की मांगों में और इस नये आंदोलन की कुछ मांगों (जैसे सभी किसानों के लिए वैधानिक दर्जा प्राप्‍त एमएसपी की मांग) में कुछ बाह्य सादृश्‍यताएं भले ही हों, उनका अंतर्य बिल्‍कुल अलग-अलग है। हम इस पर आगे बात करेंगे। इसे हम अगली किश्‍त में भी दुबारा हाथ में लेंगे। 

साफ है कि इसने एक ऐसी जागृति जगाई है जो क्रांतिकारी नहीं है लेकिन आंदोलन के आगे बढ़ने की हालत में क्रांतिकारी होने की ओर अग्रसर होने के प्रति पूरी तरह क्षमतावान है। ऐसी जागृति फिलहाल तो कानूनों के बारे में उनकी अपनी समझ पर आधारित है जिसके फलस्वरूप किसान, खासकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी यूपी जैसे ज्यादा विकसित प्रदेशों तथा क्षेत्रों के किसानों ने एक तरह का विद्रोह कर दिया है। उन्होंने अपने पिछले तीन दशकों के पूंजीवादी खेती के अनुभवों से भी निकट भविष्‍य में आने वाले नये खतरों को भांप लिया है और वे अच्छी तरह समझ गए हैं कि पूंजीवाद या पूंजीवादी खेती के रास्‍ते समृद्धि‍ प्राप्‍त करना किसानों के बहुत बड़े हिस्से के लिए संभव ही नहीं है। बल्कि, इससे किसानों के बीच आर्थिक तबाही फैली है और आगे भी फैलेगी। जब उन्होंने यह समझ लिया कि ये नए कृषि कानून और कुछ नहीं बल्कि उसी पूंजीवादी खेती के अगले कदम हैं तो वे आने वाले खतरे को और अस्तित्व पर आते जा रहे संकट को गहराई से भांपने में कोई भूल नहीं की। किसान इन कृषि कानूनों की वापसी को ले कर यूं ही इतने अटल और अडिग नहीं हैं। उनका डर बिल्‍कुल सही है कि अगर समय रहते नहीं चेते तो वे कॉर्पोरेट और उसकी समर्थक फासिस्‍ट सरकार के द्वारा अपनी जमीन और गांव से ये बेदखल कर दिये जाएंगे।

न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सभी फसलों की खरीद गारंटी के सवाल को लीजिए। यह (न्यूनतम समर्थन मूल्य को एक कानूनी अधिकार बनाने की मांग) किसान आंदोलन में एक नई चीज है जो दरअसल सरकार से खरीद गारंटी की मांग में रूपांतरित हो चुकी है। कम से कम कृषि कानूनों के जरिये कृषि क्षेत्र पर कॉर्पोरेटों के कब्ज़े का परिप्रेक्ष्‍य इसे एक नया अर्थ और एक अलग अंतर्य प्रदान कर रहा है। क्यों? क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य पर सभी उपज की खरीद गारंटी की मांग एक बुर्जुआ सरकार, जिसने अभी-अभी नए कृषि कानून लाए ही इसीलिए हैं कि खेती में कॉर्पोरेटों का प्रवेश सुनिश्चित हो सके और किसानों की एक  बड़ी आबादी को देहातों व खेतों से भगाया व हटाया जा सके, इसे कभी पूरा नहीं कर सकती। दवाब में इस मांग को स्‍वीकार करने का वह स्‍वांग कर सकती है, लेकिन इसे लागू करेगी किसानों को इस गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए। न्यूनतम समर्थन मूल्य के इस नए रूप का, इसके कानूनी स्‍वरूप का और सभी फसलों की खरीद के लिए गारंटी की मांग के रूप में इसका सार क्या है? अगर हम इसमें आ जुड़ीं नई विशेषताओं का मूल्यांकन इसके पुराने रूप को सम्पूर्णता में देखते हुए करते हैं तो हम पाते हैं कि इस मांग का अंतर्य बिल्‍कुल बदला हुआ है। न्यूनतम समर्थन मूल्य अपने पुराने रूप में (बिना कानूनी गारंटी के) केवल 6% किसानों को मिलता था जिसमें से अधिकतर धनी और उच्च मध्यम किसान थे, वो भी कुछ चुनिंदा राज्यों के। यह सभी किसानों को क्यों नहीं मिलता था? क्योंकि न्यूनतम समर्थन मूल्य के लक्ष्‍य में सभी किसानों को इसे देने की कोई मंशा शामिल ही नहीं थी। इसकी शुरूआत के पीछे ऐसी कोई सोंच कभी नहीं थी कि इसका लाभ सभी को दिया जाएगा। यह कुछ विशिष्‍ट और जरूरी फसलों की उपज को बढ़ाने हेतु दिए जाने वाले प्रोत्‍साहन के रूप व साधन मात्र थे, लेकिन इसके अतिरिक्‍त किसानों के बीच पूंजीवादी राज्‍य के पास विभेदीकरण का यह एक कारगर हथियार भी था। जरा गौरं करें। धनी व उच्‍च मध्‍यम किसानों के अतिरिक्‍त अन्य (गरीब व निम्‍न मध्‍यम किसाना) किसान इसका लाभ क्यों नहीं उठा पाए? इसलिए क्योंकि सरकारी मंडी (एपीएमसी) में अपनी उपज बेचने को ले कर किसानों के बीच की प्रतिस्पर्धा में वे अक्सर कमजोर पड़ जाते हैं। मानो, बुर्जुआ सरकार ने कह रखा हो कि, “मंडी में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बेच सको तो बेच लो”। बुर्जुआ समाज में ये प्रतिस्पर्धा कैसे हल होती है? यह केवल और केवल ताकत के बल पर तय होती है। धनी किसानों की सामाजिक-आर्थिक ताकत व हैसियत यहां  मायने रखती है और यहां वही जीतता है जो अधिक शक्तिशाली होता है। किसी वर्ग विभाजित समाज में इसके अतिरिक्‍त कुछ और हो भी नहीं सकता है या था। पूंजीवादी जनतंत्र में किसान ‘पूरी तरह’ आज़ाद होते हैं, लेकिन गरीब और आम मेहनतकश किसानों के लिए यह आज़ादी बस कहने की बात है। पूंजीवाद के अंतर्गत ऐसी आजादी का अर्थ पूंजीवाद की अदृश्‍य लाठी के द्वारा सतत उजड़ने की आजादी ही तो है!        

अगर एमएसपी को कानूनी अधिकार बना दिया जाए इसके क्‍या परिणाम होंगे या हो सकते हैं? पहली बात, इसके तहत कंपनियों द्वारा एमएसपी से नीचे के दामों पर उपज खरीदना दंडनीय अपराध माना जाएगा। किसानों के बीच की कृषि‍ उत्‍पादों के बीच बेचने की प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी। सभी किसान अपनी विक्रय योग्‍य सरप्‍लस उपज को एमएसपी पर बेच कर ‘लाभान्वित’ होंगे। गरीब किसान जाहिर है वे उतने लाभान्वित नहीं हो पाएंगे, लेकिन वे जो भी बेचेंगे वो एमएसपी पर खरीदी जाएगी। लेकिन एक बुर्जुआ समाज में इसका सामना तुरंत ही दो बड़े खतरों से होगा। पहला, मध्यम व धनी किसानों को, जो अधिक मात्रा में उपजाते हैं, पर्याप्त खरीदार नहीं मिलेंगे क्योंकि किसी भी बुर्जुआ सरकार या एग्री-बिज़नस कंपनियों के लिए सभी उपज को एमएसपी पर खरीदना, जो कि लागत मूल्य से 40-50 प्रतिशत ज्यादा है, बहुत मुश्किल होगा। यह लगभग नामुमकिन है, क्योंकि इससे पहले से ही डांवाडोल हो चुके आपूर्ति और मांग का संतुलन और बदतर हो जाएगा। कॉर्पोरेट मालिकों को अगर अधिकतम मुनाफा कमाना है तो उन्हें उपज या उनसे तैयार मालों को और महंगे दामों पर बेचना पड़ेगा। यह आम तौर पर मांग को बुरी तरह प्रभावित करेगा क्योंकि कृषि मालों की कीमतें बढ़ने से गरीब खरीदारों की बहुत बड़ी आबादी भूख की परेशानियां उठाने के बाद भी पहले की तुलना में कम खरीदेगी। इसमें अधिकतर गरीब किसान और मजदूर ही होंगे। यह भी सच है कि अधिकांशतः गरीब किसान अनाज खरीद कर खाते हैं।

अब सोचने की बात यह है कि अगर किसानों को पर्याप्त खरीदार ही नहीं मिलेंगे तो सबके लिए एमएसपी की मांग का अंततः कोई मतलब नहीं रह जाएगा और कानूनी अधिकार मिलने के बाद भी इससे कोई खास फायदा मिलता नहीं दिखता है। दरअसल अगर वास्‍तव में सरकार पीछे हटती है और एमएसपी को कानूनी दर्जा दे देती है तो इससे बुर्जुआ समाज के समक्ष खड़ा हुआ संकट और भी विकराल बन जाएगा। आखि‍री रास्ता, वो चाहे जो भी हो, वह भी बंद हो जाएगा और समस्या को सुलझाने के बजाय यह इसे और बढ़ा देगा, क्योंकि इसके बाद अन्‍य सारे दरवाजे भी बंद हो जाएंगे जो खुल सकते थे और परिणामत: संकट चौतरफा बढ़ जाएगा। लेकिन याद रहे, यह सब बहस तक ही सीमित है और यह बहस यह मानते हुए की जा रही है कि अगर राज्य सच में एमएसपी की कानूनी गारंटी की मांग मान लेता है और ईमानदारी से लागू भी करता है तो क्या होगा, जबकि असलियत में हमारा यह मानना है कि ऐसा संभव नहीं दिखता है। मानने के नाम पर छलावा की बात और है। किसानों की समस्या या कृषि के संकट का निदान नई एमएसपी की लड़ाई जीत कर नहीं होगा क्‍योंकि उसकी जड़ें कही और गहराई में हैं और किसानों को अंततः इसे समझना होगा, और क्रांतिकारियों का काम पूरी पूंजीवादी व्यवस्था की कार्यप्रणाली का किसानों के समक्ष भंडाफोड़ करना है ताकि किसान इसके पीछे के चक्रव्‍यूह को समझ पाएं यह सर्वहारा वर्ग की पार्टी के किसान कार्यक्रम का मुख्‍य प्रस्‍थान बिंदु है। इस तरह हम पाते हैं कि न्‍यूनतम समर्थन मूल्‍य का पूरा संघर्ष व्यर्थ चला जाएगा। किसानों के जीवन में व्‍याप्‍त तंगी तथा अव्यवस्था खत्‍म होने के बजाए और बढ़ जाएगी।

बुर्जुआ समाज में इस तरह की परिस्थिति का मूल कारण क्या है? एमएसपी को केंद्र बनाते हुए बात की जाए तो मूल कारण यही है कि पूंजीपतियों द्वारा चलाए जा रहे समाज में लोगों का आर्थिक विकास, उनकी खुशहाली और सामाजिक पायदान पर ऊपर पहुंचने का जरिया या आधार (पूंजीवादी) मुनाफा पर टिका रहता है। गरीब से गरीब व्यक्ति को अगर आगे बढ़ना है तो उसे सबसे पहले किसी का हक मारने और मुनाफा कमाने की स्थिति में आना होगा। यह दरमियानी सामाजिक वर्गों के एक-एक कर के विनष्‍टीकरण की एक अंतहीन प्रक्रिया है जिसमें चंद लोग अंत में पूरी दुनिया को तबाह कर के पूरी संपदा पर कब्‍जा करेंगे। यह एक तरह का ब्लैक होल है जिसमें जितनी भी रौशनी डालो, वहां से केवल अंधकार ही बाहर निकलता है। यह एक ऐसी गुफा है जिसके अंत में कोई रौशनी नहीं है। समृद्धि और विकास की लालस एक सहज मानवीय ख्‍वाहिश है, लेकिन पूंजीवाद में इसका फलित होना एक प्रतिक्रियावादी परिघटना बन जाती है और दूसरों के शोषण का कारण बन जाता है। सभी लोग, यहां तक कि सबसे गरीब तबका, अपनी उपज के बढ़े हुए दामों से मिलने वाले मुनाफे के प्रति आकर्षित होता है और उसी के लिए काम करता है क्योंकि उसे लगता है समृद्ध होने का केवल यही एकमात्र रास्ता है। पूंजीवाद की सीमा में रहते हुए यह बात सत्‍य भी है अन्‍यथा खुशहाल बनने की कल्‍पना को त्‍यागना होता है। लेकिन दिक्‍कत यह है कि गरीब जनता के लिए मुनाफे के इस प्रलोभन के पीछे की सच्चाई बहुत भयावह है। सच क्‍या है? सच तो यही है कि मुनाफा एकमात्र गरीबों की श्रमशक्ति को निचोड़कर बनता है, लेकिन वे खुद कभी इसका फायदा नहीं उठा पाते हैं क्योंकि मुनाफा के लिए पहले मालिक होना होता है। इसलिए केवल ऊपर के पायदान पर मौजूद संपन्न लोग ही इसका लाभ लेते हैं क्योंकि वही इस प्रतिस्पर्धा में जीत सकते हैं। गरीबी जितनी बढ़ती जाती है यह प्रतिस्पर्धा और तीखी होती जाती है।

किसी भी माल की लागत से बढ़ी हुई कीमत, चाहे वो जितनी भी हो और यह धरती के चाहे जिस कोने की बात हो, लेकिन आखि‍री खरीदार तक वही कीमत कई गुना ज्यादा बढ़े हुए रूप में पहुंचती हैं। यही हाल किसानों को मिलने वाले “लागत मूल्य से 50 प्रतिशत ऊपर के दाम” के साथ भी है जो किसानों के मुताबिक उनके भरण-पोषण और उन्‍नति के लिए जरूरी है। लेकिन यह इसके अंतिम खरीदार तक पहुंचते-पहुंचते कई गुना और बढ़ जाता है। किसानों के पास इसका क्‍या उपाय या जबाव है? किसानों के पास इसका कोई जबाव नहीं है और पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के रहते इसका कोई जबाव हो भी नहीं सकता है, वहीं किसान और किसान की तरह के अन्‍य छोटे उत्‍पादक या व्‍यापारी अपने इर्दगिर्द मालों और सेवाओं के कई गुना बढ़े दामों के साम्राज्‍य के बीच घिरे और उससे दबे रहते हैं। इसलिए किसान किसी भी अन्य वर्ग की तरह अन्य मालों और सेवाओं के बढ़ते दामों के साथ अपनी कमाई का संतुलन बनाए रखने की जद्दोजहद में लगे रहते हैं और यह स्‍वाभाविक है। इसीलिए लेनिन और स्‍टालिन किसान बुर्जुआ और देहाती पूंजीपति वर्ग में फर्क करते हैं। सभी किसानों के लिए और सभी फसलों के लिए एमएसपी की मांग छोटे किसानों के बीच भी इसीलिए तो इतना लोकप्रिय है जबकि इससे उन्‍हें कुछ भी ज्‍यादा हासिल नहीं होने वाला है। इससे उन्‍हें बाहर निकालने का काम सीधा और सरल नहीं, अपतिु बुरी तरह कठिन और घुमावदार है। दूसरी तरफ, किसानों के मुनाफा के लिए बाजार की निर्भरता में यह देखा गया कि बाजार के भरोसे अब धनी किसान भी नहीं चल सकते हैं। बाजार में दामों की अनियमितता के कारण बढ़ते-घटते दामों के कारण गरीब किसानों की तो बात ही छोड़ि‍ए धनी किसानों का एक हिस्सा भी बर्बादी की कगार पर पहुंच जाएगा। स्‍वयं भारत का अनुभव इसे सही सिद्ध करता है। अगर मंदी और दामों का उतार-चढ़ाव दोनों लगातार बने रहें और मांग भी धरती चुमती रहे तो धनी किसानों का एक हिस्‍सा भी बच नहीं पाएगा। इसलिए कॉर्पोरेट खेती की शुरूआत की सांझ वेला में गरीब और छोटे व मध्यम किसानों की तरह ही इनकी भी तकदीर लिखी जा चुकी है, खासकर तब जब खेती में कॉर्पोरेटों का निर्बाध प्रवेश होने वाला है। इसीलिए कृषि क्षेत्र पूंजीवादी कृषि के बढ़ते कदमों के साथ अधिकतर किसानों के लिए व्यर्थ का सेक्‍टर साबित होने जा रहा है और खेती में अब केवल सबसे धनी किसानों का एक छोटा तबका, जो वास्‍तव में देहाती बुर्जुआ है, ही बचा रह पाएगा जो बड़ी पूंजी नियंत्रित बाजार व खेती में कॉर्पोरेट कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा में मुनाफा का एक औसत दर बनाये रख सकता है। कुछ समय बाद संभवतः सबसे धनी तबके के एक हिस्‍से में भी अस्तित्‍व का संकट में आ जाए क्योंकि प्रतिस्‍पर्धा में और भी अधिक धनी तबके का निर्माण हो जाएगा और कई अन्‍य भी प्रतिस्‍पर्धा में शामिल हो सकते हैं जिससे प्रतिस्‍पर्धा लगातार कटु और जानलेवा होती जाएगी। इसका कोई अंत नहीं है। यही पूंजी की स्वाभाविक गति है। चाहे कृषि क्षेत्र हो या कोई अन्‍य क्षेत्र, यह प्रतिस्‍पर्धा सच्‍चाई है जो दिनोंदिन गहरी, विस्‍तृत और ज्‍यादा से ज्‍यादा पशुवत चरित्र वाली होती जा रही है।

यहां पर कोई कह सकता है कि जो ऐसी कृषि में टिक नहीं सकते उन्हें खेती छोड़ देनी चाहिए। मोदी और कॉर्पोरेट भी बिल्कुल यही चाहते हैं। इसके मायने क्‍या हैं इसे समझना होगा। दूसरी तरफ, जब तक यह व्यवस्था पूंजीपतियों के हाथ में रहेगी और उनके लिए काम करती रहेगी, तब तक इसके अलावा कुछ और संभव है भी नहीं। इसलिए एक ही विकल्प बचता है, और वो है बड़े पूंजी के मुनाफे पर आधारित समाज को उखाड़ फेकना। लेकिन कुछ देर के लिए अगर हम मान लें कि किसान हार जाते हैं, मोदी सरकार नए कृषि कानून लागू कर देती है और अनाज बाजार पर कॉर्पोरेट एग्री-बिज़नस कंपनियों का एकाधिकार हो जाता है, तब क्या होगा? तब क्‍या पहले वाली स्थिति से कुछ ज्‍यादा भिन्‍न हालात होंगे? मान लें कि एमएसपी और एफसीआई तथा मंडी बंद हो जाते हैं, तो क्‍या कृषि मालों के दाम वास्‍तव में कम होंगे? कुछ लोग ऐसा ही सोचते हैं जिनमें हमारे ये ‘शिक्षक’ भी शामिल हैं। सच्‍चाई यह है कि कीमतें और भी ज्यादा बढ़ जाएंगी क्योंकि कॉर्पोरेट एकाधिकारी कंपनियां मनमाना दाम वसूलेंगी। कृषि मालों के दाम एकाधिकारी दाम की शक्‍ल ले लेंगे। वहीं दूसरी तरफ, गरीब किसानों को उनकी जमीन से जबरन बेदखल किया जाएगा। भारतीय बुर्जुआ राज्य की दीर्घकालीन सोच है, गांव की आबादी को पहले चरण में 60% से 36% कर दिया जाए ताकि जल्द ही जमीन के बड़े हिस्से को बड़े पैमाने की कॉर्पोरेट खेती के लिए सुनिश्चित किया जा सके। इसके अलावा, सरकार राशन वितरण प्रणाली (पीडीएस) और एफसीआई को खत्म करने की तैयारी कर चुकी है और पहले से ही अनाज व दलहन के भंडारण पर लगी रोक के हट जाने के बाद पूरा कृषि माल बाजार एवं इससे जुड़े अन्‍य खाद्य पदार्थों के बाजार सीधे कॉर्पोरेट घरानों के हाथों में चले जाएंगे जिससे वे अनाज, दलहन, सब्जी, फल, आदि के मनमाने दाम वसूलेंगे।[11]  

अतः हम देख सकते हैं कि गरीबों के लिए पूंजीवाद में कोई उपाय नहीं बचता है।

अब एक बार फिर से नये एमएसपी पर आते हैं। हम देख चुके हैं कि बड़े खरीदारों की संख्या में संभवतः बड़ी गिरावट आ सकती है। ये स्थि‍ति किसानों को और भी अतार्किक और अंतर्विरोधी कदम या मांग उठाने के लिए मजबूर करेगी। इससे एक नया संघर्ष जन्म लेगा, इस बार खरीद गारंटी के लिए नहीं खरीदारों की गारंटी के लिए। किसानों को एक अलग कानून के लिए नया संघर्ष उठाना होगा जो बड़े पूंजीपतियों द्वारा सभी उपज की एमएसपी पर खरीदारों की उपस्थिति की कानूनी गारंटी दे सके। लेकिन कोई भी कानून पूंजीपतियों को किसी तय कीमत पर खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। ऐसे में, खरीद गारंटी की मांग को पूरा करने का जिम्मा सरकार पर आ जाता है। लेकिन सरकार नहीं मान रही और आगे भी यह कहते हुए राज़ी नहीं होगी कि वो उपज के भंडारों का आखिर करेगी क्या! सर्वहारा राज्‍य की तरह पूंजीवाद में सभी के पेट भरने की जिम्‍मेवारी एक हद तक ही सरकार उठा सकती है। आज जैसे विशालकाय गहरे संकट में यह अब संभव नही है। तभी तो किसान नेता कह रहे हैं कि निजी व्‍यापारी या पूंजीपति हमसे एमएसपी पर अनाज खरीदें और दामों में अंतर की भरपाई सरकार करे। इसका मतलब है कि अंततः नये एमएसपी की मांग राज्य/केंद्र सरकार से खरीद गारंटी की मांग बन जाती है जिसके लिए सरकारों को सार्वजनिक वित्त (public finance) पर निर्भर होना पड़ेगा जो पहले से ही इस कदर सूख चुका है कि आम जनता के लिए अब कुछ नहीं बचा। अगर सरकार किसानों की बात मानते हुए दामों में अंतर की भरपाई सरकार निजी खरीदार कंपनियों को भारी मात्रा में पैसे चुका कर करेगी तो इससे कॉर्पोरेटों को देश की संपदा को दुगुने या उससे भी ज्‍यादा दर से लुटने का फायदा होगा। अतः अगर हम मान भी लें कि सरकार इसके लिए तैयार हो जाती है तो सार्वजनिक वित्त और कृषि मालों की मांग का संकट पूरी प्रणाली के अंदर एक विस्फोटक स्थिति बना देगा। इस स्थि‍ति की मार से किसान भी नहीं बच पाएंगे। अतः ये साफ है कि अगर सरकार मांग मान भी लेती है तो भी किसानों के हाथ में कुछ खास नहीं आएगा।

इस तरह एमएसपी के कानूनी अधिकार और खरीद गारंटी की मांग पूंजीवादी बाजार के नियमों के विरुद्ध जाती है। वांछित नतीजों के लिए पूंजीवादी बाजार के नियमों को तोड़ना होगा जो कि केवल इस पूंजीवादी व्यवस्था की कब्र पर बने सर्वहारा राज्य में और उसके द्वारा ही संभव है। इसलिए यह साफ है कि नई एमएसपी की मांग में एक गंभीर और भयानक रूप से हिंसात्‍मक त्रुटि है जिससे पूरा मामला आंतरिक रूप से विरोधाभास के एक विशाल भंवर में फंस जाता है जिसके समाधान हेतु उठाये जाने वाले कदम स्‍वाभाविक रूप से सर्वहारा क्रांति और सर्वहारा राज्‍य की मांग की ओर लक्षित होंगे। ऐसे में मजूदर वर्गीय ठोस राजनीतिक व वैचारिक प्रचार एक नई उम्‍मीद किसानों के बीच पैदा कर सकती है। पीआरसी ठीक यही बात ठोस ढंग से कहने की कोशिश कर रही है कि इन मांगों की पूर्ति एक सर्वहारा राज्य में ही हो सकती है क्योंकि केवल एक सर्वहारा राज्य ही किसानों की सारी उपज उचित दामों पर खरीदने की गारंटी दे सकता है और उन्हें बिना किसी संकट और विनाशकारी प्रभाव के एक समुचित व गरिमामय जीवन देने का वादा भी पूरा कर सकता है जो कि एक बुर्जुआ समाज में कभी संभव ही नहीं है। वहीं दूसरी तरफ हम ये भी देख चुके हैं कि अगर इस पूरी समस्या से जुझने का पूंजीवादी-अर्थवादी तरीका लिया जाएगा तो इसका एक ही निष्कर्ष है – कॉर्पोरेट कब्जा के लिए रास्‍ता साफ करने की बात करना जो विनाशकारी तो होगा ही क्योंकि इससे गांव ही नहीं पूरी खेती बड़ी पूंजी के स्वामियों के पास चली जाएगी और वे इसका आखि‍री कतरा भी नहीं छोड़ेंगे।  

हालांकि किसान आक्रोशित हैं और ऐसा लग रहा है कि वे तब तक नहीं मानेंगे जब तक कि कृषि कानून वापस नहीं हो जाते और एमएसपी पर कानून नहीं बन जाता। इसका क्या मतलब है? इसका मतलब है कि अगर यह संघर्ष आगे बढ़ता है और किसान, जो इन कानूनों के खतरों से वाकिफ हैं, राज्य के साथ और भी बड़े टकराव की स्थिति में चले जाते हैं तो ये आंदोलन बुर्जुआ दायरों के बाहर जा सकता है। किसान धीरे-धीरे यह भी समझने लगेंगे कि इन कृषि कानूनों के बिना भी एक बुर्जुआ राज्य के अंदर पूंजीवादी खेती उनके अस्तित्व के लिए कम बड़ा खतरा नहीं है क्योंकि इससे पैदा हुए संकट से अधिकतर आबादी तबाह हो रही है जिससे उत्पादक शक्तियों का नाश हो रहा है और आम गरीब पुरुष, महिलाएं, बच्चे और बूढ़े अपनी जान गंवा रहे हैं। नहीं चाहते हुए भी जब तक पूंजीवादी खेती बनी रहती है यह हर पल हर क्षण कॉर्पोरेट नियंत्रण के तरफ बढ़ेगी, चाहे ये कानून न भी हों। हां अंतर यह होगा कि कानूनों के जरिए सब कुछ एक झटके में करने की तैयारी है जबकि पुराने तरीके से पूरी प्रक्रिया पर स्‍वत:स्‍फूर्तता की चादर पड़ी रहेगी। लेकिन अंतिम परिेणाम की दृष्टि से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। जब कृषि कानून नहीं थे तब भी सबसे अति धनी तबके को छोड़ कर अन्‍य सभी वर्ग के किसानों की आय पिछले 6-7 सालों में लगभग 30 प्रतिशत से ज्यादा घटी है।

उपरोक्त दृश्य में सर्वहारा वर्ग की पार्टी की भूमिका

इसपर विचार करना बेहद जरूरी है कि उपरोक्त परिस्थितियों में एक सर्वहारा वर्ग की पार्टी का क्या कार्यभार होना चाहिए। हम पाते हैं कि किसानों की वर्तमान से वर्तमान समस्याओं की तात्‍कालिक से तात्‍कालिक जड़ें भी उनके अस्तित्व से जुड़ी हुई हैं जिनका पूंजीवाद की चौहद्दी में हल होना संभव ही नहीं है। इसी कारण से हम देख रहे हैं कि उनकी मांगों को पूंजीवादी राज्‍य द्वारा सुना तक नहीं जा रहा और आंदोलन को तोड़ने की कोशिशें जारी हैं जब कि वोटों के क्षरण के रूप में इसकी भारी कीमत सत्‍तासीन दल को चुकानी पड़ सकती है। संक्षेप में, बुर्जुआ राज्‍य की सीमाओं में किसानों की समस्याओं का कोई हल नहीं है, भले ही सरकार के संकट पर खतरा हो, और ना ही कृषि व किसानों के संकट को आज के संकटग्रस्‍त पूंजीवाद में किसानों का भला करते हुए समाप्त किया जा सकता है, वो भी तब जब पूंजीवाद एक स्थाई संरचनात्‍मक संकट में प्रवेश कर चुका है। हम ऊपर देख चुके हैं कि सभी के लिए कुल लागत मूल्य से 50 प्रतिशत ऊपर की एमएसपी की मांग का किसानों की दूरगामी व मूल समस्याओं के खात्मे की दृष्टि से असफल होना तय है और हम यह भी देख चुके हैं कि किस तरह सभी के लिए एमएसपी की बात कोई समाधान नहीं देती है, बल्कि एक और बड़ी समस्या का वह हिस्सा बन जाता है, क्योंकि यह वर्तमान विकट परिस्थितियों को एक बड़े तथा अंतिम दीवार तक ले जाकर असामान्‍य गतिरोध (डेड एंड) की और ले जाता है। अर्थात सभी के लिए एमएसपी की मांग किसानों को बुर्जुआ समाज की चौहद्दी से एक हिंसक टकराव की स्थिति में ले जाती है और अगर इसके बाद भी किसान आंदोलन की राह पर बढ़ते जाते है या उससे पीछे नहीं लौटते हैं तो उन्हें पूंजीवाद के दायरे को तोड़ने के लिए प्रेरित ‘होना पड़ेगा।’ अगर वे इस मांग को उठाते रहते हैं, अपने संघर्ष को थोड़े और विवेकपूर्ण तरीके से चलाते रहते हैं और बेशक अगर मजदूर वर्ग इसमें सर्वहारा राज्य और सर्वहारा क्रांति के आह्वान के साथ हस्तक्षेप करता है तो यह आंदोलन क्रांतिकारी दिशा ले सकता है इसमें कोई संदेह नहीं होना  चाहिए।

लगभग सभी किसान (जाहिर है अत्यंत धनी किसानों के एक छोटे हिस्से हो छोड़ कर) इस आंदोलन में शामिल हैं, चाहे वे सक्रि‍य भूमिका में हों या निष्क्रिय भूमिका में, क्योंकि उन्होंने नए कृषि कानूनों के जरिये पूरे किसानी और ग्रामीण क्षेत्र पर कॉर्पोरेटों के अवश्यम्भावी और पूर्ण नियंत्रण से उत्पन्न होने वाले भयानक खतरे (जो कि सच है) को भांप लिया है। उनके हिसाब से एमएसपी का कानूनी अधिकार एक ऐसी जरूरत बन गई है जिससे वे सोंचते हैं कि वे बाजार में दामों के भयानक उठापटक से खुद की (खासकर धनी व मध्यम किसान) रक्षा कर सकेंगे और बाजार में दाम गिरने के बावजूद निजी कंपनियों को एमएसपी पर खरीदने के लिए बाध्य कर सकेंगे। लेकिन जैसा कि हम पहले ही चर्चा कर चुके हैं कि एमएसपी पर कानून बन जाने के बाद किसानों को और दूसरे तरह की विकराल समस्‍याओं को सामना करना पड़ेगा। हम क्रांतिकारियों की यह एक मुख्‍य जिम्‍मेवारी है कि यह बात किसानों को साफ-साफ बताई जाए और उनसे कहा कहा जाए कि एक सड़ी-गली बुर्जुआ व्‍यवस्‍था व समाज में किसानों की समस्याओं के लिए किसी भी तरह का एमएसपी कोई हल नहीं है। अगर होता तो उनके बर्बाद होने की नौबत हीं क्‍यों आती? कम से कम उनकी ये नौबत नहीं आनी चाहिए थी जिन्‍हें एमएसपी का लाभ मिल रहा था! इससे एक बार फिर से कालांतर में सबसे धनिकों के भीतर सिर्फ एक और अत्‍यंत धनी तबका के निर्माण में मदद मिलेगी। इससे अधिक और कुछ नहीं होगा। हमने इस पर भी विस्तृत चर्चा की है कि तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना, जिससे कृषि में पूंजीवादी विकास की गति में रूकावट आएगी, कोई आसान मांग नहीं है जिसे मोदी सरकार मान लेगी जब तक कि सर्वहारा क्रांति का खतरा उनकी आंखों के सामने नहीं आ खड़ा होता है। हालांकि तब भी वे पूंजीवादी खेती के विरुद्ध फरमान भला कैसे जारी कर सकते हैं। सामान्य परिस्थितियों में, बड़े पूंजीपतियों की जरखरीद सरकार इन मांगों को सुनने के लिए भी तैयार नहीं होगी और ठीक यही हो रहा है। किसान आंदोलन के सौ दिनों का यही अनुभव है। ये मरणासन्न पूंजीवाद का दौर है। फिर भी यह आंदोलन मजदूर वर्ग के लिए बहुत महत्‍वपूर्ण है, क्यों? क्योंकि हम मानते हैं कि इससे किसान खुद ही ये समझने में सक्षम होंगे और हो रहे हैं कि उनकी समस्याएं वास्‍तव में क्‍या हैं और उनका हल निकालने में ये बुर्जुआ राज्य क्‍यों सक्षम नहीं है। आइए, देखें पीआरसी के लेखक ने इसके बारे में क्या लिखा है –

“स्‍पष्‍ट है, यह मांग अगर प्रबलता से उठती है और लोकप्रिय हो जाती है तो किसानों को अंतत: पूंजीवाद के दायरे से बाहर ही नहीं ले जाएगी अपितु स्‍वाभाविक रूप से सर्वहारा राज्य की मांग तक भी ले जाएगी, क्‍योंकि सर्वहारा राज्‍य मुनाफे पर नहीं टिका होता है और इसलिए उसके सिवा अन्‍य कोई ‘राज्‍य’ किसानों की खरीद गारंटी की मांग का ‘भार’ नहीं उठा सकता है। इस तरह वर्तमान किसान आंदोलन की दोहरी भूमिका है। एक, यह कार्पोरेट कंपनियों के प्रवेश के विरूद्ध मालिक किसानों के रूप में किसानों की अस्ति‍त्‍व-रक्षा की लड़ाई है, और दूसरा, यह किसानों की अस्ति‍त्‍व-रक्षा की लड़ाई के रूप में पूंजीवादी राज्‍य के दायरे को तोड़ने की मांग को (स्‍वयं अपने अंदर से) उठाने वाली लड़ाई भी है जो समाजवादी सर्वहारा राज्‍य की आवश्‍यकता को सामने लाती है। … देखा जाए तो एमएसपी वास्‍तव में एमएसपी नहीं, खरीद गारंटी और राज्‍य के साथ कांट्रैक्‍ट खेती की मांग है। यही वजह है कि यह आंदोलन बाह्य रूप में चाहे जिस भी पुरानी छाप वाली मांगों पर आधारित दिखता हो, लेकिन इसका लक्ष्य और अंतर्य दोनों भिन्न हैं। जहां लक्ष्य कार्पोरेट के आगे अलंघ्य दिवार खड़ा करता है, वहीं अंतर्य किसानों को पूंजीवादी राज्‍य (और समाज#) का दायरा तोड़ने की ओर मुखातिब है।” 

और इसीलिए पीआरसी के लेखक लिखते हैं –

“… इसके मद्देनजर एमएसपी के प्रति उनके आकर्षण मात्र को वर्तमान किसान आंदोलन के प्रति रुख तय करने का आधार बनाना गलत है। वस्‍तु की ऊपरी सतह को ही नहीं इसके अंदर और बाहर, दोनों को मिलाकर उभरने वाली संपूर्ण तस्वीर को देखना जरूरी है। ऐसा नहीं करने से इससे महज मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी राजनीति करने वालों की राजनीतिक अदूरदर्शिता और कार्यनीतिक दरिद्रता ही उजागर होती है। आंदोलन शुरू होने के 50 दिनों बाद हम यह कह सकने की स्थिति में हैं कि इसमें मौजूद कार्पोरेट से मुक्ति की गूंज के साथ-साथ पूरे देश को पूंजीवादी लूट के विरूद्ध भी आंदोलित करने की क्षमता है क्‍योंकि यह एकमात्र अपनी आंतरिक द्वंद्वात्‍मक गति के अधीन ही नई तरह की जागृति की ओर अग्रसर और उन्‍मुख हुई है।” 

लेकिन जैसा कि हमने पहले कहा अगर एमएसपी की गारंटी नहीं होती है और किसान हार जाते हैं और कॉर्पोरेट-पक्षीय कृषि बिल लागू हो जाते हैं, तो उसके बाद भी कृषि उत्‍पादों के दाम घटने के बजाए बढ़ेंगे, सभी किसानों को एमएसपी मिलने की स्थिति में दाम जितना बढ़ते उससे भी ज्यादा बढ़ेंगे, क्योंकि इसके बाद एकाधिकारी कीमतों का दौर आ जाएगा। हमारे ‘शिक्षकों’ की प्रबल इच्छा है कि किसान आंदोलन परजित हो जाए क्योंकि उनके अनुसार इसके बाद अनाजों के दाम घटेंगे और इन कानूनों के लागू होने से भारत के कृषि क्षेत्र में उत्पादक शक्तियों का विकास हो सकता है तथा ग्रामीण प्रतिक्रियावाद की कमर तोड़ी जा सकती है।

पीआरसी बनाम अन्‍य सभी

उपरोक्‍त परिस्थितियों को देखते हुए, एक क्रांतिकारी स्टैंड क्या हो इस पर गंभीरता से चिंतन की जरूरत है। हमारे हिसाब से केवल किसान आंदोलन का समर्थन करना एक क्रांतिकारी स्टैंड नहीं हो सकता। यह कोई आम आंदोलन नहीं है। इसने पूरी फ़ासिस्ट सत्ता से लोहा लेने की ठान ली है और दिन प्रतिदिन टकराव और तीखा होता जा रहा है। केवल एक प्रति-क्रांतिकारी ही इसके द्वारा पैदा हो रहे और भीतर तक व्याप्त होते जा रहे आक्रोश का मजाक उड़ा सकता है। लेकिन कुछ लोग ऐसा ही करते देखे जा सकते हैं। किसानों के तेवर बता रहे हैं कि हमें क्रांतिकारी राजनीति को ठोस नारों के माध्‍यम से ले जाना चाहिए और हम कारगर सफलता भी पा सकते हैं या कम से कम मजदूर वर्गीय क्रांतिकारी राजनीति के किसी ठोस व दूरगामी लक्ष्‍य व लक्ष्‍य के स्‍वरूप से किसानों को परिचित तो जरूर ही करा सकते हैं। यह आंदोलन एक फ़ासिस्ट राज्य से आमने-सामने की टक्कर में है जिसके पीछे हटने की संभावना नहीं है और है भी। एक ऐसी स्थिति है जिसमें खासकर आम किसान अपने नेताओं को पीछे हटने से रोक रहे हैं और उनके इस खौफ का काफी असर दिखता है। इसलिए हम पाते हैं कि आंदोलन तथा राज्‍य के बीच एक गतिरोध की स्थिति उत्पन्न हो गई है जिसका एक छोर निस्‍संदेह आम किसान और फिसलने वाले किसान नेताओं के बीच का गतिरोध भी है। यहां से आंदोलन किसी भी दिशा में जा सकता है इससे यह संकेत साफ दिखता है। अगर उथल-पुथल कुछ ज्‍यादा ही पैदा हो गई तो इसकी लहरें हमें एक क्रांतिकारी संकट की स्थिति में भी ला खड़ा कर सकती हैं। अगर यह आंदोलन सारे दमन को झेलते हुए बिना झुके इसी तरह बढ़ता रहा तो अततः वास्‍तव में एक ऐसी स्थिति आ सकती है, इस संभावना से इनकार करना मुश्किल है। यह भी हो सकता है कि आंदोलन किसान नेताओं की गद्दारी या अदूरदर्शिता के कारण बीच में ही खत्‍म हो बिखर जाए, लेकिन उस स्थिति में भी आंदोलन सिर्फ कुछ वक्‍त के लिए ही खत्‍म होगा, क्‍योंकि नये कृषि कानूनो के कुप्रभाव (बड़ी पूंजी की लूट-खसोट के फलस्‍वरूप) आम किसानों को एक बार फिर से आंदोलन के रास्‍ते पर ला खड़ा करेंगे। ऐसा बारंबार हो सकता है, और हर बार उसमें मजदूर वर्गीय राजनीति के तरफ होने वाला शिफ्ट बढ़ती मात्रा में दिखेगा। अत्‍यंत धनी किसानों की एक बारीक परत और बाकी के किसानों के बीच ध्रुवीकरण भी काफी तेज होगा और मजदूर वर्ग के लिए हस्‍तक्षेप करने की स्थितियां आज की तुलना में कल अत्‍यधिक मुफीद होंगी, आंदोलन नई तैयारी और नये तेवर के साथ उठ खड़ा होगा। कहने का अर्थ है, कॉर्पोरेट खेती के आगाज के बाद किसानों की बर्बादी जिस तेजी से बढ़ेगी उससे आंदोलन पैदा होता रहेगा और उसका स्‍वरूप भी ज्‍यादा से ज्‍यादा पूंजीवाद विरोधी होता जाएगा। मतलब साफ है, अगर यह आंदोलन बिना रूके और बिना झुके बढ़ता है तो सामाजिक शक्तियों का पुराना संतुलन, जिसे फासिस्‍ट शासन ने पहले ही एक हद तक अस्थिर कर दिया है, वह निश्चित ही हिलेगा और वह पूरी तरह टूट भी सकता है। यह स्थिति पूरे समाज में मौजूद शांति व सन्नाटे को चीरते हुए पल-पल बदलती परिस्थितियों में उत्‍पीड़ि‍त वर्गों के बीच नए समीकरण और संरेखण को जन्म दे सकती है, बावजूद इसके कि मजदूर वर्ग अभी तक लड़ाई के नेतृत्‍व के लिए लिए तैयार नहीं है। यानी, स्‍वयं मजदूर वर्ग की भावी तैयारी की दृष्टि से आंदोलन का स्‍थान बहुत महत्‍वपूर्ण है। आइए, देखें पीआरसी ने इसके बारे में क्या लिखा है –

“जब तक पूंजीवादी व्‍यवस्‍था है, किसानों का कॉर्पोरेट से संघर्ष भी रहेगा और यह तीव्र से तीव्रतर होगा। मजदूर वर्ग की पार्टी को सिर्फ कृषि कानूनों का विरोध नहीं अपितु पूंजीवाद की पूरी कार्यप्रणाली का भव्‍यतम तरीके से, यानी सभी वर्गों के समक्ष और उनके संदर्भ में समग्रता से भंडाफोड़ करना चाहिए जो इस आंदोलन के क्रांतिकारी बनने की दूसरी पूर्वशर्त है। लेकिन पहली शर्त आज की मांगों पर अंतिम जीत तक आंदोलन का मं‍जिल-दर-मंजिल कूच करते जाना है जिसके बिना दूसरी शर्त बेमानी है।”

“यह गौरतलब है कि यह किसान आंदोलन अनजाने ही सही लेकिन एक ऐसे राज्य की कल्पना से प्रेरित है जो पूंजीवादी कृषि में हुई अंतर्विरोधी प्रगति को इसके कुफल और दुष्परिणामों सहित पलट दे। बाजार की अराजकता से दहशत और कृषि पर कार्पोरेट की निर्णायक जीत को रोकने की लड़ाई इसी का परिणाम है। यह दिखाता है कि किसानों की चेतना अभी किस मंजिल तक पहुंची है अर्थात कुल मिलाकर वह ‘पूंजी’ के हितों के विरूद्ध जाने वाला राज्य चाहता है और विडंबना यह है कि ऐसी मांग की पूर्ति वह एक पूंजीवादी राज्य के रहमोकरम के सहारे (और खुद उसका तावेदार बने रहकर#) चाहता है! इस आंदोलन में अंतर्निहित विरोधाभास का यह शिखर बिंदु है जो बताता है कि आगे अगर यह आंदोलन और तीव्र होता है (और मजदूर वर्ग वैचारिक व राजनीतिक हस्‍तक्षेप करता है, जैसा कि ऊपर कहा गया है#) तो इसका पूंजी की सार्विक सत्‍ता के विरूद्ध मुड़ना अवश्‍यंभावी है। अगर वास्‍तव में ऐसा होता है तो यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं होगी।”       

ऐसी स्थिति में खुद को केवल समर्थन तक सीमित रखना आज के सर्वहारा वर्गीय क्रांतिकारी राजनीति की जरूरत के हिसाब से काफी नहीं है जो यह मांग कर रहा है कि हम बाहर निकलें और आंदोलन में ठोस आह्वान करें। और फिर उसके आधार यह कहते हुए हस्तक्षेप करें कि पूंजीवादी व्यवस्था में, एक ऐसे समाज में जो ज्‍यादा समृद्ध तबकों द्वारा अपने से कमजोर तबकों के शोषण पर टिकी हो, केवल कॉर्पोरेट और कॉर्पोरेटों में भी सबसे बड़े और शक्तिशाली कॉर्पोरेट ही फल-फूल सकते हैं। और खेती में भी यही हो रहा है जिसके शिकार सबसे ज्‍यादा गरीब किसान होंगे या हो रहे हैं। अतः मजदूर वर्ग को, भले ही उसके पास सभी तरह के ”हथियारों” से लैस एक मजबूत अगुआ दस्ता नहीं है, संघर्षरत किसानों से यह कहना चाहिए कि भारत में मजदूर-किसान एकता के बल पर बना एक भावी सर्वहारा राज्य ही उनके लिए गरिमामय जीवन की उनकी मांग व चाहत की गारंटी कर सकता है जहां एक के द्वारा दूसरे का शोषण नहीं होगा और किसान आधुनिक सामूहिक फार्मों में संगठित हो विकास के सारे फल के मजदूर वर्ग के बाद सबसे बड़े स्‍वामी होंगे। वो जो भी उपजाएंगे उसे आपसी मित्रता और सम्मानजनक शर्तों पर आधारित करार के जरिये अर्थात दूसरे शब्‍दों में “उचित दामों” पर सर्वहारा राज्य को बेच सकेंगे, जो उन्हें उचित दाम के अलावा अन्य जो भी मदद या सहायता दे सकता है देगा। ऐसा हुआ है और उसका एक पूरा इतिहास है जिसे सबको जानना चाहिए। जनता के दुश्मनों की सारी संपत्ति और पूंजी, मजदूरों और किसानों के श्रम से बनी सभी चीजें व संपदा, सर्वहारा राज्य द्वारा बिना किसी भरपाई के मजदूर वर्ग, गरीब मेहनतकश किसानों व मध्‍य किसानों की संयुक्त ताकत के बल पर (जो सामूहिक खेती के मूलाधार हैं) जब्त कर ली जाएगी। निश्चित ही धनी किसान वर्ग अगर इसका प्रतिरोध करेंगे तो उनसे हर तरह से निपटा जाएगा, लेकिन हम इस आंदोलन में शामिल कम धनी किसानों के संस्‍तर के साथ, अगर वे अत्‍यंत धनी किसानों के बहकावे में आकर हमारे साथ दुश्‍मन की तरह व्‍यवहार नहीं करेंगे, दूर तक लक्षित समन्‍वय के साथ चलेंगे और उन्‍हें अपने अनुभव से सीखने के लिए समय देंगे अर्थात उनके साथ तब तक ‘सम्‍मान’ के साथ पेश आएंगे जब तक कि वे भी सर्वहारा राज्‍य के साथ ‘सम्‍मान’ के साथ पेश आएंगे और बिना किसी साजिश के सर्वहारा राज्‍य के साथ सहयोग करेंगे। यानी, मजदूर वर्ग को संघर्षरत किसानों के उन सभी तबकों को आमंत्रित करना चाहिए जो इसके लिए तैयार हैं। हम पूछना चाहते हैं, कॉर्पोरेटों और सबसे अधिक धनी किसानों के विरोध का विरोध कौन करेगा? हमें इसी आधार पर फिलहाल दोस्‍त और दुश्‍मन का निर्धारण करना चाहिए। जाहिर है एकमात्र कॉर्पोरेट के लगुए-भगुए (बुर्जुआ पार्टियां, जन-विरोधी नौकरशाही, पुराने सामंती परिवारों के अवशेष और बेशक कॉर्पोरेटों के हिमायती जैसे ‘हमारे शिक्षकों का परिवार’ जिनका मानना है कि खेती में कॉर्पोरेट का प्रवेश उत्पादक शक्तियों के विकास और गांवों से प्रतिक्रियावाद हटाने में मदद करेगा) ही इस नारे का विरोध करेंगे और कर रहे हैं। आखिर कौन किसानों को लूटने और बेदखल करने वालों के खिलाफ होने वाली भावी सख्‍त कार्रवाई की घोषणा का कट्टरपन से विरोध करेगा? निश्चित ही ये वे होंगे जो मजदूर वर्ग के साथ-साथ किसानों के भी विरोधी होंगे। भावी सर्वहारा राज्‍य के हिमायतियों के रूप में हम आज से ही उनके खिलाफ की जाने वाली सख्‍त कार्रवाई की घोषणा करते हैं और किसी भी क्रांतिकारी को करनी चाहिए। धनी किसानों का सबसे छोटा और सबसे संपन्‍न तबका, जो कृषि‍ में कॉर्पोरेट के प्रवेश का समर्थक है, अगर हमारी घोषणाओं का विरोध करेगा, तो यह स्‍वाभाविक ही है। हमें भी उनके विरोध का खुलेआम एलान करना चाहिए। मुख्‍य बात यह समझने की है कि केवल इसी तरह के रास्‍तों पर चलकर ही व्‍यापक किसानों के इस आंदोलन को  मंजिल तक पहुंचाया जा सकता है। भावी मजदूरों-किसानों का सर्वहारा राज्‍य कॉर्पोरेट के साथ-साथ उनके विरूद्ध भी कार्रवाई करने का, यहां तक कि उनके द्वारा इसके बाद भी मजदूरों-किसानों का शोषण करने व उनके विरूद्ध साजिश करते जाने की हालत में उनकी संपत्ति जब्‍त करने का भी एलान करता है। उनकी जब्‍त संपत्ति निस्‍संदेह सामूहिक फार्म में शामिल कर ली जाएगी। कहने का अर्थ यह है कि हमें आंदोलन में ठोस नारों के साथ हस्‍तक्षेप की रणनीति बनाने का प्रयास करना चाहिए। हमें इस मुतल्लिक हर वह चीज सीखनी चाहिए जो जरूरी है।

ये सच है कि धनी किसानों का निचला तबका अपने अस्तित्व के लिए चिंतित होने और आंदोलन में संघर्षरत होने के बावजूद सामूहिकीकरण का रास्ता आसानी और सहजता से स्वीकार नहीं करेगा। इसे समझना कोई गूढ़ रहस्‍य समझना नहीं है। सर्वहारा राज्य का उनके साथ रवैया कैसा होगा ये अभी से कहना मुश्किल है लेकिन इतना जरूर है कि अगर मध्यम किसानों को हम अपने पक्ष में कर लेते हैं तो उनके (धनी किसानों के) लिए बहुत सारे विकल्प नहीं रह जाएंगे। अकेले वो ग्रामीण आबादी का एक अत्‍यंत छोटा हिस्सा है और तब सर्वहारा राज्य को उन पर अनाज और बाकी उपज के लिए निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। सामान्य स्थिति में[12] अलग से दबाव या बलप्रयोग करने की जरूरत नहीं पड़ेगी बशर्ते वे सर्वहारा वर्ग की तानाशाही के अधीन समुहिकीकरण की अनिवार्य रूप से उठने वाली लहरों का विरोध नही करेंगे। पीआरसी की नजर में भारत में वैसी स्थिति कभी नहीं आने वाली है जैसी रूस में आई थी। जमीन पर इसका नेतृत्व गरीब किसान करेंगे जो कुल ग्रामीण किसान आबादी का 86% हिस्सा हैं। एकमात्र यही बात ऐसी किसी संभावना के विरुद्ध प्रबल गारंटी करती है।

यहां मुख्य बात यह है कि पीआरसी को छोड़ कर और किसी ने भी किसान आंदोलन की बहसों में सर्वहारा राज्य के सवाल को नहीं उठाया, जबकि हमारा कहना है कि जो लोग गरीब किसानों की बात उठाते हैं उन्‍हें यह समझना चाहिए कि सर्वहारा राज्‍य की बात उठाये बिना उन्‍हें मजदूर वर्गीय राजनीति पर अंतिम तौर से जीतना मुमकिन नहीं हो सकता है। यह असंभव होगा, भले अपनी आंशिक मांगों के लिए वे हमारे पीछे-पीछे चलेंगे। लेकिन जैसे ही सियासी बात होगी वे धनी किसानों और बुर्जुआ दलों की पांतों मे मामूली लालच में चले जाएंगे। इसका मतलब यह नहीं है कि हम यहां उनक आंशिक मांगों के लिए लड़ने को व्‍यर्थ साबित कर रहे हैं। हमारे कहने का अर्थ है कि बड़े मौकों पर सिर्फ आंशिक मांगों तक उन्‍हें सीमित करने की राजनीति का मतलब बुर्जुआ सियासी राजनीति के नक्‍शेकदम पर धकेल देना है।

इस बहस में पीआरसी के उतरने के पहले, चर्चा केवल कृषि कानूनों के गुण-दोष, मजदूरों, किसानों व व्यापक आम जनता पर उसके अच्छे-बुरे प्रभावों पर ही केंद्रित थी। यह महत्‍वपूर्ण होते हुए काफी नहीं थी और न है। पीआरसी ने बहस में सर्वहारा राज्य के सवाल को ठोस रूप में प्रस्तुत किया, भले ही इसमें कुछ अस्‍पष्‍टता या त्रुटियां रह गई हों। हमने बहस में इसे आम मेहनतकश किसानों सहित उन तमाम किसानों के भी एकमात्र उद्धारक के रूप में पेश किया जो कॉर्पोरेट नियंत्रण के खतरो से वास्‍तव में घबराये हुए हैं। यह ठीक बात है कि हमनें धनी किसानों के एक हिस्से के बीच उठे अस्तित्‍व के सवाल का मूल्यांकन भी आज की नई परिस्थितियों की रौशनी में किया और पाया कि यह तबका भी कृषि कानूनों के खिलाफ मुखर विरोध दर्ज कर रहा है। जब हमनें इसकी पड़ताल की तो पाया कि इनका भी एक हिस्सा बेहद परेशान और पूंजीवादी खेती में मुनाफा कमाने के चक्कर में लिए गए भारी कर्ज के बोझ तले दब कर त्राहिमाम कर रहा है और जब ये कृषि कानून आये तो वो समझ गए कि उनके भी “अच्छे दिन” अब नहीं रहने वाले हैं। ये हिस्सा निस्‍संदेह मजदूर वर्ग की राजनीति के लिए भरोसेमंद नहीं है क्योंकि इसे उजरती श्रम (खेतिहर मजदूरों) का शोषण करने और साथ ही गरीब किसानों की कीमत पर कर फलने-फूलने की आदत रही है। लेकिन जब आज की बदली हुई परिस्थिति में वे खुद खतरे से घिरे महसूस करते हैं और मेहनतकशों का राज्‍य कायम करने की बात पर खुशी जाहिर करते हुए ताली बजाते हैं तो हम स्‍वयं भला क्यों उन्हें दुश्मन खेमे में धकेलने के लिए आमादा हो जाएं? अगर वे हमारी शर्तों पर हमारे प्रोग्राम में शरीक होते हैं तो हमें उनको आनन-फानन में दुश्मन क्‍यों मान लेना चाहिए जबकि वे खुद ही एक ऐसे बहुत बड़े दुश्‍मन (कॉर्पोरेट) के सामने पड़े हैं जो हम सबका दुश्‍मन है? जहां तक एमएसपी की बात है तो हमने ऊपर चर्चा की है और यह पाया है कि न तो इसकी संभावना है कि मौजूदा बुर्जुआ व्यवस्था इसे स्‍वीकार करेगी या कर के भी लागू कर सकती है और न ही इस बात की संभावना है कि इससे किसानों के जीवन में पसरा संकट दूर हो जाएगा। हम यह बता चुके हैं कि पूंजीवाद में किसी भी तरह का एमएसपी किसानों को कॉर्पोरेट से नहीं बचा सकेगा और यह बात हमें किसानों से पूरी निर्भीकता के साथ कहनी चाहिए, लेकिन उन्‍हें समझाने के लिए न कि उनका मजाक उड़ाने के लिए।

जिन्होंने भी अपने मूल्यांकन को केवल आर्थिक प्रस्तुतीकरण तक सीमित रखा (उन सभी में सबसे बड़े दिग्गज हमारे ‘शिक्षक’ हैं[13]) उन्होंने समग्रता में खुद को कृषि कानूनों और कॉर्पोरेट के पक्ष में खड़ा कर लिया अर्थात मौजूदा किसान आंदोलन को गरीब-विरोधी मजदूर वर्ग-विरोधी बताते हुए उसके खिलाफ हो गए। कुछ ने बीच का यानी तठस्‍थ बने रहने का रास्ता लिया, हालांकि ऐसी समझ को दूर तक बनाए रखना मुश्किल है क्योंकि अंततः यह स्टैंड भी किसान आंदोलन के या तो विरोध में या समर्थन में जाने के लिए बाध्‍य होगा। इसी तरह कुछ ऐसे क्रांतिकारी समूह और लोग हैं जिन्होंने सवाल का राजनीतिक प्रस्तुतीकरण तो किया लेकिन उससे मजदूर वर्ग के लिए ठोस क्रांतिकारी कार्यभार निकालने से चूक गये और खुद को कानूनों के खिलाफ विरोध में शामिल करने सीमित रखा या विरोध कार्यक्रम आयोजित करने तक सीमित कर लिया, केवल आंदोलन के पक्ष में होने की बात की और इसके लिए सक्रिय भी हुए और हैं। लेकिन उन्‍होंने इसकी जांच नहीं कि किसान आंदोलन की अपनी द्वंद्वात्मक गति किस तरफ है और आगामी सर्वहारा हस्तक्षेप की जमीन ठीक-ठीक कहां पर है ताकि दिनों-दिन उजागर तथा प्रकट होती बेहतरीन राजनीतिक परिस्थिति का फायदा उठा कर मजदूर वर्गीय राजनीति को इसके शीर्ष पर पहुंचाया जा सके और मजदूर वर्ग को समाज के भावी शासक और मानवजाति के मुक्तिदाता की तरह व उस एक इकलौते वर्ग की तरह खुल कर स्थापित किया जा सके जो पूंजी के केंद्रीकरण से होने वाले वर्तमान तथा अंतिम विध्वंसात्‍मक परिणामों से मानवजाति को बचा सकता है। अर्थात किसान आंदोलन को सम्पूर्णता में सर्वहारा क्रांति के हमारे अंतिम लक्ष्य से कैसे जोड़ा जा सके, इसके बारे में ठोस विचार-विमर्श का अभाव आंदोलन में साफ दिखता है।       

वहीं दूसरी तरफ, आंदोलन के समर्थकों में एक बड़ी संख्या उनकी है जो किसान आंदोलन को हमेशा की तरह वाले पुराने मोड में ही समर्थन कर रहे हैं और दूसरे शब्‍दों में अधिकतम ईमानदारी से किसान आंदोलन के पीछे-पीछे चल रहे हैं और किसान आंदोलन की हर बात या मांग का आंखें बंद करके महज समर्थन कर रहे हैं, वो भी बिना इसकी आतंरिक रूप से असंगत गति का मूल्यांकन किये हुए। समर्थन करने के अतिरिक्‍त इसके सिवा उन्हें और कुछ नहीं सूझ रहा। इसका क्या अर्थ है? इसका मतलब है कि किसान आंदोलन के सवाल पर परस्‍पर विरोधी मतों के स्पेक्ट्रम के एक तरफ ऐसी क्रांतिकारी ताकतें हैं जिन्होंने खुद को आंदोलन के साथ दिखाने की कोशिश की, आंदोलन के समर्थन में विचित्र आर्थिक तर्क दिए जो कि पूरी तरह आंशिक मांगों पर आधारित थे, (जैसे कुछ ने कहा कि किसान आंदोलन के मंच से मजदूरों के आंशिक मुद्दे व मांगें भी उठाए जाने चाहिए) तो कुछ ने ये तक मांग तक कर दी कि आंदोलन को सच में वृहत बनाने के लिए छोटे व गरीब किसानों की मांग और मुद्दे अलग से जोड़े जाएं। वहीं समाजवादी क्रांति खेमें में से कुछ ने मजदूरों के प्रति ”असाधारण प्रेम” का परिचय देते हुए कहा कि मजदूरों की मजदूरी बढ़ाने की मांग ‘बॉर्डरों’ से ही घोषित की जाए। नव जनवादी क्रांति वाले खेमें के कुछ उत्साहियों ने मांगों में ‘जोतने वाले को जमीन’ देने की मांग को भी शामिल करने का प्रस्ताव दिया। इन सबके पीछे के कारण व इरादे नेक हैं – वे सब चाहते हैं कि आंदोलन को वृहत से वृहतर तथा वृहतम जनाधार मिले और यह समाज के हर तबके को समेट पाये। दिक्‍कत यह है कि वे यह नहीं समझते कि आंदोलन में केवल समाज के भिन्न-भिन्‍न तरह के मध्यवर्ती तबकों की तात्कालिक आंशिक मांगों को जोड़ देने मात्र से आंदोलन वृहत नहीं हो जाता है। किसी आंदोलन के वृहतर होने की शर्त उसकी वह क्रांतिकारी धुरि होती है जिसमें से सभी दरमियानी वर्गों की मुक्ति झांकती है या उनकी मुक्ति की शर्तें पूरी होती दिखती हैं। अगर वह धुरि स्‍पष्‍ट नहीं है तो चाहे जितने भी नेक इरादे हों, चाहे हम हजारों अन्‍य मांगे जोड़ दें, तब भी यह सभी प्रभावित वर्गों को समेटने की शक्ति हासिल नहीं कर सकता है। यहां सामाजिक आंदोलन के विज्ञान की समझ आवश्‍यक है, अन्‍यथा यह सारसंग्रहवाद का ही परिचायक साबित होगा।

यह सच है कि केवल पीआरसी ने ही सर्वहारा राज्य के सवाल को बहस में उठाया, वो भी यह कह कर नहीं कि मजदूर वर्ग इस आंदोलन का समर्थन करे, बल्कि मुख्‍य रूप से यह कहते हुए कि मजदूर वर्ग इसमें हस्तक्षेप करे, आंशिक या न्यूनतम मांगों के साथ नहीं बल्कि अधिकतम मांगों के साथ जैसे कि किसानों को ये आह्वान करके कि उनके दुर्दिन सर्वहारा राज्‍य में ही खत्‍म होंगे। आज इसे पूरी निर्भकता के साथ कहने का वक्‍त है, ऐसा पीआरसी का मानना है। उन्हें साफ-साफ यह बताया जाए कि किसानों की अंतिम मुक्ति एक सर्वहारा राज्य में ही संभव है। कई लोगों ने इसे उचित समय पर उचित आह्वान माना और हमारा समर्थन किया, लेकिन कई अन्य दूसरे लोगों को खासकर संशोधनवादियों, सुधारवादियों और अवसरवादियों को तो इस आह्वान का मर्म भी समझ में नहीं आया। ऐसे तमाम लोगों ने इसका विरोध किया तो कुछ अन्‍यों ने इसका उपहास भी उड़ाया। लेकिन इनमें से किसी ने भी कॉर्पोरेट के इन नए हिमायतियों जितने ‘बोल्‍ड’ तरीके से हमारा विरोध नहीं किया। हमारे ‘शिक्षकों के इस महान कुनबे’ ने इस बात तक का विरोध करने की हिम्‍मत दिखाई कि भारत में सोवियत संघ जैसा भावी सर्वहारा राज्य ही किसानों को अंतिम रूप से शोषण से मुक्त करेगा जो न सिर्फ उनकी सारी उपज को खरीदने की एक उचित व्‍यवस्‍था करेगा बल्कि उन्हें एक शोषण-मुक्त समाज में समुचित व गरिमामय जीवन भी प्रदान करेगा। ये सुनते ही (ऊपर बोल्ड किये गए शब्दों को देखें) वे तिलमिला कर हम पर मानों अपनी ‘रायफल’ तान दी। वे बार-बार एक ही झूठ को दुहराते रहे कि पीआरसी ने ‘सोवियत रूस के समाजवादी प्रयोगों के इतिहास’ और ‘समाजवाद संक्रमण के दौरान ली गई नीतियों के इतिहास’ को मनमाने ढंग से पेश किया है जबकि पीआरसी ने ‘इतिहास’ पर ना पुस्तिका में चर्चा की है और ना ही फेसबुक पोस्ट में। जरा सोचिए, केवल सोवियत संघ जैसा भावी सर्वहारा राज्‍यलिखना ‘सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोगों के इतिहास और समाजवादी संक्रमण के दौरान अपनाई गई नीतियों के इतिहास’ पर चर्चा करना कैसे हो सकता है? केवल एक धूर्त और बेईमान इरादे वाला व्यक्ति ही इस आधार पर यह कह सकता है कि पीआरसी ने समाजवादी प्रयोगों के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया है। इस आधार पर हमारी सबसे बुरी आलोचना केवल यही हो सकती है कि ‘हमने इतिहास पर चर्चा क्‍यों नहीं की।’ वे यह भी कह सकते थे कि हमने जो कहा वह गलत है यानी यह मानने से ही इंकार कर देते कि ‘सोवियत संघ जैसे सर्वहारा राज्य के अंतर्गत कृषि उत्‍पादों की खरीद की ऐसी कोई गारंटीशुदा व्‍यवस्‍था थी। क्या वे इससे इनकार करते हैं? जैसा कि पहले कहा गया है, वे इस तथ्‍य से बिल्कुल ही इनकार नहीं करते हैं। लेकिन इनकार नहीं करते हैं इसे भी कहना मुश्किल है। बल्कि यह कहना ठीक होगा कि घुमावदार रास्‍तों से विरोध या इनकार करते हैं।  पाठक साथियों, यह कोई आश्चर्यजनक बात नहीं है। ऐसा पहली बार या सिर्फ हमारे साथ ही नहीं हुआ है। बहुत लोग जानते हैं इनका बहस का यही तरीका है। लेकिन जो लोग नहीं जानते हैं वे यह सोचने पर जरूर मजबूर हो जाएंगे कि आखिर ये ऐसा विरूपण क्यों करते हैं? उनके लिए यह सब कुछ समझ से परे है जो उन्‍हें नहीं जानते हैं। लेकिन, फिलहाल आगे बढ़ते हैं।            

‘किसान हमें पीटते’?

वे कहते हैं कि हम सामूहिकीकरण अभियान के पहले वाले तथ्‍यों, जैसे बोल्शेविक क्रांति पश्चात भूमि के राष्ट्रीयकरण, वर्ग के रूप में कुलकों का उन्मूलन, सामूहिक फार्म में मजदूरी पर रोक, आदि आंदोलनकारी किसानों से अगर नहीं छिपाये होते तो उन्होने (किसानों ने) हमें थप्पड़ मार-मार कर हमारी मूर्खता बता दी होती। इस संबंध में हमारा प्रत्यक्ष तजुरबा क्या है? हमने सिंघु, टिकरी, गाजीपुर बार्डर पर सघनता से एक हफ्ता गुजारा, किसानों और उनके नेताओं के साथ अपनी राजनीति पर खुलकर चर्चा की। अन्य मुख्‍य बिंदुओं पर बात की। लेकिन हमें याद है, उन्होंने हमें बिल्‍कुल ही नहीं पीटा (हंसिये नहीं!)। हां, वे यह सुनकर उदास जरूर हुए जब हमने उनसे और उनके मंच से यह कहा कि जब तक वे बुर्जुआ राज्य को उखाड़ नहीं फेंकते और पूंजीवादी राज्य और समाजवादी राज्य के बीच में चुनाव नहीं करते तब तक न उनकी मांगे पूरी होने वाली नहीं और न ही उनको गरिमामय सुखी जीवन ही प्राप्‍त होने वाला है। यह सच है कि किसानों को लगता है कि वे चाहेंगे तो सरकार को किसी भी सीमा तक यानी पूंजीवादी लूट की दिशा को पलटने की सीमा तक अपने संघर्ष के बल पर झुका ले सकते हैं। लेकिन हमने इनके इस विश्‍वास को ही निशाने पर लिया, क्‍योंकि यह झूठ और अज्ञानता पर आधारित है। लेकिन उन्‍होनें हमें यह नहीं कहा कि आप कौन होते हैं हमें सिखाने वाले। उन्‍होंने न सिर्फ सुना अपतिु हमें समझने का प्रयास भी किया।

इसके अलावा हमने और भी बातें भी कीं। पुस्तिका में हमने शोषणमुक्‍त समाज कैसे बनेगा इस पर भी बातचीत की है। यहां तक कि धनी किसानों के दोहरे चरित्र पर भी बातचीत की है। किसानों ने पढ़ा भी, लेकिन यकीन मानिये, उन्होने हमें नहीं पीटा। उल्‍टे हमारी चेतावनी भरी कई बातों पर तालियां बजाईं। यहां तक कि हमने यह भी कहा कि मजदूर वर्ग के नेतृत्व के बगैर उनका संघर्ष मंजिल पर नहीं पहुंच सकता। कृषि कानून रद्द हो जायें तब भी उनके अच्छे दिन नहीं आने वाले। वे फिर से उदास हुए, पर फिर भी हमें पीटा बिल्‍कुल ही नहीं! उन्‍होंने हम पर किसानों की हिम्‍मत और उम्‍मीद, जो किसी भी जारी आंदोलन की रीढ़ होती हैं, तोड़ने का आरोप भी नहीं लगाया। जैसे यह पक्‍की बात है कि हम उनकी उदासी के पीछे के भाव समझ रहे थे, उसी तरह हम इस बात को भी पक्‍के तौर पर समझते हैं कि वे हमारी बातों के मर्म को समझने की कोशिश कर रहे थे। जब उनके कई नेताओं ने हमें लौट कर आने और चर्चा करने को कहा, तो हमारी इस बात की पुष्टि हो गई कि वे हमारी कई बातों के मर्म को समझते हैं जिसमें स्‍वयं उनके जीवन के कटु अनुभव काम आए होंगे। हां, हमने निश्चित ही कॉर्पोरेट के हिमायतियों की तरह, जो यह समझते हैं कि कॉर्पोरेट पूंजी के नियंत्रण के बाद गरीब किसानों को फायदा भी हो सकता है, यानी आप जिस अंदाज में वे हमसे उम्‍मीद करते हैं कि हम किसानों से बात करते, तो वह हमने निश्‍चय ही नहीं किया। आप महानुभावों चाहते थे कि हम उनसे कुछ इस तरह के अंदाज में बात करते – “ऐ मुनाफाखोर, पितृसत्‍तात्‍मक, स्‍त्रीविरोधी, दंगाई, मजदूरों का खून चूसने वाले किसानों! अब तुम संकट में हो, तो पहले यह बताओ कि क्रांतिकारी बनने के संबंध में हमारे द्वारा तैयार किए गए वचन पत्र पर हस्‍ताक्षर करोगे?”

हमलोगों ने सोचा, ‘क्रांति के इंस्‍पेक्‍टर’ तो ये लोग ही हैं, इसलिए इस अंदाज में बोलने का काम हम इनके लिए छोड़ देते हैं। ठीक है ना? ये अंदाज इन्‍हें ही मुबारक हो।

कॉर्पोरेट हिमायतियों की बुजदिली

लेकिन एक बात तय है कि वे हमारे ऊपर जो फिकरे कस रहे हैं वे हमसे ज्‍यादा आंदोलनकारी किसानों को बदनाम करने हेतु हैं। वे मानो यह कह रहे हैं कि मजदूरों के पक्ष की बात कहने वालों को इन बार्डर पर बैठे किसान पीट डालेंगे या पीट डालते हैं। लगता है जैसे उन्होंने किसान आंदोलन विरोधी ट्रोल आर्मी के एक हिस्‍से की तरह आंदोलनकारी किसानों को बदनाम करने की ज़िम्मेदारी अपने सिर ओढ़ ली है। शायद इसीलिए उन्हें मोदी और मोदी भक्तों की तरह वहां जाने और अपनी बात करने से भय लग रहा है। कथा सम्राट प्रेमचंद की तरह बात करूं, तो हम कहते, ”क्‍या पीटने के डर से क्रांति की बात नहीं करोगे, क्रांतिवीरों?” जाओ, जल्‍दी जाओ, नहीं तो इससे खुद अपनी विश्वसनीयता हमेशा के लिए खो दोगे। और यह बात सोलहो आना सच है कि वे खुद अपना ही नुकसान कर रहे हैं। उन्हें लगता है हम इनकी बातों से किसानों से डरने लगेंगे। वाह, क्‍या बात है! परंतु असली बात कुछ और है। असली बात यह है कि खुद उनके अंदर की छिपी हुई बुज़दिली उभर कर सतह पर आ गई है। जाहिर है, पिटाई के इसी डर की वजह से उन्होने इन किसानों के बीच अपनी राजनीति का प्रचार करने की हिम्‍मत नहीं जुटाई। लेकिन ये तो सबसे बड़े क्रांतिकारी, इन्‍हें तो सारे जोखिम उठाकर ऐसा करना था।है कि नहीं? इतना तो ये भी मानते हैं कि दिल्‍ली के बॉर्डरों पर गरीब व निम्न-मध्यम किसान भी हैं जिनका ये भी दम भरते हैं। क्या इन्‍हें उनके पास नहीं जाना चाहिए कम से कम उन्हें सचेत करने के लिए कि ‘यह उनका नहीं कुलकों का आंदोलन है और वे इसे छोड़ अपने घर चले जायें?’ हम सत्‍य बोल रहे हैं न हमारे ”प्रिय शिक्षकों”? चलिये इन बार्डर पर तो खतरा ज्यादा है (आपके मुताबिक), पर उनके गांवों में जाकर तो कर ही सकते हैं। ठीक है सबके सामने खुले तौर पर नहीं, क्‍योंकि पकड़े जाने का डर है, तो चुपके से ही सही, कान में फुसफुसा कर, कोशिश तो करिए। अगर वास्‍तव में अत्‍यधिक डरे हुए हैं और इनमें से कुछ भी मुमकिन नहीं है, तो क्या हम एक सुझाव दें? बहुत खूबसूरत व शानदार सुझाव है। मोदी से कुछ सुरक्षा मांग लीजिये। एसपीजी नहीं तो कुछ बजरंगी ही साथ में लगा देंगे। वो खुश होकर देगा क्योंकि आपका और उसका कहना एक ही है कि इन क़ानूनों से छोटे किसानों को लाभ होगा। आप और आपके लिलिपुटियन हिमायतियों का समूह सुरक्षित महसूस करेगा। पर ‘प्रिय शिक्षकों’, मैं फिर भी आपको चेताता हूं कि इसके बाद भी कुछ अनहोनी घट सकती है! किसान कॉर्पोरेट से ज्‍यादा कॉर्पोरेट हिमायतियों से नाराज हैं। आपको सूंघ लेंगे तो कहीं आपके शरीर की नाप-जोख न कर दें यह डर है। अतः अपना ख्याल रखियेगा! जैसा कि आप कहते ही हो, ये किसान बहुत ‘जालिम’ और ‘पितृसत्तात्मक’ हैं, वे ‘दुष्टता’ भरी हरकत कभी भी कर सकते हैं!

लेकिन हद है! लोग अपनी बुलदिली को भी दूसरे को बदनाम करने के लिए इस्‍तेमाल करने लगे हैं।   

बहरहल एक बात पक्की है। हमारे ”शिक्षकों” को पंजाब-हरयाणा के किसी गरीब किसान के पास जाकर उसे यह तो बताना ही चाहिए कि ये कृषि कानून कैसे उसके हित में भी हो सकते हैं। हम सशर्त बता सकते हैं कि बीजेपी नेताओं की ही तरह ही वे उन्हें भी दौड़ा लेंगे (हालांकि हमें उम्मीद है कि पीटने जैसी गलती वे कतई नहीं करेंगे, किसान इस तरह की चालों को समझते हैं)। लेकिन, क्या तब भी इन्हें अक्ल आएगी? संभवतः नहीं। तब ये भी बीजेपी नेताओं के अंदाज में कहना शुरू कर देंगे, ”किसानों को दिग्भ्रमित किया गया है”! प्रिय शिक्षकों! आप कितने कच्चे, लेकिन सच्‍चे हिमायती हो! खैर, जो भी हो, ‘शिक्षक’ होने का दर्जा तो आपने अपने लिए पक्का कर ही लिया है क्योंकि बुज़दिली का बेहतरीन सबक तो आपने हमें सिखाया ही है। इसके लिए तो आपको पदक मिलना चाहिए। मौका आने दीजिए, कॉर्पोरेट पूंजीपति आपको बिल्‍कुल ही निराश नहीं करेंगे।

और एक प्रश्न

हम समाज के भावी शासक वर्ग के रूप में मजदूर वर्ग का नेतृत्व स्वीकार करने के लिए आंदोलनकारी किसानों का आह्वान करते हैं ताकि उनकी तकलीफ़ों का स्थायी समाधान मुमकिन हो, क्योंकि किसानों के साथ गठजोड़ के जरिये स्थापित एक सर्वहारा राज्य ही न सिर्फ ‘उचित दामों’ पर उनकी उपज की खरीद की गारंटी दे सकता है, बल्कि उन्हें हर मुमकिन (आर्थिक, राजनीतिक, वैचारिक, वैज्ञानिक, सांस्कृतिक, आदि) सहयोग व मदद प्रदान कर उनके लिए एक सुखद एवं मर्यादित जीवन सुनिश्चित करेगा। इस पर पहले तो ये ‘शिक्षक’ एकबारगी इसका खंडन करते हैं (सामूहिकीकरण के इतिहास से निराधार उद्धरण देकर): नहीं, नहीं! सामूहिक किसानों को सिर्फ लागत से थोड़ा अधिक दाम ही दिये जा सकते हैं (क्योंकि उनके अनुसार सोवियत संघ में इतने ही दाम दिये गए थे)। पर अगर सामूहिकीकरण के विचार को इस अंदाज में प्रस्तुत किया जाएगा तो हमें लगता है कि छोटे किसानों का एक कई हिस्‍से भी इससे दूर भागते नजर आयेंगे! दूसरे, इस बात को भुलाकर कि किसानों में वर्गविभेदीकरण और अन्य किसानों के बजाय गरीब किसानों की बात कितनी ही बार क्यों न दोहराई जा चुकी हो वे अपने शिकारी किरदार वाले खास अंदाज में तुरंत पूछते हैं – कौन से किसान[14]? आज के वक्‍त में हमारा स्वाभाविक जवाब है ‘संघर्षशील किसान’। ये संघर्षशील किसान कौन हैं? गरीब, मध्यम एवं अत्यंत धनी किसानों के संस्तर को छोड़कर धनी किसानों का एक हिस्सा। हमारे शिक्षक पूछते हैं: क्या हम धनी किसानों के एक हिस्‍से का भी सामूहिकीकरण करेंगे? हमारा कहना है कि हमारा प्रस्ताव अति धनी किसानों के संस्तर को छोड़कर उन कम धनी किसानों के लिए भी है जो अब नई परिस्थिति में खुद के अस्तित्व को संकटग्रस्त मानकर नए कृषि क़ानूनों के जरिये भविष्य में ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर काबिज होने वाले कॉर्पोरेट पूंजीपति के मुक़ाबले संघर्ष में शामिल हैं। अगर तीन दशकों की पूंजीवादी कृषि की निरंतरता में लाये गए इन क़ानूनों के खिलाफ धनी किसानों का एक हिस्सा भी विरोध कर रहा है अर्थात जाने-अनजाने मूलतः पूंजीवादी कृषि का विरोध कर रहा है तो इसकी वजह हम तो नहीं। यह तो एक वस्तुगत तथ्य है। अतः मजदूर वर्ग के सदर मुकाम को इस उघड़ती नवीन परिघटना का विश्लेषण कर इस बदलाव के चरित्र को तो समझना ही होगा। सिर्फ तात्विक बातों को दोहराते रहने से मजदूर आंदोलन का तो भला नहीं होने वाला है। यह तत्वज्ञान तो हो सकता है सर्वहारा राजनीति नहीं जो सहयोगी (स्थायी व अस्थायी, वफादार व ढुलमुल सभी) तलाशती है ताकि अपने असली विरोधी को अलग-थलग कर ठीक उस पर निशाना साध सके। यह विरोधी है ग्रामीण सम्पन्न लोगों का अति धनी संस्तर जिसके फासिस्टों के साथ सियासी रिश्तों में अब तक जरा सी दरार तक नहीं पड़ी है, किसान आंदोलन की सारी सरगर्मी के बावजूद भी उनके फासिस्टों के साथ संबंध अटूट बने हुये हैं। एक सदी पहले की एक खास घटना और वर्ग के साथ यांत्रिक तुलना, वह भी पूरी तरह सही तरीके से नहीं बल्कि तोड़ते-मड़ोरते हुए, इतिहास से सीखने का सटीक तरीका नहीं है। क्रांतिकारियों को नकल-चेंप की प्रवृत्ति में न बहकर विशिष्ट परिघटनाओं के ठोस विश्लेषण पर ध्यान दे अपने वैचारिक-राजनीतिक कार्यभारों को उस आधार पर तय करना चाहिए। एक सदी पहले रूसी कुलकों के अस्तित्व पर पूंजीवादी कृषि के किसी उच्चतर मंजिल या स्‍टेज के कारण कोई ऐसा खतरा पैदा नहीं हुआ था जैसा कि आज भारत में हो रहा है। रूसी कुलकों के समक्ष कोई कॉर्पोरेट खतरा नहीं आ खड़ा हुआ था। उन्‍हें जो खतरा था वह सोवियत सत्‍ता से था और उनका चरित्र एकमात्र इसी बात से निर्धारित हो सकता था। हालांकि यह भी एक तथ्‍य है कि 1920 के दशक के अंतिम वर्षों में इनके खिलाफ अंतिम अस्‍त्र चलाने के पहले मजदूर वर्ग की नीति‍ सर्वहारा क्राति के प्रसव काल से लेकर बहुत सालों तक वैसी नहीं थी जैसी कि हमारे ”शिक्षक” बताने की चेष्‍टा कर रहे हैं। इसके बारे में हम अगली किश्‍त में सविस्‍तार लिखेंगे कि समूहिकीकरण आंदोलन के पहले तक इस संबंध में सोवि‍यत संघ में सत्‍तासीन मजदूर वर्ग की नीतियां वास्‍तव में क्‍यों थीं। लेकिन इतना कहना जरूरी है कि आज के भारत की स्थिति उनके साथ तुलनीय नहीं है। उनके और भारतीय किसानों के बीच 100 वर्ष का अंतर है। पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के संकट और इसकी की सड़न में भी इतने ही वर्षों का अंतर है। ये भारतीय किसान आज पूंजीवादी कृषि के विकास के इस दूसरे चरण में न सिर्फ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को निगलने के लिए कॉर्पोरेट पूंजी के नए-नए कदमों से भयभीत हैं बल्कि कॉर्पोरेट कृषि के रूप में पूंजीवादी कृषि के इस नए चरण के जरिये जिस तरह कृषि क्षेत्र पर प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से निर्भर खास रूप से गरीब-मध्यम किसानों को कृषि से बेदखल किया जाना है उससे सामाजिक जीवन में पैदा होने वाले असंतुलन से कुछ अति धनिकों को छोड़कर सभी ग्रामीण जन खतरे की आहट महसूस कर रहे हैं। यह एक बिल्‍कुल ही दूसरी परिस्‍थति है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।  

दरअसल हमारे ‘शिक्षक’ नए कृषि कानूनों से गांवों में उत्पादक शक्तियों का विकास होगा यह मानकर उनका समर्थन कर रहे हैं और यही उनका कॉर्पोरेट पूंजी का औज़ार बन जाने के पीछे मूल कारण है। उत्पादक शक्तियों के इस प्रश्न पर विस्तारित चर्चा हम अगली किश्त में करेंगे।

क्या गरीब किसान भी हमारा प्रस्ताव आसानी से मान लेंगे?

हमसे धनी किसानों के एक हिस्से के बारे में पूछा गया है: क्या धनी किसानों का निचला संस्तर कभी मजदूर वर्ग का प्रस्ताव मानेगा? पूरी संभावना है – नहीं। तब उनके समक्ष यह प्रस्ताव ही क्यों? हमारा जवाब है: इसलिए क्योंकि वे किसानों के अन्य निम्नतर संस्तरों के साथ कॉर्पोरेट विरोधी इस संघर्ष में शामिल हैं और रणकौशल के तौर पर (अन्यथा भी) हम उन्हें न अलग कर सकते हैं न करना चाहिए। रणकौशल के प्रश्‍न को हमें इतने मनमाने तरीके से और खास कर ऊपर से अद्यतन परिस्थितयों से जुदा होकर तय नहीं करना चाहिए। ऐसे नुकीले मोड़ों पर कई प्रश्‍नों को हमें स्‍वयं गतिमान परिस्थितियों द्वारा हल किये जाने तक ऊपर से तय करने से बचना चाहिए और हमारी भूमिका परिस्थिति‍यों को प्रभावि‍त करने तक सीमित रहनी चाहिए। इसका सबसे बड़ा उदाहरण स्‍वयं अक्‍टूबर क्रांति है जिसके बारे में हम शीघ्र ही प्रकाशित होने वाली अगली किश्‍त में तफसील से चर्चा करेंगे। पर फिलहाल इस बात में शामिल अन्‍य सवालों को भी बेहतर ढंग से समझना चाहिए। सबसे अहम बात है कि यही सवाल गरीब किसानों के बारे में भी पूछा जाये; क्‍या गरीब किसान भी समाजवादी कृषि के लिए आसानी से तैयार हो जाएंगे? जवाब यह होगा: संघर्षरत धनी किसानों की बात तो छोड़ें मध्यम, छोटे तथा गरीब किसान भी सामूहिकीकरण के प्रस्ताव को तत्परता से मंजूर नहीं करेंगे, क्योंकि फिलहाल तो यह विकल्प उनकी कल्पना से ही बाहर है, राजनीतिक-वैचारिक तौर पर प्रारम्भिक रूप से भी उनके सामने प्रस्तुत नहीं किया गया है। साथ ही वे भारी दुष्प्रचार के भी शिकार हैं। पूंजीवादी व्यवस्था और बदलती राजनीतिक परिस्थिति के सम्पूर्ण विस्तार में पर्दाफाश हेतु सघन सतत प्रचार जिससे हम उनके मस्तिष्क में इस बात की कल्पना जगा सकें कि निकट या कम सुदूर भविष्य में एक नया राज्य और नई सामाजिक व्यवस्था, उनका अपना सर्वहारा राज्य, उनकी मदद के लिए वजूद में आ सकता है और (शक्तिशाली मजदूर वर्ग शक्ति के अभाव के बावजूद) मजदूर वर्ग के अगुआ तत्वों के राजनीतिक हस्तक्षेप के जरिये बहुसंख्यक किसानों की घोर हताशा से जनित मौजूदा किसान आंदोलन में भावी सर्वहारा राज्य के विचार की जड़ें जमाने में सहायता कर सकें, तभी एवं सिर्फ तभी, अत्यंत कष्टसाध्य प्रयास के बाद, यह संभावना पैदा होगी कि वे मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक कार्यभार में (ठोस विकल्‍प को लेकर ठोस रूप से) भरोसा कर सकें और मजदूर वर्ग के साथ गठजोड़ में अपने पैरों पर खड़ा होने का विश्वास हासिल कर सकें। तब तक वे बुर्जुआ वर्ग के पुच्छल्ले बनकर तुच्छ मांगों के पीछे ही ललचाते रहेंगे। पीआरसी ने ठीक यही करने का प्रयास किया है। इस वक्त सिर्फ आंशिक मांगों तक सीमित होना उन्हें बुर्जुआ वर्ग की सियासत के अनुयायी बनने के लिए कहना होगा जबकि इस वक्त किसानों की समस्या के समाधान में बुर्जुआ वर्ग का दिवालियापन पूरी तरह जाहिर हो रहा है। इस वक्त ऐसा करना घनघोर अर्थवाद होगा और हम अपने ‘शिक्षकों’ से हुई पिछली मुठभेड़ों और चुनावी राजनीति में कूदने के उनके अंदाज के जरिये अपने ‘शिक्षकों’ की इस प्रवृत्ति से भली भांति परिचित हैं कि वे किस तरह ठीक ऐन मौके पर अवसरवाद की तरफ पूरी निर्भकता से छलांग लगाने में माहिर हैं।

अतः किसानों को अपनी ओर लाने का प्रश्न मात्र एक आर्थिक प्रश्न नहीं है, ऐसा विषय नहीं है जिसे मात्र आर्थिक ढंग से प्रस्तुत किया जाये। इसकी आर्थिक व्याख्या मात्र राजनीतिक-वैचारिक समझ के साथ जुड़कर ही सर्वहारा के पक्ष में हो सकती है। गरीब किसान आर्थिक रूप से बेहद बरबाद हो चुके हैं अतः उनका राष्ट्रीयकरण या समाजीकरण को तत्परता से स्वीकार करने को राजी होना मुमकिन बन सकता है। [15] लेकिन इसे राजनीतिक जीवन के ठोस सवालों के जरिए ठोस रूप से निरूपित करना होगा। वे सिर्फ इस कारण समाजवादी कृषि के ठोस रूप से हिमायती नहीं हो जाएंगे कि वे लूटे जा रहे हैं या लूटे जा चुके हैं। ऐसी बात कोई नौसिखुआ ही सोंच सकता है। इसी प्रकार मध्यम किसान भी जिस हद तक आर्थिक बरबादी का शिकार हैं और खुद के अस्तित्व पर खतरा महसूस कर रहे हैं उस हद तक वे हमारे लक्ष्य में मित्र बन सकते हैं (पर गरीब-सीमांत किसानों जैसे स्वाभाविक मित्र के रूप में अवश्‍य ही नहीं), बशर्ते वर्ग संघर्ष या जनउभार के क्रम में एक सुसंगत राजनीतिक संघर्ष भी हो जो किसानों सहित समाज के विभिन्न हिस्सों को सिलसिलेवार अपने पीछे खींच ला सके अथवा कृषि में बड़ी पूंजी के बढ़ते दखल से जमीन से अपनी फौरी ऐतिहासिक बेदखली से आशंकित किसानों में भारी बेचैनी व खलबली हो जैसी कि आजकल मची है। इसीलिए तो पीआरसी का मानना है कि ऐसे समय में अधिकतम नारों के साथ और पूर्ण बोल्‍शेविक लचीलेपन के साथ इस आंदोलन में दखल देना चाहिए।  और, जो बात मध्यम किसानों के बारे में सही है वही धनी किसानों के निचले संस्तर के बारे में भी उतना ही सही है (दोनों के बीच कोई चीनी दिवार नहीं है और अक्‍सर एक के कुछ तत्‍वों का दूसरे में परिवर्तन होता रहता है), क्योंकि अब तक सत्ताधारी बुर्जुआ वर्ग के समरूप रहा उनका राजनीतिक व्यवहार नवीन कृषि क़ानूनों के लागू होने पश्चात तब्दील होने की प्रवृत्ति दर्शा रहा है, हालांकि तात्विक तौर पर उनका मौलिक चरित्र नहीं बदला है और बदल भी नहीं सकता है क्योंकि यह आर्थिक दशा में परिवर्तन की संभावना या परिवर्तन होते ही आसानी से नहीं बदल जाता। किन्तु बदलती आर्थिक परिस्थितियों की वजह से पिछली सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अस्तित्व पर जोखिम पैदा होने से भी धीमे-धीमे बदलने वाले तात्विक चरित्र की रट लगाते जाना आखिर क्या दर्शाता है? मार्क्सवाद तो कतई नहीं। हां, हम इसे अतिक्रांतिकारि‍ता कह सकते हैं, लेकिन यह अत्‍यंत बुरी चीज है सभी जानते हैं। यह सिर्फ तत्वज्ञानी लोगों का काम है जो सत्ताधारी वर्ग के अंदर ही पुराने रिश्तों के टूटने के इस नए बदलाव के मजदूर वर्गीय राजनीति के लिए आम महत्व और मौजूदा फासिस्ट खतरे के संदर्भ में इसके विशिष्ट महत्व को नहीं समझते, जो मजदूर वर्ग को अर्थवाद में फंसा कॉर्पोरेट पूंजी के पक्ष में ले जाते हैं, जो सम्पूर्ण ग्रामीण एवं शहरी भारत पर कॉर्पोरेट या बड़ी पूंजी की विजय में सामाजिक विकास की विजय तलाशते हैं, जो सम्पूर्ण ग्रामीण भारत को कॉर्पोरेट पूंजी के हाथ सौंपे जाने और शासक वर्ग द्वारा योजनाबद्ध तरीके से कदम दर कदम आधी ग्रामीण आबादी को गांवों से बेदखल कर पूरी कृषि को कॉर्पोरेट सेक्टर को सौंप दिये जाने में कोई हानि नहीं देखते और जो उस वक्त उत्पादक शक्तियों के विकास के उत्तम भविष्य की कल्पना में शर्म महसूस नहीं करते जब भारत सहित पूरी दुनिया पूंजी के घोर वित्तीयकरण के भंवरजाल में बही जा रही है। नवीन कृषि क़ानूनों से एक परिस्थिति पैदा हुई है जिसमें बहुसंख्यक किसान अपने अस्तित्व पर संकट मान कॉर्पोरेट पूंजी के खिलाफ मरो या मारो की लड़ाई में उतरने को बाध्‍य हुए हैं।  इन तूफानी दिनों में जो चारों ओर पूंजी, मनुष्यों और भौतिक पदार्थों के विनाश को प्रतिबिम्बित करते हैं हमारे ‘शिक्षकों’ ने कॉर्पोरेट पूंजी के पाले में खड़ा होना तय किया है। फिर इसमें अचंभे की कौन सी बात है कि वे उन पर नृशंस हमला करते हैं जो आज की ठोस परिस्थिति के ठोस विश्लेषण के आधार पर मजदूर वर्ग के लिए क्रांतिकारी कार्यभार तय करना चाहते हैं ताकि मौजूदा किसान आंदोलन पर सर्वहारा राजनीति की छाप डाल सकें, ताकि मजदूर वर्ग समाज के भावी शासक और अभिरक्षक के तौर पर 3-4 दशक की पूंजीवादी खेती के नतीजों से संकटग्रस्त व हताश किसानों को संबोधित करने का एक मौका पा सके। ये ‘शिक्षक’ इसे ही कुलकों की पूंछ में कंघी करना कहते हैं जबकी खुद वे खुलेआम नग्न होकर कॉर्पोरेट पूंजी के पाले में जा खड़े हुये हैं। पर फासीवाद के इस दौर में कुछ भी, सचमुच कुछ भी, अचंभे लायक नहीं है!

सामूहिक किसानों को उचित दाम: ‘शिक्षाविदों’ को ख़ुद शिक्षित होने की ज़रूरत है 

जब हम सर्वहारा राज्य में सामुहिकृत फार्मों के किसानों के लिए उचित दाम की बात करते हैं, तब यह एक दम अलग बात होती है, भले ये उचित दाम कुल लागत से थोडा ऊपर हो या 40-50% ऊपर। पूंजीवाद में ‘थोड़े से ऊपर’ होने से भी वह पूंजीवादी मुनाफा ही कहा जाएगा। समाज में इसे उस तरह परिभाषित अथवा समझा नहीं जा सकता अथवा उस तरह विशेषीकृत नहीं किया जा सकता जैसा कि पूंजीवादी राज्य में होता है। इसे लाभकारी मूल्य तो नहीं ही कहा जा सकता। जब हम ये कहते हैं कि समाजवादी उद्योग की कोई विशेष शाखा लाभप्रद है, इसका वो अर्थ नहीं होता जैसा कि तब होता है जब पूंजीवादी राज्य कोई उद्योग संचालित करता है। समाजवादी व्यवस्था में जब हम आम तौर पर मुनाफ़े की बात करते हैं तो वह पूंजीवादी मुनाफ़ा नहीं होता। इसका ये अर्थ होता है कि उत्पादन के किसी भाग का मूल्य, इस भाग के उत्पादन में लगे सामूहिक श्रम के सारे आकलन सहित तमाम चीजों के मूल्‍यों का हिसाब लगाने के बाद भी कुल लागत से ज्यादा है। हम जानते ही हैं कि सामूहिक फार्म में उजरती श्रम प्रतिबंधित होती है, किसी भी परिस्थिति में मान्य नहीं है। सामूहिक फार्म में किसान सामूहिक रूप से जो भी उत्पादन करते हैं वो उनकी स्वयं की श्रम शक्ति से ही पैदा होता है और सामूहिक फार्म द्वारा उत्पादित सारे उत्पाद के मालिक वे अपने सामूहिक हित में सभी सामूहिक रूप से होते हैं। लेकिन मजदूर वर्ग इन सबका अभिरक्षक होता है इस अर्थ में कि वह तमाम सामाजिक संपदा का स्‍वामी होता है। तब ये कैसे संभव है कि (पूंजीवादी अर्थ में) मुनाफ़ा पैदा हो? इसलिए, जब हम कहते हैं कि सर्वहारा राज्य, सारे के सारे उत्पाद की ‘उचित मूल्य’ पर खरीद की गारंटी देगा तो हमारे ‘शिक्षाविदों’ की खोपड़ी में लाभदायक मूल्य की बात कहां से आ गई? एक तरफ वो भी कहते हैं कि सामूहिक फार्म में उजरती श्रम प्रतिबंधित है वहीं दूसरी तरफ वो मुझ पर सर्वहारा राज्य में लाभकारी मूल्य देने की बात कहने का आरोप लगा रहा है जबकि मैंने ऐसा एक शब्द भी जुबान से नहीं निकाला है। अब ये मैं पाठकों पर ही छोड़ता हूं, खुद समझें कि सच्चाई क्या है? मैं पाठकों से पूछना चाहता हूं कि पूंजीवादी मुनाफ़ा कैसे पैदा होता है? और समाजवाद में कैसे और किसके श्रम की चोरी से हो सकता है? क्या सर्वहारा से, जो कि सारे राज्य और संपत्‍ति‍ का मालिक है? असलियत में तो, सर्वहारा राज्य में पुराने अर्थां में सर्वहारा का अस्तित्व रह ही नहीं जाता, वो अब वेतनभोगी गुलाम नहीं है बल्कि सारे के सारे उत्पादन के साधनों व सारे के सारे उत्पादन का मालिक है। इसलिए हमारे ‘शिक्षकों’ के अनुसार, जैसा कि वे कह रहे हैं, सामूहिक फार्म के किसान सर्वहारा राज्य से पूंजीवादी मुनाफ़ा कमा रहे हैं (वर्ना सामूहिक फार्म के किसानों को लाभकारी मूल्य देने का सवाल कहां से आ गया)!! हमारे ‘शिक्षाविद’ सर्वहारा राज्य की प्रतिष्ठा बढ़ा रहे हैं या उसे ज़लील कर रहे हैं?

सच्चाई ये है कि सोवियत संघ में सर्वहारा राज्य जो भी खरीदी मूल्य देता था (जो कि लागत से अधिक होता था) वो सामूहिक श्रम की गणना के आधार पर तय होता था। इसका क्या अर्थ हुआ? इसका अर्थ है, सामूहिक फार्म, राज्य से जो भी बिक्री मूल्य प्राप्त करते थे वह उनकी लागत व उनकी स्वयं की श्रम शक्ति के मूल्‍य को गणना में शामिल करने के आधार पर तय होता था। सोवियत राज्य द्वारा लागत से ज्यादा जो भी भुगतान किया जाता था (चाहे वह पैसे के रूप में हो वस्‍तु के रूप में) वह उनके स्वयं के श्रमशक्ति के मूल्‍य के बराबर ही होता था ऐसा माना जा सकता है। इसका निष्कर्ष ये हुआ कि सोवियत संघ में सामूहिक फार्म के किसान को लागत से अधिक जो भी दिया जाता था वो उसकी श्रम शक्ति के मूल्‍य के बराबर होता था। ‘शिक्षाविदों’ का कहना है कि सामूहिक फार्म का किसान सर्वहारा राज्य से जो भी प्राप्त करता था वो ‘मुख्य रूप से’ सामाजिक श्रम की गणना के आधार पर ही तय होता था। किसानों को उनकी उपज के दाम के निर्धारण में सामाजिक श्रम से अलग ये ‘मुख्य रूप से’ और क्या है? इस पर हमारे ‘शिक्षाविद’ मौन हैं!

संक्षेप में कहें तो, सामूहिक फार्म के किसानों को उनकी उपज के मूल्य के भुगतान के विषय में समाजवाद का इतिहास बताता है कि सोवियत राज्य के द्वारा दोनों तरह के दाम वसूली मूल्य तथा खरीद मूल्य दोनों तरह से भुगतान किया जाता था। वसूली मूल्य उस हालत में दिए जाते थे जब राज्य द्वारा पूर्व निर्धारित कोटे की वसूली की जाती थी। इसमें कर वसूली हो और अनाज वसूली दोनों के तत्‍व शामिल थे और यह लागत से बहुत थोड़ा अधिक होता था। इसका निर्धारण ज़मीन की गुणवत्ता और कुल बुवाई क्षेत्रफल के आधार पर किया जाता था। ऐसा निर्धारण करते वक़्त इस तथ्य को मद्देनज़र रखा जाता था कि अनुकूल परिस्थितियों में स्थित सामूहिक फार्म के किसानों के एक हिस्से को दूसरे की तुलना में बहुत अधिक नहीं मिल जाए जिससे एक का दूसरे की तुलना में अत्‍यधिक साधन संपन्न बन जाने से पैदा हुई आर्थिक असमानता, समाजवाद को मज़बूत व सफल बनाने में कहीं बाधा न खड़ी हो जाए। इसीलिए भी, ये वसूली मूल्य बाज़ार मूल्य से काफी कम होते थे। दूसरी तरफ, राज्य और सामूहिक फार्म अथवा व्यक्तिगत किसानी खेती के बीच किए गए खरीद समझौते में दाम, वसूली खरीदी दामों से काफी ज्यादा होते थे। अब, चूंकि खरीदी मूल्य, वसूली मूल्य से काफी ज्यादा हैं, इसका मतलब वह लागत से भी काफी ज्यादा हैं। इसका ये भी अर्थ निकलता है कि खरीदी मूल्‍य वाले दाम के हिस्‍से में सामूहिक फार्म के किसानों के लगी सामूहिक श्रम शक्ति की क़ीमत बहुत ज्यादा दी जाती थी। क्‍योंकि यहां दूसरे के श्रम की चोरी नहीं संभव थी तो यह पूंजीवादी मुनाफा तो नहीं ही कहा जाएगा। खरीद मूल्य, बाज़ार मूल्य की तुलना में कितना था ये तो कह पाना संभव नहीं लेकिन इतना तय है कि ये उससे कम ही होगा, अन्‍यथा खुले बाजार की व्‍यवस्‍था की छूट देने का कोई अर्थ नहीं था जहां वसूली और राज्‍य के साथ करार के आधार पर की गई खरीदगी के बाद, जो भी उत्पाद बचा उसे सामूहिक किसान बचेते थे। यह कुल उत्‍पाद का छोटा हिस्‍सा होता था। ये खुले बाजार गांव के बाहर स्थित कोलकोज़ मार्केट थे जहां किसान बाज़ार दाम पर उपने बचे उत्‍पाद बेचते थे और जहां से अपनी जरूरत की चीजें भी खरीदते थे। ये बाज़ार, सामूहिक फार्म के किसानों के लिए थे जो औद्योगिक मज़दूर अथवा कम्यून में रहने वाले किसानों की तरह सरकारी राशन पर निर्भर होकर नहीं रहना चाहते थे। पाठकों को ये समझना चाहिए कि वो उपज जिसे खुले बाज़ार में बेचा जाता था, उसे भी आखिर में राज्य द्वारा ही ख़रीदा जाता था क्योंकि वहां मुक्त बाज़ार व्यवस्था नहीं होती थी और ऐसे बाज़ार भी राज्य द्वारा कुछ निजी व्यापारियों के साथ हुए पूर्व निर्धारित समझौते के तहत ही संचालित होते थे, कोलकोज़ बाज़ार भी बहुत सीमित अर्थों में ही विद्यमान थे, उन्हें भी पूंजीवादी बाज़ारों जैसी खुली छूट नहीं थी। असलियत में सर्वहारा राज्य ही समस्त उत्पादन का मालिक था और सारी खरीदी उसी के द्वारा तीन तरह से की जाती थी; वसूली, राज्य खरीदी तथा निजी व्यापारियों के साथ राज्‍य के करार के तहत सीमित बाज़ार द्वारा। पाठकों को ‘बाज़ार’ शब्द के प्रयोग से भ्रमित नहीं होना चाहिए।

अत:, एक तथ्य बिलकुल स्पष्ट है कि सामूहिक फार्म के किसानों को दामों का कुल जो भी भुगतान किया जाता था वो सब अंतत: राज्य के द्वारा ही किया जाता था। इन सब को अगर मिलाकर देखा जाए तो वे लागत से थोडा सा ऊपर ही नहीं होती थीं, जैसा कि ऊपर के विवरण से स्पष्ट है। एक साथ मिलाकर देखा जाए तो वे क़ीमतें लागत से काफी ज्यादा होती थीं। फिर भी क्या इसे पूंजीवादी मुनाफ़ा कहा जाएगा, मैं अपने ‘शिक्षाविद’ से पूछना चाहता हूँ? नहीं, बिलकुल नहीं, वो चिल्लाएँगे! पर क्यों? वे संभवत: कहेंगे – ”क्योंकि ये निश्चित नहीं है कि ये लागत से 40-50% अधिक है अथवा नहीं।” अगर किसी गणना से यह साबित हो जाए कि सामूहिक किसानों को जो भुगतान हुआ वह लागत से 40-50% ज्यादा है तो वे फिर चिल्लाएंगे, लेकिन इस बार वे यह साबित करने के लिए चिल्लाएंगे कि अरे! ये तो पूंजीवादी मुनाफ़ा हो गया, ये तो लाभकारी मूल्य हो गया!! उनकी शायद यही सोच है (कृपया हंसिये मत)। हमारे ‘शिक्षाविदों’ का बस एक ही मापदंड है; क़ीमतें अगर लागत से 40-50% ज्यादा हो गईं तो लाभकारी ही कहलाएंगी, चाहें हम सर्वहारा राज्य में रह रहे हों चाहें पूंजीवादी राज्य में!! उन्होंने तो बस एक लकीर खींच दी है, कृषि उत्पाद की कीमतें उससे ऊपर गईं तो समझो सर्वहारा राज्य द्वारा सामूहिक फार्म को लाभकारी मूल्य देने (पूंजीवादी मुनाफ़े) का मामला बन गया!!

पूंजीवादी व्यवस्था में चूँकि उत्पादन मुख्य रूप से उजरती श्रम की बदौलत ही होता है इसलिए कुल लागत से ऊपर दिया गया भाव मुनाफ़ा का हिस्‍सा होता है। दूसरी तरफ़, समाजवादी व्यवस्था में चूंकि‍ वेतन गुलामी को समाप्त कर दिया जाता है और मज़दूर वर्ग पुराने ऐतिहासिक अर्थ में मज़दूर वर्ग नहीं रह जाता, कोई भी दाम भले वो लागत से थोडा ऊपर हो अथवा ज्यादा ऊपर हो पूंजीवादी मुनाफ़ा या उसका हिस्‍सा नहीं हो सकता है।

कम्युनिस्ट समाज की प्रथम अवस्था में जिसे समाजवाद कहा जाता है, क्योंकि मूल्य का नियम एक बहुत सीमित अर्थों में ही लागू होता है, इसलिए (सट्टा) बाज़ार द्वारा निर्मित क़ीमतों की अस्थिरता और उथल-पुथल आदि चीजें बन्द हो जाती हैं और क़ीमतों की स्थिरता बनी रहती है यानी बाज़ार स्थिर बना रहता है। लेकिन क्या इसका ये अर्थ निकाला जा सकता है कि सट्टेबाजी की प्रवृ‍ति पूरी तरह समाप्त हो जाती है? नहीं, जब तक बाज़ार मौजूद रहता है, भले ये बहुत सीमित अर्थों में ही क्यों ना हो, ये वैसा ही बाज़ार बना रहता है जैसा कि पूंजीवादी देशों में होता है और इससे सट्टा बाज़ार प्रवृत्ति पनपने की जमीन और आशंका दोनों बनी रहती है। यहां तक कि सामूहिक फार्म के किसान भी, जो बिल्‍कुल ही धनी किसान-कुलक की श्रेणी से नहीं आए थे, सामूहिक फार्म व्यापार की अनुमति दिए जाने पर सट्टेबाजी की लत के शिकार होने से नहीं बच सके थे। सन 1932 के ख़राब साल बन जाने और अनाज की बहुत कम वसूली का ये ही मुख्‍य कारण था।[16] यह और अधिक दाम के लालच से ही हुआ था और तुरंत आवश्यक रोकथाम और चौकसी की बदौलत ही परिस्थिति संभल पाई। यहां तक कि कई बार राज्य के सीधे नियंत्रण वाले फार्म भी इस रोग के शिकार हुए। जो लोग, किसानों के ऊंची क़ीमत से आकृष्ट होने पर किसानों का सिर्फ़ मखौल उड़ाना जानते हैं या जो ये सोचते हैं कि लघु किसान ऊंची क़ीमतों की लालच से मुक्त होते हैं, उनके लिए, मेरी राय में, इतना कहना या ये उदाहरण ही काफ़ी है। उनके लिए, तो मानो ग़रीब किसान कहीं और किसी गृह पर वास करते हैं जहां वे दैनंदिन पूंजीवादी वातावरण से बिल्‍कुल ही प्रभावित नहीं होते!!

लेकिन, मुक्त बाज़ार (कोलकोझ) कैसे संचालित होते थे और कुछ निजी व्यापारी तथा निजी व्यापारी संसथान कैसे काम करते थे, इसकी और ज्यादा बारीकी में और ज्यादा जाने की हमें अभी ज़रूरत नहीं है। इसे हम आगे संभवत: अपनी अगली किस्त में बहस में शामिल करेंगे।

लागत से ऊपर कीमतें: समाजवादी व्यवस्था में इन्हें कैसे समझें?   

अब हम‍ लेख के अंतिंम भाग में हैं और ‘लागत से ऊपर की क़ीमतों’ को समझने की कोशिश करते हैं जो  सोवियत संघ के सर्वहारा राज्य द्वारा सामूहिक फार्मों के किसानों को दी जाती थीं और जिन्हें भारत के भावी सर्वहारा राज्य द्वारा भारत के किसानों को दिया जाएगा। सबसे पहले तो, भले ये लागत से 40-50% से अधिक ही क्यों ना हों, इन्हें लाभकारी मूल्य नहीं कहा जा सकता। ये मुख्य रूप से मदद या सहायता के रूप में होती हैं। सामूहिक फार्म के सामूहिक उत्पाद को लागत (सामूहिक श्रम को मिलाकर) से ऊपर जो भी सर्वहारा राज्य द्वारा दिया जाता है वह सामूहिक फार्म तथा पूरे गांव के उत्थान के लिए राज्य द्वारा मदद अथवा सहायता के लिए राज्य द्वारा किया गया खर्च ही होता है। इसमें इसका एक बहुत अहम पहलू ये है, कि ऐसा शहर व गांव में श्रम विभाजन तथा दोनों में विद्यमान अंतर को सतत रूप से कम करते जाने के मक़सद से किया जाता है या किया गया था। इसलिए, समाजवादी राज्य में सामूहिक उत्पाद का उचित मूल्य वह होता है जो ये सुनिश्चित करे कि सर्वहारा राज्य में, सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में, सामूहिक फार्म के किसानों को एक उत्तरोत्तर उन्नत तथा मर्यादापूर्ण और सुन्दर जीवन को सुनिश्चित करे, जिससे किसान हमेशा सर्वहारा राज्य के अटूट  सहयोगी और सर्वहारा राज्य के सशक्त आधारस्तंभ बने रहें, अन्तिम लक्ष्य राजकीय फार्मों की दिशा में बढ़ते जाए जिससे वह दिन आएगा जब ग्रामीण और शहरी जीवन का भेद पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। खेती भी उद्योग जैसा उन्नत दर्जा हासिल करेगा, बाज़ार, उजरती श्रम तथा किसी भी रूप में शोषण  का नामोनिशान मिट जाएगा। सामूहिक फार्मों को इसी तरह मदद और सहायता देते हुए समाजवादी राज्य किसानों के दिलोदिमाग को जीता है जिससे वे कालांतर में और भी उन्नत उत्पादन साधन व वितरण प्राप्त करने की दिशा में नेतृत्वकारी ढंग से आगे बढ़ते जाएंगे। लेकिन, हमारे ‘शिक्षकों’ को इन सब बातों का मानो कोई इल्म नहीं! उसे तो बस इतना मालूम है कि सर्वहारा राज्य कभी भी सामूहिक फार्म के किसानों को ‘लागत से ज़रा सा ऊपर’ से ज्यादा दे ही नहीं सकता।

आएये, सामूहिक फार्मों के किसानों के निरंतर बढ़ते जा रहे जीवन स्तर के परिणामस्वरूप हुए उच्च सामाजिक विकास के स्तर पर नज़र डालें जो हमारे शिक्षाविद की शिक्षा, कि सर्वहारा राज्य सामूहिक फार्मों के किसानों को उनके सामूहिक कृषि उत्पाद का ‘लागत से ज़रा सा ऊपर’ भुगतान करते हैं, से मेल नहीं खाता। आएये, मौरिस डॉब की ओर मुड़ें जिन्हें हमारे ‘शिक्षाविदों’ ने ही हमें पढ़ने के लिए सुझाया है, जो सोवियत संघ में सामूहिक फार्मों के किसानों के लगातार उन्नत होते जा रहे भौतिक व सांस्कृतिक स्तर की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करते हैं और जो ‘लागत से ज़रा सा ऊपर’ से संभव नहीं था, खासतौर से 1932 के बुरे दिनों के बाद से।

1930 के दशक में बड़े पैमाने पर सरकारी राशन के विस्तार और विभिन्न बाज़ारों में एक ही उत्पाद की  भिन्न कीमत होने के कारण, खुदरा मूल्य सूचकांक की व्यवस्था के अभाव के मद्देनज़र विभिन्न खाद्य उत्पादों के मूल्यों और मज़दूरों के वेतन सम्बन्धी आंकडे जानने का कोई तरीका नहीं है। मौरिस डॉब भी यही कहते हैं । इसलिए कोई भी इस सम्बन्ध में जो भी बात करेगा, वह उस समय के मज़दूरों व किसानों के जीवन में आए बदलावों के वस्तुगत मूल्यांकन के आधार पर ही कह सकेगा। यहां हम ज़ाहिर तौर पर अपने को किसानों के बारे में ही अपनी बात को सीमित रखेंगे। अपनी जांच के बारे में मौरिस डॉब का भी यही कहना है।

मौरिस डेब लिखते हैं-

“1930 के दशक के मध्य में देश के विभिन्न राज्यों में तुलनात्मक दृष्टि से शहरों की अपेक्षा गावों में जीवन स्तर में अधिक सुधार आया, ऐसा सोचने के ठोस सबूत मौजूद हैंमध्य वोल्गा, कुबान तथा युक्रेन के गावों में 1937 में किए गए सर्वे के आधिकारिक आंकड़े बताते हैं कि 1932 के बुरे साल की तुलना में सामूहिक फार्मों को मिलने वाला औसत वार्षिक लाभांश चाहे वह जिंसों या वस्‍तुओं के रूप में हो अथवा पैसे के रूप में, दो से तीन गुना बढ़ गया था और किसान परिवारों के सदस्य, 1914 पूर्व के दिनों की तुलना में ब्रेड और दूध का उपभोग 50% ज्यादा और मांस तथा चर्बी (घी) का उपभोग कई गुना ज्यादा कर पा रहे थे.” 

मौरिस डॉब अपने लेख के नीचे दिए गए फुट नोट में ए. युगोफ़ का उद्धरण देते हैं जो बताते हैं कि मांस व चर्बी का उपभोग 8 गुना ज्यादा हो गया था। वे सोवियत वॉर न्यूज़ (16 फरवरी 1944) में छपे एक लेख के हवाले से बताते हैं कि 1917 की तुलना में किसानों में गोश्त व मक्खन का उपभोग 2 गुना, चीनी का 7 गुना और जूते का उपभोग 3 गुना हो गया था।

हमारे ‘शिक्षाविदों’ के यह दावे कि ‘सामूहिक फार्मों के किसानों को उनके उत्पाद का मूल्य लागत से ज़रा सा ज्यादा दिया जाता था’, से मिलान करने पर इसे भला कैसे समझा जा सकता है? दरअसल, सामूहिक फार्मों के किसानों को जो क़ीमत दी जाती थी वे सिर्फ़ पैसे के रूप में ही नहीं होती थीं बल्कि मशीनरी, सामूहिक फार्म में तकनीकी विकास के लिए प्रशिक्षित व अनुभवी विशेषज्ञों की टीम तथा उनके द्वारा सलाह मशविरा आदि भी दिया जाता था लेकिन ये सब मुनाफ़े के रूप में नहीं बल्कि मदद व सहायता के रूप में था और ये सब कुल मिलाकर, यदि भौतिक विकास तथा उत्पादकता का सही आकलन किया जाए, तो 40-50% से भी ज्यादा बैठता है। इसीलिए ही हम पाते हैं कि गावों की शक्‍ल-सूरत एकदम बदल गई थी। आएये, इसे फिर से देखते हैं। किसी प्रवासी लेखक का उद्धरण देते हुआ मौरिस डॉब लिखते हैं –

‘बगैर चिमनी, सपाट चारपाई वाली, छोटी-छोटी खिड़कियों वाली झोपड़ियां ग़ायब हो गई थींअब बड़ी तादाद में खुले व अधिक रोशनी वाले घर बहुत बड़ी तादाद में बन चुके थेये घर अन्दर से बिकुल साफ़-सुथरे, फर्नीचर से सुसज्जित, अच्छे बर्तन व परदे वाले पहली बार ही नज़र आए थेउसी पन्ने के नीचे फुट नोट में मौरिस डॉब फिर से युगोफ़ को उद्धृत करते हुए लिखते हैं, कई क्षेत्रों में गावों में बिजली पहुंच गई थी, नल व पक्की सड़कें मौजूद थीं…पुस्तकालय और ज्यादातर जगह क्लब, बच्चों के नर्सरी स्कूल तथा अस्पताल भी मौजूद थे

सामूहिक फार्मों के माध्यम से सोवियत संघ में मज़दूर वर्ग की राजसत्ता ने किसानों के जीवन को निश्चित रूप से बदल डाला था। लगता है, हमारे ‘शिक्षकों’ ने खुद मौरिस डॉब को अच्छी तरह से नहीं पढ़ा है और दूसरे बहुत सारे साहित्य से भी वे अनभिज्ञ हैं जिसमें 1930 के दशक के अन्तिम वर्षों में ज़बरदस्त विकास के वर्णन मौजूद हैं। अगर उन्होंने पढ़ा है तो निश्चित रूप से वे इसे समझ नहीं पाए हैं। हमारा ‘शिक्षकों का यह कुनबा’ चाहता है कि सोवियत संघ में किसानों की ज़िन्दगी में इन चमत्कारिक बदलावों को भारत के आन्दोलनरत किसानों को, जो तीन दशक से खेती में हो रहे विनाशपूर्ण पूंजीवादी विकास के दुष्परिणामों से बेहाल और बेचैन हैं और तंग आ चुके हैं और अब बड़े कॉरपोरेट मगरमच्छों द्वारा खुद को और साथ में समस्त ग्रामीण जन मानस और पुरे अवाम को निगले जाने का मंज़र सामने देख पा रहे हैं, ना बताया जाए। इनका मुख्य धंधा ये बताना है कि, पहला, उन्हें (भारतीय किसान को) समाजवादी व्यवस्था में ‘लागत से ज़रा सा ज्यादा दाम’ मिलेंगे, दूसरे, बेहाल किसानों को कहा जाए कि वे अपनी फुटकर मांगों को रखें, अपना-अपना खुद देखें तथा उनका अपना राज्य स्थापित करने को लड़ने के लिए इन महान ‘शिक्षकों’ के निर्णय का इन्तज़ार करते बैठें और तीसरे, जो कि सबसे घातक है, ग़रीब किसानों को जो देश के कॉर्पोरेट के ख़िलाफ़ शानदार, समझौतारहित आन्दोलन चला रहे हैं, इस या उस बहाने से आपस में फूट डालने को उकसाएं।

अब, हालांकि इस बात से कोई आश्चर्य नहीं होता है कि क्यों ये लोग उन लोगों पर रौद्र रूप से टूट पड़ते हैं जो ज़बरदस्त लड़ाई लड़ रहे किसानों के समक्ष ज़रा सा भी भविष्य के सर्वहारा राज्य के एक मात्र पर्याय को उनके सामने लाता है, जिससे वे ना सिर्फ़ अपनी किसान वाली पहचान, मान, मर्यादा को बचा पाएंगे बल्कि साथ ही एक गरिमापूर्ण, सम्मानपूर्ण जीवन भी सुनिश्चित कर पाएंगे। सोवियत संघ के सर्वहारा राज्य में सामूहिक फार्मों के रूप में किसानों को उनके उत्पाद का उचित दाम और सम्मानजनक जीवन का ज़रा सा ज़िक्र होते ही ये लोग आग बबूला हो जाते हैं और इनका क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच जाता है। ऐसा भला किसको हो सकता है? ये फैसला मैं अपने पाठकों पर ही छोड़ता हूं। इसके आगे की किश्त में हम (द ट्रुथ व यथार्थ के अगले अंक में) अन्‍य बाकी विषयों को हाथ में लेंगे जिसमें हम बदलते परिवेश में कानूनशुदा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) यानी खरीद गारंटी की मांग के मुद्दे पर अपने विचार को सविस्तार रखेंगे। पहले ही काफी लंबे हो चुके आलेख को अब खत्‍म करने का समय हो चुका है।  

प्रस्तुत भाग का समापन करते हुए, हम अपने ‘शिक्षकों’ को आखिर क्या कहें? हम उनको बस इतना ही कह सकते हैं, हमारे ‘शिक्षाविद’ महानुभावो, आपकी सम्पूर्ण समालोचना और कुछ नहीं बल्कि आपके घमण्ड और छल का शर्मनाक प्रदर्शन भर है। ये असलियत में आपके खुद के चरित्र की समालोचना है, हालंकि यदि आप मुझे अनुमति दें, तो मैं आपके व्यक्तित्व को और भी कई विशेषणों से सज़ा सकता हूं। मसलन, पीआरसी की आपकी समालोचना दर्शाती है कि आप अपने खुद के पाठ्यक्रम के अनुरूप प्रश्न पत्र बनाते हैं जिससे आप हमें अपनी खुद तैयार की गई उत्तरपुस्तिका के अनुसार जांच पाओ और कृत्रिम रूप से सिद्ध कर दो कि हम अज्ञानी हैं और उनकी परीक्षा में बुरी तरह नाकामयाब हो गए। उम्‍मीद करते हैं कि ऐसा करने से आपकी ‘सिखाने’ की भूख शांत हो गई होगी, लेकिन आपका कॉर्पोरेट का खिदमतगार होने का चरित्र भी साामने आ गया है और ये अब सब लोगों को समझ में आ गया है कि आप पीआरसी पर इस तरह क्यों टूट पड़े हैं। आपकी एक और योग्यता का पर्दाफ़ाश हो गया कि आपने एक मूर्ख छात्र की तरह बर्ताव किया जो कुंजियों द्वारा सुझाए, रटे-रटाए उत्तरों के अनुरूप प्रश्न पत्र चाहता है और अगर ऐसा प्रश्न पत्र ना आए तब भी उन्हीं उत्तरों को चालबाजी के साथ तोड़ मरोड़ कर प्रस्तुत कर निरीक्षक की आंखों में धूल झोंकने का दयनीय प्रयास करता है। इसके अलावा भी, अगर आप मुझे सच्चाई बयान करने की अनुमति दें, यह कहना चाहता हूं कि आपकी समालोचना में अपनाए गये तरीकों से यह प्रतीत होता है आप फासिस्ट उन्मादियों की ट्रोल सैनिकों जैसे बन गए हैं जो विपक्षी से कोई चर्चा नहीं करना चाहते बल्कि यदि बात उनके पूर्वनिर्धारित पाठ्यक्रम के अनुरूप ना हो तो किसी भी तरह की रुग्णमानसिकता ग्रस्त हथकंडा अपनाते हुए डिबेट को ही खण्डित कर डालते हैं। अंत में, हमें पूरी उम्‍मीद है महानुभावों,  आप हमारे साथ अपने असली चरित्र के अनुसार ही व्‍यवहार करना जारी रखेंगे।

(अगले अंक में दूसरी किश्‍त में यह लेख जारी रहेगा)


[1] जैसा कि लेख के शीर्षक से ही ज्ञात हो जाता है, यह लेख आलोचना की प्रति आलोचना है। आलोचना के लिए पाठक ‘आह्वान’ नाम की पत्रिका के इस लिंक पर जा सकते हैं – मौजूदा धनी किसान आन्‍दोलन और कृषि प्रश्‍न पर कम्‍युनिस्‍ट आन्‍दोलन में मौजूद अज्ञानतापूर्ण और अवसरवादी लोकरंजकतावाद के एक दरिद्र संस्‍करण की समालोचना – आह्वान (ahwanmag.com)

[2] उपरोक्‍त ‘आह्वान’ पत्रिका इसी ”शिक्षक कुनबे” की पत्रि‍का है।  

[3] उपरोक्‍त ‘आह्वान’ पत्रिका देखें। इसमें इस ”शिक्षक कुनबे” के द्वारा पीआरसी की ही आलोचना की गई है जिसे इस ग्रुप की एक महिला कार्यकर्ता ”वारूणी” के नाम से छापा गया है।

[4] वे एक बहस में लिखते हैं, “इस तरह की व्‍यवस्‍था (ठेका खेती) में भ्रष्टाचार के तत्व को छोड़ दें, तो हमें ऐसे कई मॉडल दिखते हैं, जहां…किसानों को भी इससे लाभ हुआ।” गरीब किसानों की बर्बादी को लेकर वे लिखते हैं कि “बेशक, इस बर्बादी की दर और रफ़्तार में मात्रात्मक अन्‍तर होगा, मगर यह कहना मुश्किल है यह पहले की तुलना में तेज़ या धीमी ही होगी…” यानी, वे इस बात की संभावना के लिए जगह छोड़ दे रहे हैं कि कॉर्पोरेट इंट्री से बर्बादी की रफतार धीमी भी हो सकती है। और, इसीलिए वे मानते हैं और अपनी समझ के अनुसार ठीक ही मानते हैं कि गरीब किसानों के उजड़ने की रफ्तार के सवाल को “क्रान्तिकारी सर्वहारा वर्ग की राजनीतिक लाइन तय करने में” शामिल नहीं करना चाहिए। वे फिर एक जगह लिखते हैं – “लेकिन चूंकि पहले दो कृषि क़ानून एमएसपी व्‍यवस्‍था को ख़त्म करके, मुख्‍य रूप से, धनी किसानों और कुलकों को निशाना बनाते हैं, और उसके लिए “जमीन साफ करके” कॉरपोरेट पूंजी को फ़ायदा पहुंचाते हैं, इसलिए” इनका मानना है कि मजदूर वर्ग के द्वारा इस बिंदु पर कॉर्पोरेट का विरोध करने का कोई मतलब ही नहीं है।

[5] हालांकि इनकी बातों का आंदोलन में कोई वजन नहीं है और ऐसा कहने या मानने को, यहां तक कि हमारे इस आलोचनात्‍मक प्रत्‍युत्‍तर को भी, कुछ लेाग इन्‍हें हमारे द्वारा ज्‍यादा ‘भाव देना’ भी कह सकते हैं। सच तो यह है कि कह रहे हैं। एक हद तक यह बात सही भी प्रतीत होती है। इसीलिए हम इनसे ज्‍यादा क्रांतिकारी खेमे से मुखातिब हैं और जाहिर है सबसे ज्‍यादा किसान आंदोलन में शामिल गरीब तथा मध्‍यम किसानों से संवाद स्‍थापित करना चाहते हैं। हम चाहते हैं कि उन तक हमारी बात पहुंचे। अगर इसकी कीमत ‘इन्‍हें भाव देना है’ तो हमें यह कीमत चुकानी पड़ेगी। हम ऐसे तमाम सुधि जनों से भी इसके लिए माफी चाहते हैं।

[6] हमारे इन ‘शिक्षकों’ से उलट हम इस विचार से सहमत नहीं कि धनीअमीर किसानों का पूरा हिस्‍सा कॉर्पोरेट पूंजी और कृषि क़ानूनों के निशाने पर हैं।

[7] यहां ध्यान दें कि इन ‘शिक्षकों’ के लिए सोवियत समाजवाद का ऐतिहासिक महत्व इतना ही है कि सोवियत समाजवाद महज एक ‘समाजवादी प्रयोग’ भर था। ‘उनकी’ नजर में सोवियत समाजवादी मॉडल, खास तौर पर लेनिन की मृत्यु पश्चात स्टालिन के नेतृत्व में विकसित तथा स्‍थापित सोवियत समाजवाद का ‘महान’ ऐतिहासिक महत्व मात्र इतना था कि उसे एक नकारात्मक उदाहरण (”खराब फसल”) के तौर पर स्‍वीकृत किया जाए जिससे मुख्‍यत: यह सीखा जा सके कि समाजवाद का निर्माण कैसे नहीं किया जाए। इस नजरिए से सोवियत समाजवाद को कुछ इस तरह माना जाता है जिससे कि स्टालिनेत्‍तर समाजवादी निर्माण में सृजनात्मक मार्क्सवाद के नाम पर प्रसारित गैरमार्क्‍सवादी भावुकतावाद फलने-फूलने का मौका मिल सके और वह प्रतिष्‍ठि‍त हो सके। यह सृजनात्मक मार्क्सवाद बुद्धिजीवियों के एक और कुनबे का काम था जिनमें बेथेल्हाइम, समीर अमीन, बॉब अवाकियन, रेमंड लोट्टा वगैरह शामिल हैं जो माओवाद तथा महान सर्वहारा सांस्कृतिक क्रांति‍ में मौजूद विचलन को हवा देते हुए ऊंची से ऊंची आवाज में चेतावनी जारी करते रहे – लेनिन द्वारा स्थापित और स्टालिन द्वारा मृत्युपर्यंत विकसित सोवियत समाजवाद से खबरदार-होशियार! परंतु, वह एक अलग ही किस्सा है। ये लिखते हुए अभी हमारा मकसद सिर्फ इतना इंगित करना है कि हमारे ‘शिक्षकों’ के झोले में से और भी कुछ झांक रहा है जबकि वे सोच रहे हैं कि उस पर किसी कि नजर नहीं पड़ने वाली!

[8] ये लिखते हैं – “इस मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी संगठन के नेता महोदय ने अपने लेख में सोवियत संघ में समाजवादी प्रयोग के इतिहास और कृषि प्रश्‍न पर मार्क्‍सवादी-लेनिनवादी सिद्धान्‍तों, दोनों के ही साथ मनमाने तरीके से ज़ोर-ज़बर्दस्‍ती की है।” ये एक और जगह फिर से लिखते हैं – “लेखक ने अपनी अवस्थिति रखते हुए सोवियत समाजवादी संक्रमण के दौरान अलग-अलग दौरों में किसान प्रश्न पर अपनायी गयी नीतियों को बड़े अज्ञानतापूर्ण और अवसरवादी तरीके से ऐसे पेश किया है….” पूरे लेख में ये इस निराधार आरोप को मूर्खता की हद तक बार-बार दुहराते गए हैं।

[9] ये लिखते हैं – “यह संगठन (यानी पीआरसी) “उचित दाम” का भ्रामक नारा उछालकर धनी किसानों-कुलकों की पालकी का कहार बनने के अपने अवसरवाद को वैध ठहराने का प्रयास कर रहा है।” इस आरोप को तो इन्‍होंने इतनी बार दुहराया है कि सभी को उद्धृत करने बैठें तो समय और जगह की काफी अधिक बर्बादी होगी।

[10] # इसका अर्थ है मौजूदा लेखक ने यह वाक्य जोड़ा है।

[11] अभी भी हम खुले बाजार में अनाज, फल, सब्जियों की कीमतों की तुलना कर सकते हैं और हम पाएंगे कि अभी भी वे कटाई के समय किसानों से खरीदे जाने वाले दामों से कई गुना अधिक दामों पर बिकते हैं। उदाहरण के तौर पर, एक फूलगोभी प्लास्टिक में पैक करके 60-70 रूपए की बेचीं जाती है। और ये तब है जब सबको और सभी फसलों पर एमएसपी नहीं दी जाती है।

[12] दबाव या बल प्रयोग की जरूरत तब पड़ती है जब दुश्मन अत्यंत शक्तिशाली हो और सर्वहारा राज्य को अस्थिर करने की ताकत रखता हो। जब कॉर्पोरेटों की संपत्ति जब्त की जाएगी और छोटे व मध्यम किसान सर्वहारा राज्य के साथ खड़े होंगे तब अत्यंत धनी किसानों के बेहद छोटे हिस्से से हमें उतना खतरा नहीं होगा, खासकर तब जब उनमें से थोड़े कम सम्पत्ति वाले किसान जो खुद तकलीफ में हैं और मौजूदा आंदोलन में कॉर्पोरेट के खिलाफ संघर्ष कर रहे हैं, समूहिकीकरण के खिलाफ अत्यंत धनी किसानों के साथ नहीं खड़े होंगे। अतः धनी किसानों का सवाल मौजूदा भारतीय परिपेक्ष्य में उस कदर जरूरी या चिंता का विषय नहीं रह जाता।

[13] हमारे ‘शिक्षक’ बड़े उत्साह से अपना आर्थिक दृष्टिकोण पेश करते हैं और यह समझ रखते हैं कि पूंजीवादी खेती (अब चाहे ये एकाधिकरिकरण की तरफ ही क्यों ना बढ़ जाए) एक प्रगतिशील कदम होगा और अगर कृषि कानून इसके अगले चरण का आगाज़ करते हैं तो इससे कोई नुक्सान नहीं है बल्कि ये तो उत्पादक शक्तियों के विकास और गांवों से प्रतिक्रियावाद का खात्मा करने में मदद करेगा। और इसीलिए जब कोई समर्थन में आता है या सर्वहारा वर्ग के हस्तक्षेप की बात करता है तो वे उनको नीचा दिखाते और उनका मज़ाक उड़ाते हैं। वे जाटों के महिला विरोधी, पितृसत्तात्मक, जातिवादी और साम्प्रदायिक इतिहास को इस विश्वास के साथ उद्धृत करते हैं कि बड़ी पूंजी के आने से इन सबका समाधान हो जाएगा। यह बेवकूफी की हद है। इसका मतलब कि पूंजीवाद अभी भी भारतीय समाज में एक प्रगतिशील भूमिका अदा करने की कुवत रखता है जबकि हम साफ देख सकते हैं कि वो तो संपत्ति और पूंजी के वित्तीयकरण तक पहुंच गया है। मौद्रिकरण, शहरीकरण, आदि सब इसी के उदाहरण है कि कैसे वित्तीय निष्कर्षण और जो भी उत्पादन हो उसके मुनाफे को निचोड़ कर केवल विध्वंस फैलाया जाएगा। कॉर्पोरेट गोदामों में रखे अनाज का इस्तेमाल वित्तीयकरण के यंत्रों के जरिये सट्टेबाजी से मुनाफा कमाने में किया जाएगा। कॉर्पोरेट नियंत्रित कॉन्ट्रैक्ट खेती में आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल केवल मुनाफे के लिए किया जा रहा है जिसका वित्तीयकरण किया जाएगा क्योंकि दुबारा खेती के विकास के लिए उसमें निवेश करने से अतिउत्पादन और बढ़ेगा। अतः ये एकाधिकार को बढ़ाने वाले कृषि कानून ना सिर्फ कालाबाजारी के लिए जगह बनायेंगे, बल्कि पहले से निवेश की जा चुकी पूंजी और संपत्तियों का वित्तीयकरण भी शुरू हो जाएगा और अगर कॉन्ट्रैक्ट खेती में नई पूंजी लगती भी है तो ये एकाधिकारी पूंजी के मालिक पश्चिमी देशों से आधुनिक मशीनें लायेंगे जो वहां पड़े-पड़े सड़ रहे हैं और इनका भी मुनाफा चूस लिए जाने के बाद वही हस्र होगा। यहां तक कि अनाजों की कालाबाजारी भी इसी प्रक्रिया का हिस्सा होगी जहां भविष्य के सट्टेबाज उपकरणों को लगाया जाएगा। यह खेती को हमेशा हमेशा के लिए बर्बाद कर देगा। यही है आज के पूंजीवाद का असली रूप। अतः पूंजीवादी खेती को आगे बढ़ाने की वकालत करने का कोई तुक नहीं है। यह पहले से ही एक क्रांतिकारी संकट के आने की घोषणा कर चुका है जिसका सबसे बड़ा सबूत मौजूदा किसान आंदोलन है। 

[14] क्या हर बार मजदूर-किसान गठजोड़ बोलने पर हमें मजदूर-गरीब किसान गठजोड़ या मजदूर-गरीब व मध्यम या निम्न-मध्यम किसान कहना चाहिए? यह हास्यास्पद बात है। ऐसी यांत्रिकता बकवास है। सोवियत साहित्य में महान लेनिन को भी हम अक्सर मजदूर-किसान गठजोड़ की बात करते पते हैं जबकी उनकी बात का अर्थ धनी किसानों व कुलकों को छोड़कर होता था। हम इसके दर्जनों उदाहरण दे सकते हैं लेकिन वह पहले ही अधिक लंबे हो चुके इस लेख में पाठकों का वक्त व स्थान जाया करना होगा।

[15] इस संबंध में हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि सामाजिक विकास के मौजूदा चरण में हम राष्ट्रीयकरण पश्चात काम करने वालों को भूमि के बंटवारे के हिमायती नहीं हैं। भारतीय किसानों के संदर्भ में यह बुर्जुआ या संशोधनवादी नारा ही कहा जा सकता है। हम भारत में सर्वहारा का अधिनायकत्व कायम होने पर समाजवादी व्यवस्था में सामूहिकीकरण के जरिये कृषि के समाजीकरण को ही प्रथम चरण का कार्यभार मानते हैं।

[16] इस ज्वलंत समस्या की तस्वीर खींचते हुए स्टालिन लिखते हैं, 1932 में हमारी फसल कोई ख़राब नहीं थी बल्कि पिछले सालों से बेहतर ही थी …1932 में अनाज की बुवाई 1931 से ज्यादा ही हुई थी… तब भी, इन परिस्थियों के बावजूद भी 1932 में हमारी खाद्यान्न की वसूली पिछले साल की बराबर भी बहुत मुश्किलों से ही हो पाई… जब तक सामूहिक फार्म व्यापार नहीं था, जब तक खाद्यान्न के दो रेट नहीं थे – सरकारी रेट और मार्केट रेट, देहात में परिस्थितियां एक जैसी ही बनी रहती थीं। जब सामूहिक फार्म व्यापार की अनुमति दे दी गई, परिस्थिति तेज़ी से बदलने वाली ही थी क्योंकि सामूहिक फार्म व्यापार की अनुमति देने का मतलब ही है कि ऐसा कानून, जिससे खाद्यान्न का भाव प्रस्थापित सरकारी भाव से ज्यादा हो जाएगा। इस तथ्य को साबित करने की भी ज़रूरत नहीं है कि इससे किसानों के दिमाग में सरकारी भाव पर खाद्यान्न बेचने का कुछ ना कुछ विरोध ज़रूर पैदा होगा। किसानों ने इस तरह हिसाब लगाया : “सामूहिक फार्म व्यापार की अनुमति मिल ही गई है, बाज़ार भाव को कानूनी बना दिया गया है, निश्चित खाद्यान्न को मैं बाज़ार भाव में बेचूं तो सरकार को देने के मुकाबले ज्यादा पैसा मिलेगा। इसलिए यदि मैं बेवकूफ नहीं हूँ तो मैं अपनी उपज को रोक कर रखूँगा, सरकार को कम दूंगा, ज्यादा अनाज सामूहिक व्यापार के लिए रखूँगा और ऐसा करके मैं उतने ही अनाज से ज्यादा कमा लूँगा।” स्टालिन इसे स्वाभाविक तर्क क़रार देते हैं और इस आधार पर ऐसा निर्णय नहीं लेते कि ये सब बेकार के लोग हैं। वे कहते हैं, “ये सबसे आसान तथा सबसे स्वाभाविक तर्क है” और इसका कारण खोजते हुए बताते हैं कि तुरंत रोकथाम ना करना और पर्याप्त चौकसी ना बरतना, समाजवादी आदर्शों की पर्याप्त सीख ना होना, इसके असली कारण हैं और आगे वे कहते हैं कि इसका असली कारण है कि समाजवादी रास्ते के प्रति भरोसे की कमी अभी तक इनके दिलो-दिमाग में घुमड़ रही है।

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