प्रशांत भूषण बनाम वाम (लेफ्ट) : मूल प्रश्न विषय के प्रस्तुतिकरण का है

यह भी बहस चल रही है कि वाम को प्रशांत भूषण का समर्थन करना चाहिये या नहीं। कुछ लोग यह सवाल उठाते हैं कि प्रशांत भूषण का सुप्रीम कोर्ट में चल रहे मौजूदा द्वंद्व में समर्थन करने से हम उसको “हीरो” बना देते हैं और इसीलिए यह त्याज्य है। लेकिन वे यह नहीं कहते हैं कि इस पर क्या करें। इस प्रवृत्ति का ज्यादातर अर्थ यही निकलता है कि “चुप रहा जाए” और देश मे जिस विषय पर बबाल है उसकी “रेत में सिर गाड़कर” अनदेखी करते हुए पतली गली से निकल लिया जाए। जाहिर है, ऐसी प्रवृत्ति अराजनीतिकरण की है या फिर इससे अतिशय डर की बू आती है। यह प्रवृत्ति है तो बहुत ही घटिया, लेकिन इसका वजूद फिलहाल न के बराबर है इसलिए इसे यहीं छोड़कर इसकी “सहोदर प्रवृत्ति” पर आते हैं।

इस अदूरदर्शी और अव्यवहारिक दृष्टिकोण के ठीक बगल में इसी का जुड़वा दृष्टिकोण बड़ी शान से राजनीति के मंच पर विराजमान है। यह प्रवृत्ति उदारवाद के समक्ष समर्पण का है जिसका अर्थ “समर्थन करना” और ” समर्थन के अलावा कुछ न करना” और सिर्फ “जयकारा” करना होता है। इससे जुड़ा सवाल खासकर तब उठ खड़ा होता है जब वाम के किसी कोने से प्रशांत भूषण की वैचारिक सीमा के बारे में इशारा किया जाता है।

असलियत क्या है? वामपंथ तो अभिव्यक्ति की आज़ादी, जनवादी अधिकारों की रक्षा और इसके लिये जरूरत पड़ने पर बलिदान देने के लिए भी हमेशा ही खड़ा है और आगे रहेगा, चाहे उसकी अगुवाई पूंजीवादी जनवादी उदारवादी, जो कि प्रशांत भूषण हैं, करे या कोई और। जहां कहीं भी किसी पूंजीवादी उदारवादी के साथ अन्याय हुआ है और भेदभाव या उत्पीड़न हुआ है तथा न्याय की किसी भी प्रगतिशील और जनवादी अवधारणा पर चोट हुई है, वहां समस्या वामपंथ के साथ होने को लेकर है ही नहीं। वो तो सर्वविदित है कि वाम वहां सबसे आगे है। बस सबसे आगे की पोजीशन को छोड़कर! इसके विपरीत, इस सम्बंध में, अगर ठीक-ठीक गौर कर बोलें, तो असल समस्या पिछलग्गुपन की हद तक जाकर साथ खड़ा होने की है। वामपंथ ऐसी हर जगह साथ है और आगे भी रहेगा जहां अन्याय है या हो रहा है, लेकिन सवाल तो यह है कि क्या प्रशांत भूषण सतत और अंतिम दम तक, पूंजीवादी सीमा के परे जाकर भी, न्याय की गुहार के साथ खड़ा हैं या खड़ा रहेंगे? क्योंकि सीमा तो उनकी है कि वे एक दूरी तक ही चलेंगे, यानी, महज़ पूंजीवादी जनवादी न्याय की अवधारणा की सीमा तक। उसके आगे यथास्थिति के समक्ष नतमस्तक होने की सीमा या मज़बूरी तो उनकी है, वाम की नहीं। क्रांतिकारी वाम की तो कतई नहीं। जैसे ही सतत और वास्तविक न्याय की आवाज़ सर्वहारा और मेहनकश अवाम लगाना शुरू करेगी और इसके लिए आगे बाधा बन कर खड़ी पूंजी (पूंजीपति वर्ग) की बादशाहत, जिसके कारण ही न्याय और जनवाद जनता तक तो कभी पहुंचती है और न भविष्य में कभी पहुंचेगी, को चुनौती देगी तो वे खुद पूंजी की बलिवेदी पर सब कुछ, स्वयं अपनी आज की उफनती अंतरात्मा की आवाज़ तक को कुर्बान कर देने में नहीं हिचकेंगे। वे अपनी कथित “आत्मा की अवमानना” और “नागरिक होने के कर्तव्य” की भी आहुति देने को तैयार हो जाएंगे।

जहां तक अभी तक ज्ञात है उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि उनके शाश्वत न्याय की गुहार पूंजी के दरवाजे से आगे नहीं जाती है या जाएगी। वहां आकर वह दम तोड़ देगी। ऐसा नहीं होगा, इसकी गारंटी कोई नहीं ले सकता। वे स्वयं भी नहीं, क्योंकि यह उनकी अपनी अवधारणा से जुड़ी बात है जो बहुत से बहुत उस पूंजीवादी जनवादी न्याय की व्यवस्था तक जाती है, जो महज़ चिकनी-चुपड़ी बातों और छोटे-मोटे मसलों पर न्याय देने के जरिये पूंजीवाद के द्वारा भूख, गरीबी, दारिद्र्य, गैरबराबरी और युद्ध के द्वारा मानवजाति के हो रहे व्यावस्थजनित विनाश और ध्वंस को किसी न किसी तौर से न्यायोचित ठहराती है। तब उनके लिए इसी व्यवस्था की ‘पवित्र’ अक्षुण्णता को बनाये रखना और इसे आम जनता के ‘बर्बर’ अतिक्रमण से बचाना सर्वोपरि हो जाएगा, चाहे इसका अर्थ फासीवादी मोदी सरकार की पैरोकारी ही क्यों न हो।

फिर भी वे आज जहां खड़े हो कर इस कटे-छंटे पूंजीवादी जनवादी न्याय के भी हो रहे ध्वंस के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे हैं, उसका समर्थन जरूरी है, क्योंकि इसे बचाना और इसकी सीमा से इसे आगे ले जाना सर्वहारा वर्ग के हित में है और उसका फ़र्ज़ है। इसलिए यह सही है कि उस मोर्चे की अग्रिम पंक्ति में वामपंथी ही खड़े हैं और खड़े रहेंगे। बल्कि वाम को मोर्चे की अग्रिम पंक्ति की सबसे अग्रिम पोजीशन पर होना चाहिए था, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं है। वामपंथ का धुर विरोधी भी मानेगा और मानता है कि हम अग्रिम पोजीशन को छोड़कर हर जगह हैं! अग्रिम पोजीशन को पूंजीवादियों के लिए छोड़ देने के बाद, ठीक यहां के दो कदम आगे से, मूल समस्या शुरू होती है। और यह समस्या है, वाम का पिछलग्गूपन की हद तक “उदारवादियों” का समर्थन देना और उस लक्ष्य को ही भूल जाना जो शाश्वत और सतत न्याय की प्राप्ति हेतु जरूरी है। यानी, पूंजीवाद का खात्मा, पूंजीवाद की क्षितिज का सकारात्मक अतिक्रमण और एक पूरी की पूरी नई दुनिया का निर्माण जहां मानवजाति पूरी तरह स्वतंत्र होगी और मनुष्य स्वयं अपनी पूर्णता को प्राप्त होगा।

समस्या ठीक-ठीक यह है, जो अक्सर ऐसे मसलों पर दोनों ओर होने वाले विचलनों का साररूप है।

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