चुनाव बाद परिस्थितियों पर एक नजर

संपादकीय, ‘सर्वहारा’ अखबार (अंक 52) – 1 जून 2024

1 जून को 18वीं लोक सभा चुनाव का 7वां और अंतिम दौर समाप्त हो जाएगा। इसके साथ ही हर पांच सालों पर आने वाला ‘जनतंत्र’ का महापर्व और इसका चुनावी शोरगुल बंद भी हो जाएगी। 4 जून को हार-जीत का रिजल्ट आने के बाद किसकी हार और किसकी जीत होगी, यह भी तय हो जाएगा। कुछ लोगों के लिये, अगर विपक्ष की जीत होती है तो फासीवादी ताकतों को सत्ता से कैसे दूर रखा जा सकता है इसकी बहस भी समाप्त हो जाएगी। यानी, फन उठाते फासीवाद की पराजय सुनिश्चित करने का दायित्व पूरा हो जाएगा। लेकिन क्या वास्तव में ऐसा होगा? वर्तमान सामाजिक व आर्थिक परिस्थितियां, जिससे उसकी जड़ों को खाद-पानी मिलता है, कितनी और किस हद तक बदलेंगी? प्रश्न यह भी है कि वे बदलेंगी भी या नहीं?

आइये, सरकार बदलने की सभांवना पर बात करें। इसके बारे में हर तरह का शक-शुबहा बना हुआ है। पहला शक तो यही होता है कि भाजपानीत गठबंधन एनडीए को क्या सचमुच इतने कम वोट मिलेंगे कि वह सरकार नहीं बना पाएगी? दूसरा, चुनाव आयोग की अब तक की भूमिका और तमाम केंद्रीय एजेंसियों पर मोदी की पकड़ को देखते हुए मतगणना के समय होने वाली धांधली से लेकर हार की घोषणा के बाद भी सत्ता नहीं छोड़ने की आरएसएस-भाजपा की कोशिशों से इनकार नहीं किया जा सकता है। मोदी की बॉडी लैंग्वेज और इसके द्वारा दो दिनों के भीतर उठाये गए कुछ प्रशासनिक कदम भी इसकी गवाही देते हैं। कुलमिलाकर, हार-जीत को लेकर केवल कयास ही लगाए जा सकते हैं, और बस यही किया जा रहा है।

जाहिर है, जो भाजपा के हारने को ही फासीवादी शक्तियों की पराजय मानते हैं, उनकी धड़कने अभी से काफी तेज हो गई होंगी। लेकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि जो लोग ऐसा नहीं मानते हैं, उनके लिए इस चुनाव में सरकार बदलने की बात का कोई महत्व ही नहीं है। नहीं, ऐसा बिल्कुल ही नहीं है। भाजपा की हार का महत्व, यहां तक कि रणनीतिक महत्व, को हम सब मानते हैं। यानी, वे भी इसके महत्व को मानते हैं जो साथ में यह भी मानते हैं कि सरकार बदलने से फासीवादी शक्तियों को सत्ता से दूर रखने का दायित्व पूरी तरह खत्म नहीं हो जाता है और इसलिये इसके लिए मुख्य रूप से एक देशव्यापी जन-उभार और उसके संभावित क्रांतिकारी परिणामों पर भरोसा करना चाहिये। भाजपा की हार को हम फिर महत्व क्यों देते हैं? दोनों में वास्तविक फर्क क्या है?

इसमें कोई शक नहीं है कि मोदी की सरकार आगे जारी रहती है तो फासीवाद की पूर्ण विजय जल्दी ही सम्भव है और देश की राजनीतिक परिस्थिति में एकाएक बड़ा परिवर्तन देखने को मिल सकता है। जैसे, भारत को धार्मिक राज्य की तरह का देश बनाया जा सकता है; पूंजीवादी जनतंत्र, जिसकी वजह से जनता को सरकार चुनने का अधिकार प्राप्त है, को खत्म किया जा सकता है; देश पर हिन्दू-राष्ट्र के नाम पर बड़ी पूंजी का प्रत्यक्ष अधिनायकत्व थोपा जा सकता है, और वैसे सारे फासीवादी प्रयास तेज हो सकते हैं जिसका सपना मोदी सरकार पालती रही है। चुनाव प्रचार के दौरान एक साक्षात्कार में मोदी कह चुके हैं कि उन्हें ईश्वर ने प्रधानमंत्री के रूप में जनता की सेवा करने के लिए भेजा है। इसमें यह संदेश छुपा है कि आगे उनका जनता द्वारा चुना जाना कोई मायने नहीं रखता है। इसके पहले अयोध्या में 22 जनवरी के दिन राम मंदिर के उद्घाटन के मौके पर वे जनतंत्र की जगह रामराज और संविधान की जगह राम के विधान की बात भी कर चुके हैं। इन बयानों में एक संदेश है। वह यह कि मोदी को आगे से, या आज से ही, हार के आंकड़ों के बावजूद, ईश्वर के दूत या अवतार होने के नाते में देश पर शासन चलाने का अधिकार है। एक तरह से वे इसकी घोषणा कर रहे हैं, ताकि लागू करते वक्त किसी को कोई भ्रम न हो! इसके बाद चुनाव, संविधान और नागरिक स्वतंत्रता एवं जनवादी अधिकारों की बात स्वतः खत्म हो जाती है। आज के आधुनिक युग में, जो पूंजीवाद-साम्राज्यवाद का युग है, इस पश्चगमन का एक ही अर्थ हो सकता है। वह यह कि भारत धार्मिक राज्य के भेष में बड़ी पूंजी की सरपरस्ती में ‘जनतंत्र’ की जगह खुली व नंगी तानाशाही वाला देश बन जायेगा। इसका बाह्य स्वरूप चाहे कुछ भी हो।

इसलिए यह शुरू से ही स्पष्ट है कि मोदी सरकार के दुबारा सत्ता में आने का अर्थ जनता के जीवन में भयंकर बदहाली का आना होगा। खासकर मजदूर-मेहनतकश अवाम  अधिकार-विहीन हो जाएगी। वह किसी भी तरह के नागरिक अधिकार से वंचित तानाशाह की गुलाम प्रजा बन जाएगी। जनता के अधिकारों, न्याय और सामाजिक प्रगति की बात करना अपराध हो जाएगा। इसलिए शोषणविहीन समाज की नींव रखने की कोशिश करने वाले क्रांतिकारी जमातों ने शुरू से ही जनता से इस चुनाव में मोदी सरकार को हराने तथा दुबारा सत्ता में आने से रोकने की अपील जारी की थी। सभी ने माना कि यह चुनाव कोई मामूली चुनाव नहीं, अपितु एक तरफ तानाशाही को रोकने, तो दूसरी तरफ न्याय व जनतंत्र की अवधाराणा को जिंदा रखने की लड़ाई बन गया है और इसलिये इसके परिणाम पर देश का बहुत कुछ निर्भर करेगा।

लेकिन अधिकांश यह भी मानते हैं कि विपक्ष की सरकार बनने से जनता पर बड़ी पूंजी के हमलों से मामूली और कुछ देर के लिये ही राहत मिलेगी। कोई बुनियादी बदलाव नहीं आने वाला है। क्यों? प्रथमत: इसलिए कि मौजूदा विपक्ष भी, हालांकि इसका इतिहास हिन्दू-राष्ट्र और खुली तानाशाही कायम करने के एजेंडे पर काम करने का नहीं रहा है, बड़े पूंजीपतियों के हितों से जुड़ी तथा धार्मिक-जातीय समीकरण और झूठे वायदों के सहारे सत्ता प्राप्त करने की राजनीति पर ही टिकी पार्टियों का समूह है। आज वह इसलिए जनपक्षी बातें कर रहा है या करता दिख रहा है क्योंकि वह सत्ता में नहीं है। यह भी सही है कि फासीवादियों के खिलाफ तीखी लड़ाई में कभी-कभी और हालातवश क्रांतिकारी जनता व जमात को बुर्जुआ विपक्ष का भी कार्यनीतिक समर्थन करना पड़ सकता है और इसमें उपरोक्त बातें आड़े नहीं आती हैं, लेकिन फासीवादियों को सत्ता से दूर रखने में ऐसा विपक्ष कितना और कब तक कारगर होगा यह जरूर विचारणीय है।

मान लीजिए, अगर भाजपा खुलेआम चुनाव आयोग की सहायता से हार के आंकड़े को जीत के आंकड़े में बदलने की कोशिश करती है या इसमें असफल रहने के बाद किसी और तरीके से सत्ता में बने रहने की तिकड़म, तोड़फोड़ या बदमाशी करती है, तो क्या ऐसा विपक्ष कल को भाजपा-आरएसएस के गैर-कानूनी कदम के खिलाफ जनता को सड़क पर उतरने का आह्वान करेगा? हर किसी को, जो फासीवादी और गैर-फासीवादी दलों के (अंततः) एक समान वर्गीय चरित्र को समझता है, इसमें संदेह होना चाहिए।

हम जानते हैं कि फासीवादी किसी भी सीमा तक गिर सकते हैं। वे चुनाव से सत्ता में आते तो हैं, लेकिन चुनावी हार-जीत से आसानी से सत्ता से चले भी जाएंगे, इस पर संदेह है। मोदी के धार्मिक उन्माद उकसाने वाले चुनाव प्रचार को ही देख लीजिये, जिसमें इसकी साफ झलक दिखती है। फिर इस पर चुनाव आयोग की चुप्पी और अन्य सभी केंद्रीय एजेंसियों पर मोदी की पकड़ पर तथा चुनाव के अंतिम दौर के पहले मोदी द्वारा उठाये गए कुछ महत्वपूर्ण कदमों पर गौर फरमा लीजिये। सब कुछ साफ हो जाएगा। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि हम कह रहे हैं कि हारने के बाद भी मोदी सत्ता में बने ही रहेंगे। नहीं, हम ऐसा नहीं कह रहे हैं। बस संभावना क्या है, इसकी बात कर रहे हैं।

अगर उपरोक्त दोनों हालात पैदा नहीं भी होते हैं और सरकार की अदला-बदली सामान्य रूप से हो जाती है, तो भी न तो मौजूदा विपक्ष की सरकार जनता की इच्छाओं पर खरा उतरने वाली है और न ही उसे फासीवादी शक्तियां चलने ही देंगी। हताश व निराश जनता को वे फिर से बरगलाकर बड़े पूंजीपतियों की मदद से इसे भरसक गिराने और एक खतरनाक भंवर की तरह फिर से तथा और भी भयानक मंसूबों के साथ सत्ता में दुबारा आने की कोशिश करेंगे। इसके परिणामस्वरूप हो सकता है कि नई सरकार के बनते ही सता पक्ष और विपक्ष में बंटे शासक वर्गों के बीच गंभीर टकराव की स्थिति पैदा हो जाए। ऐसे में जनता का क्रांतिकारी उभार ही फासीवादी शक्तियों को हराने एवं एक ऐसी सरकार बनाने का एकमात्र साधन व सहारा बच जाता है जो वास्तव में फासीवादियों को पराजित करेगी और साथ ही साथ जनता के हितों का प्रतिनिधित्व भी करेगी।

इस तरह यह चुनाव ऐसा है कि फासीवादी शक्तियों की चुनावी पराजय के बाद भी फासीवादियों को सत्ता से दूर रखना, जो फिलहाल हमारा मुख्य तात्कालिक लक्ष्य है, सुनिश्चित होता नहीं दिखता है। यानी, इस चुनाव में होने वाली हार-जीत जनता के भावी राजनीतिक संघर्षों के लिए महत्वपूर्ण होते हुए भी, यहां तक कि अत्यधिक रूप से महत्वपूर्ण होते हुए भी, फासीवादियों को सत्ता से दूर रखने के सीमित संदर्भ में भी बहुत ज्यादा मूल्यवान चीज नहीं प्रतीत होती है।

तो क्या इसका कोई मूल्य नहीं है? नहीं, इसका मूल्य है। लेकिन तभी है जब हम आरएसएस-भाजपा तथा मोदी को वोटों के मामले में पराजित करने के अलावा उसे अन्य तरह से भी हराने के रास्तों के बारे में, खासकर फासीवादी शक्तियों को दुबारा से गैर-कानूनी तरीके और जोर-जबरदस्ती से सत्ता में आने से रोकने के लिए जनता के व्यापक उभार के रास्ते के बारे में भी विचार करते हैं, जिसकी संभावना दिनोंदिन बढ़ती जा रही है। इस रास्ते को अमल करने की संभावना को नकार कर फासीवादियों को सत्ता से दूर रखने का ख्वाब महज एक ख्वाब ही है।

हम उम्मीद करते हैं कि वह ‘फर्क’ स्पष्ट हो गया होगा जिसकी हमने ऊपर बात की थी। जहां तक चुनाव बाद परिस्थितियों के ठोस आकलन की बात है, तो हमें 4 जून और उसके बाद बनने वाली परिस्थितियों पर से पर्दा उठने का इंतजार करना चाहिए, लेकिन इस बात को समझते हुए कि जल्द ही जनता का असली संघर्ष शुरू होगा और जनता हर बार के विपरीत इस बार आर-पार की लड़ाई वाली भूमिका में भी आ सकती है। खुद जनता को भले ही इसका पूर्वानुमान न हो, लेकिन बुद्धिजीवी वर्ग से आये अगुआ साथियों को इसकी समझ अवश्य होनी  चाहिये।


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