आज का युवा वर्ग और स्तालिन की विरासत

[सोवियत समाजवाद के निर्माता और विश्व सर्वहारा के महान नेता व शिक्षक कॉमरेड स्तालिन के जन्मदिवस पर पीडीवाईएक द्वारा जारी लेख]

21 दिसंबर 2020

अगर बात युवा वर्ग की हो और साथ में स्तालिन की क्रांतिकारी विरासत पर भी चर्चा हो रही हो, तो जर्द बर्फीली सर्दी में भी रगों में गरमी दौड़ने लगती है। युवा मन स्वभाव से विराट हृदय का स्वामी, अन्याय व शोषण का विरोधी और न्याय का पक्षधर होता है। जब कोई बात उसके दिल पे बन आए, तो वह पराक्रमियों में भी सबसे पराक्रमी बन जाता है। वह किसी से नहीं डरता। अगर वह क्रांतिकारी बन जाए तो पल में दुनिया को बदल कर रख दे। वह चाह ले तो हिमालय को भी झुकना पड़े। वह सीना तान कर खड़ा हो जाए, तो ‘चंगेज खां’ भी घुटनों के बल आ जाए और उसके चरणों में गिर जाए। वह उर्जा का स्वामी और उसका अक्षय स्रोत है, दानवीरों में सबसे बड़ा दानवीर है। लेकिन यह सच है और हमारे युवा साथी भी इससे सहमत होंगे कि आज के दौर के युवाओं की बात करते ही शरीर में एक अजीब सी सिहरन सी दौड़ जाती है। युवाओं की समग्रता में दयनीय स्थिति सच में डराती है। उनमें व्याप्त ‘ठंढापन’ सच में कंपा देने वाला है। भगत सिंह के आदर्शों पर चलने की कसमें खाना वाला युवा वर्ग आज कहीं गुम हो गया है। हालांकि नई परिस्थितियाँ युवाओं में स्पंदन व नई चेतना पैदा कर रही है और हमारी उम्मीदों को पुनर्जीवित कर रही हैं, लेकिन यह सच है कि आज का युवा प्रगतिशील मूल्यबोध के मामले में ही नहीं, हर तरह से कुपमंडूक हो गया है और कोचिंगों/ट्यूशन सेंटरों के चक्कर काटते-काटते आत्मकेंद्रित हो युवानुमा भीड़ में कहीं खो गया है। या कहें स्वयं युवानुमा भीड़ बन गया है। सारी सुख सुविधा और एश्वर्य को त्याग कर और बिना किसी से डरे विकट से विकट बाधाओं को पार करते हुए अन्याय और गैरबराबरी पर टिके समाज को पलट देने के आदर्शवादी सपनों पर हमेशा सवार रहने वाला युवा आज ढूढ़े नहीं मिलता। जल्द से जल्द अपने लिए कोई अदद नौकरी का जुगाड़ कर लेना और ज्यादा से ज्यादा सुख-सुविधाओं की गारंटी कर लेना उसके जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन गया है। यह अलग बात है कि अधिकांश की अभिलाषा बस अभिलाषा बन कर ही रह जाती है। जो बचता है वह खाली डब्बे जैसा एक जीवन होता है जिसमें बस भरी होती है निराशा, पस्तहिम्मति और चारो ओर फैला होता है अवसाद जो अक्सरहाँ उन्हें नकारात्मकता की तरफ ले जाता है। निस्ंसदेह यह सब पूँजीपति वर्ग का किया धरा है। पूँजीवादी व्यवस्था ने ही युवा वर्ग को पूँजीवादी आदर्शों के मकड़जाल में फंसा रखा है और एकमात्र निजी हितों के पीछे-पीछे दौड़ने के लिए विवश कर रखा है। उपभोक्तावाद और मूल्यविहीनता के गहरे अंधेरे खड्डे में धकेलने वाला भी वही है। लेकिन हमारे लिए भी आत्ममंथन करना अत्यावश्यक है। युवाओं को इससे निकलने के रास्तों पर गंभीरता से विचार करना होगा। निस्संदेह आज का विषय हमारे लिए इसमें काफी मददगार है।

हम युवाओं को महान स्तालिन की समूची क्रांतिकारी विरासत को पढ़ना व समझना चाहिए और उस पर गंभीरता से चिंतन-मनन करना चाहिए। स्तालिन अत्यंत छोटी उम्र से ही, हमारी आपकी उम्र से ही, समाज को बदलने और शोषण-उत्पीड़न करने वाली व्यवस्था को उखाड़ फेंकने जैसे कार्यों में अपना योगदान देना शुरू कर चुके थे। वे मजदूरों और मेहनतकश किसानों के बीच जाते थें, उनसे सीखते थे और उन्हें सिखाते थे। तब रूस में जार के अधीन राजतंत्र का शासन हुआ करता था और वहां संगठन करने या खुले तौर से राजनीति करने का अधिकार आम लोगों को नहीं था। उन्होंने तत्कालीन रूस की ठोस परिस्थितियों का मूल्यांकन किया, मजदूरों व किसानों के हालातों का अध्ययन किया और उसके अनुरूप अपने शिक्षक लेनिन के साथ मिलकर मजदूरों-किसानों के राज्य के लिए पूरी जनता को जगाने के काम में अपने को पूरी तरह लगा दिया। मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी पार्टी, बोल्शेविक पार्टी, के गठन में उन्होंने महत्वपूर्ण योगदान दिया और राजनीतिक आंदोलन में छात्रों-नौजवानों और मजदूरों और किसानों को शामिल करने का काम किया। वे शुरू से इस बात के कायल थे कि जार के शासन को उलटना और मेहनतकशों का राज्य कायम करना जरूरी है तभी जनता के आगे बढ़ने का रास्ता साफ होगा। उन्हें जार की पुलिस ने गिरफ्तार किया, यातनाएँ दीं, साइबेरिया में निष्कासित किया लेकिन वे पीछे नहीं हटे। रूसी क्रांति के वे एक अभिन्न हिस्सा थे। नवंबर 1917 में हुई क्रांति में उनके अद्वितीय योगदान को हम सभी को गहराई से अध्ययन करना चाहिए। स्टालिन विचारधारा और राजनीति के मामले में अपने शिक्षक लेनिन की ही तरह दृढ़ और कुशाग्र बुद्धि वाले थे। हम पाते हैं कि उसी स्तालिन ने बाद में रूस और समूचे सोवियत यूनियन के मेहनतकशों के जीवन को पूरी तरह बदल देने में, उन्हें मध्ययुगीन पिछड़ेपन की अंधकारपूर्ण खाई से आधुनिक युग की रोशन दुनिया में खींच लाने में और उनके कंधे से पूंजीवादी ही नहीं हर तरह के शोषण के जुए को उतार पफेंकने में सबसे बड़ी और प्रत्यक्ष भूमिका निभाई थी। क्रांति के उपरांत जब स्तालिन पार्टी के महासचिव बने, तो कहा जाता है कि वे प्रत्येक चीज को और भी गहराई से महत्व देने लगे। रूस में सामूहिक खेती और औद्योगीकरण के वे प्रणेता थे। उनके नेतृत्व में ही कुलक रूपी जोंकों से रूसी किसानों को मुक्ति मिली। 1936 में उनके नेतृत्व में सोवियत यूनियन ने दुनिया के सामने एक समाजवादी संविधान प्रस्तुत किया। उनके नेतृत्व में ही हिटलर के फासीवाद पर विजय पायी गई। इतना ही नहीं, स्तालिन के नेतृत्व में सोवियत यूनियन द्वारा हासिल की गई उपलब्धियों ने पूरी दुनिया को भी बदलने पर विवश कर दिया था। उनके नेतृत्व में सोवियत यूनियन की जनता ने जब शहादत और आत्म त्याग की अविश्वसनीय परंपरा निर्मित करते हुए खुंखार फासीवाद को घुटने टेकने के लिए विवश किया और उसे पूरी तरह परास्त किया तो मानवजाति सहसा नई उम्मीदों से लहलहा उठी। अंदर ही अंदर पूँजीवाद-साम्राज्यवाद समाजवाद को मटियामेट करने के षडयंत्रों में लगा रहा, लेकिन प्रत्यक्षतः उसे पीछे हटने पर विवश होना पड़ा, शोषण के घुमावदार रास्ते अख्तियार करने पड़े, अपने खूनी पंजों को फिलवक्त छुपाना पड़ा और उन्हें अपने यहां के मेहनतकशों को सोवियत यूनियन के मेहनतकशों जैसी बेहतर सुविधाएँ देने पर विवश होना पड़ा था। एक तिहाई दुनिया से साम्राज्यवाद को बोरिया-बिस्तर समेटना पड़ा था। पूरे विश्व में आजादी और स्वतंत्रता की लड़ाई में स्तालिन और सोवियत समाजवाद का अप्रतिम योगदान था। स्थिति ऐसी थी मानो स्तालिन के जिंदा मात्र रहने से पूँजीवाद-साम्राज्यवाद की सांसें रूक जाएंगी।

निस्संदेह स्तालिन की मृत्यु के बाद वह सोवियत यूनियन नहीं रहा, साम्राज्यवादियों ने सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी में मौजूद गद्दारों की सहायता से लेनिन-स्टालिन की वह धरती हमसे छीन ली, लेकिन उसने यह तो दिखा ही दिया कि सच में शोषणविहीन समाज संभव है। उसने यह भी दिखा दिया कि पूँजीपतियों और शोषकों के बिना यह दुनिया और कितनी अधिक जनवादी, प्रगतिशील, सुंदर, सभ्य और सुसंस्कृत बन सकती है। हम इस विरासत से प्रेरणा लेंगे और ले रहे हैं। आज जब पूरी दुनिया में आम अवाम पूँजी के शोषण और साम्राज्यवादी कहर से मर रहा है, तो लोगों के पास आज उसी सोवियत यूनियन को याद करने और उस तरफ कदम बढ़ाने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचा है। उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए हम आज महान स्तालिन और महान लेनिन-स्टालिनकालीन सोवियत यूनियन को याद कर रहे हैं। वह परिस्थिति तेजी से बन रही है जब छात्र-युवा और मजदूर-मेहनतकश अवाम नई अंगड़ाई लेंगे। देश में एक क्रांति आएगी जो हमें शोषणमुक्त समाज के तरफ ले जाएगी। हमें अपनी पूरी निष्ठा और शक्ति से इसमें भाग लेने की तैयारी करनी चाहिए।

आजकल भारत में युवाओं की अत्यध्कि संख्या को लेकर शासकों में बड़ा उत्साह दिखता है। मीडिया से लेकर सेमिनारों तक में ‘युवा व ताजातरीन भारत’ के बड़े चर्चे हैं। हमें बचपन में यह बताया गया था और मिडिल या हाई स्कूल की किताबों में यह नुक्ता अक्सरहां मिल जाता है कि युवा किसी भी देश के भविष्य होते हैं। जिस देश में युवा अधिक होंगे उस देश का और देश के लोगों का भविष्य अच्छा होगा, इससे यह अर्थ स्वाभाविक तौर से निकाला जाता है। लेकिन सदैव से ही यह नुक्ता बहुतों के समझ से परे रहा है। आखिर एकमात्र युवा होने या न होने से भविष्य के अच्छा या बुरे होने का क्या रिश्ता है? लेकिन दिल्ली के हमारे नये निजाम अर्थात मोदी सरकार को कोटि-कोटि धन्यवाद कि उसने आज के वर्तमान संदर्भ में इस नुक्ते का अर्थ स्पष्ट किया है। सभी को मालूम है कि हमारा नया निजाम इस बात का अत्यध्कि कायल है कि भारत युवाओं से भरा पूरा देश है। उसने इस नुक्ते को ‘मेक इन इंडिया’ के अपने घोर रूप से पूंजीपक्षीय व महत्वाकांक्षी नारे का सबसे लुभावना व आकर्षक बिंदु बना दिया है। विदेशी पूंजी निवेश को ललचाने के लिए एक मजबूत लीवर की तरह आज युवा भारत का इस्तेमाल हो रहा है। मानो हमारा निजाम विश्व के पूँजीपतियों से कह रहा हो – आइए, कहीं और नहीं, हमारे देश में पूँजी लगाइए और फैक्टरी खोलिए, भारत में निर्माण करिए और पूरे विश्व में बेचकर अकूत मुनाफा कमाइए, हमारे यहां ताजा सस्ता युवा श्रम है। युवा वर्ग हमारे हुक्मरानों की नजर मे यहां जिंदा युवा गोश्त के लोथड़े में बदल जाता है जिसका कसाई को हमेशा से इंतजार रहता है। हमारे हुक्मरान यह जानते हैं कि ताजे, युवा और उपर से सस्ते श्रम का पूँजीपति वर्ग हमेशा से दीवाना होता है। देशी व विदेशी पूँजीपति भी सोंच रहे हैं कि मौका अच्छा है इस माल पर हाथ साफ करने का। आखिर पूँजी, मुनाफे की कुँजी, तो इसी माल में निहित है। इस तरह हमारे नये निजाम ने उपरोक्त नुक्ते का वास्तविक अर्थ समझने में हमारी मदद की है अर्थात युवा किसी देश का इस मायने मे भविष्य होते हैं कि उनकी मजबूत मांसपेशियों में पूँजीपतियों के मुनाफे का अकूत खजाना छुपा होता है। बदले में इनमें से अधिकांश को महज दो जून की रोटी का जुगाड़ हो जाएगा ताकि ये अपनी मांसपेशियों को पूँजीपतियों के मुनाफे का पहाड़ खड़ा करने के लिए शक्तिशाली बनाये रखें। इसे ही भारत में विकास, रोजगार और तरक्की का रास्ता बताया जा रहा है। इसके लिए पलक-पाँवड़े बिछाए जा रहे हैं। सारे श्रम कानून ध्वस्त किए जा रहे हैं ताकि स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे अभी के बच्चे, जो श्रमशक्ति के भावी स्वामी हैं, कल जब श्रम बाजार में आएँ तो उनके ‘गोश्त को नोच खाने’ में पूँजीपतियों को कोई दिक्कत नहीं हो। कल के निजाम ने कर्मियों की बहाली की ठेकेदारी प्रथा शुरू की ताकि ऐसे कर्मियों का जम के पूँजीपति शोषणा कर सकें, तो आज के नये निजाम ने बचे खुचे कानूनों को बदलकर पूँजीपतियों को पूरी तरह खूली छूट दे दी है। कल के निजाम ने कानून बदले, तो हमारे नये निजाम ने पूँजीपति को ही जज बना दिया है। आज स्कूलों और कॉलेजों में पढ़ाई कर रहे बच्चों और बच्चियों को, जिनका कल समाज में श्रमशक्ति के स्वामियों के रूप में पूँजी के स्वामियों से अर्थात पूँजीपतियों से सामना होना है, उन्हें शायद मालूम भी नहीं कि वे अपने देश में किस तरह से पूँजीपति वर्ग द्वारा बेगाना बना दिए जाएंगे।

और सच में, यही तो स्थिति है आज पूरी दुनिया की! भारत में यह कल तक स्पष्ट नहीं दिखता था, लेकिन आज कोई भी इसका अहसास कर सकता है। पूँजी और उत्पादन के साधन मुट्ठी भर अमीरों और पूँजीपतियों के हाथों में सिमटते जा रहे हैं और दूसरी तरफ ज्यादा से ज्यादा लोग दरिद्र बनते जा रहे हैं। जब ऐसी परिस्थिति आती है तो इसका अर्थ यह होता है कि देश और देश के लोग जिंदा रहने के लिए इन्हीं पूँजीपतियों के रहमोकरम पर निर्भर हो जाते हैं। इसी का परिणाम है कि आज हमारा युवा देश पूँजी और पूँजीवादियों की कठपुतली बन चुका है और हमारी युवा पीढ़ी में पूँजीपतियों का गुलाम बनने के लिए होड़ मची हुई है ताकि जिंदा रहा जा सके। इस तरह देश युवाओं का है या बूढ़ों का इससे फर्क पूँजीपतियों को पड़ता है, न कि युवाओं को, देश को या किसी अन्य को। वेतन में चाहे जितना फर्क हो, लेकिन पूँजीपतियों के यहां नौकरीशुदा कोई भी युवा पूँजी को बढ़ाने के मशीन के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसका दूसरा कोई अर्थ वर्तमान सूरतेहाल में नहीं हो सकता है। इसके लिए पहले देश और विश्व की व्यवस्था को बदलना होगा, एक ऐसी व्यवस्था लानी होगी जिसमें उत्पादन के साधनों पर से निजी स्वामित्व को खत्म करके पूरे समाज का स्वामित्व स्थापित करना होगा और एकमात्र तब जाकर इस नुक्ते का अर्थ बदलेगा। सच तो यह है कि जब समाज बदल जाएगा, तो इस नुक्ते का विशेष अर्थ भी खत्म हो जाएगा। देश और समाज के बच्चे, युवा और बूढ़े सभी मिलकर देश का भविष्य होंगे। कोई भी सभ्य समाज तब तक सभ्य नहीं माना जा सकता है जब तक कि वह बच्चों और बूढ़ों का समूचित ख्याल नहीं रखता हो। आखिर जो आज युवा है और जिसने आज समाज में अपना सर्वोन्नत योगदान दिया है वह भी कल बूढ़ा होगा। देश का वास्तविक भविष्य तो इसमें है कि हमारा समाज इन बूढ़ों के योगदानों का भरपूर सम्मान करे और अंतिम क्षणों में उन्हें मानवीय गरिमामय जीवन से वंचित न होना पड़े। लेकिन श्रम शक्ति को निचोड़कर और उसकी हड्डियों तक को चूस-चूसकर अपने लिए संजीवनी बूटी तलाशने में लगी पूँजीवादी व्यवस्था में क्या यह संभव है? उसे तो युवा पीढ़ी की मजबूत मांसपेशियों और शारीरिक व मानसिक ताकत में छुपे पूँजी व मुनाफा बढ़ाने के उस खजाने से मतलब भर है। मुनाफे की पूर्ति अगर बच्चों का भविष्य लीलकर उसकी मासूम श्रमशक्ति को भी पूँजी की बलिबेदी पर कुर्बान करने से होती है तो उसे यह भी मंजूर है। आज के अमरीका और यूरोप में भारत की तरह अगर 60 साल के उपर के बूढ़ों द्वारा आजीविका की तलाश करने की मजबूरियों की कहानियां प्रकाश में आ रही हैं, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए। समय बदलते ही और बूरा समय आते ही पूँजीवाद सबको सड़क पर माल के रूप में बिकने के लिए ले आता है। इस व्यवस्था में मुनाफे और पूँजी से अलग और कोई संबंध नहीं। अगर आप पूँजी को बढ़ाने की क्षमता नहीं रखते तो आप जीने के अधिकार से भी वंचित हो जाएंगे – यही नियम अघोषित रूप से इस पूँजीवादी समाज में काम करता है।

हम युवाओं के लिए यहां यह याद रखना जरूरी है कि पूँजीवादी विकास ऐतिहासिक तौर पर समाज के एक बहुत बड़े हिस्से में आगे बढ़ने व विकास करने की आकांक्षाएँ व अभिलाषाएँ तो पैदा करता है और कर सकता है, पर उनमें से महज चंद लोगों की अभिलाषाएँ ही पूरी करने की स्थिति प्रदान करता है या कर सकता है। यह एक अकाट्य तथ्य है कि आज तक के अपने इतिहास में पूँजीवादी विकास कभी भी और किसी भी देश में सभी या अधिकांश युवाओं, या अन्यों की अभिलाषाएँ पूरी करने में सक्षम नहीं हुआ है। इसका श्रेय एक मात्र समाजवादी राज्यों को जाता है जहां उनकी बेरोजगारी को पूरी तरह से खत्म करके उन्हें उनके अभिशप्त जीवन से मुक्त कर दिया गया था। आज तक का अनुभव यही है कि पूँजीवाद के तहत चंद लोगों की प्रगति सदैव ही अनेकों तथा अधिकांश लोगों के गहन शोषण और उनकी गरीबी और कंगाली की कीमत पर ही आई है। पूँजीपतियों द्वारा फेंके गए लाभ के चंद टुकड़े से कुछ लोगों के विकास को देखकर सभी के मन में विकास की सीढि़याँ चढ़ने और अपने सामाजिक स्तर में वृद्धि कर लेने में सफल होने की आशा जन्म लेती है। लेकिन पूँजीवादी विकास के नियम इन उम्मीदों के विपरीत काम करते हैं। वे नियम हमेशा ही अधिकांश लोगों की कीमत पर चंद लोगों के विकास को प्रश्रय देते आए हैं। कहा जा रहा है कि आज भारत विकास की राह पर अग्रसर है, लेकिन क्या तब भी यहां अधिकांश नौजवान महँगी शिक्षा के खर्च को उठा पाने में समर्थ हैं? जो युवा महँगी शिक्षा का खर्च उठाने में सक्षम हो भी जाते हैं, उनकी तरक्की भी सुनिश्चित नहीं है। हम पाते हैं कि युवाओं का वह छोटा हिस्सा जिन्हें उच्च शिक्षा हासिल हो पा रही है, उन्हें भी एक अदद नौकरी और दो जून की रोटी का जुगाड़ करने के लिए गलाकाटू प्रतिस्पर्धा से गुजरना पड़ रहा है। युवाओं का एक अत्यंत छोटा हिस्सा महँगी उच्च शिक्षा प्राप्त करने में सक्षम है, लेकिन पूँजीवादी व्यवस्था उनके उच्च ज्ञान का उपयोग समाज के हित में करने का कोई अवसर नहीं प्रदान करती है, बल्कि इसके विपरीत उन्हें अपने लूट में हिस्सेदार बनाकर उसे समाज से पूरी तरह विमुख बना देती है। अत्यंत प्रतिभासंपन्न युवाओं को भी यह व्यवस्था पूँजीपतियों के लिए बड़ा मुनाफा पैदा करने वाला मशीन बना देती है और बदले में उन्हें बस “अच्छा वेतन” देती है। उसके अंदर की सारी सृजनशीलता खत्म हो जाती है। उनके अन्य सारे सपने, उनकी अन्य दूसरी सारी आकांक्षाएँ और विधाएँ खत्म हो जाती हैं। यही कारण है कि आज का युवा वर्ग साहित्य और इतिहास से कटता जा रहा है और समाज के क्रांतिकारी पुनर्गठन के लिए होने वाले संघर्ष के सवाल पर वह आज ज्यादातर दिशाहीन और नाउम्मीद दिखता है। लेकिन अब यह चंद दिनों की ही बात है। हमारी इन चिंताओं से परे युवाओं को जिस तरह से यह व्यवस्था पूरी तरह से लूट का शिकार बनाने पर तुली है उससे जल्द ही युवाओं की फौज अपने पुराने रंग में लौटेगी। समस्त विश्व में तेजी से पूँजीवादी संकट के घिरने से होने वाली तबाही स्वयं उन्हें शिक्षित कर रही है। मजदूर वर्ग की क्रांतिकारी कार्रवाइयों और देश में एक सच्चे क्रांतिकारी केंद्र के निर्माण से भी यह प्रश्न गहरे रूप से जुड़ा है।

दोस्तो! राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय जगत में चीजें अत्यंत तेजी से बदल रही हैं। पूरी दुनिया में पूंजी का केंद्रीकरण पहले की अपेक्षा और तेज गति से हो रहा है। 2008 से लेकर आज तक, जब पूरे विश्व में आर्थिक संकट व्याप्त था, भारत सहित पूरे विश्व में पूँजी अर्थात सामाजिक संपदा का केंद्रीकरण अत्यध्कि तीव्र गति से हुआ है। इसका अर्थ यह हुआ है कि पूरी दुनिया मे गरीबी और दरिद्रता का और अधिक विस्तार हुआ है। इसी के साथ पूँजी के भिन्न-भिन्न छोटे व बड़े केंद्रों के बीच टकराव भी बढ़े हैं या बढ़ रहे हैं। विश्वपूँजीवाद के सिरमौर अमरीका, यूरोप और जापान की अर्थव्यवस्थाएं आज चारो खाने चित हैं। लाख कोशिशों के बावजूद इसकी लपटें स्पेन, पुर्तगाल, आयरलैंड और इटली को जला रही हैं। यहां तक कि इंगलैंड भी अछूता और सुरक्षित नहीं है। हम देख रहे हैं कि संकट के तात्कालिक एवं दूरगामी कारक बने हुए हैं। यह आशंका भी व्यक्त की जा रही है कि विश्व अर्थव्यवस्था का यह ठहराव व संकट लम्बे काल के लिए है। दरअसल साम्राज्यवादी भूमंडलीकरण और नवउदारवाद के लंबे चले दौर ने आम जनता की स्थिति खराब कर दी तो पूँजीवादियों की नींद भी हराम है। मुनाफा तो बढ़ा, लेकिन इसके लिए निवेश की समस्या खड़ी हो गई जो समय के साथ विकराल होती गई। इस महामंदी ने साम्राज्यवादियों के बीच ही नहीं, पूरे विश्वपूँजीवाद के ढांचे में आपसी प्रतिस्पर्धा को सतह पर ला दिया। अधिकांश देश भारी आर्थिक और राजनीतिक संकट से जूझ रहे हैं। इसी दौरान कोविड-19 महामारी ने इस संकट को अभूतपूर्व रूप से और भी तीव्र बना दिया है। कभी न खत्म होने का अहसास जगाने वाला यह संकट आगे चलकर और किस तरह के विग्रहों को जन्म देगा उनके बारे में ठीक-ठीक आज बताना संभव नहीं है, लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि इससे नये और विकट विग्रह जन्म लेंगे जरूर जो पूरी मानवजाति और इसकी अब तक की अर्जित सभ्यता को नष्ट कर देने की कोशिश करेंगे। इसलिए ये विग्रह अवश्यंभावी रूप से क्रांतियों को भी जन्म देंगे।

औ़द्योगिक उत्पादन के आंकड़े बता रहे हैं कि भारत मंदी में बुरी तरह गिरा हुआ है। नेगेटिव ‘ग्रोथ’ रेट वाले जीडीपी आंकड़े इसे स्पष्टतः दर्शा रहे हैं। कुल मिलाकर आज भारत में युवा और मजदूर-मेहनतकश वर्ग सबसे अधिक दुर्गम परिस्थिति से गुजर रहे हैं। पूँजीपति वर्ग इनके साथ जानवरों व कीड़े-मकोड़ों की तरह पेश आ रहा है। वह इसे पूरी तरह अपना गुलाम बना लेने के लिए अपने सारे आपराधिक व गैरकानूनी कृत्यों को कानूनी जामा पहना चुका है। यहां तक कि राजनीतिक तौर पर भी मजदूर-मेहनतकश वर्ग के साथ बर्बरता और असभ्यता के साथ पेश आ रहा है और उसे हर तरीके से पीछे धकेलने पर आमदा है। संक्षेप में, पूँजीवादी जनतंत्र की खोल को फाड़कर उसमें से पूँजी का सबसे खुँखार दैत्यनुमा गिरोह प्रकट हो रहा है जो आम अवाम व मेहनतकश वर्गों को सीमित ‘जनतंत्र’ देने से भी इनकार कर रहा है। भारत में श्रम कानूनों में किए जा रहे सुधारों और ‘मेक इन इंडिया’ व ‘श्रमेव जयते’ जैसे लुभावने नारों का असली मकसद पूँजी की बलिवेदी पर श्रम की आहुति देना ही है। नये उद्योगों में यूनियन बनाने तक के अधिकर का न होना और काम के घंटे का मनमाना विस्तार भी यही दर्शाता है। आज पूरे विश्व में आर्थिक मंदी किसी न किसी रूप में लगातार विद्यमान है। यद्यपि इसके बीजाणु स्वयं पूँजीवादी उत्पादन पद्धति में ही मौजूद हैं जो पूँजीवाद के खात्मे के बाद ही खत्म होंगे उसके पहले नहीं, लेकिन इसके कारण लगातार गिरते मुनाफे की दर ने पूँजीपति वर्ग को खुँखार डकैत बना दिया है। वह इससे निपटने के लिए फासीवाद के तरफ बढ़ रहा है और हर देश में ‘जनतंत्र’ और इसके निकायों का ही इस्तेमाल करके शासन की बागडोर अपने हाथ में ले ले रहा है। भारत में बनी फासीवादी रूझान वाली वर्तमान सरकार खुलकर बड़ी पूँजी के लिए काम कर रही है। स्थिति यह है कि धरती के किए जा रहे चीरहरण, धरती के अंदर व बाहर की संपदा की लूट और श्रम की भयंकर लूट से जो परिणाम सामने आ रहे हैं उनका खामियाजा मध्य वर्ग, छोटे-मँझोले दुकानदार, व्यापारी, किसान तथा छोटे कारखानेदार भी भुगत रहे हैं। 

यह भी सच है कि पूँजीवादी-फासीवादी हमलों की हर नई बौछार आम अवाम और खासकर मेहनतकश वर्गों और युवा वर्ग को झकझोर कर जगा भी रही हैं। आर्थिक मंदी और फासीवादी रूझानों वाले ये मिलेजुले हमले जब और बढ़ेंगे, जो कि बढ़ेंगे यह तय है, तो ये कल यह भी समझेंगे कि यह पूँजीवादी उत्पादन और विकास के आम नियम ही हैं जिनके गर्भ से सर्वग्रासी एकाधिकारी व फासीवादी पूँजी का जन्म होता है जो श्रम शक्ति के स्वामियों, श्रमिकों, को ही नहीं, पूंजी के छोटे-मँझोले मालिकों को भी तबाह करने का काम करती है। जल्द ही बड़ी पूँजी के विरुद्ध भारी जनाक्रोश घनीभूत होगा यह तय है। लेकिन ठीक यही चीज बड़ी पूंजी को फासीवाद को पूर्ण विजय तक ले जाने के लिए प्रेरित कर रहा है। वही यह भी सही है कि फासीवाद को इसकी पूर्ण विजय के पहले ही रोकने की कोशिश करनी चाहिए और यह संभव है। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि हम स्वयं बड़ी पूँजी के खिलाफ सीधी कार्रवाइयों में उतरें और सर्वहारा व मेहनतकश वर्ग को भी उतारें। एक दिनी या दो दिनी हड़ताल और प्रदर्शन के जरिए संघर्ष की रस्मअदायगी निभाने, महज रोने-धेने व मिमियाने या फिर महज पूँजीवादी पार्टियों के साथ चुनावी जोड़-तोड़ कायम करने की अवसरवादी रवायत पर अब विराम लगाने का वक्त आ चुका है। सर्वहारा व मेहनतकशों तथा युवा वर्ग की सीधी और फैसलाकुन वर्गीय कार्रवाइयाँ ही फासीवादी ताकतों का मुँहतोड़ जवाब दे सकती हैं। तभी बड़ी पूँजी से त्रस्त तमाम अन्य सामाजिक तबकों को भी पूँजी के शोषण के चक्रव्यूह से लड़ने तथा बाहर निकलने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा और एकमात्र तभी पूँजीवाद-फासीवाद के खिलाफ एक आम मोर्चा बन सकता है।

इस तरह आज जिस तेजी से परिस्थितियाँ विस्फोटक बनने की ओर अग्रसर हैं, उससे एक बात साफ है कि बहुत जल्दी ही उथल-पथल का एक महान दौर आने वाला है। हम युवाओं को जल्द ही पूँजीवाद पर निर्णायक धावा बोलने का अवसर मिलने वाला है। जल्द ही हम शांतिकाल से युद्धकाल में अग्रसर होने वाले हैं। इसका अर्थ यह है कि युवा वर्ग को अपनी विशेष भूमिका निभाने का वक्त आने वाला है। उसे क्रांतिकारियों की मुख्य ताकत का हरावल बनने का सुयोग मिलने वाला है। आज पूरे विश्व में संसारव्यापी आर्थिक संकट का दौर चल रहा है। इसके बारे में यह नहीं कहा जा सकता है कि वह कब किसी गंभीर राजनीतिक संकट को जन्म दे देगा। इन सबके परिणामस्वरूप सभी देशों में जो अनगिनत क्रांतिकारी चिनगारियां उड़ रही हैं, हम नहीं जानते और न ही जान सकते हैं कि उनमें से कौन सी चिंगारी आग लगा देगी। हम पहले से यह नहीं जानते और न ही जान सकते हैं कि यह आग साम्राज्यवादी विश्व व्यवस्था में किस जगह कौन सी और कितना गहरा दरार बना देगी जिससे किसी देश में क्रांतिकारी परिस्थिति खड़ी हो जा सकती है या क्रांति फूट पड़ सकती है। इसीलिए हमें स्तालिन से सीखते हुए अभी से ही इसकी तैयारी में लग जाना चाहिए। हमें हमेशा यह याद रखना होगा कि या तो पूँजीवाद-साम्राज्यवाद का नाश होगा, या फिर मानवजाति का महाविनाश हो जाएगा – कोई अन्य विकल्प नहीं है। निस्संदेह यह बात हमें प्रेरणा और विश्वास दोनो प्रदान करती है कि इस पृथ्वी पर पूँजीवाद से अलग, मानव द्वारा मानव के शोषण के बिना, एक अलग दुनिया – समाजवाद की दुनिय – लेनिन और स्टालिन के नेतृत्व में कभी स्थापित हुई थी, अर्थात मानवद्रोही व आदमखोर पूंजीवादी-साम्राज्यवादी दुनिया हमारा आखिरी भविष्य नहीं है। वक्त की यही मांग है कि अक्टूबर क्रांति के ऐतिहासिक अनुभवों से ठोस सबक लेते हुए एक बार फिर साम्राज्यवादियों व पूंजीपतियों के उस स्वर्ग पर और एश्वर्य के उन चंद टापूओं पर धावा बोलने की तैयारी की जाए जिनके चारो ओर भयंकर दारिद्रय का साम्राज्य फैला हुआ है और जनसाधारण की नारकीय दुनिया उठ खड़ी हुई है और फैलती ही जा रही है।

जाहिर है स्तालिन की विरासत से सीखने का प्रश्न यहां सर्वोपरि महत्व ग्रहण कर लेता है। हालांकि स्तालिन की संपूर्ण विरासत को इस छोटे से लेख में समेटना असंभव है, फिर भी हमारे लिए रूसी अक्टूबर समाजवादी क्रांति को पूरा करने में, बोल्शेविक पार्टी जैसी क्रांतिकारी पार्टी को खड़ा करने में और फिर समाजवाद के निर्माण में, स्तालिन द्वारा निभाई गई विशेष भूमिका पर विशेष गौर करना चाहिए। हम जानते हैं और कह सकते हैं कि रूसी क्रांति में अगर लेनिन इसके ब्रेन की भूमिका में थे, स्तालिन उसकी पूरी काया थे, उसकी आत्मा थे। आइए, हम स्तालिन को दिल की गहराइयों से याद करे और उनकी व उनकी विरासत की रक्षा करने व आगे बढ़ाने का प्रण लें। आइए, हम स्तालिन के सच्चे शिष्य व अनुयायी बनें।

प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक यूथ फेडरेशन

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