मासा के ऑनलाइन कन्वेंशन (18 अक्टूबर, 5 बजे) को सफल करें! [प्रस्ताव]

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ऑनलाइन कन्वेंशन की पूरी विडियो देखने के लिए यहां क्लिक करें


हमारी निम्नलिखित मांगों के साथ :

  • नए श्रम कोड तथा मजदूर कानूनों में मजदूर-विरोधी प्रावधान वापस लो!
  • नए कॉर्पोरेट-पक्षीय किसान-विरोधी कृषि बिल वापस लो!
  • सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (पीएसयू) को बेचने के कदम वापस लो!
  • ठेका प्रथा पर रोक लगाओ!
  • महामारी में मजदूरों के लिए संकट व तमाम मुश्किलें पैदा करना बंद करो!

मासा के ऑनलाइन कन्वेंशन को सफल करें!

18 अक्टूबर 2020, 5 बजे शाम से
मासा फेसबुक पेज पर लाइव

श्रम कानूनों के बदले श्रम कोड, कृषि बिल, छंटनी-बेरोज़गारी, निजीकरण, प्रवासी व असंगठित मज़दूरों के जीवन-आजीविका का संकट, बिगड़ती स्वास्थ्य व्यवस्था और सामाजिक सुरक्षा, बढ़ती महंगाई, जातिगत हिंसा व धार्मिक नफ़रत, जनवादी अधिकारों पर हमला – नहीं सहेंगे!

रस्मअदायगी नहीं, मजदूर आंदोलन को मजदूर वर्ग के निरंतर, जुझारू और निर्णायक संघर्ष में तब्दील करो!

साथियों,

जिस दौर में हम यह कन्वेंशन करने जा रहे हैं, उसमें हमारे प्रिय देश के मजदूरों-किसानों पर केंद्र सरकार द्वारा अभूतपूर्व हमले हो रहे हैं। दरअसल सरकार ने इस महामारी के आगमन के पहले ही मजदूरों पर हमले शुरू कर दिए थे। अगस्त 2019 में सरकार ने मजदूर वर्ग की आवाज़ों को पूरी तरह नज़रंदाज़ करते हुए मजदूरी कोड बिल को सामने लाया। इसके बाद समस्त श्रम कानूनों में गंभीर बदलाव करने हेतु तीनों श्रम कोड को जनता के प्रतिरोध से बचने के लिए महामारी के दौरान ही संसद के दोनों सदनों में तीव्रता से पारित किया गया। इन बदलावों का मुख्य कारण था पूंजीपतियों को मुनाफ़ा कमाने में अड़चन डालने वाले और मजदूरों को कुछ सुरक्षा प्रदान करने वाले नियामक संरक्षणों व कानूनों को रास्ते से हटाना और मजदूरों को मालिकों के समक्ष अपना पक्ष रखने की ताकत को अत्यंत कमज़ोर कर देना।

यह सब जानते हैं कि अच्छे श्रम कानून मजदूरों के लिए फैक्ट्रियों, मिलों व कारपोरेशनों के मालिकों व पूंजीपतियों द्वारा घोर शोषण के खिलाफ नियामक संरक्षण व सुरक्षा प्रदान करने के लिए आवश्यक हैं। पूंजीपतियों के पास मजदूरों से कई गुना अधिक पैसे व ताकत होते हैं और उनके हित मजदूरों के हित से ज़रा भी मेल नहीं खाते। अतः खुद को घोर शोषण से बचाने के लिए एक आम मजदूर को इन सहायक कानूनों की सुरक्षा की ज़रूरत होती है। हमें यह याद रखना चाहिए कि यह सहायक कानून पिछले कई दशकों के निरंतर व जुझारू संघर्ष के ही नतीजे हैं। इसके बावजूद वर्तमान सरकार ने इन संरक्षणों को एक झटके में ध्वस्त कर दिया। श्रम कानूनों में इन मजदूर विरोधी बदलावों व श्रम कोड के आगमन से मजदूरों को ही बड़ी क्षति पहुंची है – स्थाई नौकरी की मांग करने की क्षमता, यूनियन बनाने व संगठित होकर शोषण के खिलाफ और न्यायपूर्वक व सम्मानजनक परिस्थितियों के अधिकार के लिए हड़ताल व विरोध प्रदर्शन व के अधिकार आदि को लेकर। श्रम कानूनों में यह बदलाव केवल पूंजीपति वर्ग को ही फायदा और मजदूर वर्ग को क्षति पहुंचाने के साथ वर्तमान सत्तासीन पार्टी, जिनके नेता अपने कॉर्पोरेट आकाओं के सेवक हैं, के वर्ग चरित्र को भी पूरी तरह बेनकाब करते हैं। अतः यह कन्वेंशन स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार के इस कदम की भर्त्सना करता है और श्रम कानूनों में हटा दिए गए कानूनी संरक्षणों की तत्काल बहाली की मांग करता है।

हम देख सकते हैं कि किसान आज कृषि बिलों के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने ‘सुधार’ के इस कदम से ‘फार्म-टू-फोर्क’ सप्लाई चेन से मध्यस्थ को हटा कर कृषि बाजार को बाधित कर दिया है। यह बिलकुल स्पष्ट है कि यह नया विनियमन बाजार से ग्रामीण बिचौलिए को हटाता है, परंतु उसी की जगह पर बड़े कॉर्पोरेटों को ले आता है। सरकार अब से ना ही किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) प्रदान करेगी और ना ही उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए आवश्यक वस्तुओं के दामों को नियंत्रित रखने हेतु कोई कदम उठाएगी। अतः सरकार ने पूरी तरीके से किसानों व उपभोक्ताओं के हितों की सुरक्षा करने की उसकी ज़िम्मेदारी से पलड़ा झाड़ लिया है और मांग-आपूर्ति को पूरा करने व दाम तय करने का ज़िम्मा बाजार की शक्तियों पर छोड़ दिया है। ऐसा कदम आम जनता को छोड़ बड़े कॉर्पोरेटों को ही अपार फायदा पहुंचाएगा। मुट्ठीभर अमीर किसान, जिन्हें इन नए कानूनों से फायदा हो सकता है, को छोड़ देश के ज़्यादातर किसानों को गुलामी कर जीवन चलाने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। आम तौर पर किसानों को अब “बड़ी पूंजी” के हितों के आगे नतमस्तक रहना पड़ेगा, जो कि अंग्रेजी शासन की यादें ताज़ा करता है। यह कन्वेंशन यह मांग करता है कि केंद्र सरकार भारत के किसानों को नियामक सुरक्षा देने के लिए तत्काल कदम उठाए।

केंद्र सरकार सार्वजनिक क्षेत्र उपक्रमों (पीएसयू) व सरकारी प्रायोजित उद्यमों का निजीकरण करने की भी हड़बड़ी में है। हालांकि यह सरकार यहां अपने पूर्ववर्ती सरकारों के ही नक्शेकदम पर चल रही है, लेकिन इसके कदम कई अधिक तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं। यह सब कुछ शीघ्र अतिशीघ्र बेच देने की तरफ बढ़ रही है – चाहे वह रेलवे हो या डिफेन्स, दूरसंचार, बीमा, बैंक, हों या कोयला, लौह अयस्क, कच्चा तेल, प्राकृतिक गैस आदि। जहां पूरी अर्थव्यवस्था कोविद19 महामारी के कारण भयंकर मंदी का सामना कर रही है, इस सरकार ने इन सभी को बेचने की होड़ शुरू कर दी है। इस पैमाने पर विनिवेशीकरण से अर्थव्यवस्था में ठेका मजदूरों की संख्या कई गुना बढ़ जाएगी जिनके पास नए श्रम कानूनों के तहत ना के बराबर अधिकार व संरक्षण होंगे। प्रवासी मजदूर इन ठेका मजदूरों की नई पीढ़ी का एक बड़ा हिस्सा बनेंगे और उन्हें अमानवीय व असह्य जीवन व कार्य परिस्थितियों का सामना करना पड़ेगा वो भी कानूनी संरक्षणों के अभाव में। यह कन्वेंशन देश के ठेका मजदूरों की दयनीय जीवन व कार्य परिस्थितियों के खिलाफ विरोध दर्ज करता है। हम मांग करते हैं कि इन मजदूरों को सम्मानजनक जीवन जीने के लिए उचित राहत व सुरक्षा मिले।

जैसे रोज़गार का स्वरूप स्थाई से ठेका की तरफ बढ़ता जा रहा है, हम देश भर में बेरोज़गारी व छंटनी के लगातार बढ़ते मामले देख सकते हैं। मजदूरों की एक बड़ी आबादी को महामारी के दौरान वेतन नहीं दिया गया है, और उनमें से कई की छंटनी हुई है, और आज बेरोज़गारी के आंकड़े चरम पर हैं। इन गंभीर परिस्थितियों में यह मजदूर अपने पीएफ के पैसों का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं। यह कन्वेंशन भयंकर बेरोज़गारी को अंजाम देने वाली सरकारी नीतियों का सख्त विरोध करता है। कन्वेंशन देश के मजदूरों से यह आह्वान भी करता है कि वे इन नीतियों के विरुद्ध प्रतिरोध के लिए एकजुट हों।

कोविड19 महामारी एक दौरान ‘आपदा को अवसर’ में बदलते हुए, पूंजीपतियों और केंद्र सरकार में उनके भक्त नेताओं ने मजदूर वर्ग को एक अनिश्चित व काले भविष्य की ओर धकेल दिया है। समय आया चुका है कि देश भर के मजदूर और किसान आम जनता पर हो रहे इन हमलों के खिलाफ एकजुट होकर उठ खड़े हों। दस केंद्रीय ट्रेड यूनियनों ने संयुक्त रूप से श्रम कोड, श्रम कानूनों में मजदूर-विरोधी प्रावधानों और नए कृषि बिल के किसान-विरोधी प्रावधानों के विरुद्ध 26 नवंबर 2020 को एक देशव्यापी आम हड़ताल की घोषणा की है। यह कन्वेंशन इस हड़ताल को समर्थन देता है और मासा इस हड़ताल को सफल बनाने के लिए हर संभव कदम उठाएगा! यह कहते हुए हमारा मानना है कि आज केवल एक प्रतीकात्मक हड़ताल काफ़ी नहीं है। इन जन-विरोधी नीतियों का डट कर विरोध करने के लिए हमें आम जनता की व्यापक एकता और एक देशव्यापी निरंतर संघर्ष की ज़रूरत है। इस मत के साथ, 18 अक्टूबर से 18 दिसंबर तक मासा आम मेहनतकश जनता के बीच देशव्यापी ‘मजदूर संघर्ष अभियान’ आयोजित कर रहा है जिसमें जमीनी, डिजिटल, हस्ताक्षर अभियान आदि शामिल होंगे। आइये इस कन्वेंशन को हम इस संघर्ष को आगे बढ़ाने की तरफ हमारा पहला कदम बनाएं!

प्रतिरोध में एकात्मता की कामनाओं के साथ,
मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (MASA/मासा)

मजदूर अधिकार संघर्ष अभियान (मासा)

घटक महासंघ एवं संगठन
ऑल इंडिया वर्कर्स काउंसिल (AIWC) / ग्रामीण मजदूर यूनियन, बिहार / इंडियन काउंसिल ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (ICTU) / इंडियन फेडरेशन ऑफ़ ट्रेड यूनियंस (IFTU) / IFTU सर्वहारा / इंकलाबी मज़दूर केंद्र / इंकलाबी मज़दूर केंद्र, पंजाब / जन संघर्ष मंच हरियाणा / कर्नाटक श्रमिक शक्ति / मज़दूर सहयोग केंद्र, गुड़गांव-बावल / मज़दूर सहयोग केंद्र, उत्तराखंड / मज़दूर समन्वय केंद्र / सोशलिस्ट वर्कर्स सेंटर (SWC), तमिल नाडु / स्ट्रगलिंग वर्कर्स कोऑर्डिनेशन कमिटी (SWCC), पश्चिम बंगाल / ट्रेड यूनियन सेंटर ऑफ़ इंडिया (TUCI)

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