कोविद महामारी और फासीवाद के खतरों के बीच बिहार चुनाव

शेखर //

बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक आ रहा है और इसकी सरगर्मियां देखी जा सकती हैं। इसका अहसास पूरे राजनैतिक वातावरण में अब महसूस किया जा सकता है। जो बात सबसे पहले दिखाई दी वह यह थी कि संसदीय वाम और  क्रांतिकारी वाम दोनों की तरफ से  देश व राज्य में लगातार बढ़ते कोविद-19 संक्रमण के हवाले से 6 महीने या एक साल तक चुनाव टालने की मांग की गई। उन्होंने नितीश सरकार की ऐसे समय में चुनाव कराने के लिये तीखी आलोचना करते हुए कहा कि नितीश सरकार कोविद-19 से जनता की सुरक्षा पर ध्यान देने के बजाय चुनाव पर ज्यादा ध्यान दे रही है। यह सब तब की बात है जब कोविद-19 संक्रमण से पार्टी के नेतागण पूरी तरह भयभीत थे और चुनाव की तैयारियों ने भी जोर नहीं पकड़ा था। लेकिन जैसे ही चुनावी माहौल का रंग चढ़ने लगा, चुनावी सरगर्मियों की रफ्तार तेज होनी शुरू हुई, आम जन के बीच चुनावी राजनीति अपना चिर परिचित प्रभाव जमाने लगी और चुनाव की सुगबुगाहट तेज होती हुई जनता के बीच चुनावी बहस का तापमान बढ़ाने लगी, वैसे ही वाम की सभी पार्टियां, बिना किसी अपवाद के, एक साथ इसमें कूद पड़ीं। इस बात की याद तक नहीं आयी कि कल तक वे ही चुनाव को टालने की मांग कर रही थीं, ताकि सरकार को सर्वप्रथम कोविद-19 से लोगों की जान की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ज्यादा वक्त मिल पाए। उनका कहना और मानना था कि इससे नीतीश सरकार पर स्वास्थ्य सेवा और इससे जुड़ी अन्य जिम्मेवारियों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए दबाव बनेगा। लेकिन हम पाते हैं कि एकबारगी ये सारी बातें सिरे से गायब हो गयीं और वाम पार्टियों ने पीछे मुड़कर यह भी नहीं देखा कि चुनाव टालने की मांग को वापस लेने की घोषणा करना भी उनकी जिम्मेवारी है। आखिर ऐसा यू-टर्न क्यों हुआ, शायद इसका जवाब देने की जिम्मवारी वे महसूस नहीं करते।

हम मानते हैं कि ‘जनता की कोविद-19 से सुरक्षा’ और इसके कारण ‘जनता के बीच कोविद बीमारी के खौफ का माहौल होने’ के जिस तर्क पर इन्होंने चुनाव टालने की मांग की थी वह ही गलत थी और है। चुनाव हो या न हो, आम जनता बहुत पहले से कोविद-19 के खतरों का सामना करते हुए पेट की ज्वाला शांत करने के लिए एड़ी-चोटी एक की हुई है। जनता की बीमारी से मुक्ति या उसके इलाज़ की कोई समुचित व्यवस्था न तो कल थी, न आज है और न ही 6 महीने बाद होगी। इस नाम पर चुनाव टालने के तर्कों का जमीनी तथ्यों से कोई मेल नहीं है। दरअसल, आम जनता के बीच ‘भूख और रोजगार के अभाव’ का खौफ ज्यादा था और है और आम लोग आज ही नहीं पिछले कई महीनों से न सिर्फ घरों से बाहर निकल रहे हैं, बल्कि सारे खतरे उठाकर पूरे देश में इधर-उधर काम की खोज में भटक भी रहे हैं। यहां तक कि कई मौकों पर बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के वे आंदोलन भी कर रहे हैं। अपना और अपने परिवार का पेट भरने के लिए वे बहुत पहले से ही कोविद से डरना छोड़ चुके हैं। यही जमीनी सच्चाई है। इसके अलावा अगले 6 महीनों या एक साल तक चुनाव टालने की मांग के पीछे की इनकी यह धारणा भी गलत थी और है कि फासिस्टों की मदद पर टिकी नीतीश सरकार जनता के लिए अगले 6 महीने में कुछ करेगी। यह उम्मीद करना कि यह बेरहम और दमनकारी सरकार अगले 6 महीनों या एक साल में कोविद बीमारी से जनता के बचाव हेतु बहुत सारी सुविधाएं जमीन पर उतार देगी, सरकारी अस्पतालों का कायाकल्प कर देगी या निजी अस्पतालों द्वारा मरीजों के साथ इलाज़ के नाम पर की जा रही डकैती पर अंकुश लगाएगी भारी मूर्खता ही मानी जायेगी। और इस उम्मीद पर चुनाव टालने की मांग करना तो एक तरह से बचकानी बात ही मानी जायेगी। इसी तरह अगले 6 महीने में वैक्सीन आने की उम्मीद करना तो ठीक है, लेकिन यह सोच लेना कि यह 6 महीने में जनता तक भी पहुंच जाएगी और इस तरह जनता बेखौफ होकर, जो कि वह अभी ही है क्योंकि इसके अलावा उसके पास कोई चारा नहीं है, चुनाव में भाग लेगी, यह बात तो नौसिखुआपन की हद ही है। दरअसल यह सब जनता के नाम पर कुछ मांग करने की खानापूर्ति  की राजनीति के अलावा और कुछ नहीं है जो कम्युनिस्टों को शोभा नहीं देती है। अगर सच में इन्हें अपनी मांग पर भरोसा होता तो वे साथ में जनता की कोविद से सुरक्षा को लेकर आंदोलन का खाका और इसकी कोई योजना भी तैयार करते। तब निस्संदेह चुनाव का नजारा कुछ और होता। रंगत बदला-बदला होता और ‘वाम’ जनाक्रोश पर सवार होकर मैदान में उतरता।

नतीजा यह निकला और यही संभावित भी था कि जब चुनाव होना तय हो गया, तो ये ही पार्टियां सब कुछ भूल कर पूरी तरह चुनावी समर में ऐसे कूद पड़ीं जैसे इन्होंने पहले कुछ और कहा था उसकी थोड़ी सी भी याद न हो। जैसे ‘मांग कर’ देने से समस्या का खात्मा हो गया। यही नहीं, चुनावी गठबंधनों की अंधाधुंध होड़ मचा दी, जैसे तय कर लिया हो कि इस बार गठबंधन की ट्रेन किसी भी तरह न छूटे। इस दौड़ में वे “वाम एकता” जैसे शब्द तक भूल गए। ‘वाम’ आंदोलन के पुराने साथियों को छोड़ तीन मुख्य वाम पार्टियों ने अकेले-अकेले आरजेडी के साथ सीटों की लेन-देन में लग गए।  ‘वाम’ के पुराने रिसते घाव दुबारा से और पहले से भी ज्यादा घिनौने रूप में सामने आ गए हैं। वे अब तक यह पूरी तरह भूल चुके हैं कि आज से पहले कल तक वे क्या कह रहे थे और आज क्या कर रहे हैं।

यह बड़ा अनोखा दृश्य उपस्थित हुआ है। हालांकि बात फिर भी पुरानी ही है। बस कुछ नजारे मात्र ही बदले हुए हैं। चुनाव टालने की मांग करने से ले कर राजद और कांग्रेस के साथ चुनावपूर्व गठबंधन बनाने के लिए कूद पड़ने तक, वो भी पूरे वाम खेमे में कोई सामान्य एकीकृत समझ या एकता बनाए बिना ही, इन दिनों बिहार में वाम’ के राजनैतिक रंगमंच पर कई निराले करतब देखने को मिलने वाले हैं। संसदीय मूढमतिवाद के साथ-साथ हर तरह के वैचारिक राजनैतिक अवसरवाद का खुलेआम दिग्दर्शन हो रहा है। जहां तक बिहार चुनाव में एक ठोस और सुगठित वाम ब्लॉक के निर्माण का सवाल है, चाहे वो केवल संसदीय वाम पार्टियों का ब्लॉक ही क्यों ना हो ताकि चुनाव में फासीवाद के खिलाफ लड़ाई को सफलतापूर्वक निर्देशित किया जा सके और इसके आधार पर बुर्जुआ खेमे के भीतर के अंतर्विरोधों का इस्तेमाल किया जा सके और साथ ही साथ राजद और कांग्रेस जैसी पार्टियों में फासीवादियों के खिलाफ संघर्ष के सवाल पर मौजूद अस्थिरता व ढुलमुलपन पर काबू पाया जा सके, जो इस बात के सबसे संकीर्ण अर्थों में भी आज एक सच्ची वाम राजनीति की मुख्य पहचान है और होनी चाहिए, वह हमेशा की तरह बहुत पीछे जा चुका है। जाहिर है, फासीवादी विचारधारा और राजनीति के खिलाफ व्यापक स्तर पर एक स्वतंत्र वाम प्रचार व हस्स्तक्षेप, हालांकि संसदीय अर्थों में ही सही, की संभावना भी इसी के साथ पूरी तरह खत्म हो चुकी है। भविष्य में इसकी भारी कीमत देने के लिए ‘वाम’ को तैयार रहना चाहिये। इसी तरह, बुर्जुआ पार्टियों के साथ उन शर्तों पर चुनावी गठबंधन करने की बात, जो जनता और वाम पार्टियों के भविष्य के लिए फायदेमंद हो, हर बार की तरह इस बार भी बुरी तरह असफल हो गयी। हां, सीट बंटवारे की अवसरवादी लड़ाई खूब फले-फूलेगी, हालांकि इसका मुख्य फायदा भी बुर्जुआ पार्टियों को ही जाएगा, जैसा कि ऐसे हर सिद्धांतविहीन गठबंधन बनाने के बाद वाम को लगातार देश और पूरी दुनिया में भुगतना पड़ा है। आम जनता और वामदलों के कैडरों को एक बार फिर से भाजपा-जदयू को हराने की अहम जरूरत के नाम पर ऐसे सिद्धांतविहीन गठबंधन के जरिये  बेवकूफ बनाया जाएगा और राजनीतिक रूप से ब्लैकमेल किया जाएगा। यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है और इसकी भारी कीमत निकट भविष्य में पूरे वाम को चुकानी पड़ेगी।

इसी के साथ, बिहार में सामान्य रूप से पूंजीवादी शासन और मुख्य रूप से मोदी के फासीवादी शासन के खिलाफ वाम नेतृत्व में एक भावी लेकिन निश्चित जन उभार की संभावना, जिसकी तीव्र संभावना से आज शायद ही कोई इनकार करेगा, भी एक बार फिर से संसदीय वाम पार्टियों के अवसरवादी व्यवहार की वजह से दब गयी है या खत्म हो जाएगी।

आखिर इसका नतीजा क्या होगा? और इसका लाभ क्या होने वाला है? बात साफ है। अगर वामदल कुछ ज्यादा सीटें जीत जाते हैं या राजद के नेतृत्व में बना गठबंधन चुनाव जीत जाता है, तो भी यह फासीवादी विचारधारा और राजनीति को आगे जा कर घेरने, अलग करने और परास्त करने में बहुत सहायक और कारगर साबित होगा, इसमें संदेह ही संदेह है, क्योंकि इसमें राजनीतिक कमान पूंजीवादियों के हाथ में है, न कि वाम के हाथ में। तमाम वाम धड़े संयुक्त होते और क्रांतिकारी वाम धड़ों का संयुक्त खेमा भी एक संयुक्त साझा कार्यक्रम के आधार पर इसके साथ तालमेल में होता, तो निश्चय ही परिदृश्य अलग होता। एक संयुक्त वाम ब्लॉक को बिना जमीन पर उतारे फासीवाद विरोधी    ‘वामपंथी’ राजनीति को बुर्जुआ वर्ग और उनकी पार्टियों के साथ टैग कर देने का एक ही अर्थ है, इस नाजुक घड़ी व दौर में वाम राजनीति का परित्याग, बुर्जुआ वर्ग के समक्ष आत्मसमर्पण और फासिस्टों के लिए रास्ता साफ और आसान कर देना। कुल मिलाकर फासिस्टों के विरुद्ध एक संयुक्त वाम मोर्चे, जिसके बिना मानवजाति एक ऐतिहासिक पश्चगमन और विनाश के रास्ते पर जाने को विवश है, की अहम आवश्यकता के दौर में इसकी संभावना को स्वय वाम के द्वारा नष्ट करना अक्षम्य अपराध है। एक बार फिर से फासीवाद के खिलाफ एक भावी वाम जनांदोलन की बड़ी बाधा स्वयं ये संसदीय वामदल ही साबित हो रहे हैं। हालांकि हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि क्रांतिकारी खेमा में एकता है। वहां तो कुछ विशिष्ट अर्थों में स्थिति इससे भी अधिक दयनीय है, जिस पर आगे इसी लेख में बात की गई है।

फासीवाद के विरुद्ध क्रांतिकारी संयुक्त वाम हस्तक्षेप का अभाव है बड़ा खतरा, बुर्जुआ गठबंधन व राजनीति में विलीन होने की ‘वाम’ की प्रवृत्ति है दूसरा बड़ा खतरा

फासीवाद के खतरे के खिलाफ लड़ाई में बुर्जुआ चुनावी गठबंधन जहां संसदीय वामदलों का मूल मंत्र है, जो कि एक बहुत बड़ी बाधा है, तो वहीं क्रांतिकारी वाम में संयुक्त क्रांतिकारी हस्तक्षेप व पहलकदमी का घोर अभाव सबसे बड़ा खतरा है। इनके बीच किसी बड़ी पहल का सर्वथा अभाव है। यह भी सच है कि इनके समक्ष सांगठनिक अक्षमता व विस्तृत जनाधार का अभाव एक बड़ा सवाल है जो इनके हस्तक्षेप की सीमा निर्धारित करता है। इसलिए इनके बीच एकीकृत पहल की और भी भी जरूरत थी, लेकिन इनके बीच एकता की पहल उतनी भी नहीं है जितनी संसदीय वाम के बीच है।

संसदीय वाम की ‘मुख्य’ पार्टियों (सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई-एमएल लिबरेशन) की बात करें, तो उन्होंने साफ तौर पर राजद-कांग्रेस जैसी बुर्जुआ पार्टियों के साथ चुनावपूर्व गठबंधन के लिए खुद को जिस तरह से परोस दिया है उससे कुछ स्वाभाविक सवाल खड़े होते हैं। जैसे कि, क्या वामपंथी पार्टियों ने राजद के साथ फासीवाद के खिलाफ लड़ने की जरूरत के मद्देनजर कोई ऐसी खुली बहस चलाई है जिसकी अनुगूंज जनता तक पहुंची हो? नहीं। बिलकुल नहीं। यह न्यूनतम विचार भी कि हम फासीवादी विचार और राजनीति से लोहा लेने के लिए गठबंधन बनाने के लिये मजबूर हुए हैं जनता या नीचे या जनता के स्तर तक के कार्यकर्ताओं की जेहन या आम वातावरण में नहीं डाला गया है या प्रचारित किया गया है। इस स्थिति में, ऐसा गठबंधन आम जनता के बीच फासीवादी विचारधारा के फैलाव को रोकने वाला प्रभाव नहीं डालने जा रहा है यह तय है। यह निश्चित है, क्योंकि यहां बहस केवल सीट बंटवारे के ऊपर ही चल रही है। जनता के सामने इसका राजनीतिक लक्ष्यार्थ बहुत नकारात्मक साबित होगा और इसे जनता की नजर में सुविधा के लिये गठबंधन (alliance of convenience) के रूप में ही देखा जाएगा क्योंकि अभी तक “वार्ता टेबल” पर चल रही बहस में फासीवाद विरोध की कार्यनीति या रणनीति को लेकर ऐसा कोई राजनीतिक महत्व वाला विषय या बिंदु प्रकाश में नहीं आया है जिसके लिए “वार्ता टेबल पर बहस चल रही हो।” स्पष्ट है कि हमारा वाम सिर्फ सीटों को लेकर चिंतित है। यह बुर्जुआ राजनीति में निमग्न होना नहीं तो और क्या है? यह हम सबके लिए शर्म की बात है।

लोग देख सकते हैं कि वाम इस समय गठबंधन के लिये आपाधापी में है। संजीदा प्रगतिशील लोग पूछ रहे हैं कि इतनी हड़बड़ी क्यों है,भाई? राजनीतिक मुद्दों को खुलकर सामने क्यों नहीं रखा जा रहा है? क्या उन्हें यकीन है कि अगर वे गठबंधन की मदद से कुछ ज्यादा सीटें जीत लेंगे या राजद के नेतृत्व वाला गठबंधन चुनाव जीत जाता है (जो सही और संभावना से भरपूर होते हुए भी मौजूदा दौरे के फासीवादी जकड़न से भरी अत्यंत बुरी परिस्थिति में मुमकिन नहीं लग रहा है), तो क्या संसदीय वाम की संकुचित दृष्टि से भी फासीवाद का खतरा बिहार में टल जाएगा और जनतंत्र की बहार आ जाएगी? क्या उन्हें कभी भी लगता है कि ऐसा ‘गैर-राजनीतिक’ गठबंधन यानी, सुविधा वाला बुर्जुआ गठबंधन, अगर जीतता भी है तो लोगों की आकांक्षाओं व उम्मीदों पर खरा उतरेगा? अगर ऐसे गठबंधन को मोदी सरकार पांच साल सरकार चलाने भी देगी, जिसकी संभावना कम ही है, तो भी वह अपने द्वारा किए गए वादे पूरे नहीं कर पाएगा। यह ना सिर्फ ‘वामपंथ’ के लिए बदनामी और शर्मिंदगी लाएगा, जो कि लोगों की आकांक्षाओं की पूर्ति नहीं होने के फलस्वरूप जनता के बीच नए सिरे से बढ़ते असंतोष के कारण पैदा होंगी, और न सिर्फ फासीवाद के पुनः आगमन का नया रास्ता तैयार करेगा, बल्कि, पहले से ज्यादा क्रूर फासीवादी उभार और उसकी जीत का पथ भी प्रशस्त करेगा। साथ ही, यह वामपथियों के लिए उनकी बची हुई इज्जत भी पूरी तरह छिन जाने की शुरुआत होगी। यह वामपंथियों के बचे-खुचे जनाधार को नष्ट कर देगा और जनता के मुक्तिकामी आंदोलन के उद्देश्यों की एक ऐतिहासिक और अभूतपूर्व क्षति करेगा। हमने इतिहास में देखा है, कैसे सीपीआई और सीपीएम ने राजद के साथ मोर्चा बना कर ना सिर्फ अपनी विश्वसनीयता और इज्जत खोई है, बल्कि, अपना जनाधार भी खो दिया है। यहां तक कि वैचारिक-राजनीतिक अपील भी इसने खो दी है। ऐसा लगता है, इस बार सीपीआई-एमएल के  ‘लिबरेशन’ गुट की बारी है जो इस गठबंधन का दीर्घकालीन भुक्तभोगी हो सकता है। दरअसल, यही है पुरानी बोतल जिसमें  शराब भी पुरानी ही है। सिर्फ मैन्युफैक्चरिंग और एक्सपायरी का नया लेबल चिपका दिया गया है।

वामदलों के अन्दर का भाव – ‘राजनीति मुद्दों पर अधिक चर्चा करके वक्त क्यों बर्बाद करें?’

राजनीतिक मुद्दों पर चर्चा करके ‘बहुमूल्य’ समय क्यों बर्बाद करें का भाव ही आज कल वामदल के नेताओं के भीतर सर्वोपरि रूप से हावी है। यह उनके अन्दर मौजूद सीटें जीतने की बेचैनी का परिचायक है। अगर केवल सीट बंटवारे और ज्यादा से ज्यादा गठबंधन की सीटें जीतना ही फासीवादियों के खिलाफ लड़ाई का मुख्य तरीका और उद्देश्य मान लिया जाए, तब यह ताज्जुब की बात नहीं  कि यही मनःस्थिति ऊपर से लेकर नीचे तक मौजूद है। उन्हें लगता है कि अत्यधिक राजनीतिक चर्चाओं से गठबंधन की संभावना पर बुरा प्रभाव पड़ेगा। यह सही भी है, क्योंकि बुर्जुआ दल आखिर बुर्जुआ दल ही तो हैं। फासीवाद से उनका विरोध आज के संकटकालीन बुर्जुआ जनवाद के काल में बनाबटी ही अधिक है और सिर्फ यहीं तक सीमित हो सकता है। वे स्वयं भी जनतंत्र से कोसों से दूर हैं। जनतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता का तो सवाल ही नहीं है। और न हीं उन्हें जनवाद से कोई प्यार है। इसलिए इनके समक्ष झुक कर चुनावी गठबंधन में जाना हमेशा ही फासीवाद के लिये मैदान खुला छोड़ देना है। लेकिन वाम ऐसा ही कर रहा है। कभी-कभी इनकी चुनावी गंठजोड़ बनाने की तीव्र बेचैनी को देखते हुए महसूस होता है कि फासीवाद इनके लिए बुर्जुआ गठबंधन बनाने का एक बहाना है जिसके नाम पर बुर्जुआ वर्ग के साथ गठबंधन बनाने की इनकी तीव्र चाहत परवान चढ़ रही है।

जहां तक एक ऐसे बुर्जुआ गठबंधन में जाने का सवाल है जिसमें वाम की राजनीतिक पकड़ न भी हो लेकिन एक न्यूनतम संतुलन हो, ऐसा तभी होगा जब वाम गहराते जनाक्रोश से पैदा हुए जन आन्दोलन के शीर्ष पर सवार होगा। तभी वह किसी ऐसे गठबंधन के ”टर्म्स एंड कंडीशन्स” को वाम आंदोलन, जनता के हित और फासीवाद के विरुद्ध वास्तव में मोड़ सकता है। बीच का अल्पकालीन रास्ता एकमात्र यही हो सकता था कि समस्त वाम, दक्षिण से लेकर बाएं बाजू तक की समस्त छोटी-बड़ी वाम शक्तियां, एक साझा कार्यक्रम के तहत फासीवाद के बिरुद्ध एकजुट होतीं और चाहे चुनाव हो या जनांदोलन का क्षेत्र, सभी मोर्चों पर साझा कार्रवाई और हस्तक्षेप करतीं। इसी के सहारे वाम जनांदोलन के शीर्ष पर भी खड़ा हो सकेगा और फासीवाद पर करारा चोट कर सकता है। लेकिन अफसोस वाम सुधरने के लिए कतई तैयार नहीं है। ऐसा लगता है, वामदल, खासकर सीपीआई, सीपीएम और ‘लिबरेशन’ इस गठबंधन के प्रति काफी पहले से ही प्रतिबद्ध और कटिबद्ध हो चुके थे। वामदलों के कैडरों को भी शायद वाम के स्वतंत्र दावेदारी की बात से मोहभंग हो चुका है। उन्हें फासीवाद के विरुद्ध अपने दलों के दावों पर तब तक भरोसा नहीं है जब तक कि राजद या कांग्रेस के साथ उनका गठबंधन ना हो जाए। फासीवादी ताकतों को बढ़ते देख कर एक असहाय बेचैनी का माहोल सभी जगह व्याप्त है और यह अंधाधुंध जल्दबाजी और समर्पण उसी का परिणाम है। लेकिन शायद उन्हें नहीं पता कि बुर्जुआ के समक्ष ऐसा आत्मसमर्पनकारी गठबंधन हमारे वाम के उत्थान का कोई रास्ता नहीं है, उल्टे हमें यह दीर्घकालीन पराजय और नाकामी की और भी गहरी खाई में ले जाएगा। असली रास्ता तो हर हाल में वाम शक्तियों की आत्मसमर्पणवादी दिशा को वापस पटरी पर लाने और उसे क्रांतिकारी, स्वतंत्र और संयुक्त रूप देने से ही प्राप्त या हासिल होगा। इस सामान्य गिरे हुए भावबोध, यानी, पराजयबोध से भी बाहर निकलना होगा अर्थात यह मानना होगा कि बुर्जुआ गठबंधन के बिना फासीवाद को परास्त करना नामुमकिन नहीं मुमकिन है। बुर्जुआ के साथ गठबंधन कभी-कभी जरूरी होता है, लेकिन आत्मसमर्पण करने की राजनीति तक गिरकर बुर्जुआ वर्ग से गठबंधन बनाने से हम खत्म हो जायेगे यह समझना बहुत जरूरी है। इस आत्मसमर्पणवादी राजनीति का ही परिणाम है कि हम गठबंधन को बचाने के लिए अपनी राजनीति ही छोड़ने की हद तक गिरने लगते हैं। इसीलिये अभी यह स्थिति है कि बहुत ज्यादा ‘क्रांतिकारी’ राजनीतिक चर्चा करना और इस गठबंधन में वामपंथियों के स्वतंत्र दावों पर जोर देने को अनुचित माना जाता है। हम (यथार्थ के अगले अंक में) इस पर अगले महीने के मध्य तक फिर से चर्चा करेंगे, जब राजनीतिक स्थिति थोड़ी और साफ हो जाएगी और अनिश्चित्ताओं के बादल छंट जाएंगे। 

यह सच है और निश्चित तौर पर यह अब कोई गुप्त राज नहीं रह गया है कि वाम के लिए किसी भी तरह से कुछ ज्यादा सीटें जीतना ही सबसे ज्यादा मायने रखता है। जाहिर है, ऐसे में संशोधनवादी राजनीति के लिए भी कोई जगह नहीं बची है। संशोधनवाद का अर्थ है जनता को साम्यवाद के अनुयायी होने के बाह्य आवरण के पीछे से जनता के बीच बुर्जुआ राजनीति को ही जनपक्षीय और ईमानदारी के आवरण में सजा कर परोसना। अतः चुनाव के दौरान कम से कम अपनी बातों में उन्हें कुछ पूंजीवाद-विरोधी विचार और सरोकार के तत्व और तथ्य रखने पड़ते थे। इस बार शायद यह भी करना उनके लिए संभव नहीं हो पाएगा। उन्हें पता है कि संशोधनवादी राजनीति की चर्चा भी अगर वे गठबंधन की सीमा को पार कर के करते हैं, तो उन्हें दरकिनार कर दिया जाएगा। कांग्रेस और राजद का समर्थन नहीं मिलेगा। फासीवाद विरोध के नाम पे केवल भाजपा विरोधी, न कि पूंजीवाद या फासीवाद विचार विरोधी, बातों को ही करने की अनुमति मिल पाएगी। यह तो दिन के उजाले की तरह साफ है।

जाहिर है, चुनाव प्रचार में उन्हें खुद अपनी ही तय राजनीतिक लाइन, यानी, फासीवाद-पूंजीवाद के विचारों की न्यूनतम खिलाफत के अपने काम को भी आगे ले जाने के प्रति पूर्णतः उपेक्षा का भाव मौजूद है। अपनी पत्रिकाओं में जो कुछ भी वो फासीवाद के खिलाफ लिखते आए हैं वो सब महज सीट बंटवारे और इस गठबंधन को बनाए रखने की खातिर भुला दिये जाएंगे। जरा सोचिए, क्या वे खुल कर और डट कर वो सब बोल पाएंगे जो वे इस गठबंधन में नहीं रहने पर या गठबंधन में अपनी मजबूत स्थिति होने पर बोलते? क्या वे राजद और कांग्रेस जैसी बुर्जुआ पार्टियों की कमियां और भाजपा के नेतृत्व वाले फासीवाद के खिलाफ लड़ाई में उनकी कमजोरियों को इंगित कर पाएंगे? कतई नहीं। इनके भ्रष्टाचार को चिन्हित करने की तो बात ही छोड़िए। यही तो आत्मसमर्पण कहलाता है!

धूल फांकता फासीवाद के खिलाफ वाम ब्लॉक का सवाल

ऊपर वर्णित बातों से जाहिर है, वामदलों के लिए अभी बिहार में सबसे ‘कीमती’ चीज है राजद-कांग्रेस के साथ गठबंधन, ना कि एक ठोस और व्यापक लेफ्ट ब्लॉक का गठन, जिसमें या तो केवल संसदीय वाम पार्टियां हों या एक व्यापक वाम ब्लॉक हो जिसमें क्रांतिकारी वामपंथी ताकतें भी एक समग्र साझा कार्यक्रम के तहत शामिल हों। ये सब चीजें और बातें चुनाव आते ही फालतू हो जाती हैं। यही इतिहास है। एक स्वतंत्र वामपंथी दावेदारी को सामने लाना इन पार्टियों के लिए केवल एक नारा भर है, यह बार-बार साबित हुआ है। जब कि अभी इसी की सख्त जरूरत थी और है। इसकी मूल अंतर्वस्तु है जनता के सामने मौजूदा व्यवस्था का एक विकल्प पेश करना, ना कि केवल कुछ सीटें जीतना या गठबंधन सरकार बनाना। इस ताकत के आधार पर, राजद के साथ बेहतर शर्तों पर गठबंधन किया जा सकता था, यानी, उन शर्तों पर जो स्वतंत्र वामपंथी राजनीति की भावी दशा व दिशा की रक्षा हेतु जरूरी थे और हैं और साथ ही साथ जनता के हितों के पक्ष में भी थे और हैं। लेकिन अफसोस, इसका जैसे कोई नामलेवा तक नहीं है। अपने स्वतंत्र दावों की आहूति दे कर कुछ सीट जीत लेना ही लगभग पूरे वामदल का मार्गदर्शक सिद्धांत बन चुका है। ‘चुनाव में भाजपा को कौन हरा सकता है’ या ‘चुनाव में हम किसके साथ शामिल हो सकते हैं ताकि ज्यादा से ज्यादा सीट हासिल हो पाए’, यही मौजूदा वाम राजनीति की आधारशिला है। हम जानते हैं कि पूर्व में वाम की चुनावी दिशा इस बात पर निर्भर होती थी कि ‘कांग्रेस को कौन हरा सकता है’ और लक्ष्य होता था कांग्रेस को छोड़ कर सबके साथ शामिल होना, यहां तक कि भाजपा के साथ भी। ये है सीपीएम के नेतृत्व वाले वाम फ्रंट की पुरानी थीसिस जिसे हम सब बखूबी जानते हैं। इसे आज सभी दलों ने अपना थीसिस बना डाला है।  

अतः इस मौजूदा शोषक व शासक व्यवस्था के बदले एक सच्चा विकल्प जनता के सामने रखना, समाजवाद को विकल्प के तौर पर रखना और उसके इर्द-गिर्द चुनावी राजनीति की स्वतंत्र मज़दूर वर्गीय धुरी विकसित करना जाहिरा तौर से बुर्जुआ गठबंधन की राजनीति के आड़े आता है और किसी भी तरह से ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने के लक्ष्य में बाधा समझा जाता है। इसके लिए सभी तरह के अवसरवाद का सहारा लिया जाता है। वामदलों में यह बात व्यापक रूप से स्वीकृत है कि अगर फासीवाद मुख्य दुश्मन है तो हमें साम्यवाद से किनारा कर लेना चाहिए और ‘वामपंथ’ को बहुत दृढ़तापूर्वक रखना या दिखाना नहीं चाहिए क्योंकि यह बुर्जुआ गठबंधन के रास्ते में बाधा बनेगा, जो कि, इनके अनुसार, फासीवादी भाजपा को हराने में सबसे जरुरी या शायद एकलौता हथियार है। और दुर्भाग्यवश, यह विचार क्रांतिकारी वाम खेमें में भी प्रायः देखने को मिलता है। अभी तो स्थिति यह है कि बुर्जुआ दल या बुर्जुआ वर्ग ‘क्रांतिकारियों’ को चुनावी गठबंधन में ‘वैल्यू’ ही नहीं देता है, लेकिन अगर वैल्यू देने लगे तो क्या होगा कहना मुश्किल है। हममें से भी बहुतेरे की दिशा वही पाई जा सकती है जो संसदीय वाम की है।

क्रांतिकारी वाम किस तरफ है?

जैसे ही चुनाव की सुगबुगाहट शुरू हुई, वामदलों की तरह, क्रांतिकारी वाम के सभी छोटे-बड़े संगठनों ने भी (सीपीआई-एमएल पीआरसी और एक हद तक सीपीआई-एमएल एनडी को छोड़ कर) चुनाव को 6 महीने या साल भर के लिए टालने की मांग उठाई। उनका तर्क भी वही था जो वामदलों का था। उन्होंने भी यही कहा कि राज्य की जनता कोविद-19 महामारी के कारण भयानक आपदा व संकट झेल रही है और सरकार का पूरा ध्यान केवल उनके जीवन की सुरक्षा सुनिश्चित करने की तरफ होना चाहिए। अपने तर्कों को वजनदार बनाने के लिए इस मांग के कुछ उत्साही ‘क्रांतिकारी’ नेताओं ने उत्तर बिहार में बाढ़ की स्थिति का भी जिक्र किया, लेकिन मुख्य मुद्दा, जाहिर है, कोविद-19 ही था। उन्होंने तर्क किया कि अस्पतालों की स्थिति दयनीय है और (बिहार की) सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पूरी तरह चरमरा गई है और इसीलिए सरकार को लोगों को सर्वप्रथम कोविद-19 महामारी के खतरे से बचाने हेतु सभी के लिए पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधा मुहैया करने पर अपना ध्यान केन्द्रित करना चाहिए, न कि चुनाव करवाने के लिए सरकारी मशीनरी लगाने और आदमियों तथा अन्य साधनों की व्यवस्था करने में।  

अगर हम इसका ध्यान से मूल्यांकन करें, तो यह एक बहुत खतरनाक लेकिन रोचक प्रवृत्ति की तरफ इशारा करता है। उनके कहने का अर्थ है कि किसी संकट काल में जब तक जनता को राज्य और बुर्जुआ सरकार से सारी जरूरी सुविधाएं मिल नहीं जाती और जनता भयमुक्त नहीं हो जाती, तब तक ‘राजनीति’ इंतजार कर सकती है; कि अगर जनता बीमारी से या महामारी से मर रही है तो ये राजनीति करने का समय नहीं है। कुछ और लोग कहेंगे कि राजनीति तब की जानी चाहिए जब जनता के पास राजनीति करने का माकूल समय हो। वाह क्या तर्क है! इन क्रांतिकारियों के अनुसार, अगर लोग महामारी और साथ ही साथ महामारी के दौर में सरकार की उपेक्षा से पीड़ित हैं, तो यह अभी उनके (जनता के) लिए राजनीति में लगने का समय नहीं है जब तक कि सरकार सब कुछ जनता के पक्ष में ठीक ना कर दे; अगर जनता इस महामारी के दौर में भी संक्रमण के खतरों के बीच काम की तलाश में बाहर निकल रही है तो वो अपने परिवार के लिए रोजी-रोटी का इंतजाम करने के लिये निकल रही है न कि राजनीति के लिये और हम उनके साथ राजनीति की बात करते हैं तो ज्यादती करते हैं। साफ है, हमें तब तक इंतजार करना चाहिए जब तक कि 6 महीने बाद या फिर एक साल बाद कोविद-19 की वैक्सीन निकल जाने के बाद वे राजनीति करने निकलने लगेंगे। कोविद-19 के दौर में हमलोग चुनाव पर कुछ इसी तरह की चर्चा करते पाए जाते हैं।

अगर हम इनके तर्क को थोड़ा और दूर तक ले जाएं तो उनके हिसाब से क्रांति एक शांति कालीन कार्य है, जब सब नियोजित ढंग से हो रहा हो, सबके पास पर्याप्त भोजन हो, बुर्जुआ राज्य द्वारा सबका सही तरीके से ख्याल रखा जा रहा हो और सभी का स्वास्थ्य भी ठीक हो, लोग महामारी से नहीं मर रहे हों और बीमार न हों। अगर कोई स्वास्थ्य संकट खड़ा होता है, तो क्रांति तब तक इंतजार करे जब तक कि पूंजीपति वर्ग और उनका राज्य उस संकट पर विजय नहीं पा लेता, ताकि लोग आराम से बिना किस वायरस के डर के राजनीति की बात कर पाएं!

अगर इन पर भरोसा करें, तो क्या यह कहना गलत होगा कि 1917 की फरवरी और रूसी क्रांति को टाल देना चाहिए था? क्योंकि उस समय जनता युद्ध, बेरोजगारी, भुखमरी और जमीन के अभाव में बुरी तरह संकटग्रस्त थी, दाने-दाने को मोहताज़ थी। लेकिन उक्त क्रांतियां रोटी, शांति और जमीन के सवाल पर ही फूटीं, बढ़ीं और सफल भी हुईं। वे इसके बारे में क्या कहेंगे? ज्ञात हो कि स्पैनिश फ्लू भी इसी समय की बात है। वह दुनिया में प्रथम विश्व युद्ध के अंत में फैला। तब अक्टूबर क्रांति जारी ही थी और कई पूंजीवादी-साम्राज्यवादी देशों और उनकी सेनाओं के संयुक्त हमले झेल रही थी। लेकिन हमारे अनुसार, लेनिन को पहले वैक्सीन के आने का इंतजार करना चाहिए था और क्रांति को स्थगित कर देना चाहिये था। अद्भुत! 

जब यह याद दिलाया गया कि चुनाव को टालने का अर्थ है पिछले दरवाजे से मोदी राज का बिहार में आगमन करवाना, तो वे इस आगामी भयावह स्थिति पर पर्दा डालते हुए कहते हैं कि राष्ट्रपति शासन आ भी जाता है तो भी उस खतरे का कोई अलग से खास असर नहीं होगा। सही में, ये दिखाता है कि वे कितने बहादुर क्रांतिकारी हैं!

यह सच है कि बिहार की राजधानी पटना की स्वास्थ्य प्रणाली तथा व्यवस्था बिलकुल जर्जर हालत में है और इससे हम अंदाजा लगा सकते हैं कि जिलों या ब्लॉकों में क्या स्थिति होगी। लेकिन इसकी व्याख्या जरुरी है कि किस आधार पर हमारे क्रांतिकारी ये उम्मीद करते हैं कि स्वास्थ्य सेवाएं अगले 6 महीनों में बेहतर हो जाएंगी और कोविद-19 से लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित हो जाएगी, अगर चुनाव 6 महीने के लिए टाल दिए जाते हैं तो। अगर वे कहते हैं कि क्रांतिकारी गतिविधियों या प्रचार के लिए माहोल उपयुक्त या अनुकूल नहीं है क्योंकि जनता बेहद घबराई हुई है, तो ये कोई तर्क नहीं बल्कि एक गलतबयानी जैसी बात होगी, क्योंकि सच यही है कि आम मेहनतकश जनता कोविद से उतनी घबराई हुई नहीं है जितना कि जीवन की अन्य घातक और जानलेवा समस्याओं से। वो हो भी नहीं सकती। उनके लिए भूख सबसे बड़ी बीमारी और घातक वायरस है। यहां तक कि मध्यम वर्ग भी कोविद-19 महामारी के बावजूद अपने रोजमर्रा के जीवन में व्यस्त हो गया है। लोग बड़ी तादाद में जमा हो रहे हैं और काम की तलाश में इधर से उधर आ-जा भी रहे हैं। इसके बावजूद यह कहना कि “जनता डरी हुई है और ऐसी स्थिति में राजनीतिक प्रचार कतई संभव नहीं है”, तो हम उसी गड्ढे में जा गिरेंगे या उसी ट्रैप में जा फंसेंगे जो इस फासिस्ट सरकार ने हमारे लिए खोद और बना रखे हैं। वो भी यही बात कह रही है कि यह कोई राजनीति करने का समय नहीं है। हमें इसका उल्टा कहना चाहिए था। यह कहना चाहिये था कि अगर सरकार हमारी नौकरी और जीवन-जीविका की गारंटी नहीं कर रही है और कोविद-19 महामारी के दौर में जनता का ख्याल नहीं रख रही है, उल्टे बड़े पूंजीपतियों के खजाने भरने में लगी हुई है, कोविद-19 जैसी महामारी से लड़ने के लिए भी पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया नहीं करा रही हैं, तो हम राजनीति करेंगे। राजनीति करने के लिए खुलकर सभी जरुरी तैयारियां करनी चाहिए थीं, जिसे करने में कमोबेश हम सामूहिक तौर पर विफल रहे हैं। इसके लिए हमें अपनी आलोचना करनी चाहिए अगर हम आगे भी कोविद के नाम पर जनता के इस गाढ़े वक्त में राजनीति नहीं कर पाते हैं तो। और चाहे हम कुछ भी बोल लें या बहस कर लें, जहां तक आम मेहनतकश जनता की बात है, तो मौजूदा स्थिति में जब भी जहां भी तैयारी ली गई है वे प्रतिरोध में और संघर्ष में हिस्सा लेने के लिए बाहर आई है। जनता, खासकर देश भर के मजदूर, खुल कर अपनी जिंदगी की लड़ाई रहे हैं। जिंदगी की जद्दोजहद में वे वायरस से भला कितना डरेंगे! यहां तक कि वो कई मौकों पर बिना किसी राजनीतिक नेतृत्व के भी लड़ने को विवश हैं। यह एक सत्य है जिसे कोई भी झुठला नहीं सकता। यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित पूंजीवादी देशों में भी दसियों हजार लोग अपनी सरकारों की निष्क्रियता और उनकी घोर उपेक्षा के खिलाफ राजनीतिक प्रतिरोध संघर्षों में सड़कों पर बार-बार आ रहे हैं। यही सच्चाई है और आंखें मूंद लेने से इस पर पर्दा नहीं पड़ सकता है।

असल में किसकी सुरक्षा का सवाल है?

यह तो साफ है कि जहां तक जनता की सुरक्षा का प्रश्न है, तो वह चुनाव टालने का वैध कारण नहीं हो सकता। गरीब और मजदूर जनता तो पहले से ही बड़ी संख्या में बाहर निकल रही है और महीनों से इधर-उधर आ-जा रही है। वे विभिन्न नगरों और शहरों, यानी सभी जगह काम की तलाश में आ-जा रही है, क्योंकि उनके परिवार का जीवन-यापन खतरे में है। वे रोज कई बार कोविद-19 संक्रमण के खतरे का सामना करते हैं। उनके पास पार्यप्त साफ-सफाई और बचाव की भी व्यवस्था नहीं है, हो भी नहीं सकती है, क्योंकि अधिकतर लोगों की आर्थिक स्थिति इसकी इजाजत नहीं देती। उनके लिए सबसे खतरनाक वायरस है भूख। अतः चुनाव हो या नहीं, वे पहले से ही कोविद-19 संक्रमण का खतरा और उससे जुड़ी बीमारियों का जोखिम झेल रहे हैं। चुनाव हो या नहीं, उनके लिए इस खतरे से कोई राहत नहीं है। इसीलिए सुरक्षा का सवाल उनके लिए कोई मसला नहीं है। अगर सच में, हम उनके जीवन के खतरे का सवाल उठा रहे हैं और उससे विचलित हैं, तो चुनाव करवाने या टालने की मांग से ज्यादा राज्य के खिलाफ एक बड़े संयुक्त आंदोलन में उतरने की जरूरत है। क्या हम तैयार हैं?

दरअसल, कोविद के खतरे का यह मसला  कहीं किसी रूप में मौजूद है तो वह पार्टी के नेताओं की सुरक्षा के सवाल के रूप में मौजूद है। यह डर सभी पार्टियों को खाए जा रहा है, चाहे वो वामपंथी हों या दक्षिणपंथी। यहां मुख्य बात यह नहीं है कि क्या कोविद-19 से जुड़ा यह डर सही है या नहीं। सामान्यतः यह डर सच है और इस पर बात की जानी चाहिए और इसका निदान किया जाना चाहिये। लेकिन बहस का मुख्य विषय यह है कि चुनाव टालने की मांग के आधार के रूप में लीडरों की सुरक्षा के सवाल को उठाने के बजाय जनता की सुरक्षा के सवाल को उठाना निराधार और बेबुनियाद है। यह जमीन का सही चित्र नहीं पेश करता है और इसलिए हमें गलत रणनीति की ओर प्रेरित करता है। यही मुख्य बात है। चुनाव टालने की मांग करते समय उनके दिमाग में पार्टी लीडरों की सुरक्षा का सवाल आता है, जो विचारणीय है और इसे इसी रूप में पेश किया भी जाना चाहिये। जनता नहीं, बल्कि पार्टी के नेतागण के लिए खतरा है अगर वे व्यापक चुनाव प्रचार में जाते हैं तो। जनता तो पहले से ही जोखिम उठा रही है और उनका शरीर अपने हिसाब से कोविद से लड़ भी रहा होगा। रैलियों, मीटिंगों में भाग लेने के लिए या बड़े पैमाने पर राजनीति में हिस्सा लेने के लिए उन्हें अलग से और कौन सा खतरा उठाना पड़ेगा? जाहिर है, कुछ भी नहीं। यहां तक कि हमारे कैडर और कार्यकर्ता, जो कोविद-19 महामारी के खतरों के बावजूद जनता के बीच पहले से सक्रिय हैं, वे भी पहले से ही संक्रमण के खतरों को झेल रहे हैं।

अन्य प्रबल तर्क

एक बड़ा प्रबल तर्क यह है कि सम्पूर्ण राज्य मशीनरी चुनाव में व्यस्त हो जाएगी और अतः जो भी न्यूनतम राज्य मशीनरी कोविद-19 से लड़ने में व्यस्त और सक्रिय है वो भी नहीं रहेगी और ध्वस्त हो जाएगी या भटक जाएगी और लोगों की जिंदगियां चुनाव हो जाने तक, यानी, कुछ महीनों के लिए पूरी तरह खतरे में चली जाएगी। इस तर्क में कुछ दम है। लेकिन इसे बढ़ा कर पेश करने का कोई तुक नहीं है और इस रूप में बढ़ा चढ़ाकर कहने से वह गलत बात को सही करने में मददगार नहीं होगी। राज्य के पास बहुत से लोग और भौतिक संसाधन हैं। उसके हाथ में बहुत बड़ी मशीनरी है हम जानते हैं। अगर राज्य चाहे तो कुछ भी प्रबंध कर सकती है। कमी है तो राजनीतिक इच्छा की और चुनाव टालने की मांग से यह इच्छा शक्ति उसमें हम भर नहीं सकते। ऐसा हम बड़े आंदोलन के जरिये ही कर सकते हैं। नहीं तो, सच्चाई तो यही है कि अभी की बुरी स्थिति में भी बहुत सारी सरकारी एजेंसियां या विभाग न तो जन कल्याण कार्यों में  लगे हुए हैं, और ना ही स्वास्थ्य के क्षेत्र में ऐसा कोई बहुत काम हो रहा है कि उसमे बहुत आदमियों या संसाधनों की जरूरत पड़े। यहां तक कि आलाधिकारी जनता के कामों को छोड़ कर छुट्टी मनाने में व्यस्त हैं। कोविद का डर उनकी छुट्टियों के लिये बहाना बन गया है। कोई किसी भी सरकारी दफ्तर में जा कर देख सकता है। एक भी आला अफसर किसी आफिस में नहीं दिखता। अधिकांश कार्यालयों में जनता का प्रवेश वर्जित है। कोई डीएम नहीं, कोई एडीएम नहीं और यहां तक कि कोई जूनियर अफसर भी किसी दफ्तर।में नहीं मिलेगा। किसी भी दफ्तर में बहुत काम या जन कल्याण का काम नहीं चल रहा है। स्कूल कॉलेज भी बंद हैं। सरकारी दफ्तर पूरी तरह निष्क्रिय अवस्था में हैं।  यही सच है और इसलिए चुनाव में मशीनरी के अस्त-व्यस्त होने का तर्क भी कोई बहुत बड़ा मायने नहीं रखता है। हां, ये सारी बाते एक ही अर्थ में मायने रखतीं कि हम साथ में इन्हीं विषयों पर रस्मअदायगी (चुनाव टालने की मांग भी यही है) से ऊपर उठते हुए संयुक्त जनांदोलन की कोई योजना पेश करते।

चुनाव टालने की मांग के साथ जनांदोलन का आह्वान

साफ है, मौजूदा परिस्थितियों में चुनाव टालने की मांग का कोई अर्थ तभी हो सकता था, अगर हम साथ-साथ आम जनता की आंदोलनात्मक कार्रवाई को बढ़ाने का आह्वान और जनता के प्रति सरकार की उपेक्षा के खिलाफ एक जनांदोलन खड़ा करने की कार्यनीति अपना कर कोई सार्थक योजना भी पेश करते। यह एक हद तक बेहतर दिशा होती। लेकिन केवल चुनाव टालने की मांग करना और इसे फासीवादी सरकार पर दबाव बनाने की नीति कहना, यह तो कम से कम हमारे जैसे लोगों की समझ से परे है। संसदीय वाम के लिए तो ऐसी बातें आम हैं, और उनके द्वारा ऐसी बातों के तर्क के आधार पर चुनाव टालने की मांग उठाना भी आश्चर्यजनक नहीं था। लेकिन जब क्रांतिकारी भी यही करें, तो यह बेहद चिंता की बात है। इसीलिए आम जनता के बीच कार्रवाई को बढ़ाए बिना चुनाव टालने की मांग करना खराब नीति ही मानी जायेगी, चाहे हम इसे जैसे भी कहें। अगर चुनाव होते हैं, तो सामान्यतः सरकार को नैतिक रूप से बाध्य हो कर जनता को रिझाने और उनके वोट बटोरने हेतु उनके लिए कुछ न कुछ करना होता है। और इस संकीर्ण जगह से भी सोंचें, तो चुनाव बिहार की जनता के लिए शायद कुछ राहत ही ले कर आएगा। कम से कम अभी वो जिस परिस्थिति में है या चुनाव टालने से जो परिस्थित होगी, उससे तो कुछ बेहतर ही स्थिति चुनाव के दौरान होगी। और कुछ नहीं तो जनता वोट मांगने आये नेताओं को जलील तो कर ही सकती है। यह भी हम संगठित रूप से कर और करवा सकें तो एक बेहतर बात होगी। और जलालत से बचने के लिए नेतागण भी यही चाहेंगे कि जनता के लिए कुछ सरकारी मदद की घोषणा हो जाये। अगर हम इस छोटी चीज को भी ध्यान में रखें, तो भी चुनाव टालने की मांग (बिना किसी आंदोलनात्मक योजना के) का दिवालियापन साफ हो जाएगा। साफ है, किसी जन आन्दोलन का आह्वान किए बिना चुनाव टालने की मांग करना ताकि सरकार पर दबाव बने क्रांतिकारी खेमे में राजनीतिक इच्छा और कल्पनाशीलता की कमी और एक हद तक विकट समय में भी कुछ न कर पाने की मजबूरी को दर्शाता है। और, बहुत दुखद है कि हम सब यह अपने सामने होते देख रहे हैं, इसके गवाह हैं।   (अगले अंक में जारी)

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 5/ सितंबर 2020) में छपा था

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