कृषि कानून वापसी : चारों तरफ से घिरा भे‍ड़ि‍या फिर भेड़ की खोल में आने को बेताब

संपादक मंडल, यथार्थ

कृषि कानून वापस लेने की घोषणा पर एक त्वरित प्रतिक्रिया

चारों तरफ से घिरा भे‍ड़ि‍या एक बार फिर भेड़ की खोल में आने को बेताब ;
साम्प्रदायिक साजिशों से खबरदार और आपस की एकजुटता को बनाये रखें;
“आंदोलन की मार” और “चुनावी हार” की भाषा समझने वाले फासिस्टों को यूपी में हराने के लिये पूरी ताकत लगाएं;

(किसान साथियों को एक छोटा संदेश)

भे‍ड़ि‍या एक बार फिर भेड़ की खोल में आने के लिए छटपटा रहा है। मोदी के कल के भाषण को इस एक पंक्ति के अतिरिक्त किसी और बेहतर तरीके से न तो समझा जा सकता है और न ही समझाया जा सकता है। किसानों को आज और भी सख्ती तथा सावधानी बरतनी चाहिए। 

मोदी ने क्या कहा? ……

मोदी ने तीनों कृषि कानूनों को ‘गरीब किसान हितैषी’ बताते हुए, लेकिन किसानों के एक वर्ग के द्वारा किये जा रहे विरोध के मद्देनजर एवं उसका ‘सम्मान’ करते हुए, आगामी संसद सत्र में तीनों कृषि कानून को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया शुरू करने की घोषणा की है। साथ ही, एमएसपी को ज्यादा प्रभावी बनाने एवं किसान हितों के अन्य सवालों पर कमिटी बनाने की भी घोषणा की है।

इसी के साथ किसान आंदोलन के मोर्चे पर अनगिनत नुकीले मोड़ों, अत्यंत गहरी व नई पेचिदगियों और नये षडयंत्रों से भरे अतिमहत्वपूर्ण घटनाक्रमों की शुरुआत हो चुकी है ……


किसान साथियों!

यूं तो आपका संघर्ष बाह्य तौर पर एक ऐतिहासिक जीत की ओर अग्रसर दिख रहा है, लेकिन यह नहीं भूलना चाहिये कि आपका सामना एक अत्यंत शातिर सत्ता से हुआ है। मोदी के भावुक भाषणों से हमारा पाला अनगिनत बार पहले पड़ चुका है और इससे प्राप्त कठोर सबक किसानों के पास हैं। इसलिए जबकि इस घोषणा और इसके अमल के बीच अभी भी एक लंबा फासला है, अगले दिन क्या होगा, कुछ भी साफ और स्पष्ट तौर पर नहीं कहा जा सकता है। कृषि कानूनों की वापसी की जिस संवैधानिक प्रक्रिया की बात मोदी ने की है, वह प्रक्रिया ठीक-ठीक क्या होगी और उसमें कितने दांव-पेंच होंगे उसे देखना अभी बाकी है। मजबूत होती फासिस्ट सत्ता को, जैसी की मोदी की सत्ता है, एकमात्र एकजुट संघर्ष की निरंतरता से ही झुकाया जा सकता है। इसलिये संघर्ष की निरंतरता को बनाये रखना और इसके अक्षय ऊर्जा स्रोत को बीच की इस ऐतिहासिक ‘जीत’ के बाद भी तब तक निरंतर बढ़ाते रखना होगा जब तक कि किसानों के दुश्मनों (पूंजीवाद, कॉर्पोरेट पूंजीवाद सहित) को पूरी तरह परास्त नहीं किया जाता है और इसकी प्रहार क्षमता को पूरी तरह नष्ट नहीं किया जाता है। इसलिये पूंजीवादी-फासीवादी सत्ता के भेड़ियों पर विश्वास नहीं, आंदोलन का निरंतर प्रहार जरूरी है। ये आंदोलन की मार से घिरे होने के अतिरिक्त किसी और तरीके से नहीं झुकते हैं। हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि उनका किसी खास घड़ी में झुकने का हमेशा एक खास मकसद होता है। मोदी के पैर खींचने के तरीके से भी यह स्पष्ट हो रहा है कि भेड़िया बहुत सारी मजबूरियों से घिरा है और मौका मिलते ही पलटवार करेगा। पहले से ज्यादा खतरनाक पलटवार!

इसलिए मजबूरी में किसानों पर मोदी के एकाएक मेहरबान होने के पीछे के निहितार्थ को समझ कर ही हम मोदी की मौजूदा ‘रहमदिली’ की व्याख्या कर सकते हैं। पूरी स्पष्टता से यह महसूस हो रहा है कि हर दिशा से घिरे मोदी की तरफ से पहले यूपी में हार को टालने और फिर आगामी वर्षों में चुनाव होने पर केंद्र की सत्ता पर अपनी ढीली होती पकड़ को थामने की चेष्टा हो रही है। वह जनता के बीच सुलगते विद्रोह को भी भांप रहा है और किसान आंदोलन की धुरि के इर्द-गिर्द बन रहे नये शक्ति संतुलन पर भी पैनी नजर रख रहा है। मोदी द्वारा अपने पैर पीछे खींचा जाना इस बात का संकेत भी है कि मौजूदा पूंजीवादी सत्ता की सांस किसान आंदोलन ने अटका कर रख दी है और वह किसानों से निपटने में या कहें किसानों की व्यापक आबादी को ‘निपटाने’ में सक्षम नहीं हो पायी या नहीं हो पा रही है। कुल मिलाकर कहें, तो देश में विभिन्न वर्गों व तबकों के समर्थन व विरोध के कुल जोड़-घटाव से निर्मित शक्तिसंतुलन, जो फिलहाल शानदार व ऐतिहासिक किसान आंदोलन के कारण उसके हाथ से निकल चुका है, को फिर से अपने पक्ष में करने की उसकी कवायद गंभीरता से तेज हो चली है (उसका पीछे हटना ठीक इसी बात का परिचायक है और ठीक इसी अर्थ में किसान आंदोलन के लिए “बीच की एक ऐतिहासिक जीत” सुनिश्चित होना संभव हुआ है) जो निस्संदेह यह दिखाता है कि भारत के फासीवादी किसान आंदोलन से निरंकुश तरीके से निपटने की एक हद तक कोशिश करने के बाद यह समझ चुके हैं कि उनकी छोटी से छोटी निरंकुशता से भरी गलती देश में इधर-उधर दबी-पड़ी चिंगारियों को हवा दे सकती है और देश का शासक वर्ग एकाएक क्रांतिकारी संकट की स्थिति में पहुंच सकता है।

हमलोग इस मुतल्लिक पहले भी यह कह चुके हैं कि शासक वर्ग को उखाड़ फेंकने जैसी स्थिति पैदा कर देने वाले क्रांतिकारी उभार का खतरा ही मोदी को अपने पैर वापस खींचने को बाध्य कर सकता है। आज हमारी यह बात साबित हो रही है, लेकिन हमारी अन्य बातों को भी इसके साथ मिलाकर समझना चाहिए जो इस आंदोलन को एक क्रांतिकारी मंजिल की ओर अग्रसर करने वाली बातें हैं। निस्संदेह किसान आंदोलन बीच की एक महान जीत सुनिश्चित कर सकता है, और करना भी चाहिए, लेकिन फासिस्टों से जब सामना हो तो यह मानकर चलना चाहिए कि यह भी तभी संभव होगा, जब हम अंतिम घड़ी तक संघर्ष की चाबुक मजबूती से थामें रहें और इसे चलाते भी रहें।

दूसरी बात यह कि जब निरंकुश सत्ता चारों तरफ से घिरी हो और पीछे हटने के संकेत दे रही हो, तो आंदोलन को स्वाभाविक तौर पर अन्य लंबित (अधुरी पड़ी) मांगें भी दुगनी ताकत से पेश करनी चाहिए। इसके अतिरिक्त इतने कठिन संघर्ष व शहादत के बल पर हासिल की गई जीत को भविष्य में सुरक्षि‍त रखने के लिए कुछ ऐसी कठोर (फासिस्ट सत्ता की दृष्टि से) मांगें भी पेश करनी चाहिए ताकि भेड़िया कल पलटवार करना भी चाहे तो न कर‍ पाये या कम से कम आसानी से न कर पाये। और जनता के समक्ष इस जीत की एक बहुआयामी जनवादी नजीर हर वक्त मौजूद रहे। इसमें फासिस्टों की हार सुनिश्चित करने के अतिरिक्त कुछ ऐसी जनवादी मांगें पेश की जानी चाहिये जो देश में इसकी जैसी सत्ता के उभार पर अंकुश लगाने के काम आ सकती हैं।

तीसरी बात यह है कि किसान आंदोलन जिन बेहद संजीदा मांगों को (जैसे गरीबों की रोटी को अमीरों की तिजारियों में नहीं बंद होने देने की बातें, सर्वव्यापी पीडीएस आदि, हालांकि अपने मांगपत्र में नहीं) उठा चुका है, उन प्रचारात्मक मांगों के लिए भी भावी आंदोलन में ठोस जगह व स्थान देने के प्रयास भी करने चाहिए।

कुल मिलाकर यह एक ऐतिहासिक जीत है, लेकिन जो प्रकारांतर में किसानों व इनके आंदोलन के समक्ष नयी चुनौतियां व पेचिदगियां पेश करेगी, क्योंकि इन कृषि कानूनों के वापस होने के बाद भी किसानों की व्यापक आबादी पर पूंजीवाद (कॉर्पोरेट सहित) का प्रहार जारी रहेगा, इसमें किसी को कोई संदेह नहीं होना चाहिये। कुल मिलाकर किसान और किसान आंदोलन दोनों कॉर्पोरेट पूंजीपतियों के नए खतरनाक षडयंत्रों का सामना करने की ओर बढ़ेंगे। इस अभिशप्तता को समझकर ही हम इस जीत को सही एवं क्रांतिकारी परिप्रेक्ष्य में समझ सकते हैं।

किसान साथियों! अतिसावधान हो जाइए, आंदोलन की लगाम को और सख्ती से पकड़े रहिये, अन्य सभी लंबित मांगों को पहले की तुलना में और ज्यादा मजबूती से पेश कीजिए और उनके पूरे होने तक डटे रहिये, अन्य जनवादी मांगें पेश कीजिये और भेड़िये को दुबारा पलटवार करने का कोई मौका मत दीजिये!

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