जनगणना और पूंजीवाद की राजनीति : सरना धर्म कोड व आदिवासी अस्तित्व

अमिता कुमारी //

नवंबर की इस माह, ग्यारह तारीख को, झारखंड विधान सभा ने एक विशेष अधिवेशन के तहत बैठक की। सरना धर्म कोड बिल के लिए एक प्रस्ताव पारित हुआ और आदिवासियों की एक लंबे अरसे से लंबित मांग आंशिक तौर पर पूरी हुई। यह बिल अब केंद्र से स्वीकृति का इंतज़ार कर रही है, क्योंकि संवैधानिक तौर पर संसद ही धार्मिक मामलों पर कानून बनाने की अधिकारी है।

सरना धर्म कोड का मुख्य उद्देश्य आदिवासी धर्मों को भारत के अन्य प्रमुख धर्मों, यानी, हिन्दू, इस्लाम, इसाई, सिख, जैन एवं बौद्ध धर्मों, के समकक्ष लाना है। असल में, जनगणना के तहत केवल इन छः धर्मों की श्रेणियां बनाई गयी हैं, जिसका अर्थ यह है कि इन धर्मों को मानने वाले जनगणना की प्रक्रिया के तहत चिन्हित किए जाएंगे एवं वैसे भारतीय जो इन छः धर्मों के अलावा अन्य धर्मों के अनुयायी हैं, उन्हें स्वतंत्र रूप से जनगणना में पहचान नहीं मिलेगी। वे “अन्य” नामक वर्ग में एक साथ सूचीबद्ध किए जाएंगे। सरना धर्म कोड इसी विसंगति को दूर करने का प्रयास है, जिसके तहत ‘सरना’, जिसे झारखंड के आदिवासी अपना धर्म मानते हैं, को जनगणना में आधिकारिक जगह मिल सके।

सरना धर्म कोड दिखने में महज एक आधिकारिक पहचान की मांग सा प्रतीत होता है, पर इसका असल अर्थ काफी व्यापक है। इस मुद्दे का एक गंभीर ऐतिहासिक महत्व है तथा यह आदिवासी पहचान व अस्तित्व से गहराई से जुड़ा हुआ है। इस विषय के परिप्ररेक्ष्य में तीन मुद्दे हैं जिन्हें समझना आवश्यक है – पहला, आदिवासियों के विरुद्ध भारतीय राज्य की उपेक्षापूर्ण राजनीति का लंबा इतिहास; दूसरा, आदिवासियों को हिन्दू धर्म के तहत लाने की दक्षिणपंथी राजनीति; एवं तीसरा, पूँजीपतियों द्वारा आदिवासी जमीन को छिनने के अंतहीन प्रयास। प्रस्तुत आलेख इसी परिप्रेक्ष्य को समझने का एक प्रयास है ताकि झारखंड विधान सभा के इस सांकेतिक कदम के महत्व से हम अवगत हो सकें।

भारतीय राज्य व आदिवासी: शब्दावली व जनगणना की राजनीति

‘जनजाति’ व ‘आदिवासी’ के नाम से आमतौर पर पुकारे जाने वाले लोगों के लिए कई अन्य शब्दावलियों का प्रयोग किया जाता रहा है, जैसे, ‘आदिमजाति’, ‘आदिम-जनजाति’’, पिछड़े-हिन्दू’, ‘धरती-पुत्र’, ‘रानीपराज’, ‘मूल-निवासी’, ‘वनवासी’, इत्यादि। यह शब्दावलियाँ मात्र परिभाषित करने वाले वर्ग नहीं; बल्कि इनमें से अधिकांश विशेष प्रकार की राजनीतियों से उत्पन्न हुईं हैं – ऐसी राजनीतियाँ जो आदिवासियों के अस्तित्व व जीविका के लिए गंभीर महत्व रखते हैं।

भारतीय संविधान ने इस समुदाय को ‘अनुसूचित जनजाति’ कहा है। संविधान निर्माताओं ने यह सावधानी बरती कि ‘आदिवासी’ व ‘मूलनिवासी’/ ‘स्वदेशी’ (indigenous) शब्द का प्रयोग कतई ना किया जाए। यह दोनों शब्द लगातार विवादित और परखे जाते रहे हैं, खासकर उस दौर से जब ये शब्द आदिवासी राजनीति के अंग बनने लगे तथा स्थानीयता का विचार उनके दिलो-दिमाग में घर करने लगा। यह दोनों शब्द आदिवासियों के उस हक़ को प्रभावी तौर पर अभिव्यक्त करते हैं जिसके तहत वे दावा करते हैं कि उस ज़मीन पर, जो उन्होने ‘सबसे पहले’ जोती है तथा उस जंगल पर, जिसमें उन्होने ‘सबसे पहले’ निवास किया, उनका सबसे पहला अधिकार है। मानवशास्त्रीय मानकों के तहत इन शब्दों में त्रुटियाँ हो सकती हैं, पर जहां तक हाशियाकरण का सवाल है, यह दोनों शब्द इन समुदायों द्वारा अन्तर्भूत किए जा चुके हैं एवं उनकी अधिकारहीनता को अभिव्यक्त करने के सशक्त माध्यम बन चुके हैं। 

संवैधानिक और आधिकारिक तौर पर ‘आदिवासी’ और ‘मूलनिवासी’ अस्वीकृत हैं। भारत ने ‘मूल–निवासी’ (इंडीजीनस) संबंधी संयुक्त राष्ट्र कार्यदल (यू॰एन॰जी॰आई॰पी) के समक्ष अपनी स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि अनुसूचित जनजातियों के लोग मूल-निवासी नहीं हैं और भारत की समस्त जनता ही देश की मूल–निवासी है। ठीक इसी तरह, भारतीय राज्य ने ‘आदिवासी’ शब्द को नकारा है। संविधान सभा की बैठकों के रिकोर्डों में वह लंबी तीखी बहसें मौजूद हैं जिसके तहत ‘आदिवासी’ शब्द के बदले ‘अनुसूचित जनजाति’ जैसे एक तटस्थ और प्रशासनिक शब्द का चुनाव किया गया। संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा जैसे मुखर आदिवासी सदस्य ने इस नकार का जवाब देने में कोई कसर बाकी नहीं रखी थी। उनके कई प्रत्युत्तरों में से एक का उद्धरण देना उचित होगा:

विभिन्न समितियों द्वारा किए गए किसी भी अनुवाद में ‘आदिबासी’ शब्द प्रयुक्त नहीं किया गया है… ‘आदिबासी’ शब्द का प्रयोग क्यों नहीं किया गया है और क्यों ‘बनजाति’ शब्द का प्रयोग हुआ है? हमारी जनजाति के अधिकांश सदस्य जंगलों में नहीं रहते… मैं यह समझ नहीं पाया हूँ कि क्यों इस पुराने, अपमानजनक शब्द का प्रयोग उनके लिए किया जा रहा है, जबकि हाल तक इसका अर्थ असभ्य जंगली था।

जयपाल के बारम्बार आग्रह के बावजूद ‘आदिवासी’ शब्द को स्वीकार नहीं किया गया। और इसी तरह आदिवासी कार्यकर्ताओं द्वारा संयुक्त राष्ट्र संघ में साल दर साल अपने प्रतिनिधि भेजने के बावजूद भारतीय राज्य ने इस विषय पर अपनी आधिकारिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं किया।

जब आदिवासियों को उनके वाजिब अधिकारों से वंचित करने का प्रश्न आता है, तो शब्दावली की इस राजनीति का बखूबी साथ देती है जनगणना की राजनीति। दोनों राजनीतियों का एक ही उद्देश्य है – आदिवासियों की उस विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान और अनुभव, जो हाशियाकारण व बेदखली के एक लंबे अतीत के दौर में विकसित हुई है, को मिटाना।

भारत में जनगणना 1871 में शुरू हुई। औपनिवेशिक काल में जनगणना का मुख्य आधार धर्म हुआ करता था। वर्ष 1951 तक आदिवासियों को “जीववादी” (animist) या “आदिम धर्म” की श्रेणी में रखा जाता था। इस तरह आदिवासी धर्मों को 1951 तक एक अलग पहचान आधिकारिक तौर पर मिलती रही। 1961 की जनगणना से यह बदल गया, तथा धर्म की मात्र छः श्रेणीयां बनाई गयी (जैसा ऊपर वर्णित है) और वैसे धार्मिक मत जो इन छः से अलग थे उन्हें “अन्य” की श्रेणी में रखा जाने लगा। इन भिन्न मतों को अपनी धार्मिक पहचान तो बताने का विकल्प दिया गया है, पर उनकी गिनती “अन्य” के तहत ही करने का प्रावधान है। आदिवासी धार्मिक मत, इस तरह, 1961 से खुद को एक पृथक वर्ग के रूप प्रस्तुत करने में असमर्थ रहे हैं और तब से उनके अस्तित्व और पहचान को महत्वहीन बना दिया गया है।

इस महत्वहीनता का अर्थ मात्र धार्मिक उपेक्षा नहीं; यह आदिवासियों को गंभीर भौतिक क्षति पहुंचाता है। भौतिकता के इस पहलू की गहराई से पड़ताल करने पर भारतीय राज्य के उस चतुर मंसूबे का पर्दाफाश होता है जिसके तहत आदिवासियों को उनके उन अधिकारों से वंचित करने का प्रयास किया जा रहा है जो उन्होने औपनिवेशिक व भारतीय राज्य के विरुद्ध ऐतिहासिक संघर्षों द्वारा हासिल की है।

हम जानते हैं कि संविधान में आदिवासियों के लिए विशेष प्रावधान हैं जिनका उद्देश्य उनकी विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान और आवश्यकताओं को स्वीकार करते हुए उनके हितों की रक्षा करना है। जैसे, पाँचवीं अनुसूची के तहत किसी राज्य में आदिवासी बहुल क्षेत्रों को अनुसूचित क्षेत्र के रूप में चिन्हित कर उनके आर्थिक व सांस्कृतिक बेहतरी के लिए विशेष नीतियों को लागू करने का प्रावधान है। साथ, अगर आवश्यकता हो तो केंद्र या राज्य के क़ानूनों के प्रभाव को भी इन क्षेत्रों में सीमित किया जा सकता है। अनुसूचित क्षेत्रों वाले हर राज्य में एक जनजातीय परामर्श परिषद (Tribal Advisory Council) भी बनाई जाती है, जिसका कार्य राज्य के गवर्नर को आदिवासियों के विकास संबंधी सुझाव देना है। पाँचवी अनुसूची के प्रावधान का आधार जनसंख्या ही है। ठीक इसी तरह, आरक्षण या ट्राइबल सब-प्लान के तहत आवंटित केंद्रीय फंड का आधार भी जनसंख्या है। पिछले कुछ वर्षों में वैसे दावे तीखे हो चले हैं जिसके तहत कुछ क्षेत्रों, जहां आदिवासियों की संख्या में कमी आई है, को अनुसूचित क्षेत्र के दायरे से हटाने की मांग रखी जा रही है। इस संदर्भ में आदिवासी हितों को देखने पर जनगणना का मुद्दा काफी महत्वपूर्ण नज़र आने लगता है।

हम यहाँ कुछ देर रुक कर इस बात पर गौर कर सकते हैं कि किस तरह जनगणना की पूरी प्रक्रिया असल में कभी निष्पक्ष हो ही नहीं सकती। लोकतन्त्र, जहां संख्या ही राजनीतिक भाग्य को निर्धारित करती है, वहाँ जनगणना द्वारा जुटाए गए आंकड़े काफी संवेदनशील हो जाते हैं। जनगणना की पूरी प्रक्रिया में आंकड़े इकट्ठा करने, उन्हें विश्लेषित करने तथा अंततः उन्हें सार्वजनिक करने, जैसे हर कदम में राजनीति अहम भूमिका निभाती है। जनगणना आबादी की विभिन्न श्रेणियों को सृजित और परिभाषित करने का काम करती है; जनसंख्या संबंधी हमारा ज्ञान भी जनगणना ही तैयार करती है। यह देखा गया है कि इन श्रेणियों के सृजन और ज्ञान के उत्पादन की प्रक्रिया राज्य के हितों द्वारा निर्धारित होती चली आयीं हैं। आदिवासियों के संदर्भ में भारतीय राज्य द्वारा उनकी ऐतिहासिक पहचान मिटाने व उन्हें मुख्यधारा में शामिल किए जाने की सजग योजना का लंबा इतिहास रहा है। और इस योजना में जनगणना काफी सहायक सिद्ध हुई है। मेहर सिंह गिल (2007) ने अपने अध्ययन में जनगणना संबंधी तीन पद्धतियों का जिक्र किया है जिसका उपयोग कर शासक वर्ग द्वारा किसी समुदाय की प्रत्यक्षता को बढ़ाया या घटाया जाता रहा है:

पहला, गणना के श्रेणियों का इस प्रकार चुनाव करना कि जनसंख्या के वैसे पहलूओं को ही जगह मिले जो शासन करने वाले राजनीतिक वर्ग के हितों से मेल खाता हो। दूसरा, मुख्यधारा के राजनीतिक समुदायों के विभिन्न सामाजिक-आर्थिक व जनसंख्या संबंधी गुणों पर अधिक आंकड़े देना तथा उन पर चर्चा को ज्यादा जगह देना… तीसरा, जनगणना और प्रशासनिक क्षेत्रों को इस तरह बांटना कि कुछ लोगों की सघनता विभिन्न तरीकों से विभाजित हो जाए। भारत में जनगणना संबंधी आंकड़े इकट्ठा करने के दौरान इन तीनों प्रणालियों के उपयोग का पता चलता है।

भारतीय राज्य द्वारा आदिवासियों की प्रत्यक्षता को घटाने में इन तीनों के साथ अन्य तरीकों का इस्तेमाल किया गया है – “आदिम धर्म” के बदले “अन्य” जैसे वर्ग का सृजन तथा 2021 की जनगणना में “अन्य” वर्ग को भी हटाए जाने की आशंका (जैसा आदिवासी कार्यकर्ता दावा कर रहे हैं) जैसे कदमों का असल उद्देश्य आदिवासियों को एक विशेष समुदाय के रूप में क्रमशः अदृश्य करते जाना है। यह सभी तरीके कारगर भी साबित हो रहे हैं, क्योंकि जनगणना में आदिवासियों के प्रतिशत में लगातार कमी देखी जा रही है। पिछले आठ दशकों में आदिवासी जनसंख्या 38.03% से वर्ष 2011 में 26.02% रह गयी है। अगर हम गैर-आदिवासियों से आदिवासी जनसंख्या की दशकीय वृद्धि दर की तुलना करें, तो पाते हैं कि जहां 1931-41 में आदिवासी व गैर-आदिवासी जनसंख्या की वृद्धि दर क्रमशः 13.76% व 11.13% थी, वहीं 1991-2001 में यह क्रमशः 17.19% व 26.65% रही। इस तरह तुलनात्मक दृष्टि से अगर हम देखें तो आदिवासी जनसंख्या की वृद्धि दर गैर-आदिवासियों के बनिस्पत घटने की दिशा में है। इस घटती दर के कई कारक हो सकते हैं, पर जनगणना की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता है। सरना धर्म कोड की मांग को इसी संदर्भ में देखे जाने की ज़रूरत है। एक पृथक समुदाय के रूप में आदिवासियों का अस्तित्व, जोकि संवैधानिक अधिकारों का आधार बनता है, अंततः, जनगणना पर टिका है। और इसलिए धर्म, जो आदिवासियों को गैर-आदिवासियों से अलग चिन्हित करने में एक महत्वपूर्ण मानक है, विवादास्पद बना हुआ है।

संघ की राजनीति व आदिवासियों की धार्मिक पहचान

औपनिवेशिक काल में भारत की विविध आबादी को स्पष्ट खांचे में बांटने की लंबी प्रक्रिया चली थी और इसमें आदिवासी समुदाय को सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा। उनकी पहचान को परिभाषित करने वाले मापदण्डों को अस्पष्ट रखा गया और वे वर्तमान में भी वैसे ही अनिश्चित छोड़ दिये गए हैं। यह अनिश्चितता अगर सबसे ज्यादा किसी के हित में काम करती है तो वह है दक्षिणपंथी हिन्दू राजनीति। “वृहत” हिन्दू धर्म की अवधारणा कई विरोधाभासी तत्वों को एकीकृत कर समेटे हुए है, और इसलिए इसे आदिवासी धार्मिक परम्पराओं को “हिन्दू” कहने में कोई दिक्कत नहीं होती। आदिवासी पहचान के लिए तब यह गंभीर खतरा बन जाती है।

हम जानते हैं कि आदिवासी समुदाय ऐतिहासिक तौर पर हिन्दू तथा ईसाई, दोनों धर्मों के संपर्क में रहे हैं। हम यह भी जानते हैं की आदिवासियों में कई हिन्दू हैं और कई ईसाई भी; साथ वैसे भी आदिवासी हैं जो अपने पारंपरिक धर्मों को मानते हैं। आदिवासियों से संपर्क बनाने की दृष्टि से हिन्दू धर्म तथा ईसाई धर्म में कुछ महत्वपूर्ण अंतर हैं। पहला, जहां ईसाई धर्म में परिवर्तन एक औपचारिक कदम है जो एक बार में सम्पन्न हो जाता है, वहीं आदिवासियों के हिन्दू धर्म में परिवर्तन की कोई औपचारिक रस्म नहीं होती, बल्कि ऐतिहासिक तौर पर यह देखा गया है कि हिंदुकरण की यह प्रक्रिया काफी लंबी होती है। इसी क्रमिकता के कारण, असल में, हिन्दू धर्म को एक धर्मांतरण करने वाले धर्म के रूप में नहीं देखा जाता है। और इसलिए हिन्दू धर्म अपनाने वाले आदिवासियों के लिए धर्म-परिवर्तन शब्द के बदले “समावेश”, “एकीकरण” या “संस्कृतिकरण” (sanskritization) जैसे शब्दों का प्रयोग किया जाता है। साथ ही, ईसाई धर्म से भिन्न, हिन्दू धर्म में क्रमशः परिवर्तन के लिए कोई मध्यस्थ या पादरी जैसे किसी व्यक्ति की भी आवश्यकता नहीं पड़ती, इसलिए आम तौर पर हिंदुकरण की पूरी प्रक्रिया को प्राकृतिक या स्वाभाविक मान लिया जाता है। ईसाई धर्मांतरण से जोड़े जाने वाले विचार, जैसे “धर्म/ संस्कृति को खतरा”, “लालच देना/ फुसलाना”, “धोखा/ कपट” इत्यादि को, इसलिए, हिन्दू धर्मांतरण से जोड़ने की बात भी नहीं उठाई जाती। इसी “स्वाभाविकता” के कारण हिन्दू धर्म की “निर्दोष” छवि को प्रचारित करना आसान भी हो जाता है। दूसरे, ईसाई धर्म में परिवर्तन मुख्यतः पूजा-पाठ और जीवन-पद्धति में बदलाव तक सीमित रहता है; ईसाई बनने वाला आदिवासी अपने समुदाय का अंग बना रहता है। पर, हिन्दू धर्म में परिवर्तन से हिन्दू जाति-व्यवस्था का क्रमशः हिस्सा बन जाने की संभावना बनी रहती है और इतिहास में ऐसे कई उदाहरण मिलते हैं जब आदिवासी समुदाय हिंदुकरण की प्रक्रिया से गुज़र कर अंततः एक जाति बन गए हैं। इसका असल अर्थ होता है अपनी जनजातीय पहचान को खोना, अपनी आदिवासियत को त्यागना। यहाँ यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि संघ की भाषा में इसे “घर-वापसी” कहा जाता है, यानी वैसे लोग जो हिन्दू धर्म के पथ से भ्रमित हो गए थे उनका दोबारा हिन्दू धर्म में आ जाना। शुद्धि आंदोलन इसी विचार पर आधारित था। यह एक ऐसा खतरनाक विचार है जो सभी आदिवासियों को मूल रूप से हिन्दू मानता है, और किसी और धर्म में उनके परिवर्तन को अस्वाभाविक करार देता है। आदिवासियों के विरुद्ध हिन्दुत्व के एजेंडे को इसी परिप्रेक्ष्य में अवस्थित कर समझने की आवश्यकता है। हिन्दुत्व द्वारा बुना गया यह पूरा आख्यान, असल में, उनके द्वारा हिंदुकरण के सजग प्रयासों को अप्रत्यक्ष बना देता है, और “प्राकृतिक” भी; साथ ही साथ हिन्दुत्व का वोट बैंक भी फलता-फूलता जाता है।

यहाँ यह बताना उचित होगा कि अपनी तमाम “स्वाभाविकता” के दावों के बावजूद आदिवासियों के हिंदुकरण में हमेशा से सक्रिय एजेंटों ने भूमिका निभाई है। प्राचीन व मध्यकाल में ब्राह्मण पुजारी हुआ करते थे, आधुनिक काल में आर्य समाज या अन्य धर्म-सुधार हिंदुवादी संगठनों ने यह भूमिका बखूबी निभाई। परंतु, यह सभी कोशिशें बिखरी हुई व असंगठित थी। हिन्दुत्व की बढ़ती शक्ति के साथ ये सभी प्रयास संघ परिवार की वृहत छत्रछाया के भीतर संगठित हो चुके हैं और वनवासी कल्याण आश्रम, एकल विद्यालय, जैसे अभियानों द्वारा अब ये ज़मीन पर अधिक प्रभावी तरीके से काम कर पा रहे हैं। आज के दौर में संघ का यह संगठित, अनुशासित और योजनाबद्ध अभियान दुर्जेय शक्ति बन चुका है और इसके तीक्ष्ण प्रभाव अब प्रत्यक्ष नज़र आते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कई आदिवासी भी संघ के इस एजेंडे के निष्ठावान स्वयंसेवक बनकर काम कर रहे हैं।

यह पूरा एजेंडा पूर्णतः रूढ़िवादी है। यह इतिहास के तर्क को समझना नहीं चाहता और ऐसे दलील सामने रखता है जो हास्यास्पद रूप से बेतुके होते हैं। लेकिन इस तर्कशून्यता पर इस रूढ़िवादी राजनीति की इमारत टिकी हुई है। वे आदिवासी पहचान की कल्पना हिन्दू धर्म के वृहत आख्यान के भीतर ही करना चाहते हैं और अगर कोई इस तर्क के खिलाफ जाता हो, तो उसे “भारतीय संस्कृति और अखंडता पर खतरे” जैसे भावुक मुद्दों से जोड़ दिया जाता है। इस प्रतिक्रियावादी सोच के द्वारा जो सबसे बड़ा “दुश्मन” तैयार किया गया है, वह है ईसाई धर्म और उससे जुड़े धर्मांतरण कार्य। 2003 में उड़ीसा के आस्ट्रेलियाई ईसाई मिशनरी, ग्राहम स्टेंस और उनके दो बेटों को बजरंग दल द्वारा ज़िंदा जलाया जाना तथा झारखंड की पूर्ववती बी.जे.पी सरकार द्वारा 2017 में धार्मिक स्वतन्त्रता अधिनियम का पारित किया जाना, जिसके तहत कई ईसाई मिशनरियों की गिरफ्तारी हुई, इसी प्रतिगामी राजनीति की कुछ झलकियाँ मात्र हैं।

यहाँ यह उल्लेखनीय है कि आदिवासियों के संदर्भ में इस रूढ़िवादी विचारधारा पर केवल संघ परिवार का एकाधिकार नहीं रहा है। पिछले कुछेक दशकों से ही उन्होने इस राजनीति को अपना बना लिया है। असल में, आज़ादी के बाद से भारतीय राज्य, तथा आज़ादी के पहले कांग्रेस नेताओं ने भी आदिवासियों के प्रति एक पितृवत रवैय्या अपनाया था तथा उस दौर में सबसे प्रचलित व प्रभावी विचार था आदिवासियों के मुख्यधारा (हिन्दू समाज) में क्रमशः विलय को स्वाभाविक मानना। जनगणना व शब्दावली की तमाम राजनीति, जिसकी चर्चा पिछले खंड में की गयी है, तथा जिसने आदिवासियत के स्वतंत्र अस्तित्व को नकारा, उस दौर में खेली जा रही थीं जब सत्ता की कमान कांग्रेस पार्टी के हाथों में थी। अतः यह कहना अनुचित होगा कि इस प्रतिक्रियावादी राजनीति से मात्र संघ परिवार का सरोकार रहा है। संघ द्वारा इस राजनीति को केवल बेहिचक, बिना कोई सम्झौता किए और पूरी बेशर्मी के साथ खेला जा रहा है।

संघ का यही बेशर्मी भरा रवैय्या है जो खुलकर यह घोषणा करता है कि “आदिवासी हिन्दू हैं”। समय-समय पर आरएसएस और बीजेपी के नेताओं ने ऐसे बयान जारी किए हैं। वैसे कुछ बयानों को एक बार देखना उचित होगा ताकि उनके बेतुकेपन और धृष्टता का सही अनुमान लगाया जा सके। 2018 में आर.एस.एस प्रमुख मोहन भागवत ने छत्तीसगढ़ की एक रैली में कहा था:

जब हम आदिवासी कहते हैं, तो यही हमारी असल पहचान है। हम उन्हीं की संतान हैं… हमें अलग-अलग छवि दिखती है, पर चालीस हज़ार वर्षों से हमारे पूर्वज एक ही थे… अफगानिस्तान से बर्मा और चीन में तिब्बत की पहाड़ियों से दक्षिण में श्रीलंका तक, लोगों के डीएनए बताते हैं कि उनके पूर्वज एक ही थे… यही वह चीज़ है जो हमें जोड़ती है।

मई 2019 में झारखंड के दुमका जिले में एक आर.एस.एस कार्यकर्ता ने जागरूकता अभियान में गाँव के आदिवासियों से निम्नलिखित बात कही थी:

क्या तुम अपनी माँ, जिसने नौ महीने के कष्ट के बाद तुम्हें जन्म दिया है, को छोड़ सकोगे? फिर तुम अपनी हिन्दू माँ को त्याग कर ईसाई धर्म में क्यों परिवर्तित होते हो? हम हिन्दू हैं, इस पहचान को हमें बनाए रखना है।

जमीनी स्तर पर संघ के संगठनों द्वारा लगातार आदिवासियों को इसी तरह की बातों से वैचारिक स्तर पर बहकाया जा रहा है। यही वैचारिक बदलाव “घर-वापसी” के कार्यक्रमों की बुनियाद बनती है। इसके कई उदाहरण हाल के दिनों में देखने को मिले हैं। जनवरी 2019 में त्रिपुरा के आदिवासी समुदाय के 96 ईसाईयों को हिन्दू जागरण मंच व विश्व हिन्दू परिषद द्वारा हिन्दू धर्म में परिवर्तित किया गया। 2015 में पश्चिम बंगाल के रामपुरहाट में 100 आदिवासी ईसाईयों ने हिन्दू धर्म अपनाया। ठीक इसी तरह 2014 में विश्व हिन्दू परिषद ने दक्षिण गुजरात में 100 ईसाई आदिवासियों को घर वापसी अभियान के तहत हिन्दू बनाया। उत्तर प्रदेश से ऐसे “घर-वापसी” अभियानों के कई घटनाओं की रिपोर्टिंग हुई है। इन धर्म परिवर्तनों के पीछे लंबे समय तक जोरदार अभियान चलाए जाते हैं जिसके तहत आदिवासियों को वैचारिक दृष्टि से हिन्दू रीति-रिवाजों के नजदीक लाया जाता है। आदिवासी और हिन्दू धर्म के बीच समानताएँ खोजी जाती हैं, आदिवासी देवी देवताओं को हिन्दू आकार दिया जाता है और आदिवासी पर्व-त्योहारों के दिन ब्राह्मणवादी हिन्दू अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इसके अलावा एकल विद्यालय जैसे स्कूलों के द्वारा आदिवासी बच्चों के सरल मस्तिष्क को भ्रमित भी किया जाता है।

हाल के दिनों में आदिवासियों ने इन प्रयासों के पीछे छिपी असल मानसिकता को पहचाना है तथा उनके बीच का एक हिस्सा अब काफी मुखर हो गया है। पिछले कुछ वर्षों में अलग-अलग स्थानों पर इस तरह की आदिवासी लामबन्दियाँ देखी जा रही हैं। महाराष्ट्र के रायगढ़ में 2017 में दस पंचायतों के आदिवासी समुदायों ने दुर्गा पूजा नहीं मनाए जाने व रावण का पुतला दहन न करने का निर्णय लिया। आदिवासी मूलनिवासी नामक एक संगठन ने पहली बार दुर्गा पूजा मनाए जाने के खिलाफ एफ़आईआर दर्ज़ कराई क्योंकि उनका मानना था कि यह उनके पूजनीय महिसासुर का अपमान था। इस तरह के उदाहरण आदिवासियों में बढ़ती आत्म-चेतना को प्रतिबिम्बित करते हैं। ये सांकेतिक कदम, असल में, गैर-आदिवासियों को यह बताने के प्रयास हैं कि मुख्यधारा के देवी-देवताओं की संकल्पना करने के अन्य तरीके भी हो सकते हैं तथा यह भी, कि अतीत का वही एक संस्करण नहीं जो मुख्यधारा ने परोसा है।

2006 में कुछ इसी तरह की गतिविधियां आदिवासियों के बीच देखी गईं जो कहीं अधिक सचेत, मुखर और संगठित थी। छतीसगढ़, उड़ीसा, झारखंड और पश्चिम बंगाल से करीब पचास हज़ार आदिवासी एक चार-दिवसीय सम्मेलन के लिए झारखंड के लातेहार जिले में इकट्ठा हुए। इस सम्मेलन को आदिवासियों की सबसे ऊंची सभा, बिसु-सेंदरा, माना गया। उन्होंने आदिवासियों के हिंदुकरण का स्पष्ट शब्दों में विरोध किया। हिन्दू पुजारियों द्वारा आदिवासी शादियाँ व धार्मिक अनुष्ठान करवाने के विरुद्ध निषेध जारी किए गए। बिसु-सेंदरा के संयोजक बेओकुमार धान ने बताया कि हाल के दिनों में “सरना माता” नामक देवी के चित्र व मूर्तियों को आदिवासियों के बीच बांटा गया है और कई आदिवासी घरों में इनकी पूजा की जा रही है। सरना माता के गानों के केसेट भी वितरित किए गए हैं। इस सम्मेलन में वैसे आदिवासी पुजारियों को सज़ा देने की बात की गयी जो इस तरह के गाने बजाते हों और हिन्दू पुजारियों द्वारा आयोजित विवाहों को रद्द करने का निर्णय भी लिया गया।

आदिवासियों की यह मुखरता सरना धर्म कोड के प्रश्न पर अब कहीं ज्यादा स्पष्ट और तेज़ हो गयी है। “आदिवासी हिन्दू नहीं हैं” के दावे लगातार आदिवासियों के बीच स्वीकृति बना रहे हैं। सरना कोड के प्रस्ताव का झारखंड विधान सभा में पारित किया जाना इसी मुखरता और आत्म-चेतना की परिणति ही है।           

आदिवासी धर्मों को जनगणना में शामिल किए जाने की मांग कोई नयी बात नहीं है। बल्कि 1950 के दशक में संताल आदिवासी अपने धर्म, जिसे उन्होंने “सरी धर्म” का नाम दिया था, को 1961 की जनगणना में शामिल किए जाने की मांग उठा चुके हैं। आदिवासियों के एक प्रभावशाली नेता, राम दयाल मुंडा, ने “आदि-धर्म” शब्द को प्रचारित किया था। यह एक व्यापक शब्द है जो भारत के सभी आदिवासी धर्मों को एकीकृत पहचान दिलाने के लिए प्रयोग किया जाता है। मुंडा जैसे नेताओं ने आदिवासियों को हिन्दू तौर-तरीके छोडने का आह्वान किया। इन कदमों ने आदिवासियों को अपनी पहचान से गहरा रिश्ता बनाने में मदद की; साथ अपने धर्म व संस्कृति में गर्व महसूस करने की प्रेरणा भी दी।

पिछले एक-दो वर्षों में सरना कोड की मांग ने ज़ोर पकड़ लिया है, क्योंकि एक ओर तो अगली जनगणना के दिन नजदीक आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर संघ परिवार द्वारा जनगणना में आदिवासियों को हिन्दू श्रेणी में सूचीबद्ध करवाने के प्रयास भी दृढ़ हो रहे हैं। इस संदर्भ में हाल की कुछ घटनाओं का ज़िक्र आवश्यक है। आर.एस.एस प्रमुख मोहन भागवत इसी जनवरी भोपाल में संघ स्वयंसेवकों से मिले तथा हिंदुओं की “घटती” आबादी पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि इसका एक मुख्य कारण जनगणना में आदिवासियों द्वारा स्वयं को हिन्दू घोषित करना है। स्वयंसेवकों को स्पष्ट निर्देश दिये गए कि वे गाँव-गाँव जाकर आदिवासियों के बीच इस मुद्दे पर जागरूकता फैलाएँ। इस घटना के बाद आदिवासियों और गैर-बीजेपी शासित राज्यों, खासकर मध्य प्रदेश, में खलबली मच गयी। मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री कमल नाथ ने इसे गंभीरता से लेते हुए अपने उच्च अधिकारियों को राज्य के 89 जनजातीय ब्लॉकों में आरएसएस की गतिविधियों पर नज़र रखने को कहा था।

आर.एस.एस और उसके सहयोगी संगठनों ने सरना कोड की मांग को कभी नहीं स्वीकारा और इस संबंध में कोई स्पष्ट बयान देने से भी बचते रहे। पर 2015 में उन्होंने अपनी स्थिति स्पष्ट की और आर.एस.एस सह-सरकार्यवाह, कृष्ण गोपाल, ने बयान जारी किया कि सभी आदिवासी हिन्दू हैं और वे सभी हिन्दू कोड के अंतर्गत आते हैं। आदिवासियों के बढ़ते दबाव में, हालांकि, उन्हें अपना पक्ष बदलना पड़ा और 2019 के झारखंड विधान सभा चुनाव के ठीक पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री, बीजेपी के रघुबर दास, ने सरना कोड का वायदा भी कर डाला। इस बार, लेकिन, झारखंड के आदिवासियों ने बीजेपी पर भरोसा करने से इनकार कर दिया और विधान सभा चुनावों में बीजेपी की हार हुई। नवनियुक्त झारखंड मुक्ति मोर्चे की सरकार ने कार्यकाल के एक वर्ष के भीतर ही सरना कोड बिल का प्रस्ताव पास कर अपना चुनावी वायदा पूरा कर दिया।

सरना धर्म कोड और कॉर्पोरेट के मंसूबे 

अब तक की चर्चा, जोकि धर्म, राजनीति और आदिवासी अस्मिता के इर्द-गिर्द घूमती रही, वास्तविक कहानी और असल उद्देश्यों को उजागर नहीं करती। सरना धर्म कोड का प्रश्न कॉर्पोरेट के मंसूबों से गहराई से जुड़ा है। इसी गहरे संबंध को इस भाग में स्पष्ट करने की कोशिश की जाएगी। इसे बेहतर समझने के लिए पिछले कुछ वर्षों की झारखंड की राजनीति का संक्षिप्त अध्ययन ज़रूरी है जब बी.जे.पी नेतृत्व में झारखंड सरकार पूँजीपतियों के साथ मिलकर आदिवासी ज़मीनों को लूटने की योजनाएँ बना रही थी।

झारखंड के एक बड़े भूभाग को पाँचवी अनुसूची के तहत अनुसूचित क्षेत्र की श्रेणी में रखा गया है। 2007 की एक अधिसूचना द्वारा झारखंड के 13 जिलों, दो जिलों के तीन ब्लॉक और एक जिले की दो पंचायतों को अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है। पाँचवी अनुसूची ने स्पष्ट शब्दों में आदिवासियों की ज़मीन के हस्तांतरण को सीमित करने व रोकने संबंधी निर्देश दिये हैं। इन निर्देशों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों छोटानागपुर टेनेन्सि एक्ट (CNT Act), 1908 व संताल परगना टेनेन्सि एक्ट (SPT Act), 1949 द्वारा प्रशासित हैं। CNT Act उत्तरी छोटानागपुर, दक्षिणी छोटानागपुर व पलामू डिवीजनों में, तथा SPT Act झारखंड के संताल परगना डिवीज़न में लागू है। एसपीटी कानून कुछ अपवादों को छोडकर, आदिवासियों की ज़मीन के हर प्रकार के हस्तांतरण को वर्जित करता है। वहीं, सीएनटी एक्ट, जो एसपीटी की तुलना में कम कठोर है, एक ही पुलिस स्टेशन के क्षेत्र में रहने वाले आदिवासियों व एक ही जिले के भीतर रहने वाले दलितों के बीच जमीन के हस्तांतरण की अनुमति देता है।

मई 2016 में झारखंड की बीजेपी सरकार ने अध्यादेश जारी कर सीएनटी व एसपीटी एक्ट में कुछ बड़े बदलाव किए तथा नवंबर 2016 में इन संशोधनों वाले बिलों को विधान सभा में पारित करवा दिया। इन संशोधनों द्वारा सीएनटी व एसपीटी क़ानूनों को कमजोर कर ज़मीन बेदखली को आसान किया गया ताकि कॉर्पोरेट की लूट को सुगम बनाया जा सके। तत्कालीन मुख्यमंत्री पूँजीपतियों को आकर्षित व तुष्ट करने के लिए लगातार भारत के प्रमुख शहरों में रोड शो (Road Show) कर रहे थे तथा 2015 में उन्होंने “मोमेंटम झारखंड” का लोकार्पण करते हुए यह घोषणा की थी कि “भूमि अधिग्रहण हमारे लिए कभी चुनौती नहीं रही है तथा हमारे पास 1,75,000 एकड़ का भूमि बैंक मौजूद है, जोकि हमारे राज्य में विभिन्न कारखानों द्वारा अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए तुरंत उपलब्ध है”। यह समझ पाना मुश्किल नहीं कि इन संशोधनों को इसलिए लाया गया ताकि कॉर्पोरेट घराने मुख्यमंत्री के इन वायदों के प्रति आश्वस्त हो सकें; उन्हें यह संतोष हो कि आदिवासी ज़मीन के इस्तेमाल संबंधी तमाम वैधानिक बधाएँ खत्म कर दी गईं हैं।

राज्य और पूँजीपतियों के बीच के इस साँठ-गांठ को गहराई से समझने के लिए अगर हम कुछ वर्ष और पहले जाएँ तो स्थिति बेहतर स्पष्ट होती है। इन संशोधनों के तार असल में केंद्र में बैठे बीजेपी सरकार की उस वृहत योजना से जाकर जुड़ते थे जिसके तहत पूंजीपतियों के लिए भारतीय संसाधनों के दोहन के रास्ते आसान किए जा रहे थे। मोदी के नेतृत्व में केंद्र की कमान संभालने के साल भर के भीतर ही बीजेपी ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास व पुनर्स्थापना अधिनियम, 2013 को संशोधित करने का काम शुरू कर दिया था। 2015 में एक अध्यादेश जारी कर व्यापक बदलाव किए गए और कॉर्पोरेट घरानों के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को सुगम बनाते हुए हस्तांतरण के लिए आदिवासियों की सहमति और पुनर्वास संबंधी प्रावधानों को हटा दिया गया। परंतु, जब इस कदम का हर तरफ से ज़बरदस्त विरोध किया गया तो अध्यादेश वापस ले लिया गया। केंद्र में हुई इस असफलता को राज्य स्तर पर वैधानिक बदलाव लाकर ही सुधारा जा सकता था। सीएनटी व एसपीटी क़ानूनों में बदलाव, असल में, मोदी की केंद्र में असफलता को दुरुस्त करने के लिए ही लाया गया था। राज्य और पूँजीपतियों के बीच की यह गहरी साँठ-गांठ पहले कभी इतनी स्पष्ट उजागर नहीं हुई थी और ना ही कभी झारखंड के आदिवासियों को पूंजीवादी शोषण के समक्ष इतना निरीह बनाया गया था।

पर, सीएनटी व एसपीटी क़ानूनों में किए गए संशोधन कभी प्रभावी नहीं हो सके। झारखंड के लोगों के कड़े विरोध के कारण इन बिलों पर गवर्नर ने अपनी सहमति कभी दी ही नहीं। बीजेपी की यह बड़ी हार थी; पर इससे भी बड़ी असफलता थी इस मुद्दे पर सरना और ईसाई आदिवासियों की एकजुटता जिस वजह से यह विरोध व्यापक और दृढ़ हो पाया था। असल में चर्च ने आदिवासियों को इस मुद्दे पर संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। यह एकता बी.जे.पी की उस विभाजनकारी राजनीति के लिए करारा झटका थी जिसके तहत आदिवासियों को धार्मिक आधार पर बांटा जा रहा था। ईसाई मिशनरियों की एक बुरी छवि बनाकर उसे लगातार प्रचारित करना बीजेपी की इस राजनीति का महत्वपूर्ण उपकरण रही है। ऐसे सभी प्रयासों को इन संशोधनों की असफलता के बाद हारना पड़ा। इस हार के सुधार के लिए तत्कालीन बीजेपी की झारखंड सरकार ने 2017 में धार्मिक स्वतन्त्रता कानून लाया, जिसके तहत “धोखे व बलपूर्वक” धर्म परिवर्तन को एक गैर ज़मानती अपराध घोषित किया गया। यह स्पष्ट है कि इस एक्ट का प्रमुख उद्देश्य ईसाई मिशनरियों को परेशान करना व उनकी गतिविधियों को बाधित करना है। साथ ही, आदिवासी और इसाइयों के बीच के रिश्तों में बिगाड़ उत्पन्न करने की राजनीति को बढ़ावा देना भी है।

आज जब झारखंड की राजनीति में सरना कोड का प्रश्न प्रधान मुददा बन चुका है, बी.जे.पी फिर से बुरी तरह फंसी हुई नज़र आ रही है। उसके तमाम विरोध और नापसंदगी के बावजूद सरना कोड का प्रस्ताव विधान सभा में पारित हुआ, और मज़े की बात है कि ईसाई मिशनरियों ने इस प्रस्ताव का पूरे हृदय से समर्थन दिया है। सितंबर माह में ही झारखंड के कैथलिक बिशपों ने रांची कैथलिक आर्कडीयोसीज के बैनर तले मुख्यमंत्री को सरना बिल पास करने का सिफारिशी पत्र सौंपा था। इन घटनाक्रमों के बीच वर्तमान में संघ और उसकी सहयोगी बीजेपी के मंसूबे बुरी तरह नाकाम नज़र आ रहे हैं। उनकी अस्मितावादी विभाजनकारी राजनीति, जिसका प्रमुख उद्देश्य असल भौतिक मुद्दों से ध्यान हटाकर पूँजीपतियों के हितों को साधना होता है, आज कम से कम झारखंड में उसकी कलाई खुल चुकी है।    

निष्कर्ष

अब तक की चर्चा यह स्पष्ट करती है कि सरना धर्म कोड आदिवासियों को दीर्घकालिक उपेक्षा और नकार की राजनीति से निकलने का रास्ता देती है। ऐतिहासिक तौर पर इनकी पहचान और आवश्यकताओं को मिटाने के लिए भारतीय राज्य ने लगातार कई सूक्ष्म चालें चली हैं। संघ की राजनीति ने इस पूरी प्रक्रिया को और सशक्त व निर्मम बना दिया है। भारी-भरकम विचार जैसे सांस्कृतिक एकता, साझा इतिहास और राष्ट्रवाद, के नाम पर यह राजनीति चलती आई है। पर इसका असल उद्देश्य आदिवासियों को उनके उन अधिकारों से वंचित करना है जो उन्होंने अंग्रेज़ी और भारतीय सत्ता के विरुद्ध लंबे संघर्षों द्वारा हासिल की है। यह राजनीति, अंततः, उन पूँजीपतियों के हितों को साधती आई है जो आदिवासी ज़मीन और जंगल पर अपनी बुरी नज़र लगाए बैठे हैं। आदिवासी के रूप में जो उनकी विशिष्ट ऐतिहासिक पहचान है, अगर वह मिटती है – चाहे जनगणना में उनकी संख्या में कमी के कारण या उनके हिंदुकरण की वजह से – तो ज़मीन की बेदखली और हस्तांतरण के खिलाफ जो संवैधानिक और वैधानिक सुरक्षा उन्हें मिली है, वे क्रमशः अर्थहीन बन जाएंगे। और इस तरह आदिवासी क्षेत्रों में पूँजीपतियों की लूट का रास्ता सुगम हो जाएगा। यहाँ यह याद रखा जाना चाहिए कि इस सूक्ष्म राजनीति के अलावा पूंजीपति और राज्य ने इस लूट के लिए अन्य रास्ते भी ढूँढे हैं और वे क्रूरता के साथ लागू भी किए जा रहे हैं। जहां ज़रूरत पड़ी है, उन्होंने हिंसा और गैर-कानूनी तरीकों का इस्तेमाल कर आदिवासियों की ज़मीनें छीनी हैं और यह सब राष्ट्रीय सुरक्षा और नक्सलवाद से लड़ने के नाम पर हुआ है । झारखंड, छतीसगढ़, पश्चिम बंगाल और अन्य आदिवासी इलाकों में आए दिन यू.ए.पी.ए (Unlawful Activities Prevention Act) के तहत हो रही गिरफ्तारियाँ, रोज़ की हत्याएँ, पुलिस एंकाउंटर, इत्यादि, इसी उद्देश्य से की जा रही हैं।

राज्य की असंवेदनशीलता और पूँजीपतियों की मार के खिलाफ सरना धर्म कोड आदिवासियों के लिए विरोध का एक सशक्त माध्यम बन कर उभरी है। इस मांग की जो महत्ता है उससे इंकार नहीं किया जा सकता, पर साथ यह भी समझना होगा कि अगर यह मांग पूरी भी कर दी जाती है, तो यह मात्र एक वैधानिक सुरक्षा ही होगी। यह बताने की ज़रूरत नहीं कि शासक वर्गों द्वारा अपने हित के लिए क़ानूनों का इस्तेमाल करने और उन्हीं क़ानूनों की धार को कम कर देने का लंबा इतिहास रहा है। इसलिए, आज के दौर में ज़रूरत है कि उपेक्षा और बेदखली जैसे असल भौतिक मुद्दों के लिए आम आदिवासी लामबंद हों और वर्तमान व्यवस्था के खिलाफ लंबी जंग छेड़ें। यह भी समझना होगा कि यह तब ही मुमकिन है जब आदिवासी समुदाय हाशिये पर खड़े अन्य समुदायों के साथ एक व्यापक मंच बनाए और अपने असल दुश्मन यानी पूंजीवादी तंत्र को ढहाने के साझा उद्देश्य के साथ आंदोलनरत हों।

पूंजीवाद एक ऐसा तंत्र है जिसका एकमात्र उद्देश्य पूंजी और लाभ में वृद्धि करना है। अतः, प्राकृतिक संसाधनों का निर्मम दोहन पूंजीवाद के अस्तित्व की एक आवश्यक शर्त है। इन सब में राज्य आर्थिक रूप से प्रभावशाली वर्गों के हितों को साधने की भूमिका निभाता है; वर्तमान पूंजीवादी संरचना में यह प्रभावशाली वर्ग पूँजीपतियों का है। आदिवासियों की कुछ तात्कालिक मांगों को राज्य मान भी लेता है, तो पूंजीवादी शोषण को बनाए रखने के औज़ार के रूप में उसका असल चरित्र नहीं बदल जाता। इस शोषण को बनाए रखने और तीक्ष्ण करने के नए तरीके और बहाने खोजे जाएंगे। इस बात को आदिवासियों से बेहतर कौन समझते होंगे, जिन्होंने धोखे के लंबे इतिहास को झेला है। इसलिए आदिवासी, जो खुद सर्वहारा बन चुके हैं, उन्हें सबसे पहले अपनी वर्तमान परिस्थितियों के भौतिक आधार को पहचानना होगा। उन्हें यह समझना होगा कि वर्तमान परिस्थितियों से निकलने का रास्ता एक ऐसी  दुनिया को रचने में हैं जिसमें वर्ग-विभेद ना हों, जो लाभ के लिए नहीं बल्कि सर्वहारा के हितों के लिए काम करता हो, जहां राज्य जैसे तंत्र कि ज़रूरत क्रमशः खत्म होती चली जाए और जो सही मायने में लोकतान्त्रिक अधिकारों की पूर्ति करे। यह दुनिया असल में आदिवासियों की पुरातन समतामूलक-साम्यवादी व्यवस्था को ही प्रतिबिम्बित करता है। मार्क्सवादी शब्दावली में इस दुनिया को “समाजवाद” कहा जाता है। आज समय की मांग है कि आदिवासी खुद को अन्य सर्वहारा साथियों से जोड़ें और समाजवादी क्रान्ति के आंदोलन का हिस्सा बन जाएँ।

[यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 8 / दिसंबर 2020) में छपा था]

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