पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिसूचना 2020 पर्यावरण के लिए विनाशकारी है

एस. वी. सिंह //

केंद्र सरकार के ‘पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय’ ने दिनांक 11 अप्रैल 2020 को ‘पर्यावरण संरक्षण नियम, 1986 की धारा 5 (3) के तहत जन प्रतिक्रिया जानने के लिए आवश्यक 60 दिन का समय देते हुए ‘पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिसूचना 2020’ जारी की। उक्त कानून के तहत अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए जनता को दिए 60 दिन की शुरुआत उस दिन से होती है जब अधिसूचना सम्बंधित गजेट में प्रकाशित होती है। मंत्रालय ने, प्रकाशित सूचना में स्वयं ही माना कि उक्त अधिसूचना प्रकाशन के लिए 23 मार्च को ज़ारी हो गई थी लेकिन कोरोना महामारी और लॉक डाउन के चलते अधिसूचना वास्तव में 11 अप्रैल को ही प्रकाशित हो पाई। वन संरक्षण कानून 1986 के तहत एवं सुप्रीम कोर्ट के अनेकों फैसलों के मुताबिक, कोई भी नया उद्योग या प्रोजेक्ट लगाते वक़्त अथवा वर्त्तमान उद्योग-प्रोजेक्ट का विस्तार करने से पहले उद्योगपति अथवा प्रोजेक्ट प्रोमोटर को उस उद्योग द्वारा पर्यावरण का प्रदूषण एवं आसपास रहने वाले लोगों के जीवन पर होने वाले संभावित दुष्प्रभावों की विस्तृत समीक्षा करके एक रिपोर्ट बनानी होती है और फिर उस रिपोर्ट को आम जनता की राय-प्रतिक्रिया जानने के लिए 60 दिन का समय देना होता है। मोदी सरकार, दरअसल, ‘पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिसूचना 2006को बदलना चाहती है और इस बदलाव पर जनता की सहमति लेने के लिए उसने दिनांक 11 अप्रैल को ये अधिसूचना ज़ारी की जिससे जनता को अपनी राय-प्रतिक्रिया के लिए न्यनतम आवश्यक 60 दिन का समय 10 जून 2020 को समाप्त हो जाने वाला था।

अधिसूचना ज़ारी करने का वक़्त ही सरकार की नीयत स्पष्ट कर देता है

‘पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिसूचना 2020’ के तहत सरकार क्या बदलाव लाना चाहती है इसकी विस्तृत जाँच पड़ताल करने से पहले ध्यान इस बात पर जाता है कि इतने गंभीर रूप से जन मानस के जीवन को प्रभावित करने वाले पर्यावरण के मुद्दे पर जनता की राय लेने के लिए सरकार ने वक़्त कौन सा चुना है; 11 अप्रैल!! अभूतपूर्व रूप से भयानक कोरोना महामारी कोविद-19 के चलते 22 मार्च 2020 को देशभर में ‘जनता कर्फ्यू’ लगाया गया और फिर 24 मार्च को रात 12 बजे से सारे देश में सख्त लॉक डाउन लागू कर दिया गया। प्रधानमंत्री रात 8 बजे टी वी पर अवतरित हुए और देश के कुल 135 लोगों से अपने घरों के बाहर एक ‘लक्ष्मण रेखा’ खींच लेने का हुक्म सुनाया और सब लोग अपने घरों में बन्द कर दिए गए। वही स्थिति आज तक लागू है। अत: ऐसे गंभीर मुद्दे पर बहस-डिबेट के लिए और जनमत जानने के लिए 11 अप्रैल से बेहतर, भला, कौन सा वक़्त हो सकता था!! पहले दौर की लॉक डाउन उसके एक दिन पहले यानी 10 अप्रैल को ही समाप्त हुई थी और ख़त्म होने से पहले ही उसे आगे बढ़ा दिया गया था क्योंकि महामारी और भी विकराल होती जा रही थी। मोदी सरकार ‘आपदा में अवसर’ के अपने फोर्मुले को लगता है वाक़ई नई ऊँचाइयों पर ले जा चुकी है, मानो वो जानती है कि ऐसा अवसर फिर कहाँ मिलेगा!! अपनी प्रतिक्रिया देने के लिए उपलब्ध 60 दिन की मुद्दत 10 जून को समाप्त हो गई। सरकारी पाखण्ड, लेकिन, सरकार के अपने बयान से ही सामने आ गया; “अधिसूचना 23 मार्च को प्रकाशित होनी थी लेकिन लॉक डाउन में कर्मचारी कम होने के कारण वह 11 अप्रैल को ही प्रकाशित हो सकी जब इतने संसाधन एवं शक्ति होने के बावजूद सरकार खुद लॉक डाउन की वजह से 19 दिन तक अधिसूचना प्रकाशित नहीं करा पाई तब आम जन मानस, भूखा, बेहाल, मौत के डर से घर में दुबका हुआ, पूरे अधिनियम को पढ़कर, समझकर, अपनी राय उसी लॉक डाउन में 60 दिन में कैसे दर्ज करा सकता है? इसी क्रम में एक और रहस्य उजागर हुआ जिससे साबित होता है कि पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर इन बदलावों पर जैसे तैसे जनता की मुहर लगवाने को कितने उतावले थे। इन्डियन एक्सप्रेस में छपी एक खबर के मुताबिक पर्यावरण मंत्रालय ने महामारी और लॉक डाउन को देखते हुए प्रतिक्रियाएं प्राप्त करने की तिथि 60 दिन बढाकर 10 अगस्त करने की अनुशंसा की थी लेकिन मंत्री महोदय ने उसे मात्र 20 दिन मतलब 30 जून तक बढ़ाने का ही ऐलान किया। ‘आपदा में अवसर’, दरअसल, लोगों की आँखों में धूल झोंकने और उन्हें मूर्ख बनाकर जन विरोधी कानून पास कराने का ही एक पैंतरा है, इस क्रम में ये असलियत लोगों की समझ में आ गई। अगर कोई सरकार देश के दबे कुचले मेहनतक़श अवाम के प्रति थोड़ी भी संवेदनशील है तो समझो वो फासीवादी सरकार नहीं है

लोगों की ज़बरदस्त प्रतिक्रियाएं

सरकार ने योजना तो अपने वर्ग चरित्र के अनुरूप सही बनाई थी कि लोग कोरोना महामारी से डरे हुए हैं, लॉक डाउन के चलते घरों में क़ैद हैं, जाने कितनों के रोज़गार चले गए, कितनों को खाने को नहीं है। ऐसे में कौन पर्यावरण प्रदुषण की तरफ़ ध्यान देगा और जब तक लोगो को ठीक से पता चलेगा 60 दिन की मुद्दत निकल जाएगी और पर्यावरण के विध्वंश को बढ़ाने वाला ये अधिनियम पास हो जाएगा और कॉर्पोरेट आक़ा भी खुश हो जाएँगे!! सरकार बहादुर को, लेकिन, मालूम नहीं था कि सरकारी चालबाज़ी के लिए इस्तेमाल की जा रही ‘आपदा में अवसर’ की स्कीम लोगों की समझ में आ चुकी है और पर्यावरण के विनाश के क्या परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं ये वो अच्छी तरह जानते हैं। कॉर्पोरेट द्वारा प्राकृतिक संसाधनों का निर्बाध बलात्कार जन मानस को स्वीकार नहीं है। 11 अप्रैल को अधिसूचना ज़ारी होने के सिर्फ़ 9 दिन में ही कुल 1190 ई मेल पर्यावरण मंत्रालय को प्राप्त हो चुके थे जिनमें से 46 द्वारा तो सुझाव दिए गए थे लेकिन 1144 ई मेल में एक ही मांग की गई थी; महामारी और लॉक डाउन की वज़ह से प्रतिक्रिया देने की समय सीमा बढाई जाए। मज़बूर होकर सरकार को समय सीमा और 60 दिन बढाकर 10 अगस्त करनी पड़ी। इस विषय पर लोगों की जागरूकता और संवेदनाशीलता इस बात से ज़ाहिर होती है कि 10 अगस्त तक अधिसूचना का विरोध करने के 4000 लिखित पत्र पर्यावरण मंत्रालय को प्राप्त हो चुके हैं। विख्यात पर्यावरणविद विक्रांत तोंगड़ ने दिल्ली उच्च न्यायलय में याचिका दायर कर दी कि पर्यावरण संरक्षण का मुद्दा बहुत ही गंभीर है और कोरोना महामारी की वज़ह से लोगों को अपनी राय देने के लिए और समय मिलना चाहिए। दिल्ली उच्च न्यायलय के मुख्य न्यायाधीश डी एन पटेल और न्यायाधीश प्रतीक जालन की खंड पीठ ने कहा, “इस मुद्दे को पूरा करने की इतनी जल्दी क्यों है? केंद्र सरकार ने इस अस्पष्टता को स्पष्ट क्यों नहीं किया..अभी भी अधिसूचना दस्तावेजों में अंतिम तारीख 30 जून ही क्यों लिखी हुई है? अधिसूचना सिर्फ़ हिन्दी और अंग्रेजी में ही क्यों है? क्या आप इस अधिनियम को क्षेत्रीय भाषाओँ में भी उपलब्ध कराएँगे?” याचिका कर्ता के वकील गोपाल शंकरनारायणन ने इसे सभी भाषाओँ में अनुवाद किए जाने की प्रार्थना कि लेकिन सहायक सिओलिसिटर जनरल ने विरोध करते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। द मिन्ट अखबार में छपी रिपोर्ट के अनुसार 10 अगस्त तक इस अधिनियम के विरोध में जनमानस की ओर से कुल 17 लाख प्रतिक्रियाएं आ चुकी हैं। सरकार भी लेकिन अड़ी हुई है और अभी तक लोगों को प्रतिक्रिया भेजने की समय सीमा 10 अगस्त से आगे बढ़ाने की कोई सूचना घोषित नहीं हुई है। दिल्ली उच्च न्यायलय ने भी इस सम्बन्ध में समय अवधि 10 अगस्त के बाद बढ़ाने के लिए सरकार को हुक्म ज़ारी करने की ज़रूरत नहीं समझी। यही नहीं सरकार ने प्रतिक्रिया भेजने के लिए उपलब्ध ई मेल आई डी (eia2020-moefcc@gov.in) को 10 अगस्त की रात 12 बजे से निष्क्रिय कर दिया है। लोग इसके बाद भी ई मेल भेज रहे हैं लेकिन वे ई मेल ‘पता मौजूद नहीं है’ इस कारण के साथ वापस आ रही हैं।       

 ‘पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिसूचना 2020’ के मुख्य बिन्दु क्या हैं?

इस सूचना को पूरी तरह वापस होने तक इसका पुरजोर विरोध क्यों किया जाना ज़रूरी है?

  1. जन सुनवाई और लोगों को विरोध दर्ज कराने की व्यवस्था का समय कम करना: देश का शायद ही कोई नागरिक इतना भोला हो जो इस सच्चाई को अच्छी तरह ना जानता हो कि पर्यावरण के लिए विध्वंशकारी योजनाएं धन्नासेठ कॉर्पोरेट द्वारा हमारे देश में कैसे मंज़ूर कराई जाती हैं। जिस तरह अर्जुन की नज़र मछली की आँख पर गडी हुई थी, उसे उसके सिवा कुछ नज़र नहीं आ रहा था पूंजीपति की नज़र बिलकुल उसी तरह मुनाफ़े पर गडी होती है उसे भी उसके सिवा कुछ नज़र नहीं आता और उसके लिए उसे कुछ भी करने में कोई गुरेज़ नहीं होता। पर्यावरण मंजूरी मिलने के लिए सबकुछ ‘मैनेज’ हो जाता है। एक मात्र अड़चन आती है खुली जन सुनवाई में। उक्त योजना द्वारा होने वाले संभावित पर्यावरण विनाश का विरोध यहीं से शुरू होता है और यहीं से जन्म लेते हैं उक्त विध्वंशकारी योजनाओं के विरुद्ध प्रखर जन आन्दोलन। मुनाफे के लिए जीभ लपलपाए कॉर्पोरेट और उनकी मैनेजमेंट समिति मतलब सरकार, दोनों इस बात को अच्छी तरह जानते हैं इसलिए इन जन सुनवाइयों को निष्क्रिय एवं प्रभावशून्य बनाना इस प्रस्तावित अधिनियम का मूल मक़सद है। पर्यावरण संरक्षण कानून 1986, रियो घोषणा पत्र के सेक्शन 10 जिस पर भारत ने हस्ताक्षर किए हैं और सुप्रीम कोर्ट के अनेकों फैसलों के मुताबिक पर्यावरण को प्रभावित करने वाली कोई भी परियोजना जन सुनवाई और लोगों को अपनी प्रतिक्रियाएं-आपत्तियां दर्ज कराने के लिए कम से कम 30 दिन दिए बगैर लागू नहीं हो सकतीं। अगर पर्याप्त समय नहीं दिया जाता तो ये ‘न्याय के सार्वभौम नियम’ का उल्लंघन है। लेकिन ऐसे न्याय के सार्वभौम नियमों वाला ज़माना पीछे बहुत छूट चुका! सरकार ने प्रस्तावित अधिसूचना द्वारा इस समय सीमा को 30 दिन से घटाकर 20 दिन करने का फैसला किया है। इसकी वज़ह बताई गई है; ‘योजना को व्यवस्थित करना’। यही नहीं, जन सुनवाई और प्रतिक्रिया देने की प्रक्रिया के लिए कुल समय सीमा को भी 45 दिन से घटाकर 40 दिन करने का प्रस्ताव है। जन सुनवाई का समय कम करने से सरकार कौन सी ‘योजना को व्यवस्थित’ करने वाली है ये रहस्य अब सब लोग जान चुके हैं।
  2. कई परियोजनाओं को जन सुनवाई से मुक्त ही कर देना: ‘पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिसूचना 2020’ के अनुभाग 14 में ऐसी परियोजनाओं की लिस्ट दी हुई है जिनके बारे में लोगों की राय लेने की ज़रूरत ही नहीं है। उदाहरणार्थ; अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्रों में बनने वाली सडकों, पाइप लाइन के प्रोजेक्ट्स। ‘अंतर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र’ की परिभाषा दी गई है; वास्तविक अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सीधी लाइन में 100 किमी तक के क्षेत्र। इसका मतलब हुआ कि हमारे उत्तर पूर्वी 7 राज्य जो जैविक विविधता, वन्य एवं खनिज सम्पदा से लबरेज़ हैं वे तो लगभग सारे के सारे ही इस ‘छूट’ के अन्दर आ जाएँगे क्योंकि वे चीन, म्यांमार तथा बांग्लादेश की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं से घिरे हुए हैं। यही नहीं, अनुभाग 26 में भी कई योजनाएं दी गई हैं जैसे कोयला खदानें, तेल, मीथेन तथा शेल गैस की शोध एवं भूकंप शोध सम्बन्धी सभी योजनाएं। इन्हें भी सुनवाई से मुक्त करने का प्रस्ताव है। लोगों की प्रतिक्रियाएं लेने की प्रक्रिया को कैसे बे-असर किया जाए या उससे बचकर कैसे निकला जाए, इसके बारे में अच्छी तरह शोध किया गया है और वे सभी रास्ते प्रस्तावित अधिनियम में मौजूद हैं। साथ ही ये अधिनियम प्रभावित लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण को पूरी तरह नज़रंदाज़ करने के रास्ते सुझाता है। पर्यावरण को गंभीर रूप से प्रभावित करने वाली कई परियोजनाओं के लिए राष्ट्रीय वन्य जीव बोर्ड की स्टैंडिंग समिति की अनुमति प्राप्त करने के लिए अप्रैल महीने में एकदम कड़े लॉक डाउन के दरम्यान पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने एक ऑन लाइन प्रेस कांफ्रेंस की। ऐसी ही अनेकों परियोजनाओं की मंजूरी का रास्ता खोलने के लिए ही वे इस अधिनियम को पास कराने की जल्दी में हैं।
  3. परियोजना शुरू हो जाने के बाद भी मंजूरी लेने का रास्ता खुला रखा जाने की मन्शा स्पष्ट नज़र आती है: जोपरियोजनाएं पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 के तहत आवश्यक पर्यावरण मंजूरी लिए बगैर ही चल रही हैं उन्हें ये अधिनियम बाद में मंजूरी लेने का रास्ता भी खोलता है। प्रोमोटर ने पर्यावरण समीक्षा रिपोर्ट नहीं बनाई, मंजूरी नहीं ली, कोई बात नहीं, कुछ जुर्माना भरो और मंजूरी मिल जाएगी। हाल के अलेम्बिक फार्मास्युटिकल लिमिटेड बनाम रोहित प्रजापति व अन्य  मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे पर्यावरण मंजूरी लिए बगैर  कारखाने चलाने और बाद में कोई हादसा हो जाने पर पिछली तारीख से मंजूरी लेने के मुद्दे पर सख्ती दिखाई थी। इस सम्बन्ध में कुछ ताज़ा मामले गौर करने लायक़ हैं:
    7 मई को विशाखापटनम में एल जी पॉलीमर प्लांट में गैस रिसाव से भयानक दुर्घटना हुई जिसमें कम से कम 29 मज़दूरों की मौत हुई और कारखाने के आस पास रहने वाले लोग भी बेहोश हो गए थे। पता चला कि उक्त कारखाना लगभग 20 साल से बगैर पर्यावरण मंजूरी के ही चल रहा था
    इसी प्रकार की दूसरी ‘दुर्घटना’ 27 मई को हुई जब पर्यावरण सम्बन्धी शर्तों का पालन ना करने के कारण असम के तिनसुखिया जिले में ऑइल इण्डिया लिमिटेड के प्लांट से गैस रिसी और आग लग गई जिससे जान माल के साथ ही पर्यावरण को भारी नुकसान हुआ। राज्य पर्यावरण बोर्ड असम ने बताया उक्त प्लांट ने कभी भी उनसे अनुमति नहीं ली जबकि वो 15 साल से चल रहा है। ऐसे मनमर्जी कानूनी उल्लंघन पर बोर्ड ने कार्यवाही क्यों नहीं की इस पर बोर्ड चुप्पी साध गया।
    ऐसे हादसे हमारे देश में अक्सर होते रहते हैं। प्रस्तावित अधिनियम में इन पर कठोर कार्यवाही करने की बजाए बचकर निकलने का दरवाज़ा उपलब्ध कराने का उद्देश्य साफ नज़र आता है।
  4. ‘स्वयं-निगरानी’ भी चलेगी और रिपोर्टिंग की अवधि दुगुनी की गई: जो उद्योगपति कड़े पर्यावरण कानूनों को ना मानने, तोड़ मरोड़कर उनसे बचकर निकलने के रास्ते खोजने में पारंगत हैं उन्हें सरकार अपनी परियोजना के पर्यावरण प्रदूषण सम्बन्धी निगरानी खुद कर लेने के लायक़ समझकर उन्हें ये सुविधा देने जा रही है!! ये स्वयं तैयार की गई रिपोर्ट कितनी सच्ची होंगी इसे जानने के लिए कोई विशेषज्ञ होना ज़रूरी नहीं! साथ ही खनन जैसे अहम क्षेत्र में पर्यावरण समीक्षा की रिपोर्टिंग मौजूदा 6 महीने से बढाकर 12 महीने करने को ठीक मानती है। इसका मतलब हुआ कि उनके द्वारा पर्यावरण का सत्यानाश और लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने पर और अधिक दिनों तक कोई कार्यवाही नहीं हो पाएगी।
  5. खनन जैसे अतिसंवेदनशील तथा भारी उद्योगों में पर्यावरण मंजूरी की वैधता बढाई जाएगी: खनन क्षेत्र, जिसमें पर्यावरण की सबसे ज्यादा धज्जियाँ उड़ाई जाती हैं उसमें पर्यावरण की मंजूरी एक बार ले ली तो वो अब मौजूदा 30 साल की जगह 50 साल तक वैध रहेगी। उसी तरह नदी घाटी परियोजनाओं की पर्यावरण मंजूरी की वैधता मौजूदा 10 साल से बढाकर 15 साल किया जा रहा है। इसका मतलब ये हुआ कि एक बार पर्यावरण मंजूरी लेने पर उन शर्तों का खुला उल्लंघन करने पर जैसा कि हमारे देश में आम तौर पर होता है, अब पीढ़ियों तक पता नहीं चल पाया करेगा।
  6. संरक्षित क्षेत्रों को गंभीर ख़तरा: प्रस्तावित अधिनियम में भयानक प्रदूषण फ़ैलाने वाली लाल और संतरी श्रेणी के कारखानों को वन संरक्षित क्षेत्र से मात्र आधा 0.5 किमी दूरी पर ही अनुमति देने की योजना है। इससे निश्चित रूप से संरक्षित वन में जीवों को उपलब्ध पानी ज़हरीला होगा और वनों को इससे गंभीर नुकसान पहुंचना तय है। वन संरक्षणविदों का कहना है कि कौन सा प्लांट कितनी दूरी पर लगाया जाए इसका मूल्यांकन वैज्ञानिक तरीके से किया जाना चाहिए ना की हठधर्मिता और मनमाने ढंग से जैसा कि सरकार प्रस्तावित अधिनियम के ज़रिए करना चाहती है।
  7. बी-2 श्रेणी में लाकर कई भारी उद्योगों को जन सुनवाई से मुक्त करने की तिकड़म:      पर्यावरण समीक्षा रिपोर्ट अधिनियम 2020 में समस्त उद्योगों को उनकी प्रदूषण क्षमताओं को देखते हुए तीन श्रेणियों में नए सिरे से बांटा गया है; ए, बी-1 और बी-2। ए श्रेणी में भारी पूंजी वाली ताप विद्युत् योजनाएं तथा एअरपोर्ट आदि आते हैं जिनसे पर्यावरण पर होने वाला संभावित परिणाम सर्वाधिक हैं और इनकी मंजूरी केंद्र सरकार के पर्यावरण मंत्रालय से ही होगी। इन्हें भी आगे प्रदूषण ख़तरे को देखते हुए रेड तथा ऑरेंज श्रेणियों में विभाजित किया गया है; रेड श्रेणी मतलब सबसे भयानक और ऑरेंज उससे कुछ कम खतरनाक। बी-1 श्रेणी की परियोजनाएं पर्यावरण को उससे कम प्रभावित करने वालीं और बी-2 श्रेणी की उससे भी कम प्रदूषण की आशंका वाली परियोजनाएं आती हैं। बी-1 परियोजनाओं की पर्यावरण सम्बन्धी मंजूरी के लिए सम्बंधित राज्य के पर्यावरण नियंत्रण बोर्ड सक्षम होंगे। बी-2 श्रेणी की कुछ परियोजनाओं की मंजूरी के लिए ज़िला  स्तर के प्रदुषण नियंत्रण बोर्ड-जिला कलेक्टर भी सक्षम होंगे। इसी क्रम में ए श्रेणी की परियोजनाओं के मुकाबले बी-1 और बी-2 को पर्यावरण समीक्षा सम्बन्धी कई शर्तों की बाध्यता नहीं होगी उन्हें पूर्ण समीक्षा रिपोर्ट प्रस्तुत करने की शर्त नहीं होगी। सरकार ने कई परियोजनाओं को ए से बी-1 और बी-1 से बी-2 में धकेल दिया है जिससे पर्यावरण प्रदूषकों को प्रदूषण फ़ैलाने में सुविधा हो!! रेड तथा ऑरेंज श्रेणी वाले भयंकर प्रदूषण फ़ैलाने वाले निम्नलिखित उद्योगों को बी-1 तथा बी-2 श्रेणियों में शिफ्ट कर दिया गया है जिससे उन पर प्रदुषण नियंत्रण में ढील मिल जाए।
  • रसायन व पेट्रोलियम उत्पाद बनाने वाले कारखाने
  • सिंचाई परियोजनाओं का आधुनिकीकरण
  • भवन निर्माण तथा भू विकास
  • अंतर्देशीय जल मार्ग
  • राष्ट्रीय महामार्गों का विस्तार और चौड़ा करना
  • सेना एवं सुरक्षा सम्बन्धी सभी परियोजनाएं
  • ऐसी सभी परियोजनाएं जिन्हें केंद्र सरकार ‘अन्य रणनीतिक महत्त्व’ वाली मानती है
  • समुद्र में 12 नॉटिकल मील से आगे स्थित तेल गैस शोध परियोजनाएं
  • बाँध तथा अक्षय ऊर्जा सम्बन्धी सभी बड़ी योजनाएं।  

पर्यावरण के संभावित प्रदूषण से प्रभावित होने वाले लोगों की प्रतिक्रिया लेने से बचना, ना सिर्फ़ पर्यावरण संरक्षण कानून 1986 का उल्लंघन है, बल्कि पर्यावरण सम्बन्धी अंतर्राष्ट्रीय समझौतों जैसे स्टोकहोम घोशणापत्र 1972, रियो घोषणापत्र 1992 तथा कॉप 25 का भी उल्लंघन है क्योंकि हमारा देश इन सभी समझौतों को मानकर हस्ताक्षर कर चुका है। यही नहीं, प्रस्तावित अधिनियम एक नई श्रेणी, “दूसरे रणनीतिक विचार वाली परियोजनाएं” प्रस्थापित किये जाने की बात करता है। इस श्रेणी की व्याख्या कहीं भी नहीं की गई है। ये अस्पष्टता बे-मक़सद नहीं है। इस श्रेणी में अनेकों परियोजनाओं को जन सुनवाई की अनिवार्यता से बचाया जा सकेगा।

8. “आर्थिक संवेदनशील क्षेत्र” में जन सुनवाई से छूट: सरकार, ऐसा दिखता है, कि प्रदूषण समीक्षा में जन भावनाओं को ज़रा भी सहन करना नहीं चाहती। इस प्रक्रिया से बचने का एक और रास्ता उपलब्ध कराया गया है। ‘आर्थिक संवेदनशील क्षेत्र’ जिन्हें परिभाषित नहीं किया गया है, जन सुनवाई की प्रक्रिया से आज़ाद रहेंगे। इस संवेदनशीलता को सिर्फ़ सरकार जान सकती है!! जनता भी, लेकिन, सब जानती है भले शासक ये बात नहीं जानते!!

9. अधिसूचना का ‘दूसरा भाग’: पर्यावरण मंत्रालय के सचिव आर. पी. गुप्ता ने 14 अगस्त को एक प्रेस कांफ्रेंस में बताया कि प्रस्तावित अधिनियम का दूसरा भाग भी आने वाला है। भले उन्होंने उसका ब्यौरा देने की ज़हमत नहीं उठाई लेकिन उनके जो बाकी बोल-वचन हुए उनसे अंदाज़ लगाना मुश्किल नहीं। उन्होंने फ़रमाया कि यदि कोई कारखाना लग चुका और ठीक ठाक चल रहा है भले प्रोमोटर ने पर्यावरण अनुमति नहीं ली है तो भी उस कारखाने को तो बंद नहीं किया जा सकता ना!! पूरी सरकारी कवायद का मक़सद है कि पर्यावरण कानूनों का उल्लंघन करने पर सेक्शन 15 (1&2) के तहत जो 7 साल तक की सजा का प्रावधान है उसे हटा दिया जाए। कुछ जुर्माना देकर मामले को रफा दफा कर देने की व्यवस्था कायम की जाए। इसी को ‘व्यवसाय करने की सहूलियत’ नाम दिया जा रहा है जिसे मोदी सरकार अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि बता रही है। जो सरमाएदार कारखानेदार 7 साल की सज़ा से ना डरकर पर्यावरण नियमों की ऐसी तैसी करते हैं वे तब क्या हाल करेंगे जब सजा का प्रावधान ही नहीं होगा!!

देश में पर्यावरण प्रदूषण की भयावहता

  1. ज़मीन का पानी ज़हर हो चुका है: उद्योगों से सतत बहते रहने वाले ज़हरीले रसायनों और खेती बाड़ी में अत्यधिक मात्रा, बेरोकटोक और गैरवैज्ञानिक तरीके से प्रयोग होने वाले रासायनिक खाद और कीटनाशकों, जिनमें जाने कितने तो प्रतिबंधित हैं क्योंकि अत्यधिक ज़हरीले हैं, के प्रयोग से ज़मीन का पानी ज़हरीला हो चुका है। इसी का परिणाम है कि गाँव देहात में जहाँ कुछ दिन पहले तक कैंसर जैसी बिमारियों को कोई जानता भी नहीं था, आज हर गाँव में कैंसर रोगी हैं और उससे जान और पैसे की बहुत भयानक हानि हो रही है। पंजाब से बीकानेर राजस्थान तक चलने वाली एक रेलगाड़ी कैंसर एक्सप्रेस के नाम से कुख्यात है। ज़मीन का पानी, कई इलाकों में जो उद्योग क्षेत्रों के नज़दीक हैं, इस हद तक ज़हरीला हो चुका है कि उसने महामारी का रूप ले लिया है। उत्तर पूर्व पंजाब के गेहूं के खेतों से सुदूर दक्षिण तमिलनाडू व केरल के धान के खेतों तक पुरे देश में अनेकों जगह ज़मीन का पानी पीने योग्य नहीं रह गया है। ये महामारी इस तरह कहर बनकर टूट रही है:
    ज़मीन का पानी प्रदूषित होकर भी पिया जा रहा है। पानी में मिले आर्सनिक ज़हर त्वचा के रोग, पेट में गैस की समस्या और कैंसर पैदा कर रहे हैं।
    कई जगह पर पानी में पारा और फ्लोराइड अत्यधिक मात्रा में पाए गए हैं जिससे कैंसर, हड्डियों का टेढ़ा मेढ़ा और कमज़ोर होना, फ्लोरिसिस और मानसिक रोग पैदा हो रहे हैं।
    देहात में यूरिया के अत्यधिक और गैरवैज्ञानिक तरीके से उपयोग की वज़ह से ज़मीन के पानी में नाइट्रेट की मात्रा बहुत अधिक हो गई है जिससे भी कैंसर और ब्लू बेबी सिंड्रोम फैलता है जिससे बच्चों के रक्त में नाइट्रेट अधिक होने से शरीर नीला हो जाता है।
    शहरों में सीवर की व्यवस्था एकदम ध्वस्त हो जाने के कारण पीने के पानी में सीवर का पानी मिल जाना हमारी शहरी जल आपूर्ति की खासियत है। इससे सभी बैक्टीरिया ज़नित रोग और पेट की बिमारियों से लोग मर रहे हैं।
  2. नदियों का गंदे गटर में तब्दील हो जाना: हम नदियों को मा कहते हैं लेकिन उन्हें प्रदूषित करने और उन्हें सड़ाने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। जैसे हमारा तुर्रा रहता है कि हमारी संस्कृति में महिलाओं को पूजा जाता है लेकिन महिला देखते ही हम उन पर भूखे भेड़िये जैसे टूट पड़ते हैं!! नदियों के किनारे बसे महानगरों के सीवर का पानी और कारखानों से निकलने वाले रसायनों को इन नदियों में ही छोड़ा जाता है। दरअसल, स्वास्थ्य हमारे देश की सरकारों के एजेंडे में ही नहीं रहता। कोई मरे तो मरे जिए तो जिए! शहरीकरण का मतलब ही है, प्रदुषण फैलाना, हवा-पानी में ज़हरीले प्रदूषक टोक्सिंस को मिलाना। एक सर्वे के अनुसार हर रोज़ हमारी नदियों में 4 करोड़ लीटर सीवर अथवा रासायनिक पानी बहाया जाता है। जल शुद्धिकरण प्लांट लगाना, हमारी योजनाओं का हिस्सा होना बंद हो चुका है। नदियों के ज़हरीले पानी से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से कुल कितने लोग अपनी जान गँवा रहे हैं इसकी गणना संभव नहीं। यूरोप की नदियाँ देखकर इर्ष्या होती है।
  3. विषाक्त वायु से दम घुटता है: जाड़े के पूरे सीज़न में इण्डिया साँस नहीं ले पाता। “दिल्लीमें वायु प्रदुषण सुधरकर अति ख़तरनाक स्तर पर आया”नवम्बर महीने में अखबारों की इन हेड लाइन को पढ़ना कितना विडम्बनापूर्ण लगता है! शिकागो अमेरिका की ऊर्जा नीति संस्थान द्वारा संचालित वायु गुणवत्ता जीवन इंडेक्स की एक सर्वे रिपोर्ट के अनुसार “भारत की एक चौथाई आबादी इतने भयंकर प्रदूषण की शिकार जो कहीं दूसरी जगह नहीं है। उत्तरी भारत में रहने वाले 24.8 करोड़ लोगों का जीवन, जिनमें दिल्ली और कलकत्ता महानगर भी शामिल हैं, 2018 के प्रदुषण स्तर के आधार पर ही, 8 साल प्रदुषण की वज़ह से कम हो जाता है।” उक्त रिपोर्ट जो 2018 तक के प्रदुषण आंकड़ों पर आधारित है, आगे बताती है कि वायु प्रदूषण के मामले में बांग्लादेश की स्थिति दुनिया में सबसे ख़राब है लेकिन उसके बाद हमारा ही नम्बर है। सर्वाधिक 5 वायु प्रदूषित देशों में चार पडौसी है हैं; बांग्लादेश, भारत, पाकिस्तान और नेपाल। पांचवां देश सिंगापूर।
  4. ग्लेशियर पिघल रहे हैं, गौरवशाली हिमालय ख़तरे में है: 19 जून 2019 को नेशनल जिओग्राफिक में छपी स्टेफेन लीथ्य की एक रिपोर्ट के अनुसार, ना सिर्फ़ दुनिया की सर्वोच्च पर्वतीय चोटी माउंट एवेरेस्ट (29029 फिट) हिमालय में ही है, बल्कि एंटार्कटिका एवं आर्कटिक के बाद सबसे बड़ा बर्फ़ का भण्डार भी हिमालय में ही है। अब इस दुर्गम भाग की उनकी सम्पूर्ण रिपोर्ट के मुताबिक, सन 2000 से 2016 के बीच 16 साल में, तापमान बढ़ने की वज़ह से, हिमालय के ग्लेसिएर पर हर साल करोड़ों टन बर्फ़, पूरे क्षेत्र के पूरी सतह की डेढ़ घन फूट के बराबर, हर साल पिघल रही है। इतनी बर्फ़ सन 1975 से 2000 तक के 25 साल में भी नहीं पिघली थी। इसकी वज़ह से समस्त दक्षिण एशिया में पानी के बहाव एवं आपूर्ति प्रभावित हो रही है। चूँकि हमारे देश की प्रमुख नदियों का उद्गम स्रोत हिमालय ही है, कुल 80 करोड़ लोग हिमालय से बहने वाले पानी पर निर्भर करते हैं। ना सिर्फ़ ग्लासिएर्स का द्रव्यमान कम हो रहा है बल्कि इससे गर्मी के सीज़न में भी नदियों में अतिरिक्त पानी का बहाव पैदा हो रहा है।

प्रस्तावित पर्यावरण अधिनियम के विरुद्ध देशभर में ज़बरदस्त जन आन्दोलन

सरमाएदारों की मुनाफ़े की अज़गरी भूख के सामने जब सरकारें बिना शर्त समर्पण कर रही हों, आम दबे कुचले लोगों के जीवन मरण के सवालों से मुंह मोड़ रही हो, अन्याय-ज़ुल्म बढता जा रहा हो तो हर जीवित व्यक्ति का फ़र्ज़ है कि वो अन्याय के विरुद्ध अपनी आवाज़ बुलंद करे, घरों से निकले और जन संघर्ष संगठित करे, उनका हिस्सा बने। ये जानकर हर्ष होता है कि पर्यावरण विनाश के प्रस्तावित अधिनियम के विरुद्ध लोग अपने फ़र्ज़ को नहीं भूले हैं।

  1. उत्तर- पूर्वी भारत: जैसा पहले बताया जा चुका है, सेक्शन 14 में परिभाषित सीमा क्षेत्र- ‘अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 100 किमी सीधी दूरी तक’ लगने वाली किसी भी परियोजनाओं के लिए पर्यावरण समीक्षा और मंजूरी के लिए प्रभावित लोगों की राय लेने की कोई ज़रूरत नहीं है। वन, खनिज, जीव विविधता से समृद्ध हमारे उत्तर-पूर्व के 7 राज्य इससे बहुत ही बुरी तरह प्रभावित होने वाले हैं क्योंकि चीन, म्यांमार और बांग्लादेश से घिरे होने के कारण उनका तो लगभग सारा हिस्सा ही इस ‘लूट की छूट’ में कवर हो जाएगा। यही वज़ह है कि प्रतिकार भी सबसे तीखा वहीँ हुआ है। 18 अगस्त को द वायर पत्रिका में छपी रिपोर्ट के मुताबिक कोरोना महामारी के सख्त लॉक डाउन की परवाह ना करते हुए हजारों युवा गौहाटी में सडकों पर आ गए। वे नागरिकता कानूनों (इनका कहर भी सबसे ज्यादा वहीँ होने वाला है) और पर्यावरण अधिनियम (EIA 2020) दोनों का विरोध कर रहे थे। ‘असम जातीयबादी युवा छात्र परिषद्’ के झण्डे के तले दोनों आन्दोलन एक हो गए और असम व उत्तरपूर्व की समस्त जनता को इस विनाशकारी पर्यावरण अधिनियम के विरुद्ध एकजुट हो जाने की अपील की। ए जे वाय सी पी की गौहाटी यूनिट के अध्यक्ष प्रदीप कलीता ने नारेंगरी गौहाटी में मानव श्रंखला में भाग लेते हुए कहा, “अब हम तब तक नहीं रुकने वाले जब तक कि ये दोनों, नागरिकता विरोधी काले कानून (NPR-NRC-CAA) और पर्यावरण विरोधी विमशाकारी प्रस्तावित अधिनियम (EIA 2020) निरस्त नहीं कर दिए जाते। ये भी बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस सरकार ने नागरिकता विरोधी काले कानूनों को पटरी से उतरने की मन्शा से, बदले की भावना से काम करते हुए, अखिल गोगोई को जेल में डाला हुआ है।
  2. उत्तराखंड: सुन्दरलाल बहुगुणा के ‘चिपको आन्दोलन’ की शानदार विरासत वाले, भव्य हिमालय की तलहटी में बसे उत्तराखंड राज्य में प्रस्तावित पर्यावरण अधिनियम के विरुद्ध आन्दोलन बहुत प्रखर, संगठित और योजनाबद्ध तरीके से हुए। ये स्वाभाविक है क्योंकि हिमालय की बहुमूल्य वन सम्पदा के विनाश और हिमालय ग्लेशियर पिघलने की विभीषिका से उत्पन्न कहर को उत्तराखण्ड के लोग कई बार झेल चुके हैं। पर्यावरण संरक्षण से सम्बद्ध 52 समूहों ने प्रख्यात पर्यावरणविद रवि चोपड़ा के नेतृत्व में संयुक्त प्लेटफार्म बनाकर इकट्ठे लड़ने का फैसला किया। संयुक्त विज्ञप्ति में कहा गया, “असंख्य जलवायु विध्वंशक परियोजनाओं, जैव विविधता का ह्रास, भू स्खलन, नदियों के सूखने, ज़मीनी जल स्रोतों की मौतों, ग्लेशियर के पिघलने, पर्वतों के खोखला होने, ज़हरीले रसायनों के प्रदुषण के कारण हिमालय क्षेत्र अत्यंत दयनीय अवस्था में है। पर्यावरण संरक्षण सम्बन्धी नियमों को सरल बनाना इस संकट को और भयावह बनाना है।” दूसरी सबसे अहम राजनीतिक परिघटना इस सम्बन्ध में ये हुई है कि हिमालय के किनारे वाले पूर्व से पश्चिम तक के सारे राज्य जैसे असम, नागालैंड, मणिपुर, मेघालय, अरुणाचल प्रदेश, से लेकर उत्तराखंड, हिमाचल, कश्मीर और लद्दाख तक में कार्यरत आन्दोलनकारियों ने एक साझा समझौते पर हस्ताक्षर कर सरकार को प्रस्तावित पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिनियम 2020 को वापस लेने की अपील की है। “हिमालय में जलवायु संकट को बढ़ाने वाले तंत्र पर रोक लगाओ”, “पर्यावरण प्रभाव समीक्षा अधिनियम 2020 को वापस लो” नाम से सभी राज्यों के प्रतिनिधियों के हस्ताक्षर से साझा बयान ज़ारी किया गया है।
  3. तमिलनाडू: जन विरोधी कानूनों का पुरजोर विरोध करने की तमिलनाडू की विरासत को कायम रखते हुए युवाओं के 75 समूहों ने कोयमबतूर में संयुक्त आन्दोलन कर पर्यावरण के लिए विनाशकारी अधिनियम तुरंत वापस लेने की मांग की। द्रविड़ विधुथालाई कधगम, द्रविड़ तमिलियर कछी, आथी तमिज़ार परवाई, थान्थाई पेरियार द्रविड़ कज़घम ने मिलकर प्रस्तावित अधिनियम के विरोध में मोर्चा निकाला। द्रविदार विदुथलाई कझाघम के कोएम्बतूर शहरी शाखा के अध्यक्ष एम। नेहरू दास ने बताया कि केंद्र सरकार द्वारा ज़ारी प्रस्तावित अधिनियम जन विरोधी, पर्यावरण विरोधी तथा जनवाद विरोधी है। अगर सरकार ने इसे वापस नहीं लिया तो इसके ख़िलाफ़ आन्दोलन तेज़ किया जाएगा।
  4. मुझे साँस लेने दो: अमेरिका में नस्ल भेद और दमनतंत्र के ख़िलाफ़ उठा ये नारा दुनियाभर में मशहूर हो गया है। छात्र यूनियन, पर्यावरण-विनाश विरोधी अनेकों संगठन मिलकर इस शीर्षक से ऑन लाइन सम्मेलनों, चर्चाओं का आयोजन लगातार कर रहे हैं। जैव संरक्षक एवं लेखक नेहा सिन्हा, सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च के वरिष्ठ सदस्य मंजू मेनन, ऐक्यम समुदाय के संस्थापक संदीप अनिरुधन ने #Letindiabreath नाम से हैशतैग चलाकर लोगों के प्रश्नों के उत्तर दिए और पर्यावरण जागरूकता बढ़ाने का अभियान चलाया। किसी भी विरोध को कुचल डालने की अपनी परंपरा का निर्बाह करते हुए मोदी सरकार द्वारा संचालित इन्टरनेट कंपनी नेशनल इन्टरनेट एक्सचेंज ऑफ़ इन्डिया ने इस वेब साईट पर रोक लगा दी।
  5. वर्ल्ड वाइड वेबिनार: विश्व पर्यावरण दिवस, 5 जून को 10 वर्ल्ड वाइड वेबिनर आयोजित हुईं जिनमें नर्मदा बचाव आन्दोलन की नेता मेधा पाटकर, पर्यावरण और विज्ञानं केंद्र की डायरेक्टर जनरल सुनीता नारायण तथा प्रतिष्ठित पर्यावरण शोधकर्ता कांची कोहली के साथ ही दुनियाभर से लगभग 6000 लोगों ने भाग लिया।
  6. आभासी मानव श्रंखला:  पर्यावरण विध्वंश के मुद्दे और सख्त लॉक डाउन ने एक अनोखे आन्दोलन को जन्म दिया। लोगों ने अपने हाथ फैलाकर तस्वीरें लेकर उन्हें सोशल मिडिया पर अपलोड किया जिससे एक आभासी मानव श्रंखला बन गई। विदित हो कि नागरिकता सम्बन्धी काले कानूनों का विरोध केरल के लोगों ने अत्यंत प्रभावशाली तरीके से किया था जिसमें 385 लम्बी एक विशाल मानव श्रंखला बनाई गई थी जो कि एक विश्व रिकॉर्ड है।

पर्यावरण के लिए विनाशकारी इस प्रस्तावित अधिनियम का विरोध इस पाते पर पत्र भेजकर किया जा सकता है:
सचिव, पर्यावरण, वन व जलवायु परिवर्तन मंत्रालय, इंदिरा पर्यावरण भवन, जोरबाग रोड, अलीगंज, नई दिल्ली-110003,
 ई मेल: eia2020-moefcc@gov.in

समाजवाद अथवा धरती गृह का सम्पूर्ण विनाश; तीसरा विकल्प नहीं

वर्ग विभाजित समाज में कोई भी सरकार हो, वर्ग निरपेक्ष नहीं हो सकती। वो हमेशा ही शासक वर्ग के हाथ में शासित वर्ग पर शोषणमूलक शासन व्यवस्था को संचालित करने का एक औजार होती है। हम पूंजीवादी समाज में जी रहे हैं इसलिए सरकार वस्तुत: पूंजीपति वर्ग की मैनेजमेंट कमिटी से ज्यादा कुछ भी नहीं। ये तथ्य, लेकिन, कुछ समय पहले तक राजनीतिक समझ के मामले में आम भोली भाली जनता की समझ में नहीं आता था। पूंजीवाद के असाध्य संकट ने, लेकिन, आज ऐसी परिस्थिति निर्मित कर दी है कि व्यवस्था, सरकार के असल चरित्र को छुपाने के लिए इस्तेमाल चादर को खुद ही फाड़कर फेंक रही है। आज देशभर में शायद ही कोई इतना अज्ञान बचा हो जो ये ना माने कि मोदी सरकार अडानी-अम्बानी की सरकार है। सरकार को अब उसके असली चरित्र को उजागर होने के डर को संभालना ही संभव नहीं क्योंकि अब योजनाएं दिन ब दिन एकदम नंगे तरीके से श्रम विरोधी और पूंजी पोषक होती जा रही हैं। पूंजीवाद अब आई सी यू में अपनी मृत्यु शैय्या पर है और सरकार उसे पहलवान बनाने के नए नीम हकीम नुस्खे आजमा रही है। सवाल जिंदगी और मौत का है, अब छुपना क्या और छुपाना क्या!! वरना और क्या वज़ह हो सकती है कि जिस देश में पर्यावरण प्रदूषण भयंकरतम हो, हर साल करोड़ों लोग प्रदूषण जनित बिमारियों से मर रहे हों, जहाँ नियम कायदे पालन करने की बजाए उन्हें ध्वस्त करना ही आम रिवाज़ हो, वहां सरकार पर्यावरण प्रदूषण रोकने के नाम पर बने कानूनों में ऐसे बदलाव लेकर आए और उन्हें लागू कराने में हर तिकड़म भिड़ाए जो अगर लागू हुए तो पर्यावरण प्रदूषण निश्चित रूप से महामारी की शक्ल अख्तियार कर लेगा। विश्व आर्थिक फोरम और यूरोपियन कमीशन के सहयोग से अमेरिका की येल तथा कोलुम्बिया विश्वविद्यालय द्वारा तैयार विश्व पर्यावरण प्रदर्शन इंडेक्स रिपोर्ट के अनुसार, कुल 180 देशों में भारत का स्थान 177 वां है। दुनिया में सिर्फ़ 3 देश हैं जहाँ  पर्यावरण का हमसे भी ज्यादा सत्यानाश हो चुका है। शायद यही कारण है कि सरकार सरमाएदारों को प्रदूषण करने में छूट देना चाहती है जिससे हम प्रदूषण करने में विश्व गुरु बन सकें!! अकेले मोदी सरकार ही ऐसा कर रही है ये सोचना भूल होगी। 2006 में भारत 118 वें नम्बर पर था। यू पी ए काल में भी पतन बदस्तूर ज़ारी था।

मुनाफ़े के लिए ही उत्पादन करना, मुनाफ़ा नहीं तो क्यों करना तो है ही, पूंजीवाद की एक दूसरी ख़ासियत भी उतनी ही अवश्यमभावी है। वो है इन्सान को समाज-विमुख बनाना, सामाजिक प्रतिबद्धता, सरोकार को जड़मूल नष्ट कर उसे व्यक्ति केन्द्रित, खुदपसंद बनाना। समाज से क्या लेना, मैं, मैं, मैं!!! भले ज़हरीली हवा खुद मेरे ही फेफड़ों में क्यों ना जाए, लेकिन मैं मुनाफा नहीं कमा पाया तो डूब जाऊंगा इसलिए मैं मुनाफे पर ही फोकस करूँगा, मैं पर्यावरण की फ़िक्र क्यों  करूँ? पूंजीवाद व्यक्ति की सोच से सामाजिक दृष्टिकोण खुरच खुरच कर निकालता जाता है और इन्सान को पूंजी के इशारे पर नाचने वाला नर भक्षी बना देता है। अगर ज़हर का उत्पादन करने में मुनाफ़ा हो तो अम्बानी का बहुत बड़ा कारखाना तुरंत लग जाएगा!! पूंजीवाद के अन्तर्निहित नियमानुसार, प्रतियोगिता में आगे निकलने के लिए पूंजीपति को अपनी जड़ पूंजी लगातार बढाती रहनी होती है जिससे परिवर्तनशील पूंजी आनुपातिक रूप से कम होती जाती है जिसका परिणाम मुनाफ़े की दर में गिरावट में होता है। पूंजी बाज़ार का ये निर्मम नियम पूंजीपति को और किनारे की ओर धकेलता जाता है। मुनाफ़ा कमाओ या डूब जाओ!! पूंजीपति को अब उत्पादन में कोई ‘रूकावट’ नहीं चाहिए। श्रम कानूनों का पालन करना, पर्यावरण संरक्षण नियमों का पालन करना अब ‘रुकावटों’ में शुमार हो जाते हैं। सरकार का कर्तव्य बन जाता है कि इन ‘रुकावटों’ को दूर करे। सरकार ‘व्यापर करने में सरलता (Ease of doing business) का नारा लगाकर इन ‘रुकावटों’ को दूर करने में सब कुछ झोंक देती है। ‘शुद्ध रूप से और ज़ाहिर तौर से कॉर्पोरेट के सामने लहालोट होना, सारे कानून-क़ायदे उसी मक़सद से बनाना और उन्हें भूखी कंगाल होती जा रही जनता को उनके हित में बताना, ग़रीबी –भुखमरी से बिलखते लोगों को बग़ावत करने से रोके रखना’ ये है आज असली काम किसी भी सरकार का। ये काम वही सरकार कर सकती है जो ज्यादा प्रभावशाली तरीके से झूट बोल पाए। जो सफ़ेद झूट बोल रही हो तो लोगों को लगे सत्य की वर्षा हो रही है। लोगों को अंधराष्ट्रवाद, मज़हब के नशे में गाफ़िल रखे, जितना संभव हो सामाजिक ताने बाने को खण्डित करती जाए। हर रोज़ बन्दर कुलाटियाँ करनी होती हैं। एक झूट, पाखण्ड पकड़ने जाने पर दूसरा बड़ा झूट, विशालतर पाखण्ड परोसा जाए। साथ ही जो भी झूट पाखण्ड पकड़ने जाने पर सवाल उठाए उसपर टूट पड़ो, जेल में डालो, देशद्रोही बोलो। जनवादी मान्यताओं, इदारों को ध्वस्त करो। सरमाएदारों के पास इकठ्ठा पूंजी के ढूह को निवेश के अवसर उपलब्ध कराओ। अगर और कहीं निवेश ना हो पा रहा हो तो लोगों से वसूले गए करों से बने सरकारी इदारों को कौड़ियों के भाव बेचते जाओ और इस सब कर्म को देशहित में बताते जाओ। ये काम चूँकि भाजपा-संघ से बेहतर कोई नहीं कर सकता इसलिए वे सत्ता में हैं और तब तक रहेंगे जब तक इस ठगी को उनसे भी  भी बेहतर तरीके से करने वाला दूसरा नहीं आ जाता। यही कारण है कि सैकड़ों सालों से पूंजीवादी व्यवस्था की सेवा कर रही कांग्रेस के मुकाबले भाजपा को आज सरमाएदारों से कई गुना ज्यादा चंदा मिल रहा है। चुनाव हों, सारे का सारा मिडिया खरीद लेना हो या उससे भी काम ना चले तो चुनाव उपरांत विधायकों-सांसदों की ख़रीद -फरोख्त हो भाजपा के पास संसाधनों की कभी कोई कमी नहीं होती। इस प्रकार के शासन तंत्र को फासीवाद कहते हैं जो चूँकि व्यवस्था के तीव्र संकट से जन्म लेता है और आज इस संकट के दूर होने की उम्मीद नहीं बची इसलिए अब ये संकट इस पूंजीवादी व्यवस्था के साथ ही क़ब्र में जाएगा। जब पूरी की पूरी व्यवस्था ही मरणासन्न हो, लगातार डूबती ही चली जा रही हो तो पर्यावरण को प्रदूषण से बचाने की चिंता किसे होगी? हम देख ही रहे हैं कि हमारे जैसे ही फासीवाद के दूसरे उदहारण देश ब्राज़ील में बोलसोनारो ने पूरा का पूरा अमेज़न का जंगल ही, जिसका कुल क्षेत्रफल 55 लाख वर्ग किलोमीटर है जिसे पृथ्वी के फेफड़े कहा जाता है, सरमाएदारों को सोंप दिया है। यह वही बोलसोनारो है जो इस साल 26 जनवरी को हमारा मुख्य अतिथि रहा है।

उत्पादन की पूरी की पूरी प्रक्रिया मुनाफ़े पर आधारित ना होकर सामाजिक ज़रूरतों के अनुरूप हो। जिस तरह उत्पादन आज एक सामूहिक क्रिया है, कोई भी वस्तु समाज के अनेकों मज़दूरों के श्रम से बनती है उसी तरह उत्पादित वस्तु भी पूंजीपति की ना होकर पूरे के पूरे समाज की हो ऐसी व्यवस्था निर्मित करके ही पर्यावरण विनाश को बचाया जा सकता है। ऐसा करने के लिए देशव्यापी जन जागरण की आवश्यकता है। मौजूदा पूंजीवादी व्यवस्था और उसके रखवालों के असली चरित्र को आम जन मानस के सामने नंगा करते हुए उनको

उनके जीवन मरण के मूल मुद्दों पर क्रान्तिकारी संघर्ष के लिए जागृत करना आज का सबसे महत्वपूर्ण कार्य है। नागरिकता कानून, पर्यावरण, नई शिक्षा नीति, यू ए पी ए, विरोधी आवाज़ों को कुचलना उन्हें जेल में डालना, वैज्ञानिक सोच को नष्ट करते हुए पुरातनपंथी गपोड़ों का खतरनाक प्रचार प्रसार; इन सब के विरुद्ध देश भर में चल रहे जन आन्दोलनों को एक कर उन्हें देशव्यापी फासीवाद विरोधी क्रान्तिकारी मोर्चे में तब्दील कर जन आन्दोलनों की विशाल-व्यापक लहर पैदा करनी होगी। जो सभी क्रान्तिकारी तत्वों की एकजुटता के बगैर संभव नहीं। देशभर में आज अनेकों छोटे छोटे दल हैं जो बस दो-तीन राज्यों के दो-तीन ज़िलों में ही सक्रीय हैं और उतने से ही भाग में क्रांति करना चाहते हैं। यही वज़ह है कि जहाँ एक तरफ़ मध्यम वर्ग के टूटने, पिघलकर सर्वहारा की महासागर में समाते जाने से सर्वहारा सेना विशाल होती जा रही है, वहीँ दूसरी तरफ़ खुद को सर्वहारा का अगुवा दस्ता कहने वाले इन क्रान्तिकारी संगठनों के सदस्यों-कार्यकर्ताओं की तादाद घटती जा रही है, दिन ब दिन बिखराव पैदा हो रहे हैं। ‘केन्द्रीय कमेटियों’ को इन ‘अगुवा दस्तों’ की अगुवा टुकड़ियाँ ही ज़मीन पर लाएंगी। केंद्रीकृत राजसत्ता के विरुद्ध कोई भी क्रान्तिकारी संघर्ष राष्ट्र स्तर पर ही संगठित करना होगा और ऐसा ना होता दिखने से जन आन्दोलन कमज़ोर नज़र आते हैं, क्रांतियाँ बहुत दूर और धूमिल नज़र आती हैं। परिणाम स्वरूप शोषित पीड़ित जनता के महासागर में उस उत्साह का संचार नहीं हो पा रहा जिसकी आवश्यकता है। मार्क्सवाद-लेनिनवाद के ज्ञान को महज बौद्धिक क़वायद के लिए, कुछ उद्धरण देते हुए हर दूसरे दल को ‘मेन्शेविक’ और खुद को एकमात्र क्रान्तिकारी सिद्ध करने के लिए नहीं बल्कि वैचारिक-सैधांतिक डिबेट चलाते हुए क्रान्तिकारी ऊर्जा को संगठित करने के लिए एक अजेय औजार के रूप में उपयोग करने की ज़रूरत है जिससे शोषित-पीड़ित वर्ग में एक फौलादी एकता कायम हो। जन आन्दोलनों की ऐसी सशक्त सूनामी पैदा हो जो सदियों के ज़ुल्मों, भेदभावों, अन्याय, अत्याचार, शोषण की जमी गन्दगी को बहा ले जाए। उस की जगह नज़र प्रस्थापित हो बराबरी न्याय पर आधारित शोषण विहीन समाजवादी व्यवस्था की नई कोपलें। पूरब में एक नए सूरज का उदय हो। तीसरा विकल्प आज बचा ही नहीं धरती गृह का सम्पूर्ण विनाश या फिर समाजवाद।

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 5/ सितंबर 2020) में छपा था

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