प्रशांत भूषण अवमानना मामला : बुर्जुआ जनवादी सीमाओं के पार

ए. प्रिया //

12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्ठतम जजों द्वारा “जनतंत्र खतरे में है” की चेतावनी के साथ किए गए ऐतिहासिक प्रेस कांफ्रेंस के बाद, अब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण के खिलाफ स्वतः संज्ञान में लिया गया अवमानना का मुकदमा भारतीय न्याय व्यवस्था की असलियत को दुबारा सामने लाने का काम कर रहा है। ज्ञात हो कि जस्टिस अरुण मिश्रा द्वारा तीन जजों की बेंच ने भूषण को ‘न्यायालय अवमान अधिनियम’ के तहत आपराधिक अवमान का दोषी ठहराया है जो कहता है कि “आपराधिक अवमान से किसी भी ऐसी बात का (चाहे बोले गए या लिखे गए शब्दों द्वारा, या संकेतों द्वारा, या दृश्य रूपणों द्वारा, या अन्यथा) प्रकाशन अथवा किसी भी अन्य ऐसे कार्य का करना अभिप्रेत है-

(i) जो किसी न्यायालय को कलंकित करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे कलंकित करने की है अथवा जो उसके प्राधिकार को अवनत करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसे अवनत करने की है; अथवा

(ii) जो किसी न्यायिक कार्यवाही के सम्यक् अनुक्रम पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, या उसमें हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें हस्तक्षेप करने की है; अथवा

(iii) जो न्याय प्रशासन में किसी अन्य रीति से हस्तक्षेप करता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें हस्तक्षेप करने की है अथवा जो उसमें बाधा डालता है या जिसकी प्रवृत्ति उसमें बाधा डालने की है।

मुकदमे के तथ्य

प्रशांत भूषण के खिलाफ अवमानना के दो मुकदमे दर्ज हैं। पहला था जिसे हरीश साल्वे ने 2009 में भूषण द्वारा ‘तहलका’ पत्रिका को दिए गए साक्षात्कार के खिलाफ दर्ज किया था और दूसरा वह जहां उनके द्वारा 27 और 29 जून 2020 को किए गए दो ट्वीट्स पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया, जिसकी चर्चा ऊपर की गई है। 27 जून वाली ट्वीट इस प्रकार है, “जब भविष्य के इतिहासकार पीछे मुड़ कर देखेंगे कि भारत में पिछले छः सालों में जनतंत्र को किस तरह बिना किसी औपचारिक आपातकाल के बर्बाद किया गया है, तो विशेष रूप से इस बर्बादी में सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को, और खास कर के पिछले 4 चीफ जस्टिसों की भूमिका को चिन्हित करेंगे। (अनुवाद)” 29 जून को की गई दूसरी ट्वीट एक फोटो के साथ डाली गई थी जिसमें मौजूदा चीफ जस्टिस एक बीजेपी विधायक के बेटे की महंगी हार्ले डेविडसन मोटर साइकिल की सवारी करते दिख रहे हैं और नीचे लिखा है कि “राज भवन, नागपुर में चीफ जस्टिस एक भाजपा नेता की 50 लाख की मोटर साइकिल की सवारी कर रहे हैं, बिना मास्क या हेलमेट के, एक ऐसे समय में जब उनके द्वारा सुप्रीम कोर्ट को लॉकडाउन मोड में रखने के कारण नागरिक अपने न्याय पाने के मौलिक अधिकार से वंचित हो जा रहे हैं! (अनुवाद)” प्रशांत भूषण ने अपने जवाब में एक 134 पन्नों का शपथ पत्र दिया जिसमें उन्होंने अपने दूसरे ट्वीट पर अपनी स्थिति साफ करते हुए कहा कि उन्होंने ये ट्वीट वेदना से भरे हुए मन से किया था, जिसकी वजह वे बताते हैं कि “पिछले तीन महीने से ज्यादा के समय से सुप्रीम कोर्ट का भौतिक रूप में कामकाज ठप्प है जिसके फलस्वरूप नागरिकों के मौलिक अधिकारों को, जिनमें डिटेंशन में रखे गए लोग, बेसहारा और गरीब लोग, और ऐसे ही और लोग हैं जिनकी गंभीर और अत्यावश्यक शिकायतों को संबोधित नहीं किया जा रहा या उनका निवारण नहीं किया जा रहा”। और अतः मौजूदा परिस्थिति पर अपनी प्रतिक्रिया देना और वास्तविक तथ्य सामने लाना अवमानना नहीं माना जा सकता अन्यथा यह उनके बोलने की आजादी पर हमला माना जाएगा। पहली ट्वीट के मूल्यांकन से भी रोचक परिणाम सामने आते हैं। ट्वीट में पिछले 6 सालों में जनतंत्र को ध्वस्त करने में “सुप्रीम कोर्ट की भूमिका” का जिक्र है, लेकिन, बेंच द्वारा दी गई जजमेंट में सुप्रीम कोर्ट के “वाइटल” (महत्वपूर्ण) भूमिका का जिक्र किया गया है। ऐसा लगता है जैसे भूषण द्वारा खाली छोड़ी गई जगह को सुप्रीम कोर्ट ने अपने अपराध-बोध से भर दिया है!    

प्रशांत भूषण को 14 अगस्त 2020 को “गंभीर अवमानना” का दोषी करार देने के बावजूद कोर्ट ने उनकी सजा 31 अगस्त 2020 तक नहीं सुनाई, जिसमें उन्हें 1 रूपए जुर्माना, अन्यथा तीन महीने की कैद और तीन साल के लिए उनके द्वारा कानून की प्रैक्टिस करने पर रोक लगा दी जाएगी। ज्ञात हो कि उन्होंने उसी दिन यथाविधि जुर्माने की राशि जमा कर दी। 

पिछले महीने की शुरुआत में अभियोग लगने से ले कर सजा सुनाए जाने तक, पूरी दुनिया इसकी गवाह बनी कि कैसे भारतीय न्याय व्यवस्था के सर्वोच्च न्यायालय ने एड़ी चोटी का जोर लगा दिया, भावनात्मक बातों से ले कर डराने तक सभी हथकंडों का सहारा लिया, सभी तरह के तरीके अपनाए ताकि प्रशांत भूषण अपने ट्वीट के लिए माफी मांग लें, लेकिन उन्होंने इससे साफ इंकार कर दिया। उनका कहना था कि उनके ट्वीट में की गई बातें तथ्यपरक हैं और मौजूदा न्याय व्यवस्था की कमियों पर उनकी प्रतिक्रिया को दर्शाती हैं और इसीलिए माफी मांगना उनकी, “अंतरात्मा और उस संस्थान, जिसका वे बहुत सम्मान करते हैं, दोनों की अवमानना होगी।” अंत तक उन्होंने न्याय व्यवस्था में उनके भरोसे को लगातार व्यक्त करते हुए कहा है कि वे हर उस सजा के लिए तैयार हैं (शुरू से ही तैयार थे) जो कोर्ट उनके लिए तय करेगा, और यह उन्होंने 1 रूपए जुर्माना दे कर साबित भी कर दिया, और साथ ही साथ खुद को तीन महीने की जेल और कानून की प्रैक्टिस पर तीन साल की रोक से भी बचा लिया। जरा सोचिए कि क्या इस लड़ाई का और कोई अंजाम हो सकता था? क्या वो एक क्रांतिकारी हैं? क्या सुप्रीम कोर्ट के साथ ऐसे आमने-सामने की लड़ाई प्रशांत भूषण जैसे बुर्जुआ जनवादी के संकीर्ण दायरे की वजह से सीमित नहीं रह गई? जवाब साफ है. लेकिन हां, इसमें कोई शक नहीं है कि इस लड़ाई ने भारतीय न्याय व्यवस्था में मौजूद सड़ांध को सतह पर ला दिया है। उससे भी ज्यादा, इससे यह साफ हो गया है कि न्यायतंत्र भीतर से हथिया लिया जा चुका है और आखिरकार उसे केंद्र की फासीवादी सरकार द्वारा अपने मंसूबों को अंजाम देने का हथियार बनाया जा चुका है।

जाहिर है यह एक बहस का विषय है कि क्या उन्हें ये सजा स्वीकार करनी चाहिए थी या नहीं। कुछ लोग कहेंगे कि ये सजा (1 रूपए का जुर्माना) स्वीकार करना, वो भी लगातार यह कहने के बाद कि उनके दोनों ट्वीट संविधान के तहत अवमानना नहीं माने जाने चाहिए, और न्यायतंत्र के गैर-जनवादी फैसले, जहां वो विरोध करने को जुर्म मान कर सजा सुनाता है और न्यायतंत्र में मौजूदा कमियों को चिन्हित करने के प्रति असहिष्णुता का रवैया रखता है, को साफ-साफ चिन्हित नहीं करना प्रशांत भूषण जैसे बुर्जुआ उदारवादी का न्यायतंत्र के सामने टैक्टिकल समर्पण दिखाता है। और यह उनके उपरोक्त वैचारिक-राजनीतिक सीमाओं और इस लड़ाई की हदों के हिसाब से सच है। हालांकि उन्होंने कहा है कि उनके पास “इस दोष सिद्धि और सजा की रिव्यु की मांग करने का अधिकार है (अनुवाद)”। लेकिन क्या वे इस विकल्प का प्रयोग करेंगे और क्या उसका भी यही हश्र होगा जो इस बार हुआ? अभी कुछ कहा नहीं जा सकता। अभी के लिए, हमें केवल इतना पता है कि न्यायतंत्र के भीतर न्याय मिलने की संभावना पर सवाल खड़ा करने के लिए सजा सुना दी गई है, जनतंत्र को बचाने के लिए मुकर्रर की गई सांकेतिक सजा “हंसी-खुशी” मान ली गई है और यह लड़ाई शुरू होते ही खत्म हो गई है।  

प्रशांत भूषण और वामपंथी खेमा – कुछ महत्वपूर्ण सवाल 

हम कई पहलुओं से इस घटना, जो पुरे देश में आग की तरह फैल गई और जिसने विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लगा दी, की व्याख्या सकते हैं। न्यायतंत्र के द्वारा जनतांत्रिक आवाजों को दबाया जाना, पूरी संस्थान का मौजूदा तानाशाही सरकार के निहित स्वार्थ के खातिर उनके और बड़े पूंजीपतियों के खिलाफ उठी हर आवाज को दबाने और सजा देने का हथियार बन जाना, आदि, यह कुछ ऐसे पहलु हैं जिसने जनता के बीच हो रही बहसों में अपनी जगह बना ली है और सर्वोच्च न्यायालय की निष्पक्षता और पवित्रता पर कई सवाल खड़ा कर दिए हैं। इस बहस ने वामदलों और कम्युनिस्ट क्रांतिकारी खेमों के बीच तो तुल पकड़ा ही है, साथ ही साथ उदारवादी खेमे में भी इस विषय पर सरगर्मी दिखाई दे रही है। प्रशांत भूषण के द्वारा उठाई गई लड़ाई, उनकी नजर में, एक ऐसी लड़ाई है जिसने सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा तानाशाही राज्य के अनुकूल हो जाने और बुर्जुआ जनतांत्रिक ढांचे में अपने तय कर्तव्यों से बड़ी आसानी से भटक जाने के रवैये को चुनौती दी है। इसी कारण से उदारवादी खेमे में उन्हें एक हीरो समझा जा रहा है, जो कि उन लोगों के उदारवादी सोच की सीमाओं को देखते हुए उतनी आश्चर्यजनक बात नहीं है। लेकिन वामपंथी खेमे की प्रतिक्रिया, चाहे वो संशोधनवादी हों या कम्युनिस्ट क्रांतिकारी, बेहद विचलित करने वाली रही है।  

इस लड़ाई ने वामपंथी खेमे को कुल मिलाकर दो गुटों में बांट दिया है; पहला गुट वह है जिसके अनुसार इस आमने-सामने की लड़ाई की वजह से व्यवस्था के भीतर जन्मे इस संकट को स्वीकार करना और प्रशांत भूषण के साहस की बात करना उन्हें “हीरो” की उपाधि देने और उदारवादी खेमे में शामिल होने के बराबर है। वे इस घटना के सही सार को पकड़ नहीं पाते, जो है कि, ऐसी घटनाओं से हम “जनतंत्र” के पीछे छुपे इन बुर्जुआ जनतांत्रिक संस्थानों की असलियत जनता के सामने ला सकते हैं और इसी के अनुरूप सही तात्कालिक कार्य और दिशा तय कर सकते हैं, जिसमें वे बुरी तरह असफल रहते हैं, और अंततः चुप रहने या पूरी तरह निष्क्रिय होने की नीति अपना लेते हैं। ये वही लोग हैं जो ऐसे सवाल उठाते हैं कि “तब कहां थे प्रशांत भूषण जब अन्य जनवादी आवाजें कुचली जा रही थी, कहां थे वे जब आम जनता पर जुल्म ढाए जा रहे थे?” ऐसी शिकायतें मौजूदा स्थिति की अवैज्ञानिक और अराजनीतिक मूल्यांकन का और एक बुर्जुआ उदारवादी की कमियों को ना समझ पाने का ही नतीजा है। वे उम्मीद करते हैं कि प्रशांत भूषण एक क्रांतिकारी भूमिका में आ जाएंगे और न्याय व्यवस्था की असलियत को साफ-साफ सबके सामने रखते हुए कह देंगे कि वो एक ऐसी संस्था है जो अपने जन्म से ही अमीरों के पक्ष में झुकी हुई है और साथ ही “सभी के लिए न्याय” के परदे के पीछे से राज्य द्वारा गरीब मेहनतकश जनता के शोषण को जारी रखने में मदद करती है। लेकिन वो ये देखना भूल जाते हैं कि प्रशांत भूषण खुद उसी पूंजीवादी व्यवस्था का हिस्सा हैं। उनके और सुप्रीम कोर्ट के बीच मौजूद संघर्ष का आधार यह है कि इस फासीवादी शासन के तहत न्यायतंत्र ने, बाकी सभी बुर्जुआ सस्थानों की तरह ही, ऐसी भूमिका ले ली है जो उनके ही विरुद्ध जाती है और वे उपरोक्त परदे से बाहर निकलने की तरफ बढ़ रहे हैं ताकि बड़े पूंजीपतियों और फासिस्टों के हितों की सेवा खुल के कर पाए; लेकिन भूषण ने अपनी कल्पना के महान बुर्जुआ जनवादी न्यायिक व्यवस्था के पक्ष में खड़े हो कर न्यायतंत्र के इस नए रुख को चुनौती दे दी है। इसके लिए भी साहस चाहिए। और हमें ऐसे कदमों को प्रोत्साहित करना चाहिए, चाहे वो किसी उदारवादी द्वारा या व्यवस्था के भीतर के ही किसी व्यक्ति द्वारा क्यों ना उठाए जा रहे हों।  

न्यायतंत्र के पुराने बुर्जुआ मॉडल के तहत भूषण एक नेक इरादे वाले व्यक्ति हैं। वो बुर्जुआ जनतंत्र और उस पर आधारित न्यायिक व्यवस्था के एक वफादार सैनिक और रक्षक हैं। वो बुर्जुआ जनतंत्र के लिए एक “सेफ्टी वाल्व” का काम करते हैं। वे “जनतंत्र” के परदे को आहिस्ते से लेकिन लगातार हटते हुए देख रहे हैं और उन्हें पता है कि अगर यह परदा पूरी तरह हट गया तो यह जनता के गुस्से को पहले की तरह झूठे और कमजोर “इंसाफ के वादों” से शांत नहीं कर पाएगा। तब जनता को मुर्ख बनाने और उनकी “आखरी उम्मीदों” को बरकरार रखने का कोई तरीका नहीं रह जाएगा। अगर न्यायतंत्र के रूप में एक मसीहा, एक आखरी विकल्प का भ्रम भी खत्म हो जाएगा तो अभी तक फासिस्टों द्वारा भयावह परिस्थितियों में धकेली गई जनता मौजूदा फासीवादी व्यवस्था के खिलाफ उठ खड़ी होगी। और ये बुर्जुआ उदारवादियों को कतई बर्दाश्त नहीं होगा क्योंकि फासीवादी लूट के खिलाफ उठे जनाक्रोश में, (भूषण सरीखे) उदारवादियों के अतिप्रिय बुर्जुआ जनतंत्र को भी साथ बहा ले जाने का खतरा निहित है। यह है प्रशांत भूषण के साहस और प्रतिबद्धता का स्रोत जो कि हमें आज के भयानक और स्थाई आर्थिक संकट के दौर में बुर्जुआ जनतंत्र की भंगुरता को बेनकाब करने में मदद करता है, जो कि अपने भीतर से ही फासीवादी प्रवृत्तियों को जन्म दे रहा है। प्रशांत भूषण की इच्छा है कि न्यायतंत्र अपने 2014 के पहली वाली भूमिका अख्तियार कर ले, लेकिन ये संभव नहीं है। अपने उदारवादी चरित्र की वजह से वे उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं है। वे मानने को तैयार नहीं है कि न्यायतंत्र जिस जगह चला गया है वह वहां से तब तक वापस नहीं आ पाएगा जब तक सर्वहारा वर्ग के नेतृत्व में जनता की क्रांति मौजूदा व्यवस्था में हस्तक्षेप करके पूंजी की बेड़ियों से आजाद एक नए समाज का निर्माण ना कर दे। वे यह बात समझ नहीं पा रहे, या एक बुर्जुआ उदारवादी होने के कारण यह बात उनके समझने की क्षमता से परे है कि मौजूदा फासीवादी शासन को उस “सेफ्टी वाल्व” की कोई जरूरत नहीं है। ना ही ऐसे किसी उदारवादी शख्सियत की जरूरत है जो शासकों की अंतरात्मा को जगा दे। भूषण जैसे लोग सोचते हैं कि उनकी साहसी लड़ाई से स्थिति बदल जाएगी। मौजूदा स्थाई वैश्विक आर्थिक संकट की स्थिति में, जो कि कोविड-19 महामारी के आने के बाद और गहरा गया है, पूंजीपतियों के लिए जनतंत्र के परदे के पीछे से अपनी लूट और शोषण जारी रखना संभव नहीं है क्योंकि उसके रहने से इन्हें “कानून के नियमों” के अनुसार चलना पड़ेगा जिसका मतलब है जनता के मौलिक अधिकारों को मानना और यह उनकी खुली लूट के उद्देश्य में जरूर बाधा पहुंचाएगा। इस कंटे-छंटे जनतंत्र को बरकरार रखते हुए वो अपनी खुली लूट को अंजाम नहीं दे सकते जैसे वो अभी दे रहे हैं। इसकी वजह से विश्व भर के बुर्जुआ जनतंत्रों में फासीवाद का उभार या फासीवादी शासकों का सत्ता में आना देखा जा रहा है, जिसके तहत बुर्जुआ जनतांत्रिक संस्थान ऐसी भूमिका अख्तियार कर रहे हैं जो खुद उन्हीं के खिलाफ जाता है ताकि वे बड़े पूंजीपतियों के फासीवादी उद्देश्य की पूर्ति कर सकें। बुर्जुआ जनतांत्रिक व्यवस्था में जनतांत्रिक अधिकारों और संस्थानों के द्वारा शक्तियों का संतुलन बनाए रखने और शासक वर्ग की ताकतों पर काबू करने की भूमिका का भ्रम भी अब बड़े पूंजीपतियों के लिए प्राकृतिक या मानव निर्मित सभी संसाधनों पर कब्जा करने में बाधा बन रहा है। अतः यह रूपांतरण उस बुर्जुआ जनतांत्रिक व्यवस्था के लिए काफी सहज था जो शुरुआत से ही कभी असल में जनतांत्रिक थी ही नहीं और ना हो सकता थी। बेतहाशा लूट की जरूरत ने फासीवाद और फासीवादी प्रवृत्तियों के पैदा होने के लिए उपयुक्त जमीन की जरूरत को जन्म दिया। कटे-छंटे बुर्जुआ जनतंत्र के फासीवाद में परिवर्तित हो जाने की सहज प्रक्रिया प्रशांत भूषण सरीखे उदारवादियों की समझ से परे थी, जो उस पुराने कटे-छंटे जनतंत्र को ही सच्चा, उत्तम और शोषित-उत्पीड़ित जनता की समस्याओं का एक मात्र समाधान मानते थे, और उसके असली रूप को नहीं देख पाते थे जहां वो खुद ही शोषण करने का एक हथियार था। और इसीलिए, अभी जो लोग प्रशांत भूषण के बुर्जुआ जनतंत्र के प्रति वफादारी नहीं देख पाते और उम्मीद करते हैं कि वो अपना वर्ग हित छोड़ देंगे और बुर्जुआ जनतंत्र की दहलीज को पार कर लेंगे, उनका मौजूदा स्थिति के मूल्यांकन में गलती करना तय है।  

वहीं दूसरी तरफ, दुसरा गुट है, जिसमें मुख्य धारा के और संसदीय वाम दल मौजूद हैं, जिन्होंने बहुत पहले ही मजदूर मेहनतकश वर्ग के सदर मुकाम के रूप में अपनी भूमिका छोड़ दी है और इसीलिए बड़ा सामान्य था उनके लिए प्रशांत भूषण के साहस पर मंत्रमुग्ध हो कर उनके, यानी एक बुर्जुआ जनवादी, के पीछे “निष्ठापूर्वक” लामबंद हो जाना। उनकी छवि में, वामपंथियों की ये धारा, अपनी खुद की छवि देखते हैं और एक राहगीर पाते हैं। जाहिर है, ये मौजूदा परिस्थिति में अपनी भूमिका तय करने में बुरी तरह असफल रहे हैं। उनका क्रांति के रास्ते से युगों पुराना और गंभीर भटकाव, और कम्युनिस्ट क्रांतिकारियों का फासीवादी ताकतों के खिलाफ लड़ाई का सही रास्ता लेने की अंतर्बाधा और अक्षमता ने एक ऐसी स्थिति बना दी है जहां भूषण की जय-जय कार करना और बिना शर्तों के उनके पीछे चलना ही इनकी किस्मत हो गई है। बेचैनी और निराशा की इस स्थिति में, बिना किसी भटकाव के, अपनी भूमिका का सही मूल्यांकन संभव ही नहीं है। उनके लिए समर्थन करने का मतलब होता है कमियों पर परदा डाल देना और सर्वहारा वर्गीय आन्दोलन की नेतृत्वकारी भूमिका को इन बुर्जुआ उदारवादियों के सामने समर्पित कर देना। ठीक इसी तरह, भीतर के इन विरोधों से दूरी बनाने की प्रवृत्ति, वो भी केवल इसीलिए कि वे विरोधी खेमे के अन्दर से उठ रही हैं, हमारे भटकावों से ग्रसित आन्दोलन के उसी दुखद कहानी का दूसरा पहलु है। दोनों ही गुट मौजूदा परिस्थिति के अनुसार सही कार्यभार निकालने में समान रूप से अक्षम साबित हुए हैं।  

कम्युनिस्ट ताकतों की भूमिका और आगे का रास्ता

इतिहास गवाह है कि जनतांत्रिक अधिकारों पर हुए हमलों या आम जनता पर ढाए गए हर जुल्म और दमन के खिलाफ कम्युनिस्ट हमेशा डट कर खड़े रहे हैं। विरोध करने का अधिकार और बोलने की आजादी की लड़ाई में कम्युनिस्ट जमात हमेशा से अपना दायित्व निभाते आए हैं और वही हैं जो इस लड़ाई में अंत तक बने रहेंगे। सीमाएं तो प्रशांत भूषण सरीखे लोगों की है, जैसा कि ऊपर बताया गया है, जिनकी लड़ाई का दायरा बुर्जुआ जनतंत्र की दहलीज के बाहर नहीं जा पाता। लेकिन वामपंथियों के साथ समस्या यहां है कि वे, उपरोक्त चर्चा में आए कमजोरियों और भटकावों की वजह से, लड़ाई की कमान इन बुर्जुआ उदारवादियों के हाथ में दे देते हैं और उनके पीछे चल देते हैं; और अतः लड़ाई का दायरा बुर्जुआ जनतंत्र की दहलीज लांघ ही नहीं पाता। ‘सभी के लिए न्याय’ के उद्देश्य को पूरा करने के लिए, सभी तरह के शोषण और दमन से मुक्त एक सच्चा जनतंत्र स्थापित करने के लिए, सभी लोगों के अधिकारों को और उन अधिकारों को प्रयोग करने की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने के लिए जरूरी है कि मौजूदा फासीवादी शासन और पहले के बुर्जुआ जनतंत्र को, जो मेहनतकश जनता के लिए कभी सच्चा जनतंत्र था ही नहीं, का खात्मा कर दिया जाए। जनता के लिए 2014 के पहले के जनतंत्र में जाने का कोई विकल्प नहीं है, जिसका सपना प्रशांत भूषण सरीखे बुर्जुआ जनवादी अक्सर देखते रहते हैं। इसीलिए जब शोषित और उत्पीड़ित जनता सच्चे जनतंत्र, न्याय, रोजगार, भोजन और स्वास्थ्य सेवा, इज्जत और समानता की लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर आएगी, तब प्रशांत भूषण जैसे बुर्जुआ जनवादी इसे एक “अनावश्यक अवज्ञा” के रूप में देखेंगे और हाशिये पर की गरीब मेहनतकश जनता के कंधे से कंधा मिला कर लड़ने के बजाय वह राज्य का साथ देंगे ताकि “मामले को अपने हाथ में लेते इन विद्रोहियों को” और “कमजोर और उत्पीड़ित जनता की उम्मीदों के आखरी रखवाले [सुप्रीम कोर्ट]”[1] के ईश्वरीय न्याय के लिए इंतजार नहीं करने वालों के संघर्ष को कुचला जा सके। तब एक नई दुनिया बनाने बनाम यथास्थिति बनाए रखने की लड़ाई में, वो यथास्थिति का साथ देंगे। और इस बुर्जुआ यथास्थिति के प्रति उनके लगाव की वजह से, जब युद्ध का बिगुल फूंका जाएगा तो, हमें आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए अगर हम उन्हें मोदी सरकार की पंक्तियों में पाएं।   

लेकिन अभी के लिए, हमें यह समझना चाहिए कि इन जनतांत्रिक संघर्षों का साथ देना, उनके कटे-छंटे जनतंत्र की सीमा से बंधे हुए होने के बावजूद, जरूरी है क्योंकि ये हमारा कर्तव्य है और दबी-कुचली जनता के पक्ष में है कि हम इसके समर्थन में रहें और, अगर संभव हो, तो ऐसे संघर्षों का नेतृत्व करें ताकि इन्हें अंत तक और उस सीमित क्षितिज के पार ले जाया जा सके, और मजदूर मेहनतकश जनता के एक नई दुनिया बनाने के संघर्षों के साथ जोड़ा जा सके। कम्युनिस्ट ताकतों के लिए यह बेहद जरुरी है कि वे ऐसी परिस्थितियों का मूल्यांकन करते समय वाम और दक्षिणपंथी दोनों तरह के भटकावों से बचें, और ऐसे बुर्जुआ उदारवादियों और उनके नेतृत्व में उठे संघर्षों का सही आंकलन करें ताकि हम इन संघर्षों का ज्यादा से ज्यादा फायदा ले पाएं और हमारे हिसाब से व ऐसे भीतरी संघर्षों के फलस्वरूप उभरी दरारों और अंतर्विरोधों के अनुसार इनकी गति को कार्यनीतिक पहलु से बढ़ा-घटा सकें। यह तभी संभव है जब हम ऐसे संघर्षों के शीर्ष पर रहें। हमें बिना किसी भटकाव के यह करना सीखना होगा। ऐसे संघर्षों में अपनी नेतृत्वकारी भूमिका को पूरी तरह इन बुर्जुआ उदारवादियों को सौंप कर हम असल में उस कला को त्याग देते हैं जो हमारे संघर्षों की सफलता की सच्ची शर्त है, ऐसे संघर्ष जो एक सच्चे जनतांत्रिक समाज की तरफ लक्षित हैं जहां एक मनुष्य द्वारा दूसरे का शोषण संभव नहीं होगा और जहां असमानता, अन्याय और भेद-भाव का नामोनिशान तक नहीं होगा।


[1] प्रशांत भूषण द्वारा अपनी सजा के बाद सुप्रीम कोर्ट का विवरण (अनुवाद)

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 5/ सितंबर 2020) में छपा था

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