पेट्रोल, डीज़ल, गैस के नाम पर हो रही सरकारी लूट के ख़िलाफ़ उठ खड़े हो!!

एस. वी. सिंह //

“हर साल देश के 2 करोड़ युवाओं को रोज़गार, हर एक को सन 2022 तक पक्का घर, स्विस बैंकों में जमा अकूत काला धन वापस लाया जाएगा जिससे हर नागरिक के खाते में रु 15 लाख जमा होंगे और इतना कर वसूल होगा कि सालों तक किसी को कोई कर देना ही नहीं पड़ेगा, जन स्वास्थ्य के लिए उत्तम व्यवस्थाएं, एक भारत श्रेष्ठ भारत, ये करेंगे, वो करेंगे...”  2014 लोक सभा चुनाव से पहले की गई ये घोषणाएँ कुछ इस अंदाज़ में हुई थीं कि अभी तक ज़हन में गूंज रही हैं, ऊँची कर्कश कानफोडू आवाज, हाथ-आँख के अद्भुत समायोजन के साथ महामानवीय ठसक में एकदम लयबद्ध नाटकीय अंदाज़ में हर सभा में हर रोज़। उसके बाद इन बोल वचनों को हर व्यक्ति के ज़हन में ठूंसने की ज़िम्मेदारी टुकड़खोर मिडिया की थी जिसने सौंपा गया काम पूर्ण समर्पण के साथ अंजाम दिया। उसके साथ ही अंधराष्ट्रवाद और मज़हबी खुमारी की कॉकटेल; भोले- भाले बदहाल लोग जो काँग्रेसी कुशासन और भ्रष्टाचार से पहले से ही त्रस्त थे उस आंधी में बहने से खुद को नहीं रोक पाए। विश्वगुरु बन जाने के नशे की खुमारी में वे चुनाव केन्द्रों पर ऐसे टूट कर पड़े कि परिणामों पर भाजपा खुद दंग रह गई। किसी भी कोने से उठने वाली किसी भी समझ, विचार को कि, ये सब प्रपंच बड़े पूंजीपतियों की दौलत के बल पर हो रहा है क्योंकि पूंजीवादी व्यवस्था का संकट और असाध्य रोग अब हल होने की संभावना से परे निकल गया है और सत्ता अपने सबसे भयानक रूप फ़ासीवाद का सहारा लेने को ऐसा कर रही है, लोगों ने मखौल बनाकर दुत्कारा और झटक दिया। 2019 में तो ऐसी किसी घोषणा की भी ज़रूरत नहीं पड़ी। सीमा पर ऐसी स्थिति बनाई गई और अंधराष्ट्रवाद के नशे को चरम पर पहुंचा दिया गया। घर में घुसकर मारने की बेख़ुदी ने सब दुःख दर्द भुला दिए और पहले से भी ज्यादा ताक़त के साथ फिर से मोदी सरकार प्रकट हुई। कुल 6 साल का ‘विकास’ आज हम सब के सामने है!! हर नागरिक के जीवन को प्रभावित करने वाली मदों, डीज़ल, पेट्रोल और गैस की कीमतों के सन्दर्भ में मोदी सरकार के प्रदर्शन का वस्तुपरक मूल्याङ्कन करना इस लेख का उद्देश्य है।

कच्चे तेल का दाम अभूतपूर्व न्यूनतम स्तर पर है और पेट्रोल-डीज़ल-गैस के दाम अभूतपूर्व उच्चतम स्तर पर

सभी जानते हैं कि सरकारों ने जब भी डीज़ल-पेट्रोल के दाम बढाए उसकी एक ही वज़ह बताई गई कि अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में कच्चे तेल (क्रूड आयल) के दाम बढ़ गए इसलिए पेट्रोल डीज़ल के दाम बढ़ाने ज़रूरी हो गए थे। आज कोरोना उपरांत की दुनिया में वो घट रहा है जो अविश्वसनीय है और जो कभी नहीं घटा। 27 अप्रेल 2020 को विश्व तेल मूल्य निर्धारित करने वाला मानक ‘वेस्ट टेक्सास इंटरमीडिएट’ में कच्चे तेल का दाम इतिहास में पहली बार नेगेटिव में, मतलब शून्य से भी नीचे -$37.63 पर बन्द हुआ। कोरोना नाम की भयावह वैश्विक महामारी ने विश्व अर्थ व्यवस्था को उलट पलट कर रख दिया है। कोरोना माहमारी के चलते बन्द पड़े अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार, कहीं कोई मांग नहीं, दूसरी तरफ़ सऊदी अरब के नेतृत्व में तेल उत्पादन एवं निर्यात संस्थान (ओपेक), रूस और अमेरिका के तेल कीमतों को लगातार कम करते जाने और उत्पादन मात्रा सम्बन्धी शर्तों को पालन ना करने के ‘तेल व्यापर युद्ध’ के चलते तेल आपूर्ति, तेल की मांग से लगभग 10 मिलियन (1 करोड़) बैरल प्रति दिन के हिसाब से अधिक हो गई। पर्यावरण नियमों के चलते तेल को समुद्र में भी बहाया नहीं जा सकता। इन सब कारणों ने मिलकर ऐसे स्थिति पैदा की कि क्रूड के भाव नकारात्मक हो गए। इसका मतलब ये हुआ की तेल उत्पादक देश, तेल को मुफ़्त ही नहीं बल्कि ‘तेल भी ले लो और साथ में पैसे (मतलब डॉलर) भी लो’ ऐसा करने को मज़बूर हो गए!! क्या कोई इस बात पर भरोसा कर सकता है!! ऐसा इससे  पहले कभी नहीं हुआ। और यहाँ, अपने प्यारे देश में तेल के दाम के मामले में उसी वक़्त क्या हो रहा था? जितना कच्चे तेल का दाम अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में नीचे आता गया उतना ही नहीं बल्कि उससे कहीं अधिक कर सरकार उसपर लगाती गई जिससे जो राहत आम उपभोक्ता को मिलनी चाहिए थी वो तो छोडिये उनपर और ज्यादा बोझ लादा जाता गया और पेट्रोल डीज़ल के दाम बेतहाशा बढ़ते गए। इन्डियन एक्सप्रेस में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले 74 साल का कच्चे तेल के भाव का ग्राफ देखा जाए तो हम पाते हैं कि “भारत के कच्चे तेल खरीदी का औसत मूल्य कई दशकों में सबसे नीचे स्तर पर पहुँच गया है। इतना नीचे कि मई 2020 में ये $19.9 प्रति बैरल पर पहुँच गया जबकि इसी साल मार्च में $33.36 प्रति बैरल था और जनवरी में $64.31 प्रति बैरल। इन सब तथ्यों के बावजूद भी सरकार डीज़ल पेट्रोल के दाम बढ़ाने को उचित ठहराने में क़ामयाब होती जा रही है। “अगर प्रजा मूर्ख हो तो राजा अपनी विफलताओं का भी जश्न मनवा सकता है!!” प्रतिष्ठित व्यंग्यकार हरिशंकर परसाईं जी का ये व्यंग्य याद आ जाता है। यही वज़ह है कि सरकार लोगों को कूपमंडूक बनाए रखने, उन्हें मज़हबी मुद्दों, मंदिर-मस्जिद झमेलों में उलझाए रखने, पुराने दकियानूसी विचारों और अंधविश्वासों में लिप्त रखने के लिए बहुत अधिक संसाधन खर्च कर रही है। भूखे, बदहाल, बीमार लोग असली कठोर सच्चाई ना जान पाएं और अंधराष्ट्रवाद के नशे की खुमारी में टुन्न रहें, हमेशा ग़फलत में रहें इसके लिए सभी संभव प्रयास ज़ारी रहते हैं। अभी तक मोदी सरकार अपने मंसूबों में क़ामयाब भी होती जा रही है ये स्वीकार करना पड़ेगा। इतिहास, लेकिन, हमें सिखाता है कि शासकों की ये नीति हमेशा के लिए क़ामयाब नहीं होती और जिस दिन आम जन को असलियत समझ आ जाती है, वे वर्ग चेतना से लैस हो जाते हैं, उनका क्रोध कई गुना बढ़ जाता है और वो कितनी भी चालाक और धूर्त सत्ता को उखाड़ फेंकते हैं। सब लोगों को कुछ दिन, कुछ लोगों को हमेशा के लिए मुर्ख बनाया जा सकता है लेकिन सब लोगों को हमेशा के लिए मुर्ख नहीं बनाया जा सकता!! कभी कभी एक छोटी सी चिंगारी दावानल बन जाती है, सत्ताओं को ये याद दिलाना पड़ता है।  

पेट्रोल-डीज़ल-गैस पर सरकार हमसे पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स वसूल रही है

अपने 6 साल के कार्यकाल में मोदी सरकार देश की जनता से डीज़ल और पेट्रोल पर कुल रु 14.66 लाख करोड़ का टैक्स वसूल चुकी है!! इस वक़्त बाज़ार भाव के हिसाब से, कच्चा तेल खरीदी, भाड़ा, शुद्धिकरण, रिफाइनरी का खर्च, भण्डारण का खर्च सब मिला लिया जाए तो भी पेट्रोल का दाम रु 32.98 प्रति लीटर और डीज़ल का दाम रु 31.83 प्रति लीटर से ज्यादा नहीं होना चाहिए। जबकि इन आवश्यक पदार्थों को 250% से भी अधिक दामों पर बेचा जा रहा है। इस सरकारी लूट को किस तरह अंजाम दिया जा रहा है; आईये देखें:

 नवम्बर 2014 को करअगस्त 2017 को करजुलाई 2020 को कर
पेट्रोल पर प्रति लीटर उत्पाद शुल्करु 9.20रु 21.48रु 32.98
डीज़ल पर प्रति लीटर उत्पाद शुल्करु 3.46रु 17.33रु 31.83
पेट्रोल पर वैट20%27%30%
डीज़ल पर वैट12.5%16.75%30%

डीज़ल एक मूलभूत आवश्यक इन्धन है। डीज़ल में कीमत वृद्धि का सीधा असर कुल मंहगाई पर पड़ता है। डीज़ल की अखिल भारतीय  कुल खपत क्षेत्रानुसार देखी जाए तो हम पाएँगे कि कुल खपत के 13.15% हिस्से को निकाल दिया जाए जो कारों में उपयोग होता है तो डीज़ल की बाक़ी सारी खपत मतलब 76.85% का सीधा सम्बन्ध आम ग़रीब आदमी के जीवन से जुड़ा हुआ है। यातायात और सामान भाड़ा, सड़क मार्ग से हो या रेल मार्ग से, डीज़ल का दाम बढ़ने पर सीधा उसी अनुपात में बढ़ जाता है। कुछ दिन पहले बसों-रेलगाड़ियों के किराए बढ़ने पर ज़ोरदार आन्दोलन हुआ करते थे और अधिकतर बार सरकारों को बढे किराए पूरे नहीं तो आंशिक रूप से वापस लेने को मज़बूर होना ही पड़ता था। आज स्थिति ये है की भाड़े बढ़े हैं ये घोषणा करने की ज़रूरत ही नहीं समझी जाती। जब जितना चाहे बढ़ाते जाइये, लोगों का खून निचोड़ते जाइये! किसानों के लिए घड़ियाली आंसू बहाने और चुनाव सभाओं में किसानों के बीच असलियत में आंसू बहाने वाले मोदी जी को ये याद नहीं कि किसानों का तो सारा काम ही आजकल डीज़ल पर निर्भर है, डीज़ल के दाम बढ़ने से ‘मेरे प्यारे किसान भाईयों’ पर क्या प्रभाव पड़ेगा?? मोदी सरकार आने से पहले डीज़ल के दाम पेट्रोल के मुकाबले 12 से 15 रुपये कम हुआ करते थे आज बराबर हैं। ये ‘राष्ट्रवादी’ मोदी सरकार आम ग़रीब लोगों के प्रति इतनी समर्पित है!!  

आईये, दुनियाभर से नहीं तो कम से कम अपने पड़ोसी देशों से पेट्रोल दामों की तुलना की जाए:

एक लीटर पेट्रोल के लिए हमारे पड़ोसी देशकितना भुगतान कर रहे हैं? भारतीय रुपये में
पाकिस्तानभारतीय रुपये में 57.83
श्रीलंकाभारतीय रुपये में 64.12
नेपालभारतीय रुपये में 68.30
बांग्लादेशभारतीय रुपये में 73.06

भारत श्रीलंका मुक्त व्यापर समझौते (ISLFTA) 1993 के अनुसार, भारत, श्रीलंका को तेल एवं अन्य पदार्थ करमुक्त आधार पर उपलब्ध करता है। सूचना अधिकार अधिनियम 2005 के मुताबिक भारत 15 देशों को पेट्रोल रु 34.00 प्रति लीटर और 34 देशों को शुधिकृत डीज़ल रु37.00 प्रति लीटर की दर से उपलब्ध कराता है।  श्रीलंका सरकार हमारे देश से पेट्रोल और डीज़ल क्रमश: रुपये @34 और @37 प्रति लीटर में खरीदकर प्रति लीटर @64.12रुपये प्रति लीटर में बेच रही है।

अपने पसंदीदा नियम ‘आपदा में अवसर’ को अपनाते हुए, जब लोगों का कोरोना महामारी की वज़ह से घर से निकलना बन्द था तब मोदी सरकार ने 6 मई 2020 को फिर से पेट्रोल डीज़ल उत्पाद शुल्क को बढाकर एक झटके में लोगों की जेब से रु 1.6 लाख करोड़ खींच लिए। विदित हो कि इससे मात्र 2 महीने पहले 15 मार्च 2020 को भी सरकार ने पेट्रोल डीज़ल पर उत्पाद शुल्क बढाकर लोगों से रु 34000 झटके थे! मोदी जी ने जो भारत को विज्ञानं तकनीक विकास और मान मर्यादा में विश्व गुरु बनाने का वादा किया था उसके तहत तो हम मानव विकास के सभी मापदंडों जैसे भुखमरी, बाल विकास, महिला एवं बाल स्वास्थ्य आदि में दुनिया में सोमालिया के बराबर पहुँच गए और नीचे ही गिरते जा रहे हैं लेकिन डीज़ल पेट्रोल पर कर लगाने में हमें  ज़रूर विश्व गुरु बना दिया है। मोदी सरकार भारत के कंगाल लोगों से पेट्रोल डीज़ल पर दुनिया में सबसे ज्यादा टैक्स वसूल रही है। 2014 में सत्ता हासिल करने के बाद से आज तक सरकार पेट्रोल डीज़ल पर कुल 5 बार टैक्स बढ़ा चुकी है। ‘मोदी है तो मुमकिन है’ नारा इस रूप में चरितार्थ हो रहा है।

हवाई ज़हाज़ का इंधन: दुनिया में कच्चे तेल के दामों में आ रही अभूतपूर्व गिरावट के मद्दे नज़र सरकार ने हवाई ज़हाज़ में उपयोग होने वाले पेट्रोल के दामों में 23% की कमी की। आज स्थिति ये है कि हवाई ज़हाज़ में इस्तेमाल होने वाला पेट्रोल आज रु 22.54 प्रति लीटर में उपलब्ध है जबकि स्कूटर मोटर साइकिल में इस्तेमाल होने वाले पेट्रोल के दाम हरियाणा में रु 77.39 प्रति लीटर है। ग़रीब लोग पेट्रोल के दाम अमीरों के मुकाबले 350% मतलब साढ़े तीन गुना ज्यादा चुका रहे हैं!! इतनी चिन्ता करते हैं मोदी जी ‘मेरे प्यारे ग़रीब भाइयो बहनों’ की!! मौजूदा सरकार का हवाई यात्रा करने वालों से कुछ विशेष ही प्रेम है। ये पिछले महीनों में भी ज़ाहिर हुआ था जब अपने रोज़गार गँवा चुके विस्थापित मज़दूर भूखे बेहाल देश के एक कोने से दूसरे कोने तक पैदल यात्रा कर रहे थे और रस्ते में भूख से या फिर दुर्घटनाओं में मर रहे थे और उनके लिए रेलगाड़ियाँ मयस्सर नहीं थीं उसी वक़्त मोदी सरकार विदेशों में फंसे अमीरों को लाने के लिए विशेष विमानों की व्यवस्था की जा रही थी।

पेट्रोल उपकर (सेस): पेट्रोल-डीज़ल-गैस के दामों के रूप में हो रही खुली लूट की जब कोई दखल नहीं ले रहा है और लोग प्रतिकार में सडकों पर उतर अपनी ताक़त दिखाने की बजाए इन झटकों को बिना कुलबुलाए सहन करते जा रहे हैं तब केंद्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारें भी बहती गंगा में हाथ धोने का अवसर भला क्यों छोड़ें!! बकरे को हलाल करने के लिए वे भी अपनी छुरी निकालकर और कर ठोकते जा रहे हैं। किसी भी कर या दूसरी किसी वसूली के साथ ही पेट्रोल उपकर (सेस) लगाकर अपने ख़जाने भर रहे हैं। उदाहरणार्थ, हरियाणा सरकार 19000 रुपये के बिजली बिल में रु 955 पेट्रोल उपकर वसूल रहे हैं। मानो देश में लूट की राष्ट्रीय खुली  प्रतियोगिता चल रही है!!    

रसोई गैस की अभूतपूर्व गति से बढ़ती कीमतें: 2014 में जब ये स्वयं घोषित एवं प्रचारित ‘देशभक्त’ सरकार सत्ता में आई थी तब रसोई गैस का एक सिलिंडर दिल्ली में रु 220 में आता था। जिसे बहुत मंहगा बताकर और ग़रीब गृहणियों पर अन्यायकारक बताकर भाजपा ने देश भर में सिर पर गैस का खाली सिलिंडर रखकर प्रदर्शन किए थे। आज भी वो वीडियो देखे जा सकते हैं। आज वही सिलिंडर रु 858.50 में आ रहा है और ये अन्यायकारक नहीं माना जा रहा क्योंकि कहीं कोई आन्दोलन प्रतिरोध होता नज़र नहीं आता। गैस के दाम पिछले 6 सालों में कुल कितनी बार बढाए गए हैं, गिनती करना मुश्किल है। हर बार गैस सिलिंडर की कीमत पिछले महीने से ज्यादा ही पाई जाती है।

सरकारी लूट के विरुद्ध जन आन्दोलन

‘खून बहता भारत’: तेल-गैस दामों के ज़रिए हो रही सरकारी लूट के विरुद्ध देश भर में जन आन्दोलन हुए हैं। सबसे असरदार आन्दोलन कोच्ची केरल में हुए हैं जहाँ इन आन्दोलनों का नाम ‘रक्त बहता भारत’ दिया गया है इसके तहत लोगों ने, यह जताते हुए कि बार बार कीमतें बढ़ाना लोगों का खून निचोड़ने जैसा है, राज्य भर में रक्त दान किया। आन्दोलन के संयोजक यू। एस। आशीन ने बताया, “डीज़ल-पेट्रोल कीमतों में लगातार होती जा रही मूल्य वृद्धि आम आदमी की कमर तोड़ने वाली है जिसका प्रभाव दूसरे सारे क्षेत्रों में भी पड़ रहा है। सब लोग चुपचाप सहन करते जा रहे हैं। जब तक हम घरों से बाहर निकलकर अपना विरोध दर्ज नहीं करेंगे, कुछ नहीं होगा। ” ‘केरल राज्य विकलांग-कुर्सी अधिकार संगठन’ के विकलांग भाईयों-बहनों ने भी रक्त दान में हिस्सा लिया और राजेंद्र मैदान में धरना दिया ताकि सरकार को शर्म आए। जन आन्दोलन पूरे देश भर में हुए हैं, पंजाब के किसानों ने कई जगह ट्रेक्टर रैलियां की हैं लेकिन कोरोना महामारी के चलते लॉक डाउन के हालात में लोग अपने घरों से निकल नहीं पा रहें और सरकार शातिर सूदखोर वाले अंदाज़ में ‘महामारी में अवसर’ की अपनी निति के तहत  परिस्थिति का अधिकतम लाभ, लोगों का खून निचोड़ने के अपने कर्म में, लेने से नहीं चूक रही। मोदी सरकार मेहनतकश लोगों के विरुद्ध अब तक की सबसे ज्यादा संवेदनहीन सरकार साबित हुई है जिसे लोगों के मरने-जीने से कुछ लेना देना नहीं। आन्दोलन करने के नाम के लिए आन्दोलन की औपचारिकता से सरकार की मोटी चमड़ी पर रत्तीभर भी फर्क नहीं पड़ रहा और जो आन्दोलन इस जन द्रोही सरकार को ये असहनीय मूल्य वृद्धि वापस लेने को विवश कर दे ऐसे आन्दोलन कोरोना महामारी के चलते हो नहीं पा रहे। इसलिए सरकार शोषण की चक्की को और तेज़ घुमाती जा रही है। हालाँकि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने ये देखते हुए कि लोगों को फिर से बहकाने के लिए किस मुंह से उनके पास जाएँगे, डीज़ल-पेट्रोल के दामों में कुछ कटौती पिछले हफ़्ते की है जो ऊंट के मुंह में जीरा जैसी बात है। भाजपा भी उसे नाकाफ़ी बता रही है और इस बात को कहते वक़्त बिलकुल शर्म महसूस नहीं कर रही। दरअसल शर्म वगैरह का ज़माना बहुत पीछे छूट चुका है।

देश के राज्यों में तेल की स्मगलिंग–छीना झपटी: लोगों का खून निचोड़ने में राज्य सरकारें भी कोई कसर नहीं छोड़ रहीं। राज्यों में बिक्री कर की दर समान ना होने के कारण हर राज्य में डीज़ल-पेट्रोल का रेट अलग है। इस स्थिति ने एक नए तरह की स्मगलिंग को जन्म दिया है; राज्य की सीमा से बाहर जाकर तेल खरीदना। ये छीना झपटी दिल्ली-एन सी आर के नाम से जाने जाने वाले भाग में ज्यादा नज़र आती है। यू पी और हरियाणा के उपभोक्ता आजकल दिल्ली से पेट्रोल डीज़ल खरीद रहे हैं जिससे इन प्रदेशों के पेट्रोल पंप उजाड़ नज़र आते हैं। इसी मुद्दे पर पंजाब के डीलर 29 जुलाई को हड़ताल भी कर चुके हैं। इस हालत का विपरीत असर पेट्रोल पंप पर काम करने वाले मज़दूरों के काम और रोज़गार पर स्वाभाविक रूप से पड़ता है।

पेट्रोल-डीज़ल मूल्य वृद्धि के विरुद्ध दुनिया भर में हो रहे जन आन्दोलन 

ईरान: नवम्बर 2019 में ईरान की सरकार ने नई तेल नीति की घोषणा की जिसमें तेल की खपत पर राशन लगाया गया और पेट्रोल, डीज़ल और गैसोलीन के दाम 70% बढ़ा दिए। लोग गुस्से में उबल पड़े और देशभर में ज़बरदस्त विरोध आन्दोलन खड़े हो गए। ‘तेल के बढे हुए दाम तुरंत वापस लो’ के अतिरिक्त भी एक नारा गूंजने लगा, ‘हमें इस्लामिक गणराज्य नहीं चाहिए, नहीं चाहिए, नहीं चाहिए’। ईरानी अयातुल्लाओं की फासिस्ट सरकार ने बिलकुल वही किया जो हर फासिस्ट सरकार आजकल कर रही है। पुलिस और पैरा मिलिटरी को प्रदर्शनकारियों से सख्ती से निबटने के लिए, जो चाहे करो, ये आदेश दे दिए। तेहरान में जिस दिन एक विशाल प्रदर्शन होने वाला था उसी दिन हथियार बंद सैनिकों ने इमारतों की छतों पर ऐसी मोर्चाबन्दी की जैसे दुश्मन के ख़िलाफ़ की जाती है। जैसे ही प्रदर्शन बीच शहर पहुंचा, गोली चलाने के आदेश दे दिए गए। तेहरान की सड़कें लहू लुहान हो गईं। कुल 270 प्रदर्शनकारी मारे गए। अधिकतर को गोलियां उनके सिरों में लगी थीं। कई हज़ार ज़ख़्मी हुए। इसके बाद जो हुआ वो अभी तक कहीं नहीं हुआ। इस नरसंहार के लिए सरकार ने पुलिस-फौज को ज़िम्मेदार ठहराने की बजाए आन्दोलन का नेतृत्व कर रहे नेताओं, आमिर हुसैन मोराडी, मोहम्मद रज़बी और सईद तमजीदी को ही नरसंहार भड़काने के लिए दोषी मानकर गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर विशेष अदालतों में मुक़दमा चलाया गया और जैसा की ये ‘विशेष अदालतें’ अक्सर करती है, उन तीनों को 270 लोगों की हत्या के लिए दोषी मानते हुए उन्हें फांसी की सजा सुना दी जबकि वे तीनों प्रदर्शनकारी नेता बिलकुल निहत्थे थे। सुप्रीम कोर्ट ने भी न्याय की नौटंकी ज़ारी रखते हुए फांसी की सजा में कोई भी ढील देना ‘न्याय के विरुद्ध’ माना और फांसी का दिन भी तय कर दिया। इसके ख़िलाफ़ ईरान और दुनियाभर में आन्दोलन तीव्र होने की वज़ह से फांसी फिलहाल टल गई है लेकिन उसे वापस नहीं लिया गया है और उसे किसी भी दिन अंजाम दिया जा सकता है। ‘फांसी मत दो#’ ट्विटर पर चलाए गए इस हैश टैग में 50 लाख से भी अधिक लोग शामिल हुए।

फ़्रांस:  फ़्रांस की मेक्रों सरकार की पेट्रोल-डीज़ल दाम वृद्धि एवं पेंशन बदलाव और दूसरे जन-खर्च-कटौती की नीति के ख़िलाफ़ सबसे दीर्घकालीन और सशक्त जन आन्दोलनों की श्रंखला 17.11.2018 को शुरू हुई जो आज तक ज़ारी है। हर शनिवार को लोग फ़्रांस के सभी शहरों में पीले पट्टे (येलो वेस्ट) और जिलेट जोंस के नाम से होने वाले प्रदर्शनों में आज भी इकट्ठे होते हैं। येलो वेस्ट और जिलेट जोंस नाम देने का कारण ये है कि फ़्रांस में कम टैक्स दर वाले पेट्रोल को खरीदने के लिए लोगों को पीले रंग की ऐसी पट्टी पहननी होती है जैसी की सड़क पर काम करने वाले कुछ मज़दूर पहनते हैं। ये सप्ताहांत आन्दोलन पिछले पूरे साल ज़बरदस्त होते गए। कई जगह आगजनी और गोलीबारी की घटनाएँ भी हुईं जिनमें कम से कम 4 प्रदर्शनकारी मारे गए। प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि हिंसा और आगज़नी कराकर प्रदर्शन को बदनाम करने के लिए पुलिस अपने लोगों को प्रदर्शन में शामिल (प्लांट) करती है और फिर गोलियां चलाती है लेकिन हम इससे डरने वाले नहीं हैं। प्रदर्शनकारियों के मनोबल का अंदाज़ इस बात से लगाया जा सकता है कि मेक्रों सरकार ने डीज़ल-पेट्रोल पर बढाई गई मूल्य वृद्धि वापस ले ली है लेकिन आन्दोलन ज़ारी है क्योंकि लोग चाहते हैं कि सभी नव उदारवादी नीतियाँ वापस ली जाएँ।

चिली: “बात 30 पीसो (चिली की मुद्रा) की नहीं है, बात 30 साल की है” लेटिन अमेरिकी देश चिली में मेट्रो किराया और डीज़ल-पेट्रोल के दाम बढ़ने के विरुद्ध जो आन्दोलन हुए उनमें ये नारा हर रोज़, हर जगह गूंजा। इसका मतलब ये है कि आन्दोलनकारी चिली की सेबेस्टियन पिनेरा की सरकार को चुनौती देते हुए कह रहे थे कि आपने जो मेट्रो किराए में 30 पीसो की वृद्धि की है हमारे निशाने पर सिर्फ़ वो नहीं है बल्कि देश में जो नव उदारवादी नीतियाँ 30 साल से ज़ारी हैं, हमारे निशाने पर वो हैं। आपको वो सब नीतियाँ फाड़कर कचरे की डिब्बे में डालनी होंगी। चिली के खूनी तानाशाह पिनोचेट के दिनों से चिली ने जन आक्रोश की ऐसी लहर पहली बार ही देखी। राष्ट्रपति पिनेरा, जिसने कुछ दिन पहले ही शेखी बघारते हुए ऐलान किया था कि उनका देश ‘स्थिरता का स्वर्ग’ है, ने देशभर में इमरजेंसी लगा दी और कर्फ्यू की घोषणा कर दी। प्रदर्शनकारियों ने कर्फ्यू की भी कोई परवाह नहीं की और सरकार को बढे हुए दाम वापस लेने के लिए मज़बूर कर दिया। लोगों का गुस्सा फिर भी शांत नहीं हुआ और सरकार को नव उदारवादी नीतियाँ वापस लेने का अल्टीमेटम दे दिया। प्रचंड जन आक्रोश आन्दोलन जो अक्टूबर  2019 में शुरू हुए थे, 2020 में भी ज़ारी रहे। कोरोना महामारी ने पिनेरा सरकार की जान बचाई हुई है, लेकिन कब तक? ‘पर्यावरण अधिकार कार्यवाही नेटवर्क’ के संयोजक अल्जेंद्रा पारा कहते हैं, “चिली के नागरिक आन्दोलन ने सरकार के उन मंसूबों पर ठण्डा पानी फेर दिया है जो पिछले तानाशाह पिनोचेट के कार्यकाल में बुने गए थे जिसके तहत सारी जन सुविधाओं जैसे स्वास्थ्य, शिक्षा, पेंसन और मूलभूत ज़रूरतें जैसे पानी को निजी हाथों में सौंप दिया जाना था। ” 

एक्वाडोर: लेटिन अमेरिकी देश एक्वाडोर के राष्ट्रपति लेनिन मोरानो ने अक्टूबर 2019 में पेट्रोल-डीज़ल के दाम बढ़ा दिए। देश भर में आक्रोशित लोग सडकों पर आ गए। राजधानी क्विटो की सडकों को प्रदर्शनकारियों ने अपने कब्जे में ले लिया और देश की संसद को घेर लिया। राष्ट्रपति को अपनी सरकार को ही राजधानी से दूर ले जाना पड़ा। देश में आपातकाल घोषित कर दिया गया। प्रदर्शन रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। सैनिकों को निहत्थे लोगों पर गोली चलाने का हुक्म दिया गया जिससे कम से कम 7 प्रदर्शनकारी मारे गए और 1152 घायल हुए। इसके बाद भी प्रदर्शन नहीं रुके और सरकार को मूल्य वृद्धि वापस लेनी पड़ी।   

चीन अमेरिका व्यापार युद्ध, तेल युद्ध की अगली कड़ी है

विश्व पूंजीवाद का संकट असाध्य होता जा रहा है। दुनियाभर में कहीं भी नया बाज़ार अब झपटने के लिए नहीं बचा है। नई तकनीक से उत्पादन कई गुना बढाया जा सकता है लेकिन उसे बेचा कैसे जाए? मौजूदा बाज़ार को लेकर ही पूंजीवादी गिद्ध आपस में लड़ मर रहे हैं। ‘अपना सामान हर देश में बेरोकटोक जाए और दूसरे किसी भी राष्ट्र की वस्तुएं देश में प्रवेश ना करने पाएं’ सारे देशों की विदेश नीतियों, युद्ध नीतियों का ये सार है। बाज़ार का आकार लगातार घटता जा रहा है क्योंकि कंगाली बढती जा रही है। भारत के सम्पदा पिरेमिड पर गौर करने से स्थिति स्पष्ट हो जाएगी। देश की कुल 83.49 की वयस्क आबादी में 77.07 करोड़ लोग जो कुल आबादी का 63.1% जो पिरेमिड का आधार हैं, साल में $10000 से भी कम कमा पाते हैं। ये आबादी गिनती में ही बची है, असलियत में बाज़ार से बाहर हो चुकी है क्योंकि ये लोग जैसे तैसे जिंदा हैं या तो जीने लायक अनाज पैदा कर लेते हैं या खरीदने के नाम पर कुछ अनाज वगैरह ही खरीद पाते हैं। दूसरी कोई उपभोग की वस्तु खरीद ही नहीं पाते। पूंजीवादी व्यवस्था ने समुदाय से जिसे सर्वहारा के नाम से जाना जाता है सब कुछ छीन लिया है सिवाय उनकी श्रम शक्ति के। दूसरी सच्चाई ये है कि पिरेमिड में इनसे ऊपर वाले भाग में स्थित निम्न मध्यम वर्ग भी इनमें शामिल होता जा रहा है। सबसे ऊपर वाले खाने में कुल 760 व्यक्ति हैं जिनके पास कुल सम्पदा का आधे से ज्यादा हिस्सा है। बिलकुल इसी तरह दुनिया की कुल आबादी 780 करोड़ है लेकिन उसका भी 70% हिस्सा इतना निर्धन हो चुका है कि वो सिर्फ़ जीवित रहने के लिए ही कुछ आनाज या तो उगा लेता है या जैसे तैसे खरीद लेता है। कॉर्पोरेट को अपना माल बेचने को 780 करोड़ में से सिर्फ़ 234 करोड़ उपभोक्ता ही बचे हैं। इनमें भी ध्रुवीकरण की प्रक्रिया नव उदारवाद से तीव्र हुई है। 70% आबादी को कंगाल बनाकर भी पूंजीवाद पूरी तरह सांस नहीं ले पा रहा इसीलिए बाज़ार हड़पने के लिए पूंजीवादी-साम्राज्यवादी गिद्ध अपने जंगी जहाज़ लिए घूम रहे हैं और एक बड़ा जमावड़ा हमारे नज़दीक दक्षिण चीन महासागर में जमा होता जा रहा है। पूंजीवादी अन्यायी व्यवस्था ने बाज़ारों पर कब्जे के लिए पिछली शताब्दी में दो भयानक विश्व युद्ध लड़े हैं जिनमें करोड़ों लोगों ने अपनी जान क़ुर्बान की हैं। पूंजीवादी चमचमाते गढ़ों की बुनियाद करोड़ों लाशों पर खड़ी हुई हैं। आज खुला युद्ध अनियंत्रित विनाश ला सकता है क्योंकि हथियार अधिक से अधिक विनाशक हो चुके हैं और लगभग सभी देशों के पास न्यूक्लियर अस्त्र हैं। विश्व युद्ध छिड़ा तो बाज़ार का साइज़ बढ़ने की बजाय सारा बाज़ार ही स्वाहा हो सकता है इसलिए आज वो युद्ध वाला पर्याय भी नहीं बचा। इसलिए विशाल युद्ध ना छेड़कर छोटे छोटे युद्ध या युद्ध जैसा माहौल बनाकर रखा जा रहा है।

दूसरा अहम् बदलाव अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ये हुआ है कि दुनियाभर का स्वयं घोषित लठैत अमेरिका जो अपनी विध्वंशक नेवी के बल पर अपने हित के बीच रूकावट बन रहे देशों की बांह मरोड़ता रहा है, उनके व्यापार के रास्ते रोकता रहा है, उसकी हालत पतली हो गई है। पिद्दी से वायरस ने अमेरिका को नंगा कर दिया है। इस ‘महाशक्ति’ के पास वेंटीलेटर, मास्क तक भी नहीं थे। निजी अस्पतालों के माफिया ने ईलाज सस्ता करने के किसी भी सरकारी हुक्म को पूरी तरह दुत्कार दिया। परिणाम ये हुआ कि दुनिया भर में सबसे ज्यादा मौतें (155000 से भी ज्यादा) अमेरिका में ही हुई हैं। दवाईयों का इन्तेजाम ऐसा है कि बेकार की दवाई क्लोरोक्विन हांसिल करने के लिए उसे मोदी से पहले गुहार फिर घुड़की लगानी पड़ी। दूसरी तरफ़ चीन दुनिया का उत्पादन केंद्र बनता जा रहा है क्योंकि वहां के पतित कम्युनिस्ट, मज़दूरों का अधिकतम शोषण कर उत्पादन लागत इतनी कम रखे हुए हैं जो कहीं दूसरी जगह सम्भव ही नहीं। चीन भी अपनी ज़रूरत के लायक़ तेल अपने देश में उत्पादन नहीं कर पाता और उसे समुद्री मार्ग से तेल आयात करना होता है इसलिए उसे अपना मार्ग सुरक्षित चाहिए और मिडिल ईस्ट के तेल उत्पादक देशों जैसे ईरान आदि से अच्छे सम्बन्ध चाहिएं। इसीलिए दक्षिण चीन महासागर में जंगी जहाजी बेड़े जमे हुए हैं। “अगर तेल आपूर्ति काट दी गई तो चीन के पास कितना तेल बचता है?” चीन की वैश्विक ऊर्जा नीति के बारे में ‘चीन पेट्रोलियम एवं पेट्रोकेमिकाल्स’ पत्रिका के 15 जून 2019 में छपी ये रिपोर्ट गौर करने लायक़ है।

तेल की जंग ने दुनिया में जाने कितनी क्रूर सत्ताओं को भस्म किया है!!

प्रकृति का दिया ये अमूल्य संसाधन आज अर्थव्यवस्थाओं के लिए इतना अहम बन गया है कि दुनिया में जाने कितनी जंगों को जन्म दे चुका है, जाने कितनी क्रूर सत्ताएँ तेल की आग में जलकर भस्म हुई हैं। ईरान-इराक का वो सालों चलने वाला युद्ध तेल की वज़ह से उत्पन्न विश्व साम्राज्यवादी लुटेरों के आपसी हितों के टकराव का नतीजा था ही। इसके अतिरिक्त यहाँ ऐसी तीन सत्ताओं का उदाहरण प्रस्तुत है जहाँ शासकों ने खुद को ख़ुदा समझा और जन आक्रोश ने उन्हें मिटटी में मिला दिया।

  1. इंडोनेसिया-सुहार्तो: 21 मई 1998 को इंडोनेसिया के सुहार्तो नाम के ऐसे खूंख्वार, मानवद्रोही तानाशाह का पतन हुआ जिसने पूरे 32 साल तक अपने ही लोगों का नरसंहार किया, लाखों कम्युनिस्ट कार्यकर्ताओं-नेताओं का क़त्ल किया, मानवाधिकार-नागरिक अधिकारों को पैरों तले कुचला और ईस्ट तिमोर के 2 लाख से अधिक लोगों का सामूहिक कत्लेआम किया। तेल मूल्य वृद्धि और सरकार में व्याप्त व्यापक भ्रष्टाचार के विरोध में इंडोनेसिया की त्रिशक्ति विश्वविद्यालय के छात्रों के शानदार, ऐतिहासिक आन्दोलन को कौन भूल सकता है? 12 मई 1998 को छात्रों के शांतिपूर्वक चल रहे आन्दोलन पर ज़ालिम सुहार्तो ने गोली चलाने का आदेश दिया जिसमें 4 छात्र मारे गए। इस चिंगारी ने देशभर में भयानक दावानल का रूप ले लिया। ज्वालामुखी फूट निकला। देशभर में छात्र अपने कॉलेज-युनिवेर्सिटी छोड़ सडकों पर आ गए, हाथ में आधे झुके झंडे और होठों पर अपने शहीद कामरेडों की याद में गीत। जन समुदाय भी छात्रों के साथ हो गया। सुहार्तो नाम के  दरिंदे का सिंहासन चरमराकर धूल में मिल गया।
  2. म्यांमार (बर्मा) की ‘नारंगी क्रांति’: हमारे पूर्वी पड़ोसी देश म्यांमार में सैनिक तानाशाहों के लम्बे चले बर्बर और निरंकुश शासन के पतन की बात 2007 की है। लोगों को फौजी बूटों से दबाकर, कुचलकर रखने वाले तानाशाही शासकों ने तेल के लिए दी जाने वाली सब्सिडी को हटाने का फैसला लिया जिसके परिणाम स्वरूप तेल के दाम 100% और गैस के दाम 500% बढ़ गए।  सत्ता वर्ग की इस हिमाक़त ने उस ट्रिगर का काम किया जिसकी ज़रूरत आम जन मानस को क्रियाशील होने के लिए हमेशा होती है। लोग घरों से निकल सडकों पर आ गए। छात्रों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ बहुत सारे बौद्ध भिक्षु (मोंक) भी जुड़ गए जिनकी वेशभूषा नारंगी रंग की होती है। इसीलिए इस सशक्त जन आन्दोलन को नारंगी क्रांति के नाम से जाना जाता है। जन आक्रोश आन्दोलन देश भर में फ़ैल गया और कहीं भी कोई हिंसा की वारदात नहीं हुई। आन्दोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण रहा लेकिन फासिस्ट फौजी शासकों ने वही किया जो हर फासिस्ट मरने से पहले ज़रूर करता है। फ़ौज को गोली चलाने का हुक्म हुआ, फौज ने माना, कम से कम 35 प्रदर्शनकारी शहीद हुए और हजारों ज़ख़्मी हुए। ये कार्यवाही लोगों में दहशत फ़ैलाने के लिए की गई लेकिन आन्दोलन और तेज़ भड़क गया। लोग दहशत में ना आएं तो वहशी शासक दहशत में आ जाते हैं। फौज़ी हुकूमत का किला ढह गया, चुनाव हुए और फौजी शासन में दशकों ज़ुल्म झेलने वालीं औंग संग सू ची शासन में आईं जो अब वही सब कर रही हैं, लोगों को बिलकुल उसी तरह कुचल रही हैं जैसा फौजी शासक किया करते थे। वो भले भूल गईं, लेकिन इतिहास हमें सिखाता है; “जो हिटलर की चाल चलेगा वो हिटलर की मौत मरेगा”।
  3. नाईजीरिया पर क़ब्ज़ा करो: नाईजीरिया में भी रविवार 1 जनवरी 2012 को ऐसा ही जन सैलाब उठा था जिसका नारा था; नाईजेरिया पर कब्जा करो (Occupy Nigeria)। चिंगारी वही थी जो म्यांमार और इंडोनेशिया में थी। नाईजेरिया के राष्ट्रपति गुडलक जोनाथन ने लोगों की जेब से पैसा ऐंठने की स्कीम के तहत तेल पदार्थों से अनुदान हटाने का फैसला किया। नाईजेरिया अफ्रीका का सबसे बड़ा तेल उत्पादक देश है। एक झटके में अनुदान हटाने का नतीजा ये हुआ कि 1 लीटर गैसोलीन की कीमत 65 नाइरा से बढकर 141 नाइरा हो गई। ये काम 1 जनवरी 2012 को किया गया था मानो नए साल का तोहफा दे रहे हों। सोचा होगा, लोग नए साल के हैंग ओवर में होंगे, सब धक जाएगा!! लेकिन धका नहीं बल्कि राष्ट्रपति मिस्टर गुडलक के लिए उनका ये फैसला बेडलक साबित हुआ। लोगों का गुस्सा उबल पड़ा। सब लोग सडकों पर आ गए। फेई फावेहिंमी जो एक प्रदर्शनकारी जो पेशे से लेखाकार हैं, ने सी एन एन को बताया, “सरकार का ये झटके में लिया क़दम ऐसा है मानो बगैर प्लास के किसी ने हमारा दांत उखाड़ दिया हो”। 9 जनवरी को प्रदर्शनकारी सारी सड़कें घिराकर बैठ गए। गुडलक ने डराने के लिए फौज बुला ली लेकिन लोग नहीं डरे। भाड़े के सैनिकों को गोली चलाने का हुक्म हुआ, गोली चली और जिससे कितने लोग मरे आज तक सही आंकड़ा नहीं मिल पाया। इस ज़ुल्म ने लोगों के गुस्से में उबाल ला दिया। प्रदर्शनकारी चीख रहे थे, “तुमने अनुदान ख़त्म नहीं किया, तुमने सरकार से हमारा भरोसा ख़त्म किया है”। राष्ट्रपति गुडलक ने अपने चेले रयूबन अबाती को लोगों को ये समझाने के लिए भेजा कि कैसे ये मूल्य वृद्धि राष्ट्र हित में है!! उन्होंने भाषण शुरू किया, “डीज़ल-पेट्रोल-गैसोलीन से अनुदान ख़त्म करके सरकार ने कुल 1 ट्रिलियन नाइरा ($6.13 बिलियन) बचाए हैं जिसे देश में जन सुविधाएँ बढ़ाने, सड़कें बनाने में खर्च किया जाएगा। ” लोगों ने मूर्ख बनने से इन्कार कर दिया और उसे चुप करा दिया। लोग तब तक वापस नहीं गए जब तक की बढ़ी कीमतें पूरी की पूरी वापस नहीं हो गईं।

पेट्रोल-डीज़ल-गैस के नाम पर हो रही सरकारी लूट के ख़िलाफ़ उठ खड़े हो!!

अपने 6 साल के कार्यकाल में मोदी सरकार ने पेट्रोल के दाम रु 65 से बढाकर रु 80 प्रति लीटर, डीज़ल के दाम रु 60 से रु 80 प्रति लीटर और गैस के सिलिंडर के दाम रु 220 से बढाकर रु 855 कर दिए हैं जबकि इसी दौरान कच्चे तेल के दाम 2014 के मुकाबले 300% घटकर एक तिहाई से भी कम रह गए हैं। इस जन विरोधी सरकार ने देश के भूखे, बेहाल, कोरोना महामारी से मरते जा रहे लोगों पर दुनिया भर में सबसे ज्यादा टैक्स लगाए हैं। इस तरह इसने लोगों से कुल 14 लाख 60 हज़ार करोड़ से भी अधिक पैसे तेल पर टैक्स से वसूले हैं। ये लूट बहुत चालाकी के साथ ज़ारी है। एक झटके में टैक्स ना बढाकर धीरे धीरे हर रोज़ टैक्स बढाए जा रहे हैं जिससे लोगों का गुस्सा नियंत्रित रहे और लोग ज़ुल्म सहने के आदी हो जाएँ। जी एस टी कर प्रणाली जो देश की हर वस्तु पर लागू हुई उसे पेट्रोल-डीज़ल-गैस पर जान पूछकर लागू नहीं किया गया जिससे केंद्र सरकार के साथ ही राज्य सरकारों की लूट भी बिक्री कर मतलब वैट के ज़रिए ज़ारी रहे। ऐसा सोच समझकर किया जा रहा है जिससे डीज़ल-पेट्रोल-गैस पर सरकार जब चाहे, जितना चाहे कर वसूल सके। पिछले महीने लगातार 20 दिन तक हर रोज़ तेल की कीमतें बढाई गईं। कंगाल लोगों का खून निचोड़कर वसूले गए 14,60,000 करोड़ रुपये में से ‘जन कल्याण’ पर कितना खर्च हुआ है, देश के सामने है। कोरोना मरीजों की तादाद 19 लाख से ऊपर निकल चुकी और 39000 से अधिक लोग अपनी जान गँवा चुके हैं। आगे आने वाले दिनों में स्थिति और भी भयावह होने वाली है। लोग अस्पतालों के बाहर मर रहे हैं। अस्पतालों में बेड तक नहीं वेंटीलेटर की तो बात छोडिए। ‘आत्मनिर्भर बनो’ का उपदेश देकर लोगों को उनके हाल पर मरने के लिए छोड़ दिया गया है। एक एक गड्ढे में आठ आठ लाशों को फेंका जा रहा है। अस्पतालों में सूअरों के झुण्ड या कुत्ते घूम रहे हैं। सुरक्षा उपकरण ना होने के कारण 100 से ज्यादा डॉक्टर अपनी जान गँवा चुके हैं। दूसरी तरफ़ असम और बिहार में करोड़ों लोग बाढ़ से बेघर हो चुके हैं, कई सौ मर चुके हैं। 6 साल में इस फासिस्ट मोदी सरकार ने एक भी अस्पताल नहीं बनाया, जन स्वास्थ्य सुविधाओं के नाम पर नाम लेने को भी कुछ नहीं किया गया। आपदा राहत के नाम पर हजारों करोड़ रूपया जो पी एम केयर्स फंड में जमा किया गया उसके खर्च का ब्यौरा देने से सरकार ने साफ इन्कार कर दिया। एक तरफ़ बड़े धन्नासेठ कॉर्पोरेटस को कर छूट देने, रियायतें देने, उनके क़र्ज़ माफ़ करने और दूसरी तरफ़ मूर्ति बनाने, मंदिर बनाने, कुम्भ मेले में पैसा लुटाने, रु 20000 करोड़ का भव्य संसदीय विस्ता बनाने, प्रधानमंत्रियों का आलिशान संग्रहालय बनाने आदि के लिए ही सारे संसाधन झोक दिए गए हैं या झोके जाने वाले हैं। इस घोर जन विरोधी सरकार की संवेदनहीनता की पराकाष्ठा देखिए कि लोगों से कोरोना की जाँच करने के नाम पर भी देश में लूट मची हुई है, निजी अस्पतालों में ईलाज के नाम पर मरीजों के कपड़े तक उतारे जा रहे हैं। सरकार ने कहीं कोई कारगर कदम नहीं उठाया।

आज सच्चाई ये है कि कोई भी विपक्षी दल पेट्रोल-डीज़ल-गैस के दामों के नाम पर हो रही खुली लूट के विरुद्ध गंभीर आन्दोलन करने को तैयार नहीं क्योंकि जहाँ भी उनकी सरकारें हैं वहां वो भी लूट में शामिल हैं। केरल की वामपंथी सरकार भी राज्य कर लगाने में किसी राज्य से पीछे नहीं। केरल में भी पेट्रोल-डीज़ल के दाम रु 80.20 प्रति लीटर हैं। प्रतिरोध की रस्म अदायगी से इस सरकार पर कोई फर्क पड़ने वाला नहीं। देश भर में बिखरी पड़ीं क्रियाशील क्रान्तिकारी ताक़तों को इस ऐतिहासिक चुनौती को स्वीकार करना होगा। शोषित-पीड़ित लोगों के महासागर को भी तय करना होगा कि वे ये अन्याय कब तक सहन करना ज़ारी रखना चाहते हैं। घर में बैठकर सरकार को कोसते रहने से इस सरकार पर कोई प्रभाव पड़ने वाला नहीं। स्थानीय स्तर पर जन कमेटियां बनाते हुए देश भर में संयुक्त प्रतिरोध मंच का गठन कर जन आक्रोश की एक सशक्त लहर उठनी चाहिए जिससे इस संवेदनहीन, घोर जन विरोधी, फासिस्ट मोदी सरकार को ये पेट्रोल-डीज़ल-गैस के दामों को जब मर्ज़ी जितना मर्ज़ी बढाकर की जा रही लूट को बंद करने और दूसरी दमनकारी नीतियों को वापस लेने को बाध्य होना पड़े।

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 4/ अगस्त 2020) में छपा था

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