[छपते-छपते] : राम मंदिर भूमिपूजन में राज्य की खुली संलिप्त्ता और बुर्जुआ जनतंत्र की मौत, एक संक्षिप्त कमेंट

शेखर //

5 अगस्‍त, आज यह अयोध्‍या में राम मंदिर के लिए भूमिपूजन का दिन था, जो स्‍वयं प्रधानमंत्री के हाथों संपन्‍न हुआ। जनतंत्र और संविधान आज दोनों धर्म की खूंटी से टांग दिए गए। राज्‍य की (हिंदू) धार्मिक निष्‍ठा खुलकर सामने आई और धर्मनिरपेक्षता पर भारी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट का फैसला था कि मंदिर निर्माण का काम ट्रस्‍ट बनाकर उसके द्वारा किया जाएगा। लेकिन इससे जनता को ‘धर्म’ की चाशनी में डूबाने और फिर उसके बहाने अंदर ही अंदर सांप्रदायिकता फैलाने का अवसर बुर्जुआ (पूंजीपति) वर्ग और इसकी चहेती मोदी सरकार को कैसे मिलता? ‘गोदी’ मीडिया पूर्व की भांति अपने काम में लगा था और बड़ी चालाकी से पल-पल की खबर पहुंचाने के बहाने इसे मुस्लिम घृणा की धुरी वाली भाजपानीत राजनीति को मजबूत करने के अवसर में बदल दिया। राम मंदिर के लिए भूमिपूजन के पूरे प्रकरण को सरकारी मशीनरी और धन के सहारे जहां तक संभव हो सका भव्‍य और प्रभावोत्‍पादक बनाने की कोशिश की गई, ताकि जनता के दिलोदिमाग पर इसकी भरपूर छाप अंकित हो सके और लोग अपनी समस्‍याओं तथा सरकार की विफलताओं के बारे में सोंचने से ज्‍यादा इस बात में मशगूल रहें कि हिंदुओं की मुस्लिमों पर विजय हुई है और वे इस झूठे मुस्लिम विरोधी गर्व से भरे रहें। अंदर ही अंदर इसे एक और स्‍वतंत्रता आंदोलन अर्थात हिंदुओं के स्‍वतंत्रता आंदोलन की जीत की तरह पेश किया गया। मंदिर आंदोलन की एक सांप्रदायकि छवि है जिसका फायदा हर हाल में आरएसएस और भाजपा को मिलना तय है और मोदी सरकार का इसमें खुलेआम शरीक होने के पीछे का एक प्रमुख मकसद इस छवि का फायदा उठाना भी है। लेकिन असमाधेय आर्थिक संकट से बुरी तरह ग्रस्‍त पूंजीपति वर्ग और उसकी चेहती मोदी सरकार का आज सर्वप्रमुख लक्ष्‍य जनता को ज्‍यादा से ज्‍यादा धर्म और सांप्रदायिकता के मसलों में उलझाए रखना है ताकि वह इसमें मशगूल रहे और जनतंत्र तथा अपने जनतांत्रिक अधिकारों के प्रति अजागरूक बनी रहे। एकमात्र तभी उसे मूर्ख बनाना आसान होगा और फिर उतनी ही आसानी से पूंजीपति वर्ग उसका और उसके श्रम से निर्मित देश की संपदा का शोषण बिना किसी प्रतिरोध के कर सकेगा। ऐसे में सरकार द्वारा अपनी विफलताओं को छुपा ले जाना भी काफी आसान होता है। इतिहास गवाह है कि धर्म आधारित राजनीति और राज्‍य हमेशा से घोर जनविरोधी, मजदूर विरोधी और स्‍त्रीविरोधी रहे हैं और उसमें आम जनता को हमेशा ही अधिकारविहीन बनाया गया है। आज वही सब दुहराया जा रहा है। अतीत के ऊपर गर्व करने के नाम पर आम जनता को राजा के अधीन रहने वाली निरीह प्रजा बनाने की कोशिश हो रही है। राम मंदिर निर्माण में जिस तरह राज्‍य की खुली संलिप्‍तता प्रगट हुई है, जिस तरह से तमाम विपक्षी पार्टियों का समर्थन और सहयोग इसे हासिल हुआ है और जिस तरह से सुप्रीम कोर्ट से लेकर तमाम संवैधानिक संस्‍थाओं ने पूंजीवादी जनतंत्र के बलात अपहरण पर मौन धारण किया हुआ है, उससे यह स्‍पष्‍ट हो गया कि हिंदू राष्‍ट्र के मार्ग की सारी रूकावटें दूर हो चुकी हैं और इसी के साथ फासीवाद की पूर्ण विजय और अधिक सन्निकट आ पहुंची है।   

आज कुछ लोग (खासकर संसदीय वाम से जुड़े लोग) सुप्रीम कोर्ट के उक्‍त फैसले, जिसके अनुसार मंदिर निर्माण का काम एक ट्रस्‍ट बनाकर किया जाना था, का हवाला देते हुए मोदी सरकार की लानत-मलानत कर रहे हैं और जोर-जोर से छाती पीट रहे हैं। लेकिन, सवाल है क्‍या स्‍वयं सुप्रीम कोर्ट को अपना यह फैसला याद है? और अगर याद हो भी तो इससे क्‍या होगा, जबकि पूरी राज्‍य-सत्‍ता और पूंजीपति वर्ग के मिजाज और हित बदल चुके हैं? स्‍वयं जनता के एक हिस्‍से पर प्रतिक्रियावादी प्रचार का अच्‍छा-खासा प्रभाव है। कोराना महामारी के कारण आज के भव्‍य आयोजन को फिर भी उतना भव्‍य नहीं बनाया गया, जितना की मोदी सरकार की मंशा थी। हालांकि गोदी मीडिया के प्रयास के बावजूद यह उतना कारगर नहीं हो सका जितना सोंचा गया था। जनता को ”भगवान राम” में डूबा कर उसे लूटने-पिटने के लिए पूंजीपतियों के समक्ष परोसने का मोदी सरकार का यह जतन कितना सफल होगा, यह तो आने वाला समय ही बताएगा, लेकिन जिस तेजी से अर्थव्‍यवस्‍था धूल में मिलती जा रही है और आम लोगों का जीवन संकट में घिरता जा रहा है, मोदी सरकार के लिए जनता को बहुत दिनों तक ”भगवान राम” में डूबाए रखना संभव नहीं होगा। हालांकि सरकार की मंशा यही है कि जनता को इन्‍हीं मसलों में फंसाए रखा जाए, लेकिन शाम को दीए जलाने के आरएसएस और मोदी के आह्वान को कुछ अपवाद को छोड़कर जनता ने जिस ठंढे तरीके से लिया है वह इस बात का संकेत है कि पग-पग पर ठगी जाने वाली जनता बोटी-बोटी नोचे जाने पर भी हमेशा गुलाम की तरह चुपचाप सब कुछ सहती रहेगी, इसकी संभावना नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट आखिर बुर्जुआ हितों के ही तो अधीन है। अगर बुर्जुआ वर्ग के हित आज बदल गए हैं और जनतांत्रिक मूल्‍यों से टकरा रहे हैं और यहां तक कि ‘जनतंत्र’ के आवरण को बनाए रखना भी उनके लिए मुश्किल हो रहा है, तो ऐसे में आखिर कोई एक खंभा कितने दिनों तक प्रतिरोध कर सकेगा? उदारवादी विचारों के लिए आज जगह नहीं है, क्‍योंकि आज बुर्जुआ वर्ग के एकाधिकारी हित इससे पूरे नहीं होते। इसके विपरीत, उदारवादी जनतंत्र उनके पूजी संचय के हितों को बेड़ि‍यों में जकड़ने लगा है। बुर्जुआ वर्ग अब पुराने तरीके से अपना शासन नहीं चलाना चाहता है, क्‍योंकि गहरे एवं स्‍थाई आर्थिक संकट के काल में उसके मुनाफे की गारंटी एकमात्र तानाशाही में ही हो सकती है। उसे आज धर्म की चाशनी में डूबे फासिस्‍ट राज्‍य की जरूरत है, ताकि उसकी लूट पर पाबंदी लगाने वाले जनतांत्रिक जनमानस को नष्‍ट किया जा सके। उसके लूट में कोई विघ्न डालने वाला कानून या कोई ऐसी संस्‍था नहीं हो जो जनता की तरफ से आवाज उठा सके या उनके लिए खड़ी हो सके। इसलिए जरूरी है कि जनता जनतांत्रिक मूल्‍यों से मरहूम हो जाए, धर्म और राष्‍ट्रवाद में विश्‍वास जताए तथा एक शक्तिशाली तानाशाह शासक के प्रति भक्ति बनाए रखे जो उसे छाया दुश्‍मन से हमेशा युद्धरत रखे, मीडिया के सहारे वास्‍तविक मुद्दे की समझ को भ्रष्‍ट किया जा सके और उसको हमेशा अहसास कराए कि कोई चीज है जिससे उसके वजूद और अस्तित्‍व को खतरा है और उस अनजाने खतरे के अहसास से वह इस कदर घिर जाए कि तर्क करना छोड़ दे और वर्तमान तथा भविष्‍य को देखना बंद कर काल्‍पनिक अतीत के झूठे गर्व में डूब जाए। ठीक यही चीज करने की कोशिश की जा रही है। मानवजाति के मिथकीय इतिहास के पात्रों के महिमा गान को इसीलिए तो बढ़ावा दिया जाता है, ताकि वर्तमान के गर्दिश को अतीत के काल्‍पनिक छांव में भूलने को प्रेरित किया जाए। 

सरकारी कार्यक्रम की भांति पूरे क्षेत्र को पुलिस और सैन्‍य बल के हवाले कर पूरी (यूपी और केंद्र की) राज्‍य मशीनरी इस भूमिपूजन को संपन्‍न करने में लगा दी गई। देश के विशिष्‍ट जगहों से तथा विशिष्ट नदियों से मिट्टी, जल और रज को लाने में तमाम सरकारी महकमों को लगाया गया। सरकारी धन का खुले तौर पर उपयोग हुआ। सरकारी खजाने का मुंह खोल दिया गया। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुरूप यह सब नहीं हुआ तो क्‍या हुआ? अमित शाह तो ‘माननीय’ न्‍यायालय और न्‍यायाधीशों को पहले ही कह चुके हैं कि वे कोई ऐसा फैसला नहीं दें जिसे ‘जनता’ स्‍वीकार ही न कर सके और जिसे माना ही ना जा सके। वैसे योगी सरकार के लिए यह कोई नई बात नहीं है। पहले भी वह धार्मिक आयोजनों पर खुलेआम सरकारी धन खर्च करती रही है और पूरी मशीनरी को साधुओं और श्रद्धालुओं की सेवा में लगाती रही है। बहस इस पर है ही नहीं। बहस तो इस बात पर है कि इस बार यह सब ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्‍द को जनमानस के दिलोदिमाग से ही निकाल देने के निर्दिष्‍ट लक्ष्‍य के साथ किया गया। ‘धर्मनिरपेक्षता’ शब्‍द संविधान से जब हटेगा तब हटेगा, लेकिन सरजमीं पर तो इसे आज ही पूरी तरह हटा दिया गया। कहीं कोई ‘आवरण’ नहीं था। वैसे ‘आवरण’ तो पिछले छ: सालों में लगातार सरकते हुए गिरता ही रहा है, लेकिन आज तो मानो उसको बनाए रखने की आवश्‍यकता और बाध्‍यता का भी अंत हो गया। कुल मिलाकर कहें, तो भारतीय राज्‍यसत्‍ता और आरएसएस-भाजपा की देख-रेख और निगहवानी में राम मंदिर निर्माण हेतु भूमिपूजन का कार्य स्‍वयं देश के प्रधानमंत्री के हाथों संपन्‍न हुआ। थियोक्रेटिक स्‍टेट की तरफ भारत का यह एक बड़ा कदम है। तो इससे क्‍या हुआ कि राज्‍य का यह रूप मौजूदा बुर्जुआ संविधान के साथ मेल नहीं खाता है। इस संविधान के दिन लद गए हैं। अब इसे कौन पूछने वाला है? आखिर यह बुर्जुआ यानी पूंजीवादी संविधान ही तो था! पूंजीपतियों के अधीन रहने वाली कोई चीज पूंजीपतियों के संकट काल में उनके ही तो काम आएगी!! जिन्‍होंने कभी भी मौजूदा पूंजीवादी संविधान को स्‍वीकार नहीं किया और मनुस्‍मृति को ही अपना आदर्श माना और उसे ही संविधान का दर्जा देने का सपना देखा, उन्‍हें सत्‍ता की कुर्सी देते वक्‍त देश के बड़े पूंजीपति वर्ग ने सब कुछ पहले से सोच समझ रखा था। ये तो तथाकथित क्रांतिकारी और प्रगतिशील लोग थे या हैं जो मुगालते में थे या अभी भी हैं कि बुर्जुआ संविधान न हुआ अंगद का पैर हो गया जिसे हटाया ही न जा सके। अभी भी कुछ लोग हो सकते हैं जिनकी नजर में यह आज भी अंगद का पैर ही हो। संविधान की जगह मनुस्‍मृति लागू करने का सपना संजोये संगठन व उसके परिवार के लोग आज सत्‍ता में हैं, तो वे तो इसे लागू करेंगे ही। स्‍थायी संकट से ग्रस्‍त दौर व काल में पूंजीपति वर्ग की जरूरत भी यही है, तो इसको खत्‍म होते देख आश्‍चर्य होने के बजाय बहुत पहले ही समझ लेना चाहिए था कि ऐसा ही कुछ होने वाला है और उसके अनुरूप तैयारी करना था, जो कि दुर्भाग्‍यवश नहीं हो सका।

भूमिपूजन का कार्य संपन्‍न होने के उपरांत मोदी का जोरदार भाषण हुआ। उससे यह स्‍पष्‍ट हो गया कि सरकार की योजना आगे ‘भगवान राम’ के सहारे ही देश को चलाने की है। जिन्‍होंने भी भाषण सुना है, वे जानते हैं कि उसमें ‘भगवान’ राम की महिमा के गुणगान के सहारे हिंदू राष्‍ट्र की परिकल्‍पना पेश की गई। हालांकि उसके आदर्श को लागू करने की खुलेआम घोषणा तो नहीं की गई, लेकिन उसको अन्‍य सभी चीजों से ऊपर सर्वोच्‍च स्‍थान देने की बात अवश्‍य की गई। यही नहीं, यह कहा गया कि भगवान राम ही हैं जो सभी के खासकर गरीबों के पालनहार हैं, क्‍योंकि भगवान के सबसे प्रिय गरीब ही हैं। समझने वाले समझते हैं इसका अर्थ क्‍या है। आखिर लोगों की समस्‍याओं को दूर करने में बुरी तरह विफल सरकार के पास अब ‘राम’ के पीछे मुंह छिपाने के सिवा और रास्‍ता ही क्‍या है। बुरी तरह ध्‍वस्‍त हो चुकी अर्थव्‍यवस्‍था, बेरोजगारी, महंगाई, छंटनी, वेतन कटौती, कोरोना महामारी के फैलते प्रकोप और इन सबके कारण भुखमरी तथा बीमारी से चारो ओर पसरते मौत के मंजर से बदहाल देश और देश के लोगों का ध्‍यान भटकाने के लिए मोदी सरकार के पास और उपाय भी क्‍या था या क्‍या है? पाकिस्‍तान, चीन और राफेल आखिर कब तक काम आते। मोदी के लिए राम के सहारे ही आगे की यात्रा करना सबसे मुनासिब था और है। चीन मामले में इनकी रणनीति एक हद के बाद पस्‍त हो गई और उल्‍टे इन्‍हें ही भारी पड़ने लगी। फिलहाल पाकिस्‍तान और कश्‍मीर से काम नहीं चल रहा था। अंत में ले दे के मंदिर मुद्दे की सवारी करना ही इनके लिए एकमात्र उपाय बचा था जिसे मीडिया के सहारे आज अंजाम तक पहुंचाया गया। इसी तरह आज के दिन को देश का स्‍वर्णाक्षरों में लिखे जाने वाला ऐतिहासिक दिवस और अवसर बताया गया। आगे आम जनता को भुखमरी, बेरोजगारी, पूरी तरह चौपट और मरणासन्‍न स्‍वास्थ्‍य सेवा और शिक्षा, कोविद महामारी में बेमौत मरने की हालात को भूलने, सरकारी संपत्ति की अपने पूंजीपति यार दोस्‍तों में की जा रही बंदरबाट, काम के घंटों में की जा रही वृद्धि और आम जनता के विरोध करने के अधिकारों पर किए जा रहे कुठाराघात तथा महामारी में अस्‍पतालों में भर्ती हुए बिना सड़क पर मरते-बिलखते रोगियों व उनके परिजनों की चीख पुकार को राम के भरोसे ही भुल जाने के लिए कहा जाएगा। गरीब जनता को बताया जाएगा कि दीनहीन भक्‍तों के दुखहर्ता और उनकी डूबती नैया के खेवनहार भगवान श्रीराम के भव्‍य मंदिर निमार्ण में लगो, इसी से जीवन के सारे कष्‍ट दूर होंगे।

आज से ठीक एक साल पहले आज ही के दिन कश्‍मीर की लगभग एक करोड़ आबादी को सेना की निगरानी में उनके घरों में कैद कर दिया गया था और साथ में उसकी स्‍वायत्तता छीनते हुए उसके तीन टुकड़े कर दिए गए थे। महीनों तक जो जहां था उसे वहीं कैद कर लिया गया था। आज भी स्थिति में ज्‍यादा परिवर्तन नहीं आया है। हम उसमें देश की फासीवाद सरकार के उभरते शक्‍ल को देख सकते थे। इसमें एक फासीवादी संदेश था कि देखो जनवादी अधिकारों के लिए लड़ने वालों को हम सबक किस तरह सिखाते हैं। आज दिल्‍ली दंगों की छानबीन के नाम पर पुलिसिया कार्रवाई से भी यही संदेश देने की कोशिश हो रही है। भीमा कोरेगांव में भी यही रणनीति काम कर रही है कि न्‍याय के लिए आवाज उठाना और लड़ना सीधे-सीधे अपराध है। अगर न्‍याय की मांग करने वालों पर हमला होता है, तो दोषी हमलावर नहीं न्‍याय की मांग करने वाला होगा। यही नया कानून है। बाबरी मस्जिद विवाद में सुप्रीम कोर्ट के फैसले में भी यही सब कुछ दिखा। यह कहे जाने के बावजूद कि मस्जिद गिराना आपराधिक कार्रवाई थी, फिर भी मस्जिद गिराने वालों के हक में ही फैसला दिया गया।

कश्‍मीर में आज तक वहां इंटरनेट सेवा, जिसे एक साल पहले पूरी तरह बंद कर दिया गया था, पूरी तरह बहाल नहीं हो सकी है। सारे कश्‍मीरी नेता नजरबंद कर दिए गए थे जिनमें से अधिकांश आज भी कैद में हैं। तब से लेकर आज भूमि पूजन तक की यात्रा को देखें तो यह साफ दिखेगा कि फासीवादी उभार के जिस रास्‍ते पर भारत चल रहा है और काफी आगे निकल चुका है उसके पीछे लौटने के आसार पूरी तरह खत्‍म हो गए हैं। चुनाव हों या न हों, संसद रहे या खत्‍म कर दी जाए, इन सबसे परे यह कहा जा सकता है कि भारतीय बुर्जुआ राज्‍य का फासीवादीकरण पूर्ण विजय से बस चंद कदम ही दूर है। जो चीजों को उसके सार रूप में देखने के आदी है उनके लिए यह स्‍पष्‍ट है कि जनतंत्र खत्‍म हो चुका है, लेकिन उनके लिए जो चीजों को महज बाह्य रूपों में देखने के आदी हैं उनके लिए फासीवाद की भारत में विजय अभी भी दूर है, क्‍योंकि वे देखते हैं कि संसद और संविधान अभी भी बने हुए हैं। लेकिन यह अब कहने की बातें हैं। असल में तो इस बहस के दिन खत्‍म हो चुके हैं। बहस अब सिर्फ इस बात पर करने को बची है कि देश की क्रांतिकारी ताकतें कब एकजुट होंगी और इसे हमेशा के लिए परास्‍त करने की रणनीति, कार्यनीति व एक मुकम्‍मल फासीवाद विरोधी कार्यक्रम के आधार पर मेहनतकश जनता की अगुवाई में अन्‍य सभी उत्‍पीड़ि‍त वर्गों व तबकों को संगठित करने का काम हम संयुक्‍त रूप से कब शुरू करेंगें। यहां, एक बात तय है कि फासीवाद के बरक्‍स बुर्जुआ जनतंत्र की वापसी की उम्‍मीदों पर टिकी रणनीति आज सर्वहारा वर्ग की क्रांतिकारी रणनीति व कार्यनीति का हिस्‍सा नहीं हो सकती है, क्‍योंकि बुर्जुआ जनतंत्र स्‍थाई आर्थिक संकट के मौजूदा काल में स्‍वयं का इतना भक्षण कर चुका है, अपने को इतना अधिक जनविरोधी और जनवादी अधिकारों का दुश्‍मन बना चुका है, जो कि ऐसे स्‍थाई रूप से संकटग्रस्‍त बुर्जुआ अर्थव्‍यवस्‍था के दौर में बड़े बुर्जुआ वर्ग की एक स्‍वाभाविक राजनीतिक प्रतिक्रिया है, कि उसे फासीवाद का विकल्‍प के रूप में देखना असंभव है। वह समाज में जड़ जमाए फासीवादी प्रतिक्रियावादी शक्तियों से अपने को थोड़े समय के लिए भी बचा नहीं सकेगा। आज फासीवादी सरकार का विकल्‍प ऐसी क्रांतिकारी सरकार ही हो सकती है जो सर्वहारा वर्ग के नेतृत्‍व में कायम हो और जिसका लक्ष्‍य एक ऐसे नए समाज का निर्माण हो जिसमें बड़ा पूंजीपति वर्ग, बड़ा भूस्‍वामी वर्ग और साम्राज्‍यवाद का बोलबाला न हो और यह तभी संभव है जब वर्ग के बतौर उन्‍हें पूरी तरह खत्‍म कर दिया जाए, इतिहास के रंगमंच से हटा दिया जाए। जाहिर है हमें समाजवाद के विकल्‍प की ओर ले जाने वाली रणनीति के आधार पर बने कार्यक्रम को ही अपने फासीवाद विरोधी संघर्ष का आधार बनाना होगा।

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 4/ अगस्त 2020) में छपा था

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