सरकारी योजनाओं और घोषणाओ से परे, जमीनी वास्तविकता की ओर एक नजर

सरकार द्वारा गरीब मजदूरों को राहत पहुंचाए जाने के आंकड़े जो तस्वीर दिखाते हैं, वास्तविकता उससे बिल्कुल अलग होती है। सरकारी आंकड़ों और जमीनी सच्चाई के अंतर को जानने के लिए कुछ ऐसी जानकारियों और घटनाओं पर नजर डालना ज़रूरी है जो सरकारी घोषणाओं, फर्जी विज्ञापनों से इतर वास्तविक सच्चाई का जीता जागता सबूत पेश करती हैं।

लाकडाउन का ऐलान होते ही हजारों की संख्या में दिहाड़ी मजदूरों को सरकार के लगातार घोषणाओं के बाद भी जब कोई संसाधन मुहैया नहीं कराया गया तो खाने और किराया ना जुटा पाने की स्थिति में वे पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर दूर अपने घरों के लिए निकल पड़े। कुछ राहगीरों से बातचीत के दौरान अत्यंत हृदयविदारक तस्वीर सामने आई। मजदूरों ने बताया कि भूखे, प्यासे एक हफ्ते से चले जा रहे है। धुप से झुलसती सड़कों पर लगातार चलते हुए पैरों में छाले पड़ गए हैं। शरीर का कण- कण दर्द से कराह रहा है। लगभग सभी मजदूरों के पास आखरी दो चार सौ रूपए बचे थे। संभवतः ये पैसे उनके घर पहुँचने से पहले ही समाप्त हो जायेंगे। कुछ बुज़ुर्ग मजदूरों की दवा ख़त्म हो गयी है और दुबारा दवा खरीदने के पैसे नहीं हैं। जो मजदूर अपने परिवार के साथ रहते थे वे एक कंधे पर सामान और दुसरे कंधे पर अपने थक कर सो चुके बच्चों को लिए चले आ रहे थे। कुछ मजदूर सरकारी घोषणा सुनने के बाद कुछ देर महानगरों में रुके रहे, लेकिन जब उन तक कोई मदद नहीं पहुंची और सरकार के द्वारा की जा रही “विनती” के बावजूद मकानमालिक ने जब किराये के लिए दबाव बढ़ाया तो उन्हें मजबूर हो कर सड़कों पर आना ही पड़ा।

वे गरीब मजदूर जो लॉकडाउन के पहले ही अपने घर पहुँच गये उनकी हालत भी अपने राहगीर भाइयों जैसी ही है। लॉकडाउन की वजह से काम बंद हो गया है। अब उनकी बची पूंजी भी धीरे धीरे ख़त्म होती जा रही है और घर में अनाज भी पर्याप्त नहीं बचा है। उनमे से अधिकतर लोगों के पास राशनकार्ड नहीं है अर्थात वे सरकारी सुविधाओं के योग्य नहीं है। जिन लोगों को सरकारी योजना के तहत राशन मिल भी रहा है वे बताते हैं कि दिया गया चावल और गेंहू जानवरों के खाने लायक है और पूरे परिवार में महीने भर चलता नहीं है। एैसे में कुछ मजदूर जो इसमें सरकार की वर्गीय घृणा को देख सकते हैं उन्हें अपने हक अधिकारों के लिए संघर्ष करते हुए मर जाने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं सूझता है। वे कहते हैं कि, “भयंकर महामारी से पूरा देश ग्रसित है परंतु हम इस बीमारी की चिंता छोड़ भूख से तिलतिल कर मर रहे हैं। इस ज़िल्लत भरी ज़िन्दगीमें भूख से मरने से बेहतर है हमारे लिए आंदोलन करते हुए लाठियों, बंदूकों से मरना।“ हक अधिकारों की मांग करते लोगों को बर्बरता से पीटने तथा इन हृदयविदारक, दिल दहला देने वाली घटनाओं को प्रत्यक्ष देखने से इस गूंगी बहरी सरकार की मंशा साफ नज़र आती है।

द वायर की रिपोर्ट में बिहार में लॉकडाउन की वजह से हुए मौतों के बारे में बताया है। रिपोर्ट के अनुसार 26 मार्च को बिहार के भोजपुर जिले के आरा में मुसहर समुदाय से आने वाले 8 वर्षीय राकेश की भूख से मौत हो गयी। राकेश के पिता कुम्हार थे और लॉकडाउन के कारण उन्हें काम नहीं मिल पा रहा था। घर में उपलब्ध राशन भी देखते देखते ख़त्म हो गया था।

कुछ दिन पहले सरकार के द्वारा ये योजनाएं प्रचारित की जा रही थी कि 32000 करोड़ (BOCW फंड) निर्माण मजदूरों को दिया जाएगा जिससे उनके जीवन जीविका में सुधार हो सके परन्तु निर्माण मजदूरों के बीच जन साहस एनजीओ द्वारा की गयी सर्वे पर आधारित द क्विंट की रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 94% मजदूरों के पास निर्माण मजदूर पहचान पत्र ही नहीं है। जिस कार्ड के नामांकन की जिम्मेदारी सरकारी विभागों की ही थी परन्तु निर्माण मजदूर कार्ड न बनने की वजह से आजतक ये मजदूर मिलने वाली तमाम सुविधाओं से वंचित ही रहे हैं।

हथियार बंद सिपाहियों और इनके साथ मिलकर फ़ासिस्टों द्वारा तैयार की गए हुल्लड़ बाजो के टीम ने देश भक्ति और लॉक डाउन पालन के नाम पर बेसहारे मजदूरों (ख़ास कर बड़े शहर से अपने घर लौट रहे मजदूरों और जरूरी समान के लिए घर से निकले लोगों) पर बर्बरता पूर्वक लाठी डंडे बरसा कर उनके अंदर भय का मौहोल पैदा कर दिया है। सूत्रों के अनुसार पता चला है कि 14 अप्रैल को ही पटना के नगर निगम के एक इंस्पेक्टर को खाना ले जाते वक़्त सुबह 9 बजे पुलिस अफसरों ने लाठियों से बेवजह पीटा जिसपर आक्रोशित होकर नगर निगम के कर्मचारियों ने उस अफसर को सस्पेंड करने की मांग करते हुए पुलिस थाने के बाहर विरोध प्रदर्शन भी किया।

स्वास्थ्य सेवाओं की बात करें तो लॉकडाउन और कोरोना महामारी से लड़ने की राज्य व केंद्र सरकारों की तैयारियों की पोल खुलती दिखती है। सूत्रों के अनुसार बिहार के कई जिलों के आइसोलेशन वार्ड में कोई सुविधा नहीं है। वहीं पुराने मैले बिस्तर वाले अँधेरे कमरों में साफ सफाई का कोई इंतेजाम नहीं है तथा जाँच और चिकित्सा के लिए पर्याप्त उपकरण भी मौजूद नहीं हैं। कुछ जगहों पर बाहर से आए लोगों की स्क्रीनिंग, कोरोना जांच की मशीन उपलब्ध नहीं होने के कारण, टीबी जांच की मशीन से की जा रही है। डॉक्टर केवल लक्षणों को पूछकर कोरोना होने और ना होने की पुष्टि कर दे रहे है। निजी क्लिनिक की बात करें तो यह खबर भी सामने आ रही है कि कुछ जगहों पर कोरोना टेस्ट के लिए ₹4500 नहीं बल्कि ₹6400 रुपए चार्ज कर रही है।

इन सारी घटनाओं से इस संवेदनहीन सरकार के खोखले वादों की सच्चाई का पता चलता है। कोरोना महामारी के दौर में इसने पहले से ही त्रस्त मजदूर मेहनतकश जनता को मरने के लिए छोड़ दिया है। मजदूर वर्ग को पूंजीपतियों की सेवा में नतमस्तक इस सरकार के असली चेहरे को पहचान अपने भविष्य की दिशा तय करनी होगी, जहाँ या तो वो इसी तरह गुलामी और ज़िल्लत की ज़िन्दगी जिये, या फिर आगे बढ़ कर अपने हक़ अधिकारों के लिए आवाज़ बुलंद करे।

यह लेख मूलतः सर्वहारा : समसामयिक मुद्दों पर पीआरसी की सैद्धांतिक एवं राजनीतिक पाक्षिक कमेंटरी (अंक 1/ 15-30 अप्रैल ’20) में छपा था

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