लॉकडाउन में फंसे लाखों मजदूरों को मिली घर जाने की इजाजत

लॉक डाउन में भूख और अपमान का सामना करते लाखों प्रवासी मजदूरों को मिली तत्‍काल राहत के अतिरिक्‍त परदे के पीछे के असली खेल पर भी ध्‍यान देना जरूरी है

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लॉकडाउन में फंसे मजदूरों को लेकर अब तक दो आदेश निकाले हैं। कल यानी 29 अप्रैल के अपने नये आदेश में मोदी सरकार ने लॉक डाउन में फंसे मजदूरों को घर वापस जाने की इजाजत दे दी है। लेकिन यह तत्‍काल प्रभाव से नहीं, 4 मई से लागू होगा। यानी, मजदूरों को अभी कम से कम पांच दिनों के लिए और इंतजार करना होगा। लेकिन वे वास्‍तव में कब तक घर पहुंचेंगे यह कहना अभी भी पूरी तरह मु‍मकिन नहीं है। पहले उनकी एक्जिट पोइंट पर, यानी, अभी वे जहां हैं वहां जांच होगी। उस जांच में संक्रमण रहित पाये जाने पर ही वे घर जाने के हकदार होंगे। फिर जब वे अपने राज्‍य पहुंचेंगे, तो वहां भी उनकी जांच होगी। इतना सब के बाद यह मालूम होगा कि वे वास्‍तव में घर जा पाएंगे या नहीं जा पायेंगे। फिर भी, अपनों से दूर भूख और अपमान झेलते मजदूरों के लिए निस्‍संदेह यह एक बड़ी राहत वाली बात है। लेकिन यह नहीं भूलना चाहिए कि यह राहत बस मानसिक संतुष्टि तक ही सीमित है, क्‍योंकि गांवों में कुछ दिन ठहरते ही फिर से वही रोजी-रोजगार की समस्‍या मुंह बाये खड़ी मिलेगी।

मजदूरों की त्रासद स्थिति पर गौर करिये। जो लोग गांवों में हैं, वे भी फंसे हुए महसूस करते हैं, क्‍योंकि गांवों में रोजगार आदि की कोई सुविधा नहीं है। वे बाहर निकलना चाहते हैं ताकि परिवार का पेट भरने तथा अन्‍य खर्चों के लिए कुछ कमा सकें और इसके एवज में वे कल तक पुलिस की लाठियां खा रहे थे। वहीं दूसरी तरफ, जो बाहर में फंसे हैं, वे गांव आना चाहते हैं, क्‍योंकि वे बाहर में भूख व अपमान झेलते हुए मरने से बेहतर अपनों के बीच रहना ज्‍यादा पसंद करते हैं, भले ही यहां भी वे भूख से मरने के ही लिए क्‍यों न विवश हों। इन दो पाटों के बीच पीसते हुए मजदूर अपनी खुद की भयानक त्रासदी के सबसे उम्‍दा चित्रकार हैं। इस भयानक त्रासदी का जो छोर पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के जुल्‍मों–सितम वाले रवैये तक जाता है वह मजदूरों से अभी भी छुपा पड़ा है। उसकी परदेदारी में शासक और विपक्ष दोनों लगे हैं। सबसे दुखद बात यह है कि क्रांतिकारी समूहों ने भी मजदूरों की इस भयानक त्रासद स्थिति के अनुरूप न तो कोई कार्रवाई की, न ही मांग की। और तो और, न तो किसी ने करोड़ों मजदूरों को इस बारे में सही बात बताई, और न ही किसी ने दुविधा, असमंजस और अपमान तथा भुखमरी के अथाह सागर में गोते लगाते करोड़ों-करोड़ मजदूरों के समक्ष इसके सिवा कोई और प्रस्‍ताव ही रखा कि वे घर वापस चले जाएं। इसके अतिरिक्‍त उन्‍हें और क्‍या करना चाहिए, हममें से किसी ने उन्‍हें कुछ भी नहीं बताया। निश्‍चय ही हमारे मजदूर आंदोलन की यह त्रासदी भी अंतत: मजदूर वर्ग की त्रासदी बन कर प्रकट होती है। मानो, वर्तमान तो तबाह है ही, भविष्‍य के दरवाजे भी बंद ही समझि‍ये। उल्‍टे, यह कहा जाएगा कि मजदूरों की यही तात्‍कालिक मांग थी और यही करना सबसे उचित था। और सच ही तो है। हमारा आंदोलन भला ‘तात्‍कालि‍क हितों’ के पीछे-पीछे चलने के अलावा और भला कर भी क्‍या सकता है? ‘तात्‍कालिक हितों’ के अलावा वह न तो कोई और हित देखता है, न ही देख सकता है!

आइए, परदे के पीछे के खेल के बारे में बात करें। वह खेल जिसे शासक वर्ग ने मजदूरों के खिलाफ बड़ी चालाकी से खेला और खुद मजदूरों को ही इसका मोहरा बना दिया। इसके लिए सबसे पहले 19 अप्रैल के इसी गृह मंत्रालय के उस आदेश पर नजर दौड़ाना जरूरी है जिसमें मजदूरों को घर वापस नहीं जाने देने का फरमान सुनाया गया था। दस दिनों में आखिर क्‍या हो गया कि फरमान ‘उलट दिया गया’ और बड़ी चालाकी से पहले महाराष्‍ट्र सरकार के माध्‍यम से और फिर उत्‍तरप्रदेश सरकार के द्वारा यह प्रचारित कराया गया कि मजदूरों को घर भेजा जाए, जो कि लॉक डाउन में फंसे मजदूरों की पहले दिन से ही मांग थी। आज 40 दिनों की भयंकर पीड़ा और अपने कई सारे भाइयों की पैदल चलते मौत का दर्द झेलने के लिए विवश करने के बाद एकाएक सरकार इतनी रहमदिल क्‍यों दिखने लगी? यह काम तो पहले भी किया जा सकता था और उस समय मजदूरों में कोविद-19 के संक्रमण का खतरा भी कम था। आज तो उनके संक्रमित होने के खतरे भी ज्‍यादा हैं और वे बुरी तरह टूटे हुए भी हैं। उनके पास की सारी कमाई भी किसी तरह पेट भरने और किराया देने में खत्‍म हो गई जिसे बचाया जा सकता था।

सवाल है, सरकार के गृह मंत्रालय के 19 अप्रैल के आदेश और 29 अप्रैल के फैसले के बीच आखिर क्‍या कुछ घटित हुआ जिस पर सरकार परदा डालना चाहती है। यही नहीं, सरकार अपने 19 अप्रैल के आदेश का जिक्र भी नहीं करना चाहती है। ऐसा दिखावा कर रही है मानो 19 अप्रैल का आदेश कभी आया ही नहीं। उसे फिलहाल छि‍पाये रखना सरकार की मजबूरी है, नहीं तो उसका पूरा खेल उजागर हो जाएगा।

आइए, सरकार करे न करे, हम उसे सबके सामने रखें और यह समझने की कोशिश करें कि आखिर उस आदेश (19 अप्रैल वाले आदेश) में क्‍या था, उसके क्‍या मायने थे और उसके आलोक में 29 अप्रैल वाले आदेश के वास्‍तव में क्‍या मायने हैं। तभी हम समझ पायेंगे कि मजदूर ही नहीं मजदूर आंदोलन के हम नेतागण भी कितने आश्‍चर्यजनक तरीके से ‘तात्‍कालिक हितों’ की जकड़न में फंसे हैं और हम एक बार फिर से दस कदम तो क्‍या तात्‍कालिक हितों से एक कदम आगे तक देख पाने में भी बुरी तरह अक्षम साबित हुए हैं।  

गृह मंत्रालय द्वारा 19 अप्रैल को जारी आदेश मजदूरों को दुबारा जबर्दस्‍ती काम पर वापस भेजे जाने के संबंध में था। उसके ठीक पहले केंद्र सरकार कई उद्योगों को फिर से उत्‍पादन शुरू करने के लिए कह चुकी थी और उसे देखते हुए मजदूरों की उपलब्‍धता को सुनिश्चित करना जरूरी थी। दूसरी तरफ, सरकार को पता था कि मजदूर घर जाने की जिद पर अड़ें हैं और किसी भी हालत में 3 मई के बाद अगर लॉक डाउन खुलता है तो वे घर का रूख करेंगे। ऐसे में यह साफ है कि 19 अप्रैल का आदेश मजदूरों को जबर्दस्‍ती रोक करने के लिए था। इसमें कई चीजें जानबूझ कर अनिश्चित छोड़ दी गयी थीं, ताकि उसकी व्‍याख्‍या सरकार अपनी जरूरतों के अनुसार कर सके। जैसे कि यह नहीं साफ किया गया था कि जबरन रोके रखने का यह आदेश कब तक के लिए अनिवार्य है। इसमें मजदूरों पर यह नहीं छोड़ा गया था कि वे काम करने के लिए रूकना चाहते हैं या घर वापस जाना चाहते हैं।

प्रक्रिया यह घोषित की गई कि मजदूरों को स्थानीय अधिकारियों के समक्ष खुद का नामांकन कराना होगा जहां उन्हें उनकी योग्यता के अनुसार काम बांटा जाएगा। बीमारी और क्वारंटाइन सेंटर में जानवरों से भी बत्तर हालत झेलने के बाद वे काम करने की हालत में हैं भी या नहीं, इन मामलों पर गृह मंत्रालय ने सोचना भी ज़रूरी नहीं समझा था। निर्देशों में आगे यह भी लिखा है कि जो मजदूर अपने पुराने काम पर जाना चाहते हैं, वो जा सकते हैं, उनको भेजने का प्रबंध किया जाएगा, लेकिन किसी भी हालत में मजदूरों को राज्य से बाहर जाने की इजाज़त नहीं दी जाएगी। अर्थात, अपने परिवार के पास लौटने की उनकी ख्वाहिशों का बिनी किसी सुनवाई के गला घोंट दिये जाने की योजना थी। मजदूरों को उनके काम की जगह भेजने के लिए बस की व्यवस्था और यात्रा के दौरान उनके खाने-पीने के प्रबंध की बातें तो थीं, लेकिन काम की जगह पहुंचने के बाद उनके खाने-पीने या रहने की क्या व्यवस्था होगी, किन हालातों में उन्‍हें काम करना पड़ेगा, इन सारे सवालों के बारे में गृह मंत्रालय के द्वारा कुछ भी नहीं कहा गया था। जाहिर है, 19 अप्रैल वाला गृह मंत्रालय का आदेश एक तुगलकी फरमान था। आदेश पढ़ने के बाद यह साफ हो जाता है कि सरकार इस आदेश को अनियतकालीन मान कर चल रही थी।

इस फ़रमान का एक ही मतलब था, अर्थव्यवस्था संकट में है और पूंजीपतियों के मुनाफे का चक्र रुक गया है और जाहिर है मजदूरों को बैठाकर खिलाना पड़ रहा है, तो फिर से अर्थव्‍यवस्‍था को पटरी पर लाने के लिए मजदूरों को गुलाम बनाकर उनकी उजरती गुलामी के तहत मिली दिखावटी ‘स्‍वतंत्रता’ को भी पूरी तरह कुचलने की तैयारी सरकार कर चुकी थी। यानी, अगर हम 19 अप्रैल के आदेश निहितार्थ को समझने की कोशिश करें, तो यह दिखेगा कि वर्तमान दौर की भारतीय पूंजीवादी व्यवस्था में उन्हें इंसान या नागरिक नहीं, केवल और केवल एक माल यानी श्रमशक्ति के ऐसे भंडार के तौर पर देखने की प्रवृति पनप चुकी है जिसके तहत श्रमशक्ति रूपी माल के ‘स्‍वतंत्र स्‍वामी’ के रूप में मजदूर की हैसियत को भी रौंदा जा सकता है, जैसे पहले कभी युद्ध के नाम पर, कभी संकट के नाम पर अर्थव्यवस्था बचाने के लिए तो कभी देश के लिए कुर्बानी की मांग के तहत पूरी दुनिया में रौंदा जाता रहा है। मोदी सरकार कह चुकी है कि कोरोना महामारी से लड़ना एक युद्ध के समान ही है जिसने देश में सोशल इमरजेंसी की स्थिति ला खड़ा की है। ऐसे में यह कल्‍पना करना आसान है कि देश के प्रति भक्ति दिखाने की मांग मजदूरों से की जाएगी और इसके लिए उनको अपनी गुलामी भी स्‍वीकार करने के लिए विवश किया जाएगा। 

लेकिन यह सवाल है, उस आदेश का क्‍या हुआ? क्‍या वह निरस्‍त हो चुका है? या फिर उसके रहते ही मजदूरों को ‘आजाद’ करने वाला नया आदेश आया है? इसके बारे में फिलहाल ऐसी कोई पुख्‍ता सूचना नहीं है। अगर वह आदेश भी मौजूद है, तो इसका मतलब क्‍या है और इसके आधार पर किस तरह बाद में मजदूरों के साथ व्‍यवहार किया जाएगा या नहीं किया जाएगा कहना मुश्किल है, लेकिन कोरोना संकट के मद्देनजर पूंजीवादी व्‍यवस्‍था के वर्तमान मैनेजर की भूमिका में मोदी सरकार का मजदूरों के प्रति रूख क्‍या है और वह आगे मजदूरों के साथ कैसा सलूक करने वाली है इसका अंदाजा इससे लग जाता है। 

तो फिर, पुराने आदेश के आलोक में नये आदेश का आखिर तात्‍पर्य क्‍या है और इसे क्‍यों लाया गया? क्‍या यह माना जा सकता है कि 19 अप्रैल के कठोर आदेश जारी करने वाला गृह मंत्रालय 29 तारीख को एकाएक मजदूरों के प्रति संवेदनशील हो गया? पैदल पहुंचने वाले मजदूरों पर हाइपोक्‍लोराइट के घोल का छिड़काव कराने वाली यूपी सरकार मजदूरों पर इतनी मेहरबान आखिर कैसे हो गई इसका जवाब क्‍या किसी के पास है? जिस तरह से राज्‍य सरकारों द्वारा मजदूरों की घर वापसी की मांग उठायी गयी और फि‍र जिस तरह से यूपी सरकार के द्वारा लॉक डाउन के नियमों का उल्‍लंधन करते हुए एकाएक अपने प्रांत के मजदूरों को वापस ले आने की कार्रवाई की गई तथा मोदी सरकार चुप रही, यह भी कुछ गहरे प्रश्‍न छोड़ जाता है।

दरअसल, उद्योगों में उत्‍पादन शुरू करवाने का सरकारी निर्णय जिस दिन आया, उसके दूसरे दिन से ही अधिकांश उद्योगपतियों ने यह कहना शुरू कर दिया था कि अभी उत्‍पादन शुरू करना असंभव है जिसके कारणों में एंड टू एंड सप्‍लाई चेन के टूट जाने से लेकर जरूरी फंड की कमी तथा मजदूरों को वेतन न दे पाने की मजबूरी से लेकर गोदामों के पहले से भरे होने की बातें कहीं गईं। मुख्‍य मसला बाद में खुलकर यह आयी कि उद्योगपति कोरोना संकट के कारण सरकार के लिए पैदा हुई संकटपूर्ण स्थिति का इस्‍तेमाल सरकारी फंड यानी जनता द्वारा उगाहे गये फंड में से ज्‍यादा से ज्‍यादा हड़पने के लिए सरकार पर दवाब बनाने के लिए कर रहे हैं। उन्‍होंने कई लाख करोड़ की राहत पैकेज की मांग की जिसके बिना, उनका कहना है, दुबारा उद्योंगों में उत्‍पादन शुरू करना असंभव होगा या काफी कठिन होगा। इसे मौका देखकर बांह मरोड़ना भी कह सकते हैं। यानी उद्योग जगत इस कोरोना संकट में अपनी जमा पूंजी में से एक ढेला का बोझ भी उठाने के लिए तैयार नहीं है, उल्‍टे, वह सरकार पर दवाब बनाकर बैंकों की पूंजी को एक बार फिर से लूटने की तैयारी कर चुका है। इसके अलावा उन्‍होंने मजदूरों की मजदूरी में कटौती करने, मजदूरी में तयशुदा वार्षिक वृद्धि पर रोक लगाने, मजदूरों के डीए और बोनस पर फिलहाल रोक लगाने तथा कम से कम मजदूरों को रखकर ज्‍यादा से ज्‍यादा देर तक उनसे काम लेने की योजना की मांग रखी है।

यानी, दो से तीन दिनों के अंदर ही यह बात साफ हो गई कि उद्योग कम से कम दो से तीन महीने तक उत्‍पादन शुरू करने की स्थिति में किसी भी तरह से तैयार नहीं है। जाहिर है, ऐसे में 19 अप्रैल के गृह मंत्रालय के आदेश को लागू करने में सबसे बड़ी बाधा स्‍वयं उद्योग ही साबित हुए। मजदूरों को तो सरकार मारपीट कर काम पर भेज ही देती।

ऐसे में मजदूरों को लॉक डाउन के तहत या लॉक डाउन खुलने के बाद बैठाकर रखने का कोई तुक या अर्थ नहीं था। सरकार इसके पहले 14 अप्रैल के दिन, यानी, जिस दिन लॉक डाउन को अगले 3 मई तक बढ़ाने का निर्णय सरकार ने किया था, उसके कुछ ही घंटों के बाद यह देख चुकी थी कि बांद्रा, सुरत, अहमदाबाद तथा हैदराबाद और संभवत: अन्‍य जगहों पर भी मजदूरों का आक्रोश किस तरह खुलकर प्रकट हुआ। उनके जुटान में किस तरह का असंतोष व्‍याप्‍त था यह भी साफ दिखा। ऐसे में, बड़े शहरों में उनका इस तरह बिना वेतन के तथा भूख और अपमान में ज्‍यादा दिन तक रखना एक विस्‍फोटक स्थिति का वाहक बन सकता था। जरा कल्‍पना कीजिए कि अगर मजदूर घर वापस जाने के अतिरिक्‍त कुछ अन्‍य दूसरी बड़ी मांगों के साथ सड़क पर उतर जाते तो क्‍या होता? मसलन, अगर मजदूर सभी को स्‍वास्‍थ्‍य सुरक्षा देते हुए काम पर वापिस लगाओ नहीं तो गुजारा भत्‍ता तथा वेतन दो, सभी मजदूरों को शहरों में डिस्‍टेंसिंग धारण करते हुए रहने की सुविधा सहित सभी की फ्री टेस्टिंग, फ्री इलाज और सभी के लिए उचित मानवीय गरिमा के साथ भोजन की व्‍यवस्‍था करो और इसके लिए बड़े शहरों में स्थित तमाम खाली पड़े फ्लैटों, बंगलों और घरों को सरकार अपने हाथ में ले, कोरोना के दौरान बंद पड़े या मुनाफा कूट रहे निजी स्वास्थ्य सेवा व अस्‍पतालों को सरकार अपने हाथ में ले, तमाम निजी व सरकारी गोदामों में पड़े अनाजों को सरकार बिना किसी भेदभाव के जरूरतमंदों के बीच वितरित करे जैसी मांगों के साथ सड़कों पर उतर जाते तो क्‍या होता? हम बस उदाहरण पेश कर रहे हैं, अन्‍यथा मांग का स्‍वरूप तो कुछ भी हो सकता था। ये तो भला हो हमारा और हमारे आंदोलन का जो स्‍वयं ही इन मांगों को उठाने, इन पर चर्चा करने तथा कम से कम इसे मजदूरों के बीच एक प्रस्‍ताव के रूप में भी ले जाने से कतराता हैं, नहीं तो इस दौर में जब मजदूर अपनी जान की परवाह किये बगैर हजारों किलोमीटर पैदल चल कर घर पहुंचने का दमखम रखते हैं, तो भला वे क्‍या नहीं सकते हैं। जब मजदूर यह कहते हैं कि सरकार चाहे गोली मार दे, लेकिन 3 मई के बाद वे नहीं रूकेंगे, तो वे उसी तरीके से यह मांग भी कर सकते हैं कि उनके लिए शहरों में और उनके परिवारों के लिए गांवो में रहने, खाने तथा सम्‍मान के साथ जीने की व्‍यवस्‍था करो। वे हजारों किलोमीटर के अपने पैदल लॉन्ग मार्च को फ्लैग मार्च में भी तो बदल दे सकते हैं!

सरकार को यह समझ में आता है कि आंदोलन के शीर्ष से आवाज नहीं आने के बावजूद स्‍वयं मजदूरों के बीच से ऐसी आवाज उठ सकती है, भले ही हमें यह बात समझ में नहीं आती हो। घर तक पैदल शुरू हुए मजदूरों के लॉन्ग मार्च के किसी और तरह के मार्च में बदलने की संभावना के प्रति सरकार संवेदनशील है, परंतु हम स्‍वयं इसकी चेतना से लैस नहीं हैं, कारण चाहे जो भी हों।

जाहिर है, जब हम तैयार नहीं हैं, तो मजदूर स्‍वयं से इसके लिए तैयार हो जाएंगे, इसका अभी दौर नहीं आया है, यह सही है, लेकिन तब हमारी भूमिका क्‍या रह जाती है? क्‍या सिर्फ मजदूर वर्ग के पीछे-पीछे चलना हमारा काम है? यह ठीक वही स्थिति है जैसी स्थिति हमने देश में फासिज्‍म के खतरे के संज्ञान को लेकर बनायी थी। हमने इसका संज्ञान तक नहीं लिया जब तक कि स्‍वयं पूंजीपति वर्ग का एक हिस्‍सा इसके के खिलाफ नहीं बोलने लगा या जब तक यह हमारी छाती पर पूरी तरह सवार नहीं हो गया। मतलब साफ है हम स्‍वयं यह साबित कर रहे हैं और आज की तारीख में हम मजदूरों को यह बताना चाहते हैं कि हमें आगे-आगे चलना नहीं आता है।

जाहिर है निकट भविष्‍य में उत्पन्न हो सकने वाली ऐसी किसी विस्फोटक स्थिति से पूर्व में ही निपटने की नीति में महारथी शासक वर्ग ने मजदूरों को घर वापस भेजे जाने की न्‍यायोचित मांग को ही मोहरा बना कर सरकार ने ठीक अपने सर के ऊपर से एक बहुत बड़ी ‘बला’ को फिलहाल हटाने में कामयब हुई। अब वे मजदूर गांवों में भगवान भरोसे भूखे मरेंगे और जब भी उद्योग जगत को जरूरत होगी और वह उत्‍पादन शुरू करेगा इनमें से कुछ को बुलाकर इनकी श्रमशक्ति को निचोड़ लेने की कार्रवाई शुरू करेगी। 12 घंटे के कार्य दिवस से लेकर ऐसे ढेरों अध्‍यादेश सरकार लाने जा रही है जो यह सुनिश्चित करेंगे कि पूंजीपति वर्ग को इस ‘नेक’ काम में कोई दिक्‍कत न हो।

दूसरी तरफ, सरकार की इस कार्रवाई से यह प्रमाणपत्र भी मिला कि सरकार ने मजदूरों से दरियादिली दिखाई और वह मजदूरों के दुख-दर्द को लेकर संवेदनशील है। इससे आगे की बात यह है कि जो लोग इसे अपनी जीत मानकर अपनी-अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, क्‍या वे इस प्रश्‍न का जवाब देना चाहेंगे कि क्‍या वे इस उम्‍मीद में थे कि मोदी सरकार उद्योगों के नहीं खुलने पर भी मजदूरों को शहरों में रोके रखती और किसी विस्‍फोट को अंदर ही अंदर पनपने का इंतजार करती? अगर सरकार 3 मई के बाद मजदूरों को घर जाने दे रही है, वो भी तब जब उ्दयोगों ने खुद ही उत्‍पादन शुरू करने से मना कर दिया है, तो इसमें खुशी मनाने जैसी बात भला क्‍या है। अगर सच में वे इसी उम्‍मीद में थे कि मोदी सरकार उद्योगों के न खुलने के बाद भी मजदूरों को शहरों में रखे रहती, तो सच में वे सभी महान समझ वाले हैं। और तब आगे एक और महान काम उनके द्वारा किये जाने का इंतजार कर रहा है। वह यह कि ये सभी आगे बढ़कर समवेत स्‍वर में मोदी सरकार को मजदूरों का दुख-दर्द समझने और विपक्ष की मजदूरों की घर वापसी की मांग का मान रखने व स्‍वयं उन्‍हें व उनके दल को सम्‍मान देने के लिए अर्थात ज्‍यादा स्‍पष्‍ट रूप से कहें तो इस घोर फासीवादी सरकार द्वारा ‘जनवादी रूख’ का मुजायरा करने के लिए ‘थैंक यू’ बोलना चाहिए।

बाकी बात बस इतनी है कि मजदूरों की यह भयंकर तबाही और बर्बादी और भी ज्‍यादा विकराल रूप लेगी। आम जनता व मजदूर वर्ग के ऐतिहासिक हितों की द़ष्टि से इस त्रासदी का अंत एक ही तरीके से संभव है – स्‍वयं पूंजीवादी व्‍यवस्‍था का अंत और मजदूरों के नेतृत्‍व में एक विशुद्ध रूप से नई व्‍यवस्‍था की स्‍थापना जिसमें मुनाफे की बलिवेदी पर मानवजाति और खासकर मेहनतकशों को कुर्बान करने के लिए कहीं कोई गुंजायश नहीं होगी। इसे समाजवाद कहा जाता है। जी हां, वही समाजवाद जिसका निर्माण लेनिन और स्‍तालिन के नेतृत्‍व में रूस तथा सोवियत संघ के मजदूरों ने किया था और जहां पूंजीपति और जमींदारों के शोषण का ही नहीं, तमाम तरह के प्राचीन से प्राचीन तथा नवीन से नवीन रूप रंगों वाले शोषण का अंत हो गया था। वैसे जिसे लेनिन या स्‍तालिन के नाम से परहेज है और जिन्‍हें समाजवाद के नाम से भी चिढ़ है, वे चाहें तो इसे किसी अन्‍य नाम से पुकार सकते हैं। लेकिन वह समाज अभी तक पाये जाने वाले खून चूसने वाले जोंकों से अवश्‍य ही मुक्‍त होगा। कोरोना महामारी ने पूंजीवादी के अंत की घोषणा वाले आदेशपत्र पर हस्‍ताक्षर कर दिया है। अब मजदूर वर्ग और इसकी रहनुमाई करने वालों पर यह निर्भर करता है कि इस घोषणा की तामिल कब होगी और कैसे होगी।

यह लेख मूलतः सर्वहारा : समसामयिक मुद्दों पर पीआरसी की सैद्धांतिक एवं राजनीतिक पाक्षिक कमेंटरी (अंक 1/ 15-30 अप्रैल ’20) में छपा था

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