निजीकरण की ओर तेजी से बढ़ते कदम

ए. प्रिया //

निजी कंपनियों को मिली कोयले के वाणिज्यिक खनन की छूट, 41 कोल ब्लॉक होंगे नीलाम

कोरोना महामारी की गिरफ्त में पूरी दुनिया त्राहिमाम कर रही है और कुछ भी सामान्य नहीं रह गया है। इस अभूतपूर्व स्थिति के साथ ही, मौजूदा व्यवस्था की कमियां और सड़ांध भी सतह पर आ गई हैं। इतनी उथल-पुथल की स्थिति में बड़े क्रांतिकारी उभार के बीज जरुर छुपे होते हैं, लेकिन साथ ही पूंजीपतियों के लिए भी इतनी अराजकता के बीच अपना मकसद सिद्ध करने के अवसर होते हैं। और इसी अवसर का पूरा लाभ उठाते हुए 18 जून 2020 को मोदी सरकार ने 41 कोल ब्लॉक की वाणिज्यिक खनन की अनुमति दे दी है। इससे निजी कंपनियों को निकाले गए कोयले या अन्य खनिज को किसी भी तरह इस्तेमाल करने की पूरी छूट मिल जाएगी, अर्थात वे इसे कच्चे माल या उर्जा स्रोत की तरह अपने कारखानों में इस्तेमाल कर सकते हैं या बाजार में बेच सकते हैं या एक्सपोर्ट भी कर सकते हैं। 

मोदी सरकार के सत्ता में आते ही कोयला क्षेत्र में तीव्र निजीकरण के लिए धीरे-धीरे जमीन तैयार की जा रही थी। 2015 में कोल माइंस (स्पेशल प्रोविजन्स) एक्ट के जरिये निजी कंपनियों को कोल ब्लॉक की नीलामी में हिस्सा लेने की अनुमति दे दी गई लेकिन शर्त थी इसका इस्तेमाल वे केवल अपने उद्योग में कच्चे माल या उर्जा स्रोत की तरह ही कर सकते थे। इसी शर्त (कैप्टिव खनन) की वजह से सरकार निजी कंपनियों को कोयला क्षेत्र में निवेश करने के लिए राजी नहीं कर पाई। 2018 में सरकार ने अपनी कोशिशें और बढ़ाते हुए कोकिंग कोल माइंस (नेशनलाइजेशन) एक्ट, 1972 और कोल माइंस (नेशनलाइजेशन) एक्ट, 1973 को भंग कर दिया और इसके साथ ही निजी कंपनियों को कोयला उत्पादन का 25 प्रतिशत बाजार में बेचने की अनुमति मिल गई, लेकिन इसके बाद भी इस क्षेत्र में निजी कंपनियों की रुचि बहुत नहीं बढ़ पाई। यहां तक कि एफडीआई (प्रत्यक्ष विदेशी निवेश) 100 प्रतिशत करने के बाद भी भारत की जटिल नौकरशाह प्रक्रियाओं और वैधानिक अनुमोदनों की लम्बी फेहरिस्त के कारण कुछ ही विदेशी कंपनियां आईं। अतः अपने आकाओं को खुश करने के लिए मोदी सरकार ने खनन किए कोयले के इस्तेमाल पर लगी सारी शर्तें हटा दीं और बड़े पूंजीपतियों के लिए देश के खनिज और संसाधनों को लूटने के सारी प्रक्रियाएं भी आसान कर दीं। 

नरेन्द्र मोदी ने निजी कंपनियों से अपने संबोधन में उनको रिझाने की कोई कसर नहीं छोड़ी। उनके पूरे संबोधन की समीक्षा उनके ही शब्दों में की जा सकती है, जब वे निजी मालिकों को कहते हैं, “आप दो कदम चलिए, मैं चार चलने को आपके साथ हूं।” और वे ठीक इसी राह पर बढ़ चुके हैं। नीलामी में प्रवेश करने व बोली लगाने के लगभग सारे मानदंडों को हटा दिया गया है। अब 100 प्रतिशत एफडीआई और प्रवेश के कोई मानदंड ना होने की वजह से कोई भी देशी या विदेशी कंपनी, जिसका खनन का कोई अनुभव नहीं रहा है, बस अग्रिम भुगतान कर नीलामी में हिस्सा ले सकती है। और तो और, कोयला मंत्रालय के तरफ से यह वादा भी किया जा चुका है कि निवेश करने वाली कंपनियों को पर्यावरण, आदि से जुड़े वैधानिक अनुमोदन लेने में मदद की जाएगी। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार खनन से जुड़ी पर्यावरण, प्राकृतिक संसाधनों और उस इलाके की जनता के प्रति निजी मालिकों को उनकी जिम्मेदारियों से मुक्त करना चाहती है, जिसके बाद उन्हें वहां के मूल निवासियों की जिंदगियों और वहां की जैव विविधताओं को मुनाफे की होड़ में अपने पांव तले रौंदने की खुली छूट मिल जाएगी। सरकार की प्राथमिकताएं इस बात से साफ हो जाती हैं कि ऐसे कष्टकर समय में, जहां एक बड़ी आबादी आर्थिक तंगी, बेरोजगारी, भुखमरी, कुपोषण, बेघरी जैसी समस्याओं से जूझ रही है, वहां सरकार ने निजी कंपनियों की ‘मदद’ हेतु कोयला खनन और परिवहन से जुड़ी आधारिक संरचना के लिए ₹50,000 करोड़ खर्च करने का वादा किया है। और तो और, प्रधानमंत्री ने कंपनियों को आश्वस्त किया है कि अगर वे निवेश करती हैं तो “उन्हें फाइनेंस (वित्त) की कोई चिंता नहीं करनी होगी”, मतलब सरकार इन निजी मालिकों को बैंकों से सस्ते और आसान लोन मुहैया करवा देगी। यह कहने की जरूरत नहीं कि जब इनमें से कई तजुर्बेहीन कंपनियां (कोई पात्रता मानदंड नहीं होने से) डूबेंगी और उनका ये कर्ज बट्टे खाते में डाल दिया जायेगा तो इसका भार भी बढ़े हुए करों और स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी सार्वजनिक सुविधाओं में होने वाली कटौती के रूप में जनता को ही उठाना पड़ेगा। 

लेकिन जनता की परेशानियों का सिलसिला अभी थमा नहीं है। मोदी जी ने निजी कंपनियों के आने से आम जनता को होने वाले कई और “फायदे” गिनवाए। पहले तो उन्होंने निजीकरण से पैदा होने वाली अनेकों नौकरियों और युवाओं के लिए रोजगार के अवसरों की बात की। लेकिन क्या जनता को यह नहीं मालूम की निजी मालिकों द्वारा चलाए जा रहे निजी खदान केवल मुनाफे पर आधारित होते हैं? वे अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए नौकरियां बनाते हैं और अपने कर्मचारियों या मजदूरों के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं महसूस करते। भारी मशीनरी लगाते ही, श्रमिकों की संख्या बढ़ाने की बजाय, वे पुराने (कम मुनाफा बनाने वाले) कर्मचारियों की छंटनी करना शुरू कर देते हैं। प्रधानमंत्री के अन्य दावों की तरह यह भी देश के बेरोजगार युवाओं और मजदूरों को बरगलाने की ही साजिश है। साथ ही, निजी मालिकों द्वारा की जा रही छंटनी और कार्य स्थलों पर खतरों के साथ मूलभूत सुविधाओं का अभाव किसी से छुपा नहीं है। चाहे रेलवे हो या बैंकिंग या कोई और सेक्टर, निजीकरण के साथ हमेशा स्थाई नौकरियों का खात्मा और ठेका प्रथा की तरफ झुकाव ही देखने को मिला है। ठेका प्रथा के तहत निजी कंपनियों को पिछड़े देहातों और आदिवासी इलाकों में उपलब्ध सस्ता श्रम निचोड़ने का अवसर मिल जाता है। अल्पतम मजदूरी और बिना किसी सुविधा के काम करने के लिए तैयार बेरोजगारों की फौज के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा और लाचारी का फायदा निजी कंपनियों ही उठाती हैं। 

अपने संबोधन में आगे प्रधानमंत्री ने कोयले के उत्पादन में वृद्धि से उस पर निर्भर सेक्टर जैसे स्टील, बिजली, आदि को होने वाले फायदे का जिक्र किया। यह सच है कि शुरुआत में निजी कंपनियों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा की वजह से उत्पाद बढ़ सकता है और इससे दाम में गिरावट भी आ सकती है। लेकिन कंपनियों के बीच की प्रतिस्पर्धा और पूंजी के संकेन्द्रण और केंद्रीकरण की प्रवृत्ति की वजह से आगे चल कर कोयला जगत में कुछ ही कंपनियां रह जाएंगी, जैसा कि टेलिकॉम/मोबाइल सेक्टर में देखा गया। यह पूंजीवादी विकास का आम नियम है। अब बची हुई कंपनियों का ये एकाधिकार मनमाने तरीके से दाम तय करेगा और निर्भर उद्योग इसी दाम पर कोयला खरीदने के लिए विवश होंगे। इसका भार भी अंततः गरीब, निम्न मध्यम वर्ग पर, यहां तक कि मध्यम वर्ग के कंधों पर ही पड़ेगा। 

निजीकरण के फलस्वरूप खदानों से जुड़े इलाकों के लोगों की बढ़ती समृद्धि और सम्पूर्ण कल्याण की बात भी मोदी जी ने कही। लेकिन यह दावा सच्चाई से कोसों दूर है। असल में वहां के मूल निवासियों की जिंदगियां पूरी तरह बर्बाद हो जाएंगी। उन्हें उनकी जमीन से बिना किसी मुआवजे के या एक छोटी रकम दे कर बेदखल कर दिया जाएगा और इस ज्यादती के खिलाफ आवाज उठाने वालों को राजकीय दमन और हिंसा का सामना करना पड़ेगा। खनन के कारण बंजर हुए खेतों, प्रदूषित हुई नदियों और सम्पूर्णता में नष्ट हुए पर्यावरण पर जिनकी जीवन-जीविका निर्भर होगी, उन्हें अब इन बड़े कॉर्पोरेट पूंजीपतियों के भरोसे छोड़ दिया जाएगा।

मोदी जी ने कोयले को भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अतिआवश्यक स्तम्भ बताते हुए बड़ी धूर्तता से इस स्तम्भ को खोखला कर निजी कंपनियों को सौंपने के कई फायदे भी बता दिए। उन्होंने कहा कि, “वाणिज्यिक खनन से कोल सेक्टर दशकों के लॉकडाउन से बाहर निकलेगा।” पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए समर्पित सरकार से और क्या ही उम्मीद की जा सकती है। पहले तो सरकारी कंपनियों में विनिवेश और सरकारी भ्रष्टाचार कर उसे ध्वस्त कर दो, फिर जब वह घाटे में जाने लगे तो उसे ‘बीमार यूनिट’ घोषित करके उसे “बचाने” के नाम पर औने-पौने दामों में निजी कंपनियों के हवाले कर दो। मोदी सरकार के आने के पहले भी कोल जगत को पूंजीपतियों को सौंपने की तैयारी चल रही थी। 1993-2008 के बीच 214 कोल ब्लॉक निजी कंपनियों को आवंटित किया गया था जिस पर सीएजी की मार्च 2012 की रिपोर्ट में सरकार पर कोल के आवंटन में ‘अक्षम’ होने का आरोप था। और इसके बाद सर्वोच्च न्यायालय ने ना तो सरकार की दलीलें सुनीं और ना निजी मालिकों का निवेदन और 2014 में इन सारे 214 आवंटनो को खारिज कर दिया। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में कहा कि, “… सरकार से यह उम्मीद की जाती है कि वे देश के प्राकृतिक संसाधनों को चंद लोगों की जागीर नहीं समझें जो इन्हें अपनी इच्छा अनुसार कभी भी कैसे भी नष्ट कर सकते हैं। इसका साफ अर्थ है कि तब सर्वोच्च न्यायालय ने आम जनमानस के हितों के खिलाफ जा कर मुट्ठीभर पूंजीपतियों की जेबें भरने वाले वाणिज्यिक खनन की नीति के विरुद्ध अपना फैसला सुनाया था। सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के पीछे की मंशा साफ थी कि देश के संसाधनों का खनन आम जनता के कल्याण और हित के लिए किया जाए और इन्हें उन बड़े धन्नासेठों और पूंजीपतियों को ना सौंपा जाए जो इसका अपने मन मुताबिक भक्षण करें।

लेकिन आज की स्थिति इसके बिलकुल विपरीत हो गई है। अब सत्ता की बागडोर एक फासीवादी पार्टी के हाथ में है जिसने बखूबी सभी जनतांत्रिक संस्थाओं को खोखला कर उन्हें भीतर से कब्जे में कर लिया है और अब उनका इस्तेमाल ठीक वही करने के लिए कर रही है जिसका 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने विरोध किया था। मौजूदा सरकार अभूतपूर्व तेजी से निजीकरण के रास्ते पर बढ़ गई है और सभी सरकारी कंपनियों एवं प्राकृतिक व अन्य संसाधनों को पूंजीपतियों की झोली में डालते जा रही है। विगत 1 जुलाई को सरकार ने रेलवे में निजीकरण करने का फैसला भी सुना ही दिया, जिसके तहत 109 रूट पर पैसेंजर ट्रेनें चलाने का जिम्मा निजी कंपनियों को सौंपने का फैसला किया गया है। लेकिन इसके खिलाफ अब किसी जनतांत्रिक संस्थान से कोई आवाज नहीं उठ रही, क्योंकि न्याय व्यवस्था और अन्य सभी संस्थानों को मूकदर्शक बना दिया गया है जिनके पास सरकार की जनविरोधी नीतियों के खिलाफ बोलने की कोई क्षमता नहीं बची है। लेकिन कुछ विरोधी आवाजें अभी भी बाकी हैं। जैसे, छत्तीसगढ़ के 20 ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिख कर कोल ब्लॉक की नीलामी रोकने और उनके इलाके में हमेशा के लिए खनन प्रतिबंधित करने का आग्रह किया है। छत्तीसगढ़ की कांग्रेस की सरकार ने भी पर्यावरण और जैव विविधता को होने वाले नुक्सान को कारण बताते हुए केंद्र की वाणिज्यिक खनन के लिए नीलामी की प्रक्रिया की खिलाफत की है। हालांकि कांग्रेस के चरित्र को देखते हुए यह दिखावा मात्र ही है। भारत के सबसे बड़े कोयला-उत्पादन करने वाले राज्य, झारखंड, की सरकार ने भी केंद्र के इस फैसले के खिलाफ 3 जुलाई को सर्वोच्च न्यायालय में केंद्र सरकार के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया है। 

कोरोना महामारी ने पूरे पूंजीवादी व्यवस्था की कमियों को उजागर करते हुए यह साफ कर दिया कि किसी महामारी को संभालने में क्या नहीं करना चाहिए। कोरोना महामारी से निबटने का पहला पाठ है निजीकरण को पीछे करके लोक कल्याण प्रणाली और पब्लिक सेक्टर को बेहतर करना। जो देश अपने निजी स्वाथ्य सेवाओं के बल पर स्वास्थ्य सुविधाओं में दुनिया में अव्वल आते थे, वे कोरोना के बढ़ते मामलों के सामने पूरी तरह धराशाई हो गए हैं। पूंजीवाद के सारे स्वर्ग देखते ही देखते जमीन पर आ गिरे हैं। अब उन सुविधा संपन्न देशों में लाखों लोग मारे जा रहे हैं और सरकार के पास उन्हें दफनाने के लिए भी जगह नहीं बची है। ऐसा क्यों हुआ कि ये तथाकथित समृद्ध और विकसित देश अपनी जनता की जान तक नहीं बचा पाए? ऐसा इसलिए क्योंकि इनकी स्वास्थ्य सेवा प्रणाली का उद्देश्य कभी लोगों को बचाना था ही नहीं। ये तो बनी ही थी केवल मुनाफा कमाने के मकसद से। भारत की बात करें तो हमने देखा है कैसे बढ़ते संक्रमित मामलों का भार सरकारी अस्पतालों के कमजोर कंधों पर ही आ पड़ा। वे कितने भी जर्जर अवस्था में क्यों ना हों, उनके समकक्ष के निजी अस्पतालों ने पहली बुरी खबर के साथ ही अपने दरवाजे जनता के लिए बंद कर लिए। मुनाफे पर टिकी निजीकरण की व्यवस्था घोर रूप से जनविरोधी या कम से कम जनता की जरूरतों से पूरी तरह बेखबर होती है और पूंजीपति वर्ग बेबस और लाचार जनता का भक्षण करके अपनी तिजोरियां भरता जाता है।  

मोदी सरकार द्वारा कोल जगत के मजदूरों पर यह अभी तक का सबसे बड़ा हमला है। हालांकि सीआईएल ने अपने बयान में कहा है कि वाणिज्यिक खनन उन्हेंप्रभावित नहीं करेगा”, लेकिन यह समझना मुश्किल नहीं कि आधुनिक तकनीक, सस्ते श्रम और सरकार के समर्थन के साथ उतरी इन निजी कंपनियों के बीच की प्रतिस्पर्धा में सरकारी कोल इंडिया लिमिटेड को केवल बाजार में बने रहने के लिए भी मशक्कत करनी होगी, अपने मुनाफे की दर को बरकरार रखने की तो बात ही छोड़िए। और जैसे-जैसे कंपनी का मुनाफा गिरना शुरू होगा, इसकी सबसे बड़ी मार मजदूरों पर ही पड़ेगी। स्थाई मजदूरों की बकाया पगार और अन्य सुविधाएं स्थगित की जा सकती हैं। बाजार की कट्टर प्रतिस्पर्धा के कारण बढ़ी हुई मांग की पूर्ति के लिए काम के घंटे बढ़ाए जा सकते हैं। हायर एंड फायर की मजदूर विरोधी नीति और फिक्स्ड टर्म एम्प्लॉयमेंट (एफ.टी.ई.) के कारण मजदूर अपनी पीएफ, पेंशन और बाकी अधिकार भी खो दे सकते हैं। मजदूरों की दुर्घटना में हुई मौत या काम करने योग्य नहीं रह जाने की स्थिति में उनके आश्रितों को दी जाने वाली नौकरी भी खतरे में आ सकती है। खबर है कि अभी कुछ दिन पहले (26 जून) को ही सीआईएल के अधिकारियों के लिए वीआरएस का आदेश आ चुका है। श्रम कानूनों में किए जा रहे मजदूर विरोधी बदलावों के तहत मजदूर अपने सभी अधिकार जैसे, न्यूनतम मजदूरी, यूनियन बनाना, हड़ताल करना, आदि खो देंगे और उनसे उनकी सुविधाओं के लिए मोल-भाव करने की शक्ति भी छिन जाएगी। 

इससे लड़ने के लिए मजदूरों को अपने सुविधापरस्त जीवन से बाहर निकला होगा और इन अधिकारों के लिए एकजुट हो कर सरकार की इन दमनकारी नीतियों के खिलाफ संघर्ष करना होगा। विगत 2 जुलाई से कोल जगत के मजदूर यूनियनों ने मुख्यतः वाणिज्यिक खनन के लिए कोल ब्लॉक नीलाम करने के विरोध में तीन दिवसीय हड़ताल बुलाई थी। सेंट्रल ट्रेड यूनियनों ने भी अपनी 3 जुलाई की अखिल भारतीय विरोध प्रदर्शन में इस हड़ताल का समर्थन किया था। लेकिन इन सबके बाद क्या? क्या निजीकरण की प्रक्रिया रोक दी गई? नहीं। अपनी अपूर्ण मांगों की पूर्ति के लिए केन्द्रीय ट्रेड यूनियनों के पास अब आगे की कार्रवाई की कोई दिशा मौजूद नहीं है। हड़ताल मजदूर वर्ग का एक प्रबल हथियार है। इससे वे मालिकों पर दबाव बना कर उन्हें अपनी मांग मानने पर मजबूर कर सकते हैं। लेकिन इस हथियार को अपने असली लक्ष्य से दूर, केवल रस्म-अदाएगी तक सीमित करके इसे कमजोर और भेद्य बना दिया गया है। अतः मालिक वर्ग/सरकार उन्हें तव्वजों नहीं देती। लेकिन आशा है की यह स्थिति जल्द ही बदलेगी।

भारत के संगठित क्षेत्र के मजदूरों के लिए जल्दी ही एक निर्णायक घड़ी आने वाली है। उन्हें तय करना होगा कि क्या वे मजदूर यूनियनों की पुतला दहन, नारेबाजी और दो-तीन दिवसीय हड़ताल से संतुष्ट रह कर अपने लड़ कर हासिल किये गए अधिकारों को यूं ही गंवा देना चाहते हैं या मजदूर वर्ग की सच्ची क्रांतिकारी एकता बना कर निजीकरण, वाणिज्यिक खनन, श्रम कानूनों में बदलाव और अन्य सभी मजदूर-विरोधी नीतियों के खिलाफ आर-पार की लड़ाई तेज करना चाहते हैं। केंद्रीय ट्रेड यूनियनों को भी अपनी पुरानी बेड़ियों को तोड़ कर इस फासीवादी राज्य के खिलाफ आखिरी दम तक लड़ने के लिए तैयारी करनी होगी, नहीं तो यूं ही खत्म हो जाने के अलावा और कोई चारा नहीं रह जायेगा। इतिहास के इस मोड़ पर जरूरत है मजदूर वर्ग के एक ऐसे जुझारू केंद्र की, जो अभी तक के सबसे दमनकारी और शातिर पूंजीपति वर्ग के खिलाफ मजदूर वर्ग का एक बड़ा और सशक्त आंदोलन खड़ा कर सके और उनके सामने एक ऐसा मांग-पत्र पेश कर सके जिसमें उनकी आर्थिक मांगों के लिए तात्कालिक संघर्ष के साथ मजदूर वर्ग का दीर्घकालिक लक्ष्य का भी गूंथा हुआ हो। यह लक्ष्य और कुछ नहीं बल्कि इस लूट और शोषण पर टिके समाज को बदलकर एक सुन्दर, शोषणमुक्त समाज बनाने का सपना है। अब मजदूरों के समक्ष यह स्पष्ट हो जाना चाहिए कि बिना इस निर्णायक लड़ाई के पूंजीपति वर्ग का हमला रुकने वाला नहीं है। यह भी साफ हो कि बिना इस निर्णायक लड़ाई के पूंजीपतियों का कोई हमला रुकने वाला नहीं है। 

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 3/ जुलाई 2020) में छपा था

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