मजदूर-विरोधी श्रम सुधारों की महामारी

एस. राज //

पूरे विश्व में फैले कोरोना वायरस महामारी के प्रकोप ने दुनिया भर में तालाबंदी जैसी स्थिति सामान्य बना दी है। इस तालाबंदी में लगभग सभी उत्पादन संबंधित गतिविधियां अभूतपूर्व स्तर पर ठप पड़ी हैं जिसके कारण पहले से ही एक गंभीर संकट से जूझ रही विश्व पूंजीवादी व्यवस्था को इस महामारी और तालाबंदी ने और भी गहरे संकट में डाल दिया है। कई बुर्जुआ जानकार व अर्थशास्त्री पूंजीवाद के अब तक के सबसे बड़े संकट के दस्तक देने की ओर भी इशारा कर चुके हैं। इस संकट के कारण दुविधा में फंसा और इससे निपटने की राह तलाशता पूंजीवादी-साम्राज्यवादी शासक वर्ग अब इस ‘आपदा को अवसर’ में तब्दील करने जैसी बातें कर रहा है। जाहिर है, हर पूंजीवादी संकट की तरह इस संकट की भी सबसे बड़ी मार मजदूर वर्ग को ही झेलनी होगी और इसी के मुताबिक शासक वर्ग ने समस्त मानवता के समक्ष खड़ी इस भयानक आपदा के दौरान खुद को संकट से बाहर निकालने के प्रयास में घोर मजदूर-विरोधी श्रम सुधार व दमनकारी काले कानूनों को लागू करने का अवसर ढूंढ़ निकाला है। हालांकि नवउदारवादी नीतियों को लागू करने के तहत मजदूर विरोधी श्रम सुधार व इनके विरोध में उठी आवाजों को दबाने हेतु दमनकारी कानूनों को आम मेहनतकश जनता पर थोपने का सिलसिला पिछले कुछ दशकों से जारी रहा है, परंतु इस महामारी के दौर में इन्हें लागू करने में अभूतपूर्व स्फूर्ति देखने को मिल रही है।

भारत में आर्थिक संकट और मजदूर वर्ग पर इसका असर

भारत में 2014 आम चुनाव के बाद एक फासीवादी, व्यापक व कैडर-आधारित संगठन वाली भारतीय जनता पार्टी के सत्तासीन होने और खासकर 2019 में दुबारा भारी बहुमत से सरकार बनाने के बाद से मजदूर-विरोधी नीतियों को लागू करने के साथ-साथ जनवादी आवाजों, अधिकारों व आंदोलनों को कुचलने का सिलसिला अभूतपूर्व स्तर पर तेज हुआ। इस एजेंडा के पीछे बड़ी योजना थी सभी स्वतंत्र ‘जनतांत्रिक’ संस्थानों का अंदर ही अंदर से शांतिपूर्ण टेकओवर, जिसके लिए 2014 के भी कुछ सालों पहले से इस संगठन द्वारा एक व्यापक और आज की परिस्थितियों को देखते हुए कहा जा सकता है कि सफल अभियान चलाया गया।

भारत में संकटग्रस्त पूंजीवाद के मद्देनजर अपने पूंजीवादी-साम्राज्यवादी आकाओं को संकट से बचाने के प्रयास में इस सरकार ने पूंजी के संकेंद्रण व केंद्रीकरण की प्रक्रिया व्यापक रूप से तेज की। सत्ता में आने के कुछ ही सालों में नोटबंदी व जीएसटी जैसी नीतियां लागू हुई जिन्होंने गरीब मेहनतकश जनता को भयंकर पीड़ा पहुंचाने के साथ 93% श्रमिकों को रोज़गार देने वाले असंगठित क्षेत्र की कमर तोड़ दी। किसी भी बड़ी-पूंजीपक्षीय व दमनकारी सरकार की तरह स्वाभाविक रूप से इस सरकार का भी मुख्य एजेंडा श्रम कानूनों में ‘सुधार’ यानी उन्हें कमजोर या ध्वस्त करना था। इसी के तहत अपने पहले कार्यकाल में ही इसने देश में 44 श्रम कानूनों की प्रणाली को ध्वस्त कर उन्हें 4 श्रम संहिताओं या कोड में समाहित करने का प्रस्ताव सामने ले आया। यह संहिताएं हैं: वेतन कोड, औद्योगिक संबंध कोड, सामाजिक सुरक्षा कोड व व्यवसायिक सुरक्षा कोड। पूंजीपति और मजदूर वर्ग के बीच शक्ति संतुलन को व्यक्त करने वाले श्रम कानूनों के ध्वस्त होने और उनकी जगह घोर पूंजीपक्षीय व खतरनाक रूप से अस्पष्ट श्रम संहिताओं का लागू होना मजदूर वर्ग पर अभी तक का सबसे बड़ा हमला साबित होगा, जो ना सिर्फ अभी तक श्रम कानूनों की सुरक्षा पा रहे मजदूरों के एक छोटे संगठित हिस्से (10% से भी कम) के अधिकारों के ताबूत में आखिरी कील होगा, बल्कि असंगठित क्षेत्र के मजदूरों के ऊपर और भी बड़ा कहर ढाएगा जो आज भी इन श्रम कानूनों की सुविधा व सुरक्षा से बाहर हैं। इन श्रम संहिताओं के लागू होते ही न्यूनतम वेतन, काम के घंटों की तय सीमा (8 घंटे), सामाजिक सुरक्षा (पीएफ, पेंशन, बोनस आदि), स्थाई रोज़गार, यूनियन का गठन, हड़ताल, काम करने के लिए सुरक्षित व मानवीय परिस्थिति जैसे बुनियादी अधिकार वास्तविक रूप से ध्वस्त हो जायेंगे और बचे कुछेक अधिकारों के लिए ‘गैरकानूनी’ हड़ताल करने पर प्रत्येक मजदूर व उनके सहयोगियों पर दसों हज़ार रुपयों का जुर्माना लग सकेगा।

यह संहिताएं भले ही सरकार के पहले कार्यकाल में पारित नहीं हुईं, लेकिन दूसरे कार्यकाल के शुरू होने के 2 महीनों में ही 2 अगस्त 2019 को ‘वेतन संहिता 2019’ संसद (लोक सभा व राज्य सभा दोनों) में पारित कर दी गई। हालांकि पहले कार्यकाल में श्रम कानूनों को अछूता नहीं छोड़ा दिया गया था। मौजूदा कानूनों में मजदूर-विरोधी बदलाव किये गए थे जैसे: अपरेंटिस अधिनियम, 1961 में बदलाव कर गैर-इंजीनियरिंग क्षेत्रों में भी कुशल (स्किल) मजदूरों को अकुशल मजदूरों की श्रेणी में डालकर उन्हें नियुक्त करना संभव कर दिया गया; बाल श्रम अधिनियम, 1986 में बदलाव कर 14-18 उम्र वाले बच्चों को महज 3 श्रेणी के उद्योगों को छोड़ कर सभी उद्योगों में नियुक्त करने की अनुमति दे दी गई (गौरतलब है कि इस बदलाव से पहले 83 तरह के खतरनाक उद्योगों में बाल श्रम वर्जित था जिसे सरकार ने 3 श्रेणियों में बदल दिया)। इसके अलावा जो बदलाव केंद्र सरकार लागू नहीं कर सकी उन्हें राज्य सरकारों द्वारा, जिसमें कांग्रेस-शासित राज्य भी शामिल हैं, लागू कराया गया जैसे फैक्ट्री अधिनियम, 1948 और ठेका श्रम अधिनियम, 1970 आदि में संशोधन।

कोविड-19 महामारी और मजदूर वर्ग पर बढ़ते हमले

कोरोना महामारी के आगमन के बाद से, यानी पिछले कुछ महीनों से, चल रहे विश्वव्यापी लॉकडाउन ने लगभग सभी उत्पादन संबंधित गतिविधियों को अभूतपूर्व स्तर पर ठप कर दिया है जिससे पहले से गंभीर व सतत रूप ले चुका पूंजीवादी संकट और भी गहराता जा रहा है। इन परिस्थितियों में अपने मुनाफे पर कोई आंच ना पड़ने देने की लालसा में एक तरफ पूंजीपति वर्ग अपनी वफादार सरकारों से स्टिम्युलस पैकेज के नाम पर मोटी रकम व आर्थिक सहायता की मांग कर रहा है, और दूसरी तरफ मजदूर वर्ग पर हमलों को और तीव्र कर रहा है जो बड़ी संख्या में छंटनी, वेतन कटौती, सामाजिक सुरक्षा व अन्य सुविधाओं पर रोक, यूनियन बनाने पर रोक, सुरक्षा के नाम पर सर्विलांस बढ़ाना (आरोग्य सेतु जैसे ऐप से) आदि रूपों में दुनिया भर में देखा जा रहा है। यह साफ है कि समस्त मानव जाति पर छाए इस गंभीर संकट के दौरान भी पूंजीपति वर्ग व उसकी सरकारें केवल अपने हितों, यानी मुनाफे पर ही केंद्रित हैं और उनके लिए पहले से ही नरक जैसी परिस्थितियों से जूझ रही आम मेहनतकश जनता की बलि भी चढ़ाने को तैयार हैं।

भारत में भी केंद्र व राज्य सरकारें पूंजीपति वर्ग के लिए इस आपदा को अवसर में तब्दील करने का हर संभव प्रयास करने के तहत मजदूर वर्ग पर लगातार हमले तेज कर रही हैं। बिना किसी तैयारी के लागू किये गए लॉकडाउन में मजदूरों की नारकीय हालत छुपी हुई नहीं है। प्रवासी मजदूरों को खाना-पीना, रोज़गार, आवास व संसाधनों के बिना मरने के लिए छोड़ दिया गया है। उनमें से कइयों की अनेक गैर-वायरस कारणों से रोज मौत हो रही हैं और कई अपने घर लौटने के लिए सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने को मजबूर हैं, जहां आने वाले दिनों में वह इससे भी तीव्र गरीबी व भुखमरी का सामना करने के लिए बाध्य होंगे। लॉकडाउन की अवधि में मजदूरों की एक बड़ी आबादी को वेतन नहीं मिला है और उलटा बड़ी संख्या में उनकी छटनी की जा रही है। 25 मई 2020 को देश में बेरोज़गारी दर 24.5% थी! इस संकट ने सरकारी कर्मचारियों को भी अछूता नहीं छोड़ा है। केंद्र सरकार ने 24 अप्रैल को अपने 50 लाख कर्मचारियों और 60 लाख पेंशनधारियों के महंगाई भत्ते (डीए) व महंगाई राहत (डीआर) को 18 महीनों के लिए वर्तमान दरों पर रोक देने का ऑर्डर पास किया था। इसी के बाद दिल्ली, उत्तर प्रदेश, तमिल नाडू और नागालैंड राज्य सरकारों ने भी अपने कर्मचारियों के डीए व डीआर दरों को रोकने का ऑर्डर पास कर दिया। हालांकि इन परिस्थितियों में मजदूरों पर अभी तक का सबसे शातिर व सुनियोजित हमला है 3 राज्य सरकारों द्वारा लगभग सभी श्रम कानूनों को ससपेंड करना व भिन्न राज्य सरकारों द्वारा काम के घंटों को 8 से बढ़ा कर 12 कर देना।

काम के घंटों में बढ़ोतरी

24 अप्रैल 2020 से, महज एक महीने में, 13 राज्य सरकारों ने काम के घंटे 8 से बढ़ाकर 12 कर दिए। ये राज्य हैं राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, गोवा, ओड़िशा, पुदुचेरी, और उत्तराखंड (11 घंटे) व कर्नाटक (10 घंटे). इनमें से गुजरात व यूपी सरकारों ने साफ कहा है कि 8 घंटे के अतिरिक्त 4 घंटों के लिए फैक्ट्री अधिनियम के तहत दोगुना वेतन के बजाए समानुपातिक (“प्रपोर्शनेट”) वेतन ही मिलेगा। यानी, उदाहरण के लिए, अगर एक घंटा काम करने के ₹100 मिलते हैं तो अभी तक लागू कानून यानी फैक्ट्री अधिनियम के तहत 8 घंटे के बाद (ओवरटाइम) काम करने के लिए उसका दोगुना यानी ₹200 मिलने चाहिए, लेकिन नए प्रस्ताव के तहत 8 घंटे के बाद काम करने पर भी एक घंटे के ₹100 ही मिलेंगे, ना की दोगुना। हालांकि यूपी सरकार को अपना यह ऑर्डर 15 मई को वापस लेने के लिए बाध्य होना पड़ा जब इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मसले पर दर्ज पीआइएल के तहत सरकार को नोटिस जारी कर दिया। राजस्थान सरकार ने भी 24 मई को अपना ऑर्डर वापस ले लिया। लेकिन काम के घंटों को 8 से बढ़ा कर 12 करने वाले ये ऑर्डर, भले ही अस्थाई रूप से, पारित होना और उनके साथ केंद्रीय सरकार का पूरे देश में काम के घंटों को 12 करने की योजना लागू करने पर विचार करना, इशारा करता है कि भारत शायद जल्द ही 12 घंटे के कार्य दिवस को लागू करने वाला विश्व का एकमात्र देश बन जाए। ऐसा कदम ना केवल अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) के कन्वेंशन संख्या 1 (1919) का उल्लंघन होगा बल्कि 8 घंटे से ज्यादा काम नहीं करने के अधिकार, जिसके लिए मजदूरों ने अनगिनत संघर्ष किये और शहादतें दी और जो 1886 में शिकागो के ऐतिहासिक मई दिवस आंदोलन की प्रमुख मांग थी, को भी ध्वस्त कर देगा।

अध्यादेशों (ऑर्डिनेंस) के रास्ते से श्रम कानूनों पर हमला

यूपी, एमपी, और गुजरात सरकारों ने अध्यादेशों व सरकारी ऑर्डर के रास्ते से लगभग सारे केंद्रीय व राज्य श्रम कानूनों को ध्वस्त कर दिया है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने ‘उत्तर प्रदेश अस्थायी श्रम कानूनों से छूट अध्यादेश, 2020’ पारित किया है जिसके तहत काम के घंटे 8 से बढ़ कर 10 हो जायेंगे और राज्य में लागू सभी 38 श्रम कानून 3 वर्ष के लिए निलंबित (ससपेंड) हो जायेंगे, केवल 3 को छोड़ कर, जो हैं: कामगार मुआवजा अधिनियम 1923, बंधुआ मजदूरी प्रणाली (उन्मूलन) अधिनियम 1976, भवन एवं अन्य निर्माण श्रमिक अधिनियम 1996 और इनके अतिरिक्त पारिश्रमिक भुगतान अधिनियम 1936 का एक भाग। यह बदलाव मौजूदा एवं नई फैक्ट्रियों पर लागू होंगे। गौरतलब है कि इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा नोटिस जारी होने के पश्चात यूपी सरकार द्वारा वापस लिए गए काम के घंटे बढ़ाने वाले ऑर्डर का इस अध्यादेश से कोई संबंध नहीं है। अतः वह ऑर्डर वापस ले लेने के बावजूद, उससे भी खतरनाक यह अध्यादेश अभी जारी है।

मध्य प्रदेश सरकार द्वारा पारित प्रस्ताव के तहत सभी नए फैक्ट्रियों पर 3 महीनों तक लगभग एक भी श्रम कानून लागू नहीं होंगे जिसकी अवधि बढ़ा कर 1000 दिन करने का प्रस्ताव एमपी सरकार ने केंद्र के सामने रखा है। इस बदलाव से नई फैक्ट्रियां फैक्ट्री अधिनियम के ‘श्रमिकों के अधिकार’ वाली धारा, जिसके तहत मजदूरों को कार्यस्थल पर उनके स्वास्थ्य व सुरक्षा संबंधित जानकारी हासिल करने का अधिकार प्राप्त है, से पूरी तरह मुक्त हो जाएंगी। अर्थात पीने का पानी, वेंटिलेशन, रौशनी, शौचालय, बैठने की सुविधा, फर्स्ट एड बॉक्स, सुरक्षा उपकरण, कैंटीन, क्रेच, साप्ताहिक अवकाश और विश्राम अंतराल जैसी बुनियादी सुविधाएं भी मुहैया कराने के लिए मालिक अब बाध्य नहीं रहेगा। इसके अतिरिक्त, फैक्ट्रियों पर औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 के कोई प्रावधान 1000 दिनों तक लागू नहीं होंगे, सिवाय धारा 25 के, जिसके तहत गैरकानूनी हड़ताल व तालाबंदी को आर्थिक सहयोग देना निषेध है। उद्योग मजदूरों को अपनी सुविधानुसार काम पर रख और निकाल सकेंगे अर्थात ‘हायर एंड फायर’ व्यवस्था लागू हो जायेगी। लेबर कोर्ट और सरकारी श्रम विभाग उद्योगों द्वारा लिए गए फैसलों में दखल नहीं देंगे। 3 महीनों तक फैक्ट्रियों में कोई निरीक्षण (इंस्पेक्शन) नहीं होगा। सरकार द्वारा पारित कुल खतरनाक बदलावों में शामिल यह कुछ बदलाव हैं।

गुजरात सरकार ने नई फैक्ट्रियों के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिनियम, औद्योगिक सुरक्षा नियम, कामगार मुआवजा अधिनियम को छोड़ सभी श्रम कानून 1200 दिनों के लिए निलंबित करने का प्रस्ताव पारित किया है। इसके अतिरिक्त भिन्न विशेष आर्थिक जोन (एसईज़ेड) में कुल 33 हज़ार हेक्टेयर (करीब 81.5 हज़ार एकड़) जमीन को औद्योगिक इस्तेमाल के लिए उपलब्ध कराया गया है।

हालांकि यूपी और गुजरात के राज्यपालों ने इन प्रस्तावों को पारित कर दिया है, परंतु इन्हें औपचारिक रूप से लागू करने के लिए देश के राष्ट्रपति द्वारा पारित होना अनिवार्य है, क्योंकि संविधान में ‘श्रम’ का विषय समवर्ती सूची (कनकरंट लिस्ट) में आता है और इस सूची में आये विषयों पर कानून पारित करने का अधिकार-क्षेत्र केंद्र व राज्य सरकारों के पास संयुक्त रूप से होता है। गौरतलब है कि राष्ट्रपति द्वारा यह प्रस्ताव अभी पारित नहीं हुए हैं।

सरकार किसके लिए?

यह साफ है कि दुनिया भर की सरकारें किस वर्ग के हितों के लिए, एक महामारी के दौरान भी, तेज़ी से मजदूर-विरोधी जन-विरोधी नीतियां लागू कर रही हैं। हालांकि अपने वर्ग-चरित्र को पर्दे के पीछे रखने की सरकार की कोशिशें अब नाकामयाब साबित हो रही हैं।

मई में 12 नियोजक (एम्प्लायर) संघों ने संयुक्त रूप से केंद्र सरकार के सामने श्रम कानूनों को अगले 2-3 सालों के लिए निलंबित करने की मांग रखी थी, और ठीक इसी दौरान भाजपा-शासित 3 राज्य सरकारों ने अपने राज्यों के लगभग सभी श्रम कानून निलंबित कर दिए। और तो और, मीडिया रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार सभी श्रम कानूनों को बिना देरी के अध्यादेश या कार्यकारी ऑर्डर के रास्ते से पूरे देश में लागू करने की योजना बना रही है। इसी तरह अप्रैल में प्रमुख व्यापार संघ असोचैम (Assocham) और फिक्की (FICCI) ने सरकार से ₹15-23 लाख  करोड़ व ₹10 लाख करोड़ के आर्थिक सहयोग (स्टिम्युलस) पैकेज की मांग की थी, और 12 मई को ही प्रधान मंत्री ने ₹20 लाख करोड़ के पूंजीपक्षीय ‘आत्मनिर्भर’ पैकेज की घोषणा कर दी। हालांकि इस पैकेज में ₹17 लाख करोड़ केवल लोन व तरलता प्रदान करने के स्वरूप में हैं, जिससे उद्योग जगत भी संतुष्ट नहीं है. इनके अतिरिक्त, गुजरात, मध्य प्रदेश, यूपी व कर्नाटक सरकारें ऐसा ऑर्डर पारित करने की योजना बना रही हैं जिसके तहत लॉकडाउन के बाद वापस काम पर लौटने से इंकार करने वाले मजदूरों के खिलाफ वेतन कटौती व अनुशासनिक कार्रवाई की जा सकेगी। तमाम सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम, अस्पताल, रेलवे, एयरपोर्ट, खदान, बैंक व अन्य क्षेत्रों को भी सरकार पूरी तेजी के साथ बड़े पूंजीपतियों की झोली में डाल रही है।

क्या करें?

उपरोक्त तथ्य इशारा करते हैं कि कोरोना महामारी व लॉकडाउन के कारण जैसे-जैसे पूंजीवादी संकट और गहराता जाएगा, मजदूर वर्ग पर हमले और तेज होंगे। बड़ा पूंजीपति वर्ग इस संकट में अपने मुनाफे की रक्षा के लिए आम मेहनतकश जनता के खून का आखिरी कतरा चूस लेने को तत्पर है, जिसके लिए संकट से बाहर निकलने के प्रयास में वह पूंजी के संकेंद्रण व केंद्रीकरण की प्रक्रिया को और तेज करेगा जिससे समाज में सर्वहाराकरण की प्रक्रिया भी और तेज होगी। तमाम आंकड़े व रिपोर्ट बताते हैं कि आने वाले दिनों में स्थिति इससे भी बदतर होने वाली है यानी ना सिर्फ बेरोजगारी, गरीबी, भुखमरी में इजाफा होगा बल्कि मजदूरों द्वारा लड़ कर हासिल किए गए अधिकारों को बड़े पूंजीपतियों की ये सरकारें एकाएक ध्वस्त कर मजदूरों के संघर्षों से समाज व जनता की हुई प्रगति व उन्नति को सदियों पीछे धकेलने का हर संभव प्रयास करेंगी। मजदूरों को बंधुआ बनाने वाले ऑर्डर व अध्यादेशों का पारित होना इसी की तरफ ठोस कदम हैं।

एक भयानक महामारी से जूझ रही मानवजाति के समक्ष जब प्रतिदिन हजारों मौत की खबरें सामने आ रही हैं, तो शोषण व गैरबराबरी पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था, मुनाफे की हवस के कारण, मानव जाति की उत्तरजीविता के रास्ते में एक बड़ा रोड़ा बन कर खड़ी हो गई है। एक तरफ अस्पताल में बेड, वेंटीलेटर, टेस्ट, पीपीई, सुरक्षा उपकरण, खाना, आवास, वेतन आदि के अभाव के कारण प्रतिदिन जानें जा रही हैं, वहीं दूसरी तरफ मुनाफा नहीं कमा पाने की स्थिति में निजी अस्पताल, फैक्ट्रियां, मशीनें बंद पड़ी हैं, भवन, बिल्डिंग, होटल खाली पड़े हैं, और भरे गोदामों में अनाज सड़ रहे हैं। ऐसा अंतर्विरोध, जहां एक तरफ जनता के बीच बुनियादी जरूरतों की वस्तुओं का अभाव और दूसरी तरफ संसाधनों व क्षमता की प्रचुरता हो, का कारण सामाजिक श्रम से पैदा हुए संसाधनों के निजी स्वामित्व में डालने वाली वह व्यवस्था है जो अपने मुनाफे की हवस के कारण मजदूर वर्ग के दुख तकलीफों की जड़ बनी हुई है और उसके अधिकारों को एक-एक कर छीन रही है।

इसी कारण से आज की परिस्थितियों में पूंजीवाद ना सिर्फ मजदूर वर्ग व समस्त मानव जाति की प्रगति और उन्नति के रास्ते में खड़ा है बल्कि उसकी उत्तरजीविता के रास्ते में भी एक रोड़ा बन गया है। अतः अपने अधिकारों के लिए मजदूर वर्ग का संघर्ष एक बड़े निर्णायक संघर्ष का हिस्सा बन जाता है जो केंद्रित है उसके शोषण व गैरबराबरी पर टिकी पूंजीवादी व्यवस्था के विरुद्ध, जिसके अस्तित्व के रहते ना केवल मजदूर वर्ग के दुख-तकलीफों व शोषण का हटना नामुमकिन है बल्कि समस्त मानवता की प्रगति व उन्नति नामुमकिन हो गई है।

“पूंजीवादी संकट यह दर्शाता है कि मजदूरों को अपना संघर्ष केवल आर्थिक मुद्दे तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, क्योंकि जब आर्थिक संकट आता है तब जो सहूलियतें पूंजीपतियों ने मजदूरों को दी होती है, उन्हें न केवल हटा लेता है, बल्कि मजदूरों की असहाय स्थिति का फायदा उठाते हुए उनकी मजदूरी को और नीचे कर देता है। यह स्थिति तब तक चलती रहेगी जब तक सर्वहारा वर्ग की समाजवादी सेना पूंजीवाद का पूरी तरह से नाश नहीं कर देती!”
लेनिन, लेसंस ऑफ़ द क्राइसिस, 1901
(संकलित रचनाएं, खंड 5, पेज 89-94)

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 2/ जून 2020) में छपा था

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