भारतीय अर्थव्यवस्था में बढ़ता पूंजी संकेंद्रण

एम. असीम //

भारत ‘भारत की 20 सर्वाधिक लाभप्रद फ़र्म आज देश के कुल लाभ का 70% उत्पन्न करती हैं, जो 30 साल पहले 14% ही था। भारत में अंतरगुंफित अर्थव्यवस्था (हाइवे, सस्ती उड़ानें, ब्रॉडबैंड, जीएसटी) के उदय ने बड़ी, कुशल फर्मों को श्रेष्ठ तकनीक और अधिक पूंजी के प्रयोग द्वारा छोटे प्रतिद्वंद्वियों को मसल डालने का मौका दिया है। जैसे अमेरिका में देखा जा चुका है, भारत में भी गिनी-चुनी बड़ी कंपनियों के बढ़ते प्रभुत्व से भारतीय पूंजीवाद का सांचा ही तब्दील हो रहा है।‘

जब भारत के कुछ मार्क्सवादी अभी भी इस अंतहीन विवाद में उलझे हुये हैं कि यहां पूंजीवाद कितने प्रतिशत विकसित हुआ है और कितने प्रतिशत सामंतवाद अभी बचा है, पूंजी निवेश शोध फर्म मारसेलस ने एक अध्ययन (https://marcellus.in/blogs/behold-the-leviathan-the-remaking-of-indian-capitalism/) में उपरोक्त निष्कर्ष निकाला है। इसका आगे कहना है कि संगठित औपचारिक अर्थव्यवस्थाओं वाले अन्य विकसित पूंजीवादी देशों की ही तरह इन शीर्ष 20 लाभदायक फर्मों का टैक्स पश्चात लाभ में हिस्सा मौजूदा 70% से बढ़ते हुये 80-90% तक पहुंचेगा। इसी तरह की स्थिति उद्योगों में पूंजी संकेंद्रण की भी है और इनमें एकाधिकार/द्वैध-अधिकार पूरी तरह स्थापित हो चुका है। टेलीकॉम में तो इसका घटित होना सुविज्ञात है, पर अन्य कई औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसे स्थापित करने के लिए पूंजीपतियों में मारक खूनी संघर्ष पहले ही हो चुका है।

भारत पहले ही कई मुख्य उद्योगों में लाभ में हिस्से के असाधारण संकेंद्रण वाली अर्थव्यवस्था बन चुका है। उदाहरणार्थ, पेंट (एशियन पेंट, बरजर पेंट), उच्च दाम वाले खाद्य तेल (मरीको, अदानी), बिस्कुट (ब्रिटानिया, पार्ले), बालों का तेल (मरीको, बजाज कॉर्प), शिशु दुग्ध आहार (नेस्ले), सिगरेट (आईटीसी), गोंद (पिडलाइट), वाटरप्रूफिंग (पिडलाइट), ट्रक (टाटा मोटर, अशोक लीलेंड), छोटी कार (मारुति, हयुन्दे)। इन सभी क्षेत्रों में उस उद्योग के मूल लाभ का 80% एक या दो कंपनियों के हाथ में आ चुका है। अब इसी रुझान के उन विखंडित क्षेत्रों में भी स्थापित होने की संभावना है जिनमें अब तक असंगठित छोटे खिलाड़ी लाभ का अधिक बड़ा हिस्सा प्राप्त कर रहे थे। 

1991 पश्चात अवधि में शीर्ष भारतीय कंपनियों के लाभार्जन की स्थिति पर गौर किया जाये तो निम्न तस्वीर उभर कर सामने आती है:

पहला ग्राफ: “इस चार्ट का उभय अक्ष सम्पूर्ण भारतीय कॉर्पोरेट क्षेत्र के मुनाफे में से 20 शीर्ष कंपनियों के मुनाफे की मात्रा के अनुपात के 3 साल के गतिमान औसत को दिखाता है। चार्ट से स्पष्ट है कि विश्व की छठी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में 1990 के दशक में अर्थव्यवस्था के उदारीकरण के वक्त शीर्ष 20 लाभर्जित करने वाली कंपनियों का हिस्सा 14% से बढ़कर अब लगभग 70% पर पहुंच गया है।”

दूसरा ग्राफ: “जीडीपी भूमि, श्रम और पूंजी को प्राप्त आय का योग होता है अतः हमने जांचा कि इन 20 शीर्ष कंपनियों का कर पश्चात मुनाफा भारत की जीडीपी का कितना भाग है। उपरोक्त चार्ट में, बायां अक्ष वही है जो चित्र 1 में है और दायां अक्ष दिखाता है कि इन 20 शीर्ष कंपनियों का मुनाफा भारत की कुल आंकिक जीडीपी का कितना प्रतिशत है। हालांकि कुल कर पश्चात मुनाफे में इन 20 शीर्ष कंपनियों का हिस्सा वित्त वर्ष 2008 से बढ़ा है (बायां पक्ष), मगर इसी अवधि में जीडीपी के हिस्से के तौर पर उनका कर पश्चात मुनाफा काफी कम हुआ है (दायां पक्ष)। असल में 21वीं सदी के पूरे दौर में ही दोनों रेखाएं एक दूसरे की विपरीत दिशा में ही गतिमान रही हैं।”

फिर सबसे बड़ी भारतीय कंपनियां इतनी प्रभुत्वशाली क्यों बनती जा रही हैं?

इस अध्ययन के अनुसार ऐसा होने के 4 मुख्य कारण हैं (आगे का अंश शब्दशः उद्धरण नहीं,  मेरे शब्दों में कुछ रूपांतर के साथ है): 

  1. अंतरगुंफित अर्थव्यवस्था बड़ी, कुशल कंपनियों को मदद करती है: पिछले दस वर्षों में भारत में सड़कों की लंबाई 33 लाख किमी से बढ़कर 59 लाख किमी हो गई है (वार्षिक चक्रवृद्धि दर 6%), मोबाइल फोन कनैक्शन 39.2 करोड़ से बढ़कर 116.1 करोड़ हो गये हैं (वार्षिक चक्रवृद्धि दर 12%), ब्रॉडबैंड कनैक्शन 60 लाख से बढ़कर 56.3 करोड़ हो गये हैं (वार्षिक चक्रवृद्धि दर 57%)। एक दशक पहले 4.4 करोड़ भारतीय हवाई यात्रा करने में सक्षम थे जो अब तीन गुना हो गये हैं (वार्षिक चक्रवृद्धि दर 13%)। 15 साल पहले एक तिहाई परिवारों के ही बैंक खाते थे, अब लगभग सभी परिवारों के बैंक खाते हैं।
    अर्थव्यवस्था के इस तरह अंतरगुंफित हो जाने से स्थायी पूंजी में अधिक निवेश कर पाने वाली कंपनियों को फायदा हुआ है। मजबूत वितरण तंत्र वाली, बड़ी, अधिक पूंजी सघन कंपनियों ने होड़ में क्षेत्रीय व स्थानीय प्रतिद्वंद्वियों को पीछे छोड़ दिया है। उदाहरण के तौर पर, अर्थव्यवस्था के राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत होते जाने से वित्तीय कर्जदाताओं के क्षेत्र में जहां पहले क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्वी प्रभावी थे पिछले 10 सालों में उनकी जगह एचडीएफसी बैंक तथा एचडीएफसी जैसे विशाल राष्ट्रीय संस्थानों ने ले ली है, जो दोनों ही शीर्ष 20 मुनाफा कमाने वालों में शामिल हैं।
  2. छोटी कंपनियों पर नियमन का बोझ अधिक है: अर्थशास्त्री लंबे समय से मानते आए हैं कि भारी नियमन बड़ी कंपनियों की तुलना में छोटी कंपनियों को हानि पहुंचाता है। स्पष्ट तौर पर कम संसाधनों वाले छोटे प्रतियोगियों को इस काम के लिए बड़े प्रतियोगियों के मुकाबले अधिक संसाधन खर्च करने पड़ते हैं। जैसे जीएसटी अपनाने में एशियन पेंट जैसी बड़ी पूंजी वाली कंपनियों को अपने संसाधनों का नगण्य हिस्सा खर्च करना पड़ा जबकि कुल बिक्री में उससे बहुत छोटी पेंट कंपनियों को यह खर्च वहन करना ही बहुत भारी पड़ा।
    मैं बहुत पहले से ही यह तर्क देता आ रहा हूँ कि जीएसटी तथा अचानक नोटबंदी के बाद कैशलेस, डिजिटल, आदि जरियों से अर्थव्यवस्था में तीव्र औपचारिकीकरण बड़ी इजारेदार पूंजी के लिए फायदेमंद रहा है। सामान्य अर्थव्यवस्था और आम जनता के लिए इन नीतियों का प्रभाव जितना भी हानिकारक हो, इन्होने सबसे बड़े पूंजीपतियों को कुछ हद तक लाभान्वित ही किया है। इसीलिये वे अभी भी मोदी सरकार के साथ खड़े हैं।
  3. तकनीक नये प्रतिद्वंद्वियों के लिए बड़ी बाधा है: मार्च 2019 के मैकिंजे के सर्वेक्षण के अनुसार, बड़ी कंपनियों की तुलना में छोटी भारतीय कंपनियों ने डिजिटल भुगतान माध्यमों को अधिक तेजी से अपनाया है। मगर उनके पास कृत्रिम मेधा (AI) व इंटरनेट ऑफ थिंग्ज जैसी विकसित तकनीकों को अपनाने के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध नहीं हैं। यहीं बड़ी कंपनियाँ उन्हें पछाड़ देती हैं। पूरे भारत के पैमाने पर वितरण तंत्र व उपस्थिति की आवश्यकता वाले कारोबारों में एशियन पेंट, एचडीएफसी बैंक, पिडलाइट जैसी अग्रणी कंपनियों ने तकनीक के कुशल प्रयोग से नये प्रतियोगियों के रास्ते में ऊंची बाधायें खड़ी कर दी हैं। उदाहरणार्थ, किसी नई या छोटी कंपनी के लिए एशियन पेंट की तुलना का एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ERP) सिस्टम बनाना मुश्किल है। नतीजा यह है कि 8 दिन की कार्यशील पूंजी चक्र से काम चलाने वाले एशियन पेंट का नकदी प्रवाह जबर्दस्त है जबकि उसके प्रतिद्वंद्वियों को 100 दिन या अधिक के कार्यशील पूंजी चक्र से काम चलाना पड़ता है जिससे उनकी लागत अधिक और लाभ दर कम होती है।
  4. विशालकाय कंपनियों की पूंजी लागत कम है: भारत की शीर्ष 20 लाभार्जन करने वाली कंपनियों को 2 मुख्य श्रेणियों में रखा जा सकता है: (क) पूंजी लागत की तुलना में पूंजी पर बेहतर लाभ दर के कारण अधिक मुक्त नकदी उत्पन्न करने वाली निजी कंपनियाँ जैसे एचडीएफसी बैंक, आईटीसी, एचडीएफसी, टीसीएस, आदि; और (ख) राज्य की निहित सार्वभौम गारंटी के कारण सस्ती पूंजी प्राप्त कर सकने वाली विशालकाय सार्वजनिक कंपनियां। छोटी कंपनियों को पूंजी के इन दोनों स्रोतों से वंचित रहना पड़ता है। यह उन्हें इन विशाल प्रभुत्वकारी कंपनियों के साथ होड से पूरी तरह बाहर कर देता है। उदाहरणार्थ, आईटीसी की बैलेंस शीट में 28 हजार करोड़ का नकद भंडार है और लगभग हर साल इसका मुक्त नकदी प्रवाह 10 हजार करोड़ रु होता है। अतः किसी छोटी उपभोक्ता उत्पाद कंपनी के लिए आईटीसी जैसी कंपनी से होड कर पाना लगभग नामुमकिन है।

समय सीमा के दबाव के चलते यह लेख अत्यंत शीघ्रता में लिखा गया है फिर भी उपरोक्त के आधार पर तीन फौरी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं:

  1. नवउदारवादी नीतियों के लागू होने के बाद से भारत में पूंजी का संकेंद्रण और इजारेदारीकरण की रफ्तार बहुत तेज हो गई है, क्योंकि पूंजीवादी फर्म अपनी पूंजी का जैविक संघटन तेजी से बढ़ा रही हैं अर्थात परिवर्तनशील पूंजी (प्रयुक्त श्रमशक्ति) की तुलना में अधिक स्थिर पूंजी (मशीन, तकनीक, कच्चा/सहायक माल, आदि) में अधिक निवेश कर रही हैं। इससे होड तीखी हुई है और पूंजी बाजार या वित्तीय पूंजीपतियों से कर्ज के रूप में अधिक पूंजी प्राप्त कर सकने वाले को इस होड में फायदा मिला है। उधर, इसने बहुत सारी छोटी फर्मों को बाजार से बाहर कर दिया है जिससे दिवलीयाकरण इतना तेज हो गया है कि उसे संभालने हेतु भारतीय पूंजीवादी राज्य को इंडियन बैंकरप्टसी कोड के रूप में बाकायदा एक औपचारिक कानूनी तंत्र बनाना पड़ा है।
  2. मार्क्स के बताये अनुसार पूंजी के इस उच्चतर जैविक संघटन ने लाभ की दर को गिराने का अपना प्रभाव प्रदर्शित कर दिया है। जैसे प्रति इकाई माल उत्पादन में परिवर्तनशील पूंजी का अनुपात गिरता है उत्पादित माल में जड़ित अधिशेष मूल्य भी कम होता है हालांकि कुछ कारक इस प्रवृत्ति के विरुद्ध भी काम करते हैं जैसे श्रम के शोषण की दर को तीव्र करना। लाभ की दर गिरने की यह प्रवृत्ति चित्र 2 से स्पष्ट है। हालांकि शीर्ष फर्मों का कुल लाभ में हिस्सा बढ़ा है पर उनका कुल लाभ भारत की कुल आंकिक जीडीपी के प्रतिशत के तौर पर गिरते हुये 2008-09 के लगभग 3% के शिखर स्तर से 1.5% से थोड़ा ऊपर ही रह गया है। मेरी नजर में यह भारत में आर्थिक संकट का प्रधान कारण है, खास तौर पर अन्य फर्मों के लिए तो यह मुनाफा दर और भी अधिक दर से गिरी है और उनके लिए वित्तीय संस्थानों द्वारा उधार दी गई पूंजी पर ब्याज चुका पाना नामुमकिन होता जा रहा है। इससे ये वित्तीय पूंजी संस्थान भी डूबे कर्जों की भारी रकम के बोझ से पैदा संकट से दबे जा रहे हैं। यही पूंजीपति वर्ग द्वारा अर्थव्यवस्था में ब्याज दरों को घटाने की निरंतर मांग की मुख्य वजह है और जिसके कारण राजन और पटेल दो रिजर्व बैंक गवर्नरों को पद से हटना पड़ा क्योंकि वे ब्याज दरों के बजाय मौद्रिक नीति द्वारा मुद्रास्फीति के नियंत्रण पर अधिक ध्यान दे रहे थे।
  3. मुनाफे की इस गिरती दर ने ही विशेषतया 2010 के बाद भारतीय पूंजीपति वर्ग को पूर्ण फासीवादी विकल्प का उपाय अपनाने की ओर धकेला। इस वजह से ही उन्हें श्रम के शोषण की दर में सतत वृद्धि की जरूरत है, न सिर्फ सापेक्ष अधिशेष मूल्य की दर बल्कि निरपेक्ष अधिशेष मूल्य की दर को भी जैसा कि 12 घंटे के कार्यदिवस पर जोर से भी पता चलता है। श्रम के शोषण की दर में इतना इजाफा औपचारिक बुर्जुआ जनतंत्र की हदों में करना मुश्किल है और मजदूर वर्ग के सभी संगठनों व आंदोलनों को पूर्ण रूप से कुचलने के लिए फासिस्ट सरकार पूंजीपति वर्ग का पसंदीदा चुनाव बन जाता है खास तौर पर भारत जैसे मुल्क में जहां फासीवादी उभर के फलने-फूलने के लिए पर्याप्त पिछड़ा सामाजिक-सांस्कृतिक वातावरण पहले से ही मौजूद है।

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 2/ जून 2020) में छपा था

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