क्या अमेरिका क्रांति के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है?

अमेरिका में 25 मई 2020 को अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की पुलिस अधिकारि‍यों द्वारा गर्दन दबाकर की गई बेरहम हत्या के बाद दूसरे सप्‍ताह में भी विरोध प्रदर्शन तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। जॉर्ज फ्लॉयड आज अमेरिका में न्याय और बराबरी तथा शोषण व अत्‍याचार के अंत की मांग के प्रतीक बन चुके हैं। 46 वर्षीय जॉर्ज अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के थे। वे नॉर्थ कैरोलिना में पैदा हुए थे और टेक्सास के ह्यूस्टन में रहते थे। ह्यूस्टन में काम के लिये संघर्ष के बाद वो मिनियापोलिस चले गये, जहां उन्होंने दो काम किये; एक, ट्रक चलाना, और दूसरा लैटिन अमेरिकी रेस्तरां कांगा लैटिन बिस्त्रो में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करना। बीबीसी की रिपोर्ट के मुताबिक, वहां वे रेस्‍तरां में सुरक्षा गार्ड की नौकरी करते हुए उसी रेस्‍तरां मालिक के घर में किराये पर रहते थे। उनकी एक 6 साल की बेटी भी है जो ह्यूस्टन में अपनी मां रॉक्सी वाशिंटगन के साथ रहती है। पुलिस के अनुसार, जॉर्ज को एक दुकान से 20 डॉलर (लगभग 1500 रूपये) के फर्जी नोट के जरिए खरीददारी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। जो वीडियो वायरल हुआ उसमें पुलिस अधिकारी को घुटने से 8 मिनट तक जॉर्ज के गर्दन को दबाते हुए देखा जा सकता है। वीडियो में जॉर्ज फ्लॉयड कह रहे हैं कि ‘मैं सांस नहीं ले पा रहा’, लेकिन नस्‍लीय घृणा के आवेग में पुलिस अधिकारी डेरेक चाउविन ने उनकी एक नहीं सुनी। बाद में इसी वजह से उनकी मौत हो गई।

तकरीबन 140 छोटे-बड़े शहरों में प्रदर्शन आज भी जारी है। 40 से ज्‍यादा शहरों में लोग कर्फ्यू तोड़कर सड़कों पर निकल अपने गुस्‍से का इजहार लगातार कर रहे हैं। कई हजार लोग गिरफ्तार तथा दर्जनों घायल हुए हैं। कई लोगों की जानें भी गई हैं जिसके बारे में कोई स्‍पष्‍ट आंकड़ा अभी तक नहीं प्राप्‍त हो सका है। शुरू से ही लोग रोके जाने पर पुलिस तथा नेशनल गार्ड से झड़प करने पर उतारू हैं। कई शहरों में घंटों तक और अंदर रिहायशी इलाकों की सड़कों व गलियों तक में जम कर लड़ाई (pitched battle) होने की खबर भी है। एक शहर से दूसरे शहर में क्रोध फूट पड़ रहा है। अंदर ही अंदर आम गरीब अमेरिकियों के भीतर एक लावा जमा था जो आज उबल कर बाहर निकल रहा है। यह भी सही है कि काफी तोड़फोड़ तथा आगजनी हुई है जो सामान्‍यत: छिटपुट तौर पर और कहीं-कहीं बड़े पैमाने पर अब तक जारी है। राष्ट्रपति भवन के सामने की सड़क और पार्क पर शुरू में ही प्रदर्शनकारि‍यों ने कब्‍जा जमा लिया था। हालांकि ट्रम्‍प समर्थक नेशनल गार्ड और पुलिस ने उन पर आंसू गैस छोड़ कर कुछ समय के लिए उन्‍हें वहां से हटाने में सफलता पाई थी। ट्रम्‍प ने उसी सड़क पर चलकर बाकी दुनिया को यह बताने की कोशिश की है कि व्‍हाइट हाउस और सामने की सड़क और पार्क पर उनका कब्‍जा बरकरार है! वह अपनी ही जनता से बुरी तरह घिर चुके हैं और एक गृहयुद्ध जैसी स्थिति का सामना कर रहे हैं। जब उन्‍होंने उपरोक्‍त सड़क के उस पार चर्च के पास खड़े होकर आंदोलनकारियों को धमकी दी कि ‘लूटिंग शुरू होगी, तो शूटिंग शुरू होगी’ तो इसका भी जबर्दस्‍त विरोध हुआ। यहां तक कि चर्च के वरिष्ठ अधिकारियों और धर्मगुरुओं ने भी ट्रम्प की सख्त आलोचना की। इससे आंदोलन की तीव्रता और फैलाव दोनों का अंदाजा लगाया जा सकता है।

इसी बीच यह खबर आई कि अमेरिकी सेना के कई वरिष्‍ठ जनरलों ने आक्रोशित आंदोलनकारियों के क्रोध से ट्रम्‍प को बचाने और सड़कों व रिहायशी इलाकों को उनसे मुक्‍त कराने के लिए सैन्‍य कार्रवाई करने के ट्रम्‍प के आदेश को मानने से साफ इनकार कर दिया है। प्रदर्शनकारियों को धमकाने वाले डोनाल्ड ट्रंप को ना तो पूरी तरह पुलिस का साथ मिल रहा है और ना ही सेना का। तीन दिन पहले एक प्रांतीय चीफ पुलिस अधिकारी ने डोनाल्ड ट्रंप को नसीहत देते हुए कहा था कि ‘अगर कुछ ढंग का नहीं बोल नहीं सकते, तो अपना मुंह बंद रखें।’ कल वरिष्‍ठ अमेरिकी जनरलों ने भी ट्रंप से विद्रोह करते हुए यह कह दिया कि वे अमेरिकी संविधान तथा लोगों के बोलने की आजादी तथा शांतिपूर्ण तरीके से जमा होने के अधिकार की रक्षा करने के लिए बने हैं, न कि किसी व्‍यक्ति डोनाल्ड ट्रंप के लिए। सच में यह आश्‍चर्यजनक है जिसकी भारत जैसे देश में कोई उम्‍मीद भी नहीं कर सकता! ट्रम्प, पुलिस प्रशासन और वरिष्ठ सैन्य अधिकारियों के बीच आंदोलनकारियों को सबक सिखाने के सवाल पर एक खुली तकरार पूरी दुनिया के सामने प्रकट हो चुकी है, जबकि प्रदर्शन और आंदोलन रूकने का नाम नहीं ले रहे हैं।

रक्षा मंत्री मार्क एस्पेर ने ट्रम्‍प के खिलाफ खुलेआम विरोध जताते हुए पेंटागन की मीटिंग में बुधवार को कहा कि सेना की कार्यरत मिलिट्री टुकड़ि‍यों का इस्तेमाल नागरिक विरोध को दबाने के लिए करना सही नहीं है। एस्पेर ने साफ कहा– “कार्यरत सेना को कानून लागू करवाने वाली भूमिका में लाने का विकल्प अंतिम शस्त्र के रूप में और अत्यंत जरूरी हालातों में इस्तेमाल किया जाना चाहिए।” जल्द ही कई दूसरे मिलिट्री अधिकारियों ने भी इनका समर्थन करते हुए वही बात दुहराई। जनरल मार्क मिल्‍ले, जो एक उच्च अमेरिकी कमांडर हैं, ने बाद में उसी दिन अन्‍य मिलिट्री लीडरों को उनके द्वारा “संविधान तथा अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता और शांतिपूर्ण तरीके से जमा होने की आजादी के अधिकार” की रक्षा हेतु ली गई शपथ की याद दिलाते हुए एक ज्ञापन जारी किया। एक अवकाशप्राप्‍त उच्‍च स्‍तरीय मिलिट्री लीडर जनरल मार्टिन डिम्पसे ने भी एक रेडियो इंटरव्यू में कहा कि “यह विचार कि मिलिट्री को शांतिपूर्ण विरोध को कुचलने के लिए बुलाया जाए बहुत खतरनाक है।” कुछ ट्रम्‍प समर्थक रिपब्लिकन नेता व सिनेटर भी ट्रम्प की ऐसी धृष्टता से परेशान हैं। ट्रम्प के पूर्व रक्षा मंत्री जनरल जेम्स मैटिस ने कठोर शब्दों में विरोध प्रदर्शनों के दौरान ट्रम्प के विभाजनकारी तथा भड़काऊ बयानों की निंदा की और कहा कि इससे नागरिक और सेना के बीच एक युद्ध की स्थिति बनेगी। एक और रिपब्लिकन सीनेटर लीजा मुरकोव्स्की ने पत्रकारों से वार्ता करते हुए रक्षा मंत्री का समर्थन किया तथा ट्रम्प को आगामी चुनाव में समर्थन देने के सवाल पर पूर्ण सहमति नहीं होने की बात स्‍वीकार की। सीनेटर लिंडसे ग्राहम ने भी रक्षामंत्री एस्‍पेर का खुले तौर पर बचाव करते हुए कहा कि वे अच्छा काम कर रहे हैं और उन्हें निकालना गलत होगा।

सेना, पुलिस प्रशासन तथा अमेरिकी सिनेटरों के ऐसे रूख का आखिर क्‍या अर्थ लगाया जा सकता है? और कुछ नहीं तो इससे इतना जरूर ही स्‍पष्‍ट हो जाता है इस आंदोलन में अकेले अश्‍वेत या काले लोगों की नहीं, श्‍वेत आबादी की भी भारी भागीदारी है। एक अश्‍वेत की गर्दन दबाकर की गई हत्‍या से ‘अचानक’ फूट पड़े आंदोलन में मुख्‍य मुद्दा सिर्फ श्‍वेत-अश्‍वेत का नहीं रह गया है। सेना द्वारा इस तरह से आंदोलनकारियों पर कार्रवाई करने का विरोध करने के पीछे का सबसे बड़ा कारण यही है कि उपरोक्‍त बातों का डर, यानी, श्‍वेत आबादी के आंदोलन में भारी संख्‍या में शामिल होने की बात का डर, अमेरिकी प्रशासन व सेना को स्‍पष्‍टत: सता रहा है। इस कारण भी उनके हाथ-पैर फुले हुए हैं कि आर्थिक रूप से अत्‍यधिक लाचारी झेलने को विवश आम अमेरि‍कि‍यों के जीवन के बुनियादी मुद्दे व प्रश्‍न भी इस आंदोलन में आ जुड़े हैं और शुरू से ही इसमें शामिल रहे हैं। वे जानते हैं कि जिस तरह से काले फ्लॉयड के गर्दन पर घुटनों के बल बैठ जाना और उनका गला घोंट देना मुनासिब और आसान है, आंदोलनरत गोरों की गर्दन पर चढ़ बैठना उतना ही कठिन और खतरों से भरा है। गोरों पर गोरे पुलिस तथा सेना के जवानों द्वारा दमन करना अमेरिका में आसान नहीं है, भले ही सनकी ट्रम्‍प ऐसा करने को सोच रहा हो। इसलिए ऐसे किसी हालत को टालने की कोशिश ट्रम्‍प विरोधियों से लेकर ट्रम्‍प समर्थकों की ओर से हो रही है। हम यह भी जानते हैं कि जब गोरे मजदूर व आम अमेरिकी काले व अश्‍वेत लोगों के साथ मिलकर अपने बेहतर जीवन के लिए लड़ाई लड़ेंगे, तो अंतत: गोरों द्वारा गोरों पर दमन का इतिहास भी लिखा जाएगा और इसकी कुछ बानगी दिखने भी लगी है जो साबित करता है कि गोरे अमेरिकी मजदूरों का साम्राज्‍यवादी दर्प पूरी तरह टूट कर बिखरने वाला है या बिखर चुका है और वे भी काले लोगों की तरह गरीब व बेरोजगार होने का दंश झेलते हुए उनके साथ मिलकर आर-पार के संघर्ष के लिए बाध्‍य हैं या बाध्‍य होंगे। गोरे-काले-भूरे की एकता अमेरिका में गृहयुद्ध का सीधा खतरा पैदा करती है, यह बात समझने में अमेरिका के शासक वर्ग का एक हिस्‍सा कोई गलती नहीं कर रहा है।

मुख्‍य बात यही है कि गरीबों की बेबसी को जुर्म समझने वाली मानसिकता किसी भी पूंजीवादी-साम्राज्‍यवादी समाज की जीवन-पद्धति का हिस्‍सा रही है। अमेरिका में अगर इसी के साथ वह गरीब अश्‍वेत या काले रंग का भी है, तो यह मानसिकता घृणा के उच्‍चतम स्‍तर पर पहुंच जाती है। पुलिस की बात भी मान लें, तो जॉर्ज फ्लॉयड ने महज 20 डॉलर के फर्जी नोटों से कुछ खाने की चीजों की खरीददारी ही तो की थी! सवाल हत्या का तो है ही, लेकिन उससे भी ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण और जरूरी यह पूछा जाना है कि आखिर कोविड-19 की वैश्विक महामारी से जनित बेरोजगारी और गरीबी के भयानक दौर में भूख मिटाने हेतु की गई महज बीस डॉलर की ‘धोखाधड़ी’ के लिए किसी को गिरफ्तार करना पुलिस के लिए क्यों जरूरी हो जाता है, जबकि सभी को मालूम है कि यह जुर्म से अधिक गरीबी की बेबसी है? इसीलिए यह कोई आश्‍चर्य की बात नहीं है कि समान तरह की गरीबी और बेबसी झेल रहे आम गोरे अमेरिकियों को भी लगा कि जॉर्ज फ्लॉयड की नियति ही अंतत: इन सबकी नियति है। और इस तरह वर्षों से उनके भीतर जमा गुस्‍सा फूट पड़ा, जैसे धरती के अंदर से उबलता लावा एकाएक बाहर निकलने लगता है। बुर्जुआ अखबारों तक को लिखना पड़ रहा है, – “जिस भयानक तरीके से फ्लॉयड सांस लेने के लिए गिड़गिड़ाते हुए मरा उससे फूटा गुस्सा काले लोगों तक सीमित नहीं है। विरोध में हो रही भागीदारी दिखाती है कि घाव के जख् रंगभेद से परे काफी गहरे हैं।

प्रदर्शनकारी गोरे अमेरिकी जॉर्ज फ्लॉयड की मौत को मौत नहीं, बल्कि हत्या कह रहे हैं। वे यह समझने में आज सक्षम हैं कि यह पुलिस अधिकारी की निजी क्रूरता नहीं, अमेरिकी पूंजीवादी राज्‍यसत्‍ता में गहरे जड़ जमाए बैठी नस्लवादी क्रूरता है। इस अर्थ में यह घृणा और हिंसा सदियों से चली आ रही और संरचनात्मक है जो शुरू से ही पूंजीवादी-साम्राज्‍यवादी लूट का नतीजा है। यह सर्वविदित है कि अमेरिकी इतिहास में दासता के उदय का संबंध वहां पूंजीवाद तथा पूंजीवादी व्‍यापार के उदय और विकास से सीधे तौर पर जुड़ा रहा है और इसीलिए यह एक ‘बुरे’ पुलिस अधिकारी तक सीमित नहीं है और न ही यह सिर्फ पुलिस तंत्र या संविधान में सुधार का मामला भर है। सबसे बड़ी बात यह है कि आज अमेरिकी अवाम, जिसमें भारी संख्‍या में गोरी आबादी के लोग भी शामिल हैं, पूंजीवादी सत्‍ता की क्रूरता की जद में आ चुकी है और ठीक इसी कारण वे यह समझने में सक्षम हैं कि श्‍वेत गरीबों और अश्‍वेत गरीबों दोनों के हित एक समान हैं और साथ मिलकर लड़ने में ही भलाई है। यह समझने तथा गौर करने वाली बात है कि प्रदर्शनों में जारी उग्रता व तथाकथित हिंसा के पीछे गोरे लोगों की पहलकदमी अधिक पाई जा रही है। गोरे व काले प्रदर्शनकारियों ने एक साथ मिलकर तमाम महत्वपूर्ण जगहों के साथ-साथ व्हाइट हाउस पर भी धावा बोला और उसको शुरू से ही निशाने पर ले लिया। यह एक अभूतपूर्व स्थिति है कि आंदोलनकारियों ने लगातार व्‍हाइट हाउस को घेरने की रणनीति पर चलने की कोशिश की है। चंद दिनों पहले, हालात इस कदर बेकाबू थे कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को अपनी पत्नी और एक बेटे के साथ कुछ घंटों के लिए नेशनल गार्ड के सख्‍त पहरे में व्‍हाइट हाउस के परिसर में बने भूमिगत बंकर में छिपना पड़ा।

यह भी देखा जा रहा है कि प्रदर्शनों में काले अमेरिकियों की तुलना में अब गोरे अमेरिकियों की भागीदारी लगातार बढ़ती जा रही है। तोड़फोड़ व आगजनी की ‘हिंसक’ कार्रवाईयों के पीछे काले व अश्‍वेतों से ज्‍यादा गोरे लोगों की हताशा काम कर रही है। ट्रम्‍प स्‍वयं कह चुके हैं कि आंदोलन को वामपंथियों व कम्‍युनिस्‍टों ने ‘हड़प’ लिया है। इशारा यही है कि अब यह अश्‍वेतों व काले लोगों का आंदोलन नहीं रह गया है। इस आंदोलन में हालांकि अश्‍वेतों के दमन पर पूरी तरह रोक लगाने की मांग सबसे सशक्‍त है और केंद्र में है, लेकिन आंदोलन एकमात्र इसी मुद्दे तक सीमित नहीं है। यह दिखाता है कि लाख कोशिशों के बावजूद आंदोलन अश्‍वेतों के दमन व उत्‍पीड़न के प्रश्‍न से कहीं आगे निकल चुका है जिसमें अश्‍वेतों के हितों की लड़ाई के साथ-साथ आम गरीब गोरी अमेरिकी आबादी की बेहतर जिंदगी की लड़ाई शामिल हो चुकी है। गरीबी-अमीरी के बीच भयंकर रूप से बढ़ती खाई, बेरोजगारी, भुखमरी, इलाज व शिक्षा का भयंकर कॉरपो‍रेटीकरण, जीवन-जीविका के साधनों व अवसरों का घोर अभाव … जैसे मुद्दे अश्‍वेतों के सदि‍यों से जारी दमन व अत्‍याचार के मुद्दों से पूरी तरह घुलमिल गये हैं। “ब्‍लैक लाइव्‍स मैटर” के मुख्‍य केंद्रीय नारे के पीछे आम अमेरिकियों की बदहाली की कहानी भी कही जा रही है जिसकी पर्याप्त रिपोर्टिंग नहीं हो पा रही है। फिर भी कभी-कभार सुनाई देने वाले “’र्इट द रिच” (‘Eat The Rich’) के नारों में इसकी एक झलक दिखाई देती है।      

इस आंदोलन ने निस्‍संदेह पूंजीवादी-साम्राज्‍यवादी विश्‍व में एक खलबली मचा दी है। पूर्व अमेरिकी राष्‍ट्रपति ओबामा सहित पूरी दुनिया के बुर्जुआ उदारवादी खुले में आकर इस भड़की आग को शांत करने के लिए ट्रंप की आलोचना से लेकर आंदोलन का समर्थन कर रहे हैं और चुपके से ‘हिंसा’ से बचने के नाम पर इस आंदोलन को क्रांतिकारी रास्‍ते पर नहीं जाने देने की कोशिश कर रहे हैं। बुर्जुआ-साम्राज्‍यवादी अखबार भी जी-जान से लगे हैं कि यह आंदोलन पूंजी के विरूद्ध क्रांतिकारी मार्ग पर नहीं चल पड़े। उनकी मुख्‍य कोशिश है कि आंदोलन को श्‍वेत-अश्‍वेत अथवा काले व गोरे के प्रश्‍न तक और उसके समाधान हेतु कुछ संवैधानिक व प्रशासनिक सुधारों तक सीमित रखा जा सके। बुर्जुआ उदारवादी से लेकर मानवतावादी तक सभी यह मांग कर रहे हैं कि तर्क तथा ‘बुद्धिमतापूर्ण’ संवाद की स्थिति बहाल की जानी चाहिए। वे भूल जाते हैं कि स्‍वयं अमेरिकी साम्राज्‍यवादियों या पूरी दुनिया में घोर रूप से मानवद्रोही बन चुकी पूंजीवादी सत्‍ता तर्क व बुद्धिमतापूर्ण संवाद की कसौटी पर एक मिनट के लिए भी नहीं टिक सकती है। दरअसल वे इस बात से घबरा उठे हैं कि इस आंदोलन से पूरा पूंजीवादी विश्‍व क्रांतिकारी आंदोलन की चपेट, जिसे वे अराजकता कहते हैं, में आ जाने का खतरा पैदा हो चुका है। लेकिन तब भी वे उन कारणों के बारे में कुछ नहीं बोलते हैं जिनकी वजह से आज अमेरिका सहित पूरी दुनिया की आबादी की भारी बहुसंख्‍या के जीवन में गरीबी और बेरोजगारी के कारण अराजकता ही अराजकता फैली हुई है।

25 मई की जॉर्ज फ्लॉयड की हत्‍या की घटना से जिस असंतोष का अंतर-महादेशीय विस्‍फोट हुआ है वह दरअसल एक ऐसे शिखर बिंदु (टिपिंग प्‍वाइंट) की तरह है जिसकी जड़ें बुरी तरह संकटग्रस्‍त विश्‍वपूंजीवाद से नाभिनालबद्ध हैं और इस कारण पूरी दुनिया में फैली हैं। अमेरिका, जहां सेना के वरिष्‍ठ लीडरों ने ट्रंप के आदेशों को मानने से इनकार कर दिया है, जरूर इसका गुरूत्‍व केंद्र है, लेकिन पूरा विश्‍व ही इसके प्रभाव में आ चुका है। लगभग पूरे यूरोप में इसकी लपटें फैल चुकी हैं। पेरिस, बर्लिन, लंदन सहित यूरोप के सभी बड़े देशों के मुख्‍य शहरों में लाखों लोगों ने बिना कोई देरी किये समर्थन में प्रदर्श‍न किये हैं। मानो, वहां की जनता इस आंदोलन के फूट पड़ने के इंतजार में थीं। यूरोप यूं भी वैश्विक आर्थिक संकट के केंद्र में स्थित है। हालां‍कि ऐशिया व अफ्रीका में अभी तक इसके झटके नहीं लगे हैं, लेकिन इसके कंपन स्‍पष्‍ट रूप से महसूस किये जा सकते हैं। भारत में इसका प्रभाव फिलहाल क्रांतिकारी जनांदोलन करने वालों का मनोबल बढ़ाने तक सीमित है। अगर इस आंदोलन के विस्‍तार और गहराई को देखते हुए विचारों का कोई प्रस्‍थान बिंदु बनाया जाए तो यह निस्‍संदेह कहा जा सकता है कि अमेरिका वस्‍तुगत रूप से अवश्‍य ही क्रांति के मुहाने पर आ खड़ा हुआ है। परंतु वास्‍तव में क्रांति होगी या नहीं इसका जवाब आज नहीं दिया जा सकता है। यह आज का विचाराधीन प्रश्‍न ही नहीं है। आज का प्रश्‍न मात्र यही है कि जो आंदोलन फूट पड़ा है उसकी जड़ें कहां हैं और उस नाते उसके अवश्‍यंभावी परिणामों पर कैसे विचार किया जाए। इसी के साथ एक दूसरा सवाल भी ठीक बगल में आ खड़ा होता है। वह यह कि, अगर अमेरिका क्रांति का अग्रदूत बन रहा है, तो क्‍या यूरोप भला पीछे रह सकता है, जबकि वह वैश्विक संकटों का केंद्र बना हुआ है? अमेरिका में शुरू हुए आंदोलन के तुरंत बाद ही यूरोप के तमाम बड़े देशों में हुए इसके द्रुत प्रसार ने यह साबित भी कर दिया कि यूरोप पीछे नहीं रहने वाला है। अगर अमेरिका क्रांति के मुहाने पर खड़ा दिख रहा है, तो यूरोप में भी क्रांतिकारी उफान दस्‍तक देने को तैयार बैठा नजर आ रहा है। जाहिर है, तब यह सोचना कि भारत या बाकी विश्‍व इससे अछूता रहेगा, जैसा कि कुछ लोग कह रहे हैं, तर्कसंगत या लाजिमी नहीं है। आस्‍ट्रेलिया और न्‍यूजीलैंड पहले ही इसकी जद में आ चुके हैं।

वास्‍तविक रूप से क्रांति की संभावनाओं पर बात करने के साथ ही कुछ ठोस प्रश्‍नों को दिमाग में लाना जरूरी है, चाहे उनके सटीक उत्‍तर हमारे पास न भी हों। इस आंदोलन के थपेड़ों में पड़कर कौन देश सबसे कमजोर कड़ी साबित होगा, किस देश में क्रांतिकारी दरार वास्‍तव में कब और कैसे प्रकट होगा, विश्‍व का कौन सा हिस्‍सा या देश क्रांतिकारी लहरों से पट जाएगा और कहां क्रांति फूट पड़ने की संभावना सबसे ज्‍यादा मुखर रूप में प्रकट होगी तथा इन सबका क्रांति की आत्‍मगत (सब्‍जेक्टिव) ताकतों के पुनर्गठन, पुनर्एकत्रीकरण तथा सुदृढ़ीकरण पर कितना, कैसे और कितनी तेजी से प्रभाव पड़ेगा, ये और ऐसे तमाम ठोस प्रश्‍नों का जवाब न तो आज किसी के पास है, न हो सकता है। हां, इस आंदोलन ने इन ठोस प्रश्‍नों को विचाराधीन बनाने का काम अवश्‍य किया है, जिसके बारे में कल तक सोचना या कल्‍पना करना भी संभव नहीं था। इसका मतलब यह नहीं है कि पूंजीवादी विश्‍व की अधोगति से आज ही क्रांति के लिए निष्‍कर्ष निकाले जा सकते हैं, मानो क्रांति आजकल की बात हो। निस्‍संदेह, इस अर्थ में अमेरिका में चल रहे आंदोलन के परिणामों पर विचार करने की कोई वजह नहीं है। लेकिन जो ठोस निष्‍कर्ष निकाले जा सकते हैं वे जरूर निकाले जाने चाहिए। हां, यह बात जरूर है कि शायद हम सब का भारत में होने के नाते, जहां जा‍तीय, नस्‍लीय, सांप्रदायिक व वर्गीय हिंसा की बाढ़ के बावजूद छिटपुट विरोध के बीच हमारा सामना अभी तक आम लोगों की चुप्‍पी से होता रहा है, इतने विस्‍तारित व गहरे स्‍वयंस्‍फूर्त आंदोलन के बारे में यकीन करना मुश्किल हो रहा है। सब्‍जेक्टिव ताकतों की कमजोरियों की वजह से भी कई बार हम वस्‍तुगत हालात से वाकिफ होते हुए भी सही निष्‍कर्ष नहीं निकाल पाते हैं। कुल मिलाकर यह सच है कि आज पूरा विश्‍व ही क्रांति की तरफ बढ़ रहा है, भले ही सब्‍जेक्टिव (आत्‍मगत) ताकतों की तैयारी कतई इसके मेल में नहीं हों। शायद यह इस युग की विशेषता साबित होने वाली है कि सब्‍जेक्टिव ताकतों के अपेक्षाकृत काफी कमजोर होने के बावजूद पूरा विश्‍व वस्‍तुगत रूप से,यानी, ऐतिहासिक गति के अधीन, क्रांति की तरफ तेजी से मुड़ जाए और सब्‍जेक्टिव फोर्सेज को आदेश निर्गत करे कि वे जितनी जल्‍द हो तेजी से आगे बढ़ें और स्थितियों का संपूर्णता में सामना करें, चाहे जो भी परिणाम हों। विजय की कहानी नहीं, तो विजय प्राप्‍त करने की क्रांतिकारी चाहत व कोशिश की कहानी तो अवश्‍य लिखी जाएगी। इसकी मूल वजह और कुछ नहीं, विश्‍व पूंजीवादी संकट का तमाम विकसित व साम्राज्‍यवादी देशों में भी स्‍थायी व असमाधेय बन जाना है जिसके कारण आम लोगों का जीवन, चाहे वे जिस भी देश व रंग या नस्‍ल के हों, पूरी तरह संकट और दलदल में जा धंसा है।

अमेरिका तथा यूरोप की गोरी चमड़ी वाली आम जनता का यह पुराना झूठा गर्व पूरी तरह टूटकर बिखर चुका है या चकनाचूर हो गया है कि वे साम्राज्‍यवादी देश के नागरिक होने के नाते अश्‍वेत और बाकी दुनिया के गरीब-मेहनतकशों से अलग हैं। गोरी चमड़ी वाले यूरोपीय व अमेरिकी मजदूर यह समझते थे या उन्‍हें समझाया गया था कि साम्राज्‍यवादी लूट के एक छोटे हिस्‍से के रूप में प्राप्‍त उनकी सुविधायें हमेशा बनी रहेंगी और उन्‍हें न तो कम्‍युनिज्‍म की जरूरत है और न ही मजदूर वर्गीय भाइचारे और लड़ाई की। यह सब तब शुरू हुआ था जब सोवियत समाजवाद में मजदूरों के जीवने में आये आमूल परिवर्तन से तमाम साम्राज्‍यवादी देशों के मजदूरों-मेहनतकशों को क्रांति की प्रेरणा मिल रही थी और उन्‍हें क्रांति से विमुख करने के लिए साम्राज्‍यवादियों ने सोवियत मजदूरों से भी उन्‍नत जीवन प्रदान करने का वादा किया था। शर्त यह थी कि वे लाल झंडा छोड़ दें और क्रांति की बात करना बंद कर दें। और इसी भ्रम में पड़कर वो वर्षों तक बाकी दुनिया के और अपने ही देशों के अश्‍वेत व काले-भूरे मजदूर भाइयों से दूर खड़े रहे और यहां तक कि उनके निकृष्‍टतम शोषण, दमन व अत्‍याचार का चुप रहकर नैतिक समर्थन किया। सोवियत यूनियन के पतन के बाद यह बात साफ हो चुकी थी कि साम्राज्‍यवादियों के साथ यूरोप व अमेरिका के गोरे मजदूरों का साहचर्य व गठबंधन टूटने वाला है और लूट व शोषण के मामले में गोरे-काले व भूरे के बीच के सारे भेद मिटने वाले हैं। आज अमेरिका में अश्‍वेत, काले व गोरे मजदूरों व अवाम का संयुक्‍त रूप से आगे बढ़कर आंदोलन को चलाने का प्रयास उस पुराने पतित व अवसरवादी गठबंधन के अंतिम तौर पर टूटने का परिणाम भी है। वर्तमान आंदोलन में इस बात की भरपूर झलक मिलती है कि ट्रंप की सारी कोशिशों के बावजूद लगभग सारे भेद मिट चुके हैं। अमेरिका में श्‍वेत अमेरिकियों के इलाके उसी तरह आंदोलन में सक्रिय हैं, जैसे अश्‍वेत व काले लोगों के इलाके। प्रदर्शनों में भी इसकी झलक स्‍पष्‍ट देखी जा सकती है।

इसलिए, इस आंदोलन में 60 के दशक में शुरू हुए मार्टिन लुथर किंग की अगुवाई वाले आंदोलन की पुनरावृति देखने वाले बुद्धिजीवी काफी गलती कर रहे हैं। वह एक सीमित तथा बीच के ठौर व मंजिल वाली लड़ाई थी जो नागरिक अधिकारों और वोट देने के अधिकार प्राप्‍त करने तक सीमित थी। आज की लड़ाई मूल रूप से संकटग्रस्‍त तथा जर्जर विश्‍वपूंजीवाद के आंतरिक सड़न के द्वारा सं‍चालित हैं और मूल रूप से पूंजी के विरूद्ध केंद्रित है, चाहे उसका बाह्य रूप जो भी हो। स्‍वयं बुर्जुआ अखबार लिख रहे हैं कि ‘यह टर्निंग प्‍वाइंट साबित हो सकता है’, हालांकि, और यह स्‍वाभाविक है, वे ज्‍यादा से ज्‍यादा अमेरिकी जनतंत्र में मौजूद फॉल्‍ट लाइन्‍स को लेकर बात करते हैं और यह उजागर होने देना नहीं चाहते हैं कि आखिर इसकी मूल वजह क्‍या है जिससे एक काले फ्लॉयड की हत्‍या के बाद यह आंदोलन अमेरिकी श्‍वेतों सहित तमाम विकसित देशों के लोगों के मुक्ति आंदोलन की आवाज ग्रहण करता जा रहा है।

एक और गौर करने वाली बात यह भी है कि यह सब कुछ कोविड-19 की विश्‍वव्‍यापी महामारी के काल में हो रहा है, और यह कम महत्‍वपूर्ण बात नहीं है। इसका अर्थ यह है कि संकटग्रस्‍त यूरोपीय व अमेरिकी पूंजीवादी समाज में लोगों की आर्थिक समस्‍यायें और इससे उत्‍पन्‍न अत्‍यंत विषम हालात ने, जिसमें निस्‍संदेह बेरोजगारी, भुखमरी और सम्‍मान के प्रश्‍न प्रमुख हैं, कोरोना महामारी के डर को दूर कर दिया है, जबकि पूरे यूरोप-अमेरिका में लाखों लोगों की इससे मौत हो चुकी है। गैर-सरकारी स्रोतों की बात करें तो अकेले अमेरिका में डेढ़ लाख लोगों से भी अधिक की मौत हो चुकी है, जिसमें जरूर काले लोग ज्‍यादा मरे हैं, लेकिन गोरे भी काफी संख्‍या में मरे हैं। यह साबित करता है कि कोरोना के डर से आंदोलन न होने की बात मनगढ़त और गलत थी। हालात इतने खराब हो चले हैं कि कोरोना जैसी खतरनाक महामारी से भी लोगों ने डरना छोड़ दिया है। यह उन लोगों की बात का उत्‍तर है, जो यह मानते हैं कि कोरोना महामारी ने क्रांति के प्रश्‍न को पीछे छोड़ दिया है या यह उनलोगों के संशयों का प्रत्‍युत्‍तर है जो यह मानते हैं कि कोरोना से लड़ने में सक्षम होने के बाद ही क्रांति की बात की जा सकती है। अमेरिका में जारी और पूरे यूरोप में फैलते जा रहे आंदोलन ने यह दिखाया है कि कोरोना महामारी ही नहीं, भविष्‍य में आने वाली तमाम महामारियों से पूरी सक्षमता के साथ लड़ने और पूंजीवादी मुनाफे की हवस के कारण हमारी दुश्‍मन बन चुकी प्रकृति के कहर से बचने के लिए भी क्रांति जरूरी है। भूख और महामारी दोनों से लड़ने का रास्‍ता क्रांति के जरिए ही संभव है, इसमें आज कोई शक नहीं रह गया है।   

और अंत में, यह सच है कि लेख शुरू करने के पहले मन में यह प्रश्‍न बार-बार कौंध रहा था, क्‍या उपरोक्‍त शीर्षक (टाइटल) पूरी तरह सही होगा? लेकिन जल्द ही साफ हो गया कि न सिर्फ शीर्षक का कंटेंट सही है, अपितु इसकी भाषा भी सटीक है। जिस बड़े पैमाने पर यह आंदोलन फूट पड़ा है, वह अपने आप में बहुत बड़ी, और ट्रम्‍प तथा उसके समर्थकों के लिए एक बहुत भयानक बात है। वह भी तब जब कुछ ही महीनों में राष्‍ट्रपति का चुनाव होना है। लेकिन बात सिर्फ चुनाव तक कतई सीमित नहीं है। कोविड-19 महामारी की चपेट में आये पूर्व से ही संकटग्रस्‍त विश्‍वपूंजीवाद के लिए, और खासकर आर्थिक रूप से कमजोर अमेरिकी अर्थव्‍यवस्‍था के लिए यह निस्‍संदेह एक बेहद नाजुक दौर का परिचायक है। यह किसी भी तरफ जा सकता है और किसी भी दिशा में मुड़ सकता है। यहां तक कि इसकी परिणति एक क्रांतिकारी विस्‍फोट में भी हो सकती है, भले ही आत्‍मगत शक्तियों की तैयारी के अभाव में वह निष्‍फल और भयंकर रूप से असफल हो जाए। लेकिन इससे पूरी तरह इनकार करना मुश्किल है। विश्‍वपूंजीवाद के गहराते संकट से उत्‍पन्‍न अत्‍यंत विषम सामाजिक-राजनीतिक हालात के परिप्रेक्ष्‍य में और इसके मद्देनजर साम्राज्‍यवादि‍यों के सरगना अमेरिकी साम्राज्‍यवाद की भूमि पर ‘अचानक से’ फूट पड़े ऐसे तीव्र, ऊर्जावान तथा प्रवाहमान आंदोलन, जो बिना देरी किये अमेरिकी सीमा को लांघ कर पूरे यूरोप तथा आस्‍ट्रेलिया तथा न्‍यूजीलैंड तक जा फैला है और जिसके कंपन को सुदूर ऐशिया और अफ्रीका में भी महसूस किया जा रहा है, के दूरगामी प्रभाव व असर से आज शायद ही कोई इनकार कर पायेगा, भले ही इससे ठोस तथा जरूरी व संतुलित क्रांतिकारी सबक निकालना आसान न हो। आत्‍मगत (सब्‍जेक्टिव) शक्तियों के विकास के संकुचि‍त व कुंठित बने रहने के कारण अमूमन चारो तरफ फैली निराशा में अगर हम निमग्‍न हों और उससे उत्‍पन्‍न हताशा भरे माहौल से घिरे हों, तो अक्‍सर यह संभव है कि हम अपनी आंखों के सामने घटित होती किसी बहुत बड़ी घटना को भी सामान्‍य मानकर चुपचाप बैठे रह सकते हैं। लेकिन, इससे स्‍वयं उस आंदोलन का महत्‍व किसी भी तरह से कम नहीं होता है।

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 2/ जून 2020) के संपादकीय में छपा था

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