प्रवासी मजदूरों की असंगठित सेना

एस. वी. सिंह //

बुर्जुआजी ने देश में शहरों का शासन स्थापित कर डाला है। इसने शहरी आबादी को ग्रामीण आबादी की तुलना में बहुत अधिक बढ़ा दिया और ऐसा करके उसने ग्रामीण आबादी के काफी बड़े भाग को देहाती जीवन की मूर्खता से बचा लिया।
– मार्क्स एंगेल्स, कम्युनिस्ट घोषणा पत्र

24 मार्च का दिन था, 8 बजे थे. “वे” टी वी पर नजरें गड़ाए थे. “अपने घर के दरवाज़े पर एक लक्ष्मण रेखा खींच लीजिए और अगले 21 दिन तक उसे किसी भी हालत में नहीं लांघना है..” प्रधानमंत्री अपने चिर परिचित अंदाज में उपदेश दे रहे थे लेकिन सिहरन उन्हें अपनी रीढ़ में नीचे तक महसूस हुई क्योंकि इस भयावह आह्वान का क्या नतीजा होगा उन्हें अंदाज था तुरंत उनके जेहन में देश के संविधान का नहीं बल्कि रोटी का चित्र चमक उठा। तुरंत उनके पांव कोने में रखे एलुमिनियम के आटे के डिब्बे की तरफ चल पड़े। हाथ से उठाया तो ये बहुत हल्का लगा। सुन्नपन गहरा हो गया और आंखें फ़ैल गईं। झोंपड़ी से बाहर आए तो देखा लोग राशन पानी खरीदने के लिए दौड़े जा रहे हैं लेकिन लाला तो ये सब मुफ़्त में नहीं देगा। हाथ स्वत: जेब तक पहुंच गया, उसकी रिक्तता उंगलियों ने बता दी। उफ्फ, अब क्या करें? सिर दोनों हाथों में रखकर जमीन पर बैठ गए। धरती वाकई घूमती है, उन्हें महसूस हुआ। “सब स्कूल – कॉलेज, दफ्तर, रेल, बस, मैट्रो, ऑटो सब रात 12 बजे से पूरे  21 दिन बंद रहेंगे और इस लॉक डाउन का उल्लंघन सख्ती से निबटा जाएगा, कोई उल्लंघन बरदाश्त नहीं किया जाएगा।” टी वी के चीखते एंकरों का तो जैसे गले का पट्टा ही खोल दिया गया था। उनकी तीखी कर्कश आवाजें उनके सिर पर हथौड़े जैसी लग रही थी। सामने जैसे उनकी मौत ही नाच रही थी। रात भर नींद नहीं आई। तब ही अचानक दिमाग में चिंगारी की तरह एक विचार कौंधा। “ जब मरना ही है तो यहां परदेश में क्यों मरें, क्यों ना अपने मुल्‍क में अपनों के बीच ही जाकर मरे। उन्हें यहां से निकलना होगा.”

ये जानलेवा यात्रा भोर में ही शुरू हो गई। ऐसा सामान ही कहां था घर में जिसे समेटने में देर लगती। सारा सामान एक चद्दर की गठरी में सिमट गया। सिर पर गठरी और हाथ में अपने बच्चों का हाथ पकड़े सुबह 5  बजे वे हाई वे पर थे। मुसीबतें और जिन्दगी मौत की महीन किनार पर रहना ही तो उनकी जिन्दगी है। वे अच्छी तरह जानते थे कि मौत को ललकारने वाली उनकी इस महा यात्रा में मुसीबतों, अपमान, जिल्लत, पुलिस की मार, भूख, प्यास सब का मुकाबला करना होगा लेकिन दूसरा कोई रास्ता बचा ही नहीं था। जो होगा देखा जाएगा और ये महायात्रा चलती गई, चलती गई। ये एक किस्म की जंग के ऐलान जैसा ही था। क्या क्या नहीं झेला। वे भूखे पेट थे, लॉक डाउन तोड़ने के लिए उन्‍हें बार बार पुलिस ने बेरहमी से पीटा, उन्हें जानवर की तरह दौड़ाया, सताया। सब कुछ हुआ लेकिन महायात्रा रुकने वाली नहीं थी। शासन की बेरहमी और अत्याचार अभूतपूर्व थे। बिलकुल ऐसा ही नजारा था जैसा देश के विभाजन के वक्‍त 1947  में हुआ था। दांव पर लेकिन जिन्दगी लगी थी इसलिए बढ़ते जाने की उनकी जिद कमजोर पड़ने का सवाल ही नहीं था। डर भी एक सीमा के बाद डराना बन्द कर देता है।

कौन हैं “वे”? वे हैं इस जालिम व्यवस्था के सबसे भयानक रूप से बे-इन्तेहा शोषित, पीड़ित, कंगाली में पिसते, सताए गए, साधन विहीन, समाज में सबसे नीचे कुचले गए मजदूर जिन्हें विस्थापित मजदूर बोला जाता है। इस भूखी बिलखती सेना की तादाद लगभग 21 करोड़ है। एक जमाने में इनके पास भी इनकी अपनी जमीन हुआ करती थी, कभी वे कारीगर थे, हाथों में जाने क्या क्या बनाने के हुनर थे लेकिन वो वक्‍त तो जाने कब का गुजर गया। उनके शरीर को उनकी हड्डियों तक निचोड़ा जा चुका है। उनके पास जो कुछ भी था सब इस जालिम व्यवस्था ने छीन लिया जिसे पूंजीवाद कहते हैं। गांव में उनकी खेती की जमीन ठीक वहीं है जहां वो हुआ करती थी क्योंकि जमीन चल फिर नहीं सकती बस उसका मालिकाना बदल गया है। रोजमर्रा की कोई जरूरत आई और उनकी जमीन अब उस किसान की हो गई जिसे फार्मर कहा जाता है, मतलब ग्रामीण बुर्जुआजी। दस्तकार के रूप में जो वस्‍तुएं वो बनाया करते थे उन्हें मशीनों से बने सस्ते माल ने गटक लिया। पेट की भूख ने उन्हें महानगर के इस भाग में ला पटका जिसे झुग्गी झोंपड़ी बस्ती कहा जाता है। उनकी श्रम शक्ति के अलावा आज उनका सबकुछ छीना जा चुका है। उन्हें हमेशा  ब्लेड की सी महीन धार पर चलना होता है। उनकी जिन्दगी और मौत के बीच हमेशा ही बहुत कम फासला होता है। उनके लिए कोई सामाजिक सुरक्षा नाम की चीज नहीं होती, उनके काम के घंटे तय नहीं होते, काम की कभी कोई गारंटी भी नहीं होती। उन्हें हमेशा ही गंदे नाले या गटर के साथ मच्‍छरों के विशाल झुंडों के साथ ही रहना होता है। दरअसल इस समाज के सबसे अधिक योग्य सर्वहारा वे ही हैं। उनके पास अक्षरस: कुछ नहीं बचा है सिवाय उनकी बेड़ियों के।

आईआईपीएस मुम्बई एवं 2011 की जनगणना के अनुसार देश में कुल जनसंख्या के मुकाबले शहरीकरण का हिस्सा 2001 के 27.81 % से बढ़कर 2011 में 31.16% हो गया है और हमारे देश में विस्थापित मजदूरों की कुल तादाद 139 मिलियन मतलब 13.9 करोड़ थी। विस्थापित मजदूर विभिन्न व्यवसायों में इस तरह उत्पादन प्रक्रिया में लगे हुए थे: भवन निर्माण 5 करोड़, घरेलु काम 2.5 करोड़, टेक्सटाइल 1.2 करोड़, ईंट भट्टा 1.1करोड़ आदि। 2011 की जनगणना के 9 साल बाद आज की तारीख में विस्थापित मजदूरों की कुल तादाद लगभग 21 करोड़ जरूर है। ये सब पूरी तरह असंगठित हैं, मालिकों के साथ सेवा शर्तों के बारे में नाम लेने को भी कोई सौदेबाजी की इनकी कोई क्षमता नहीं है, हमेशा उन्हें समाज के सबसे छोटे, खतरों से भरे काम करने होते हैं, उनके काम के कोई भी घंटे तय नहीं होते, कई बार तो उन्हें सोने तक काम करना होता है, उसके बाद वहीं सो जाना होता है जिससे सुबह जल्दी उठकर फिर काम में लग सकें। इसीलिए रात में आग लगने से वे वहीं भस्म हो गए ऐसी घटनाएं भी आम बात है। उनकी मौत भी कोई खबर नहीं बनती। उनके मूल घर और काम करने के स्थान इतनी दूर होते हैं कि‍ उन्हें वहां जाने के किए कई महीने पहले तैयारियां शुरू करनी होती हैं। हमेशा ही उनकी जान उनके खून के प्यासे लेबर ठेकेदार के हाथ में होती है जो उन्हें लगातार याद दिलाता रहता है कि आज वे उसकी बदौलत ही रोटी खा पा रहे हैं, क्योंकि उसने ही उन्हें काम ढूंढ़ कर दिया था।

सरकार का गुनाह 

हमारे देश में कोरोना का पहला मरीज 30 जनवरी 2020 को मालूम पड़ गया था, हालांकि यह महामारी दिसम्बर और जनवरी महीनों में ही सुर्खियों में आ चुकी थी और तब तक चीन के वुहान शहर में जहां से यह वायरस संक्रमण शुरू हुआ था, सैकड़ों लोगों की जान ले चुका था। सरकार ने लेकिन विश्व स्वास्थ संगठन की चेतावनियों के बावजूद इस गंभीर मामले की कोई दखल नहीं ली। सरकार ने विदेशों से आने वाले यात्रियों की हवाई अड्डों पर ना सिर्फ टेस्ट, क्वारंटाइन की कोई व्यवस्था सख्ती से लागू करने की परवाह नहीं की, बल्कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के स्वागत तमाशे को अहमदाबाद में बड़े ढोल धमाकों से आयोजित करने में जुट गई और उसमें गुजरात भर से लाखों लोगों को इकठ्ठा कर पाखण्ड रचा। मध्य प्रदेश में चुनी हुई सरकार गिराने के लिए विधायकों की मंडी बदस्तूर लगती रही, उन्हें गुडगांव और बंगलोर ले जाया जाता रहा और ये खेल २३ मार्च तक जारी रहा जब तक भाजपा की शिवराज सिंह की सरकार नहीं बन गई। कोरोना वायरस महामारी तब तक विकराल रूप ले चुकी थी और उसे काबू से बाहर जाते देखकर सरकारी तंत्र के हाथ पांव फूलने लगे थे। परिस्थिति हाथ से निकलती देख एकदम हड़बड़ी में बगैर सोचे समझे, बगैर कोई योजना और तैयारी के, परिणामों से बिल्‍कुल बेख़बर 24 मार्च को रात 8 बजे देश भर में पहले 21 दिन और फिर 18 दिन यानी कुल 39 दिन सम्पूर्ण लॉक डाउन की घोषणा कर दी गई जो उसी रात 12 बजे से सख्ती से लागू  होनी थी। इसका विस्थापित मजदूरों की 21 करोड़ की इस विशाल सेना पर क्या परिणाम होगा, इनकी जिन्दगी का क्या हस्र होगा, इस ओर जरा सा भी ध्यान नहीं दिया गया। ये भूखे, एकदम कंगाल मजदूर जो हमेशा ही बिलकुल ब्लेड की धार पर जिन्दगी जीते हैं, अपने हाल पर छोड़ दिए गए। सरकार के इस क्रूर कदम ने इन मजदूरों की जिन्दगी में जो कुछ भी बचा था सब उलट पलट कर डाला। विस्थापित मजदूरों की हालत कभी भी ऐसी नहीं होती कि‍ उनकी झोंपड़ी में दो चार दिन से ज्यादा का राशन रहे। कैसे रह सकता है? काम के बगैर वे अपनी जिन्‍दगी सोच भी नहीं सकते। काम करे बगैर उन्हें खाने को नहीं मिलता। काम नहीं मतलब खाना नहीं। उन्हें लगातार पूरे 39 दिन “घर की लक्ष्मण रेखा” में कैद कैसे रखा जाना संभव है? थाली बजाना, ताली बजाना, दिए जलाना, ये सब चोचले पेट भरे मध्यम वर्ग के हैं जो ये वीभत्स ड्रामा करते रह सकते हैं और जो ऐसे आडम्बरों से देशभक्ति के झंडे गाड़ते रह सकते हैं। भूखे पेट के लिए इससे क्रूर और तकलीफ़देह मजाक दूसरा नहीं हो सकता। इन 21 करोड़ लोगों को सतत राशन मुहैया कराने का कोई भी बंदोबस्त नहीं किया गया जबकि उन्हें जबरदस्ती, लाठी गोली के बल पर अपनी झुग्गियों में रहने को मजबूर करने और उन्हें भूखों मर जाने का पूरा बंदोबस्त था। तब से आज तक विस्थापित मजदूरों ने सरकारी तंत्र का खूनी, आततायी और बर्बर चेहरा देखा और झेला है, झेलते जा रहे हैं। उनकी रोजी रोटी और जिन्दगी पर 2016 की नोटबंदी के रूप में बहुत ही प्राणघातक हमला  किया गया था जिसने इस मंदी के दौर में उनमें से आधों के रोजगार छीन लिए थे और उन्हें अधमरा कर दिया था, 39 दिन की इस लॉक डाउन ने काम तमाम कर दिया। इन भूखे बेहाल विस्थापित मजदूरों ने पिछले एक महीने में जो जुल्म झेले हैं उनके दिल दहलाने वाले ‘दस्तावेज़’ इतिहास में दर्ज हो चुके हैं। मिडिया, सोशल मिडिया में हर तरफ बिखरे पड़े हैं जिन्हें पढने से दिमाग सुन्न हो जाता है। उनपर हुए बर्बर हमलों और इस बर्बर पूंजीवादी राज्य के काले कुरूप चहरे की दास्तां किसी भी संवदनशील इन्सान के लिए भूल पाना संभव नहीं। हम नीचे राज्य द्वारा ढाए गए जुल्म और हैवानियत के ऐसे कुछ ‘दस्तावेज़’ प्रस्तुत कर रहे हैं जो इस बुर्जुआ राज्य के असली चेहेरे को नंगा करने के लिए काफी हैं अगर आप इन्हें सुनने का सहस रखते हों तो।

  • सिर पर अपनी सारी ‘जायदाद’ लिए मानेसर से बरेली तक की 300 किमी की यात्रा पैदल पूरी कर जब ये बेहाल विस्थापित मजदूर गिरते-पड़ते बरेली पहुंचे तो वहां पुलिस ने उन्हें सड़क के किनारे बैठाकर ब्लीच (हाइड्रोक्लोराइड) का छिड़काव किया मानो वे इन्सान नहीं कीड़े मकौड़े हों।
  • प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस में जिसे क्योटो बनाने के दावे किए गए थे, बच्चे घास खाकर जी रहे थे।
  • आगरा में दूध के कंटेनर से दूध सड़क पर बिखर गया, तो उसे कुत्ते पी रहे थे उनके साथ ही एक असहाय भूखा मजदूर सड़क से उसी दूध को हाथों से समेट रहा था जिससे दम तोड़ते अपने बच्चे को बचा सके।
  • भूखे कंगाल इन विस्थापित मजदूरों के बच्चे दिल्ली के प्रमुख श्मशान स्थल निगम बोध घाट के कूड़े में से सड़े केले और केले के छिलके ढूंढ़कर खा रहे थे।
  • भूखे प्यासे बेहाल नंगे पांव घर जाते इन विस्थापित मजदूरों का एक वीडियो खूब वायरल हुआ जिसमें पुलिस वाले उन्हें डंडे मारकर सड़क के किनारे बिठाकर मेंढक की तरह चलने को मजबूर कर रहे थे। ऐसा इसलिए किया जा रहा था कि लॉक डाउन तोड़ने का अंजाम क्या होता है सब देख लें.
  • इसी तरह के दूसरे दृश्य में इन्हीं मजदूरों को लॉक डाउन तोड़ने की सजा के तौर पर सड़क के किनारे धूप में पुलिस ने मुर्गा बनाया हुआ था।

इसी सरकार ने विदेशों में फंसे तफरीह करने गए रईसजादों को देश लाने के लिए खर्च की कोई भी परवाह ना करते हुए सामान्य विमान सेवाओं के अतिरिक्त विशेष चार्टर्ड फ्लाइट्स का भी बंदोबस्त किया। दरअसल कोरोना वायरस इन्हीं लोगों के साथ विमान मार्ग से देश में आया था। बनारस एवं कई दूसरे धार्मिक स्थलों पर फंसे तीर्थ यात्रियों को उनके घर वापस सकुशल पहुंचाने के लिए भी विशेष लक्जरी बसों की व्यवस्था की गई, कोटा में फंसे छात्रों को वापस उनके घर लाने के लिए सैकड़ों बसों की व्यवस्था करने में भी किसी सरकार को कोई समस्या नहीं आई, तो फिर ऐसी कौन सी वजह है कि‍ इन बेसहारा, संसाधनविहिन, भूखे विस्थापित मजदूरों को उनके घर पहुंचाने के लिए कोई भी प्रयास किया ही नहीं गया? इन गरीब मजदूरों को इन्सान या इस देश का बराबरी का नागरिक समझा ही नहीं गया, इसकी क्या वजह है? देश में चारों ओर जो कुछ भी नजर आता है; ये चौड़े, दमकते  हाईवे, ये चमचमाते शौपिंग मॉल, ये विशाल टावर, ये सब वस्तुएं, ये सब खाने-पीने के पदार्थ कोई भी ऐसी वस्तु नहीं जिसके निर्माण में इन मज़दूरों के खून पसीने के हस्ताक्षर ना हों। ये ही हैं असली निर्माता, सब कुछ बनाने वाले। इन भूखे, बेरोजगार, कंगाल, बेहाल विस्थापित मजदूरों को महीनों तक ऐसी अमानवीय, बर्बर यातनाएं झेलने को मजबूर किया गया जिनसे जाने कितने रास्ते में भूख से थक कर दम तोड़ गए। देश में इस वक्‍त रिकॉर्ड 7.7 करोड़ टन खाद्यान्न मौजूद है। सारे सरकारी गोदाम, वेयरहाउस भरे पड़े हैं, रखने को जगह नहीं, दूसरी बम्पर फसल आने को तैयार खडी है। हर साल हम देखते ही हैं कि कैसे सरकारी गोदामों में बरसात में गेहूं सड़ता है, कैसे चूहों के परिवार वहां उछल कूद कर अपनी सेहत बनाते हैं। सरकार खुद कह चुकी है कि‍ उसके गोदामों में इतना अनाज जमा है कि‍ अगले साल मार्च तक के लिए सबके खाने के लिए पर्याप्त होगा। इस खाद्यान्न को इन भूखे गरीब जरुरतमंदों तक पहुंचाने के लिए संसाधन भी मौजूद हैं, आंगनवाडी, आशा वर्कर्स की एक बड़ी तादाद इस काम को अंजाम देने के लिए समर्थ है। फिर ऐसा कुछ करने का सोचा भी नहीं गया, आखिर क्यों? कुछ भी करने की जरूरत क्यों नहीं समझी गई? क्या इसे भूल कहा जा सकता है? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? ईमानदारी से विश्लेषण किया जाए तो सरकार के इस जघन्य कृत्य को भूल या लापरवाही नहीं बल्कि आपराधिक संलिप्तता ही कहा जाएगा। इसीलिए ये मुसीबतजदा विस्थापित मजदूर अपने रोजगार, वेतन, भत्ते, मुफ़्त मेडिकल सुविधाएं ही नहीं बल्कि उपयुक्त मुआवजे के भी हकदार हैं। एनडीटीवी पर आए पंजाब के मुख्य मंत्री के इंटरव्यू का जिक्र करना यहां बहुत प्रासंगिक होगा। उन्होंने बताया कि उन्होंने पंजाब के धनी किसानों और उद्योगपतियों से कहा कि लॉक डाउन के दरम्यान वे इन विस्थापित मजदूरों के रहने खाने की व्यवस्था करें, क्योंकि बाद में जब फसल कटाई होगी या उद्योग शुरू होंगे तब मज़दूर कहां से आएंगे। एक बार ये लोग अपने घर वापस चले गए तो वापस जल्दी नहीं आने वाले। उन्होंने ये भी कहा कि‍ ये सलाह उन्होंने केंद्र सरकार को भी दी थी। इसका मतलब है कि इन मजदूरों को उनकी झुग्गियों में ज़बरदस्ती इसीलिए रोका गया कि लॉक डाउन के बाद उद्योग शुरू होते वक्‍त मजदूर उपलब्ध रहें। इस बीच कुछ भूखे मर भी जाते हैं तो मरने दो उससे क्या फर्क पड़ता है, बेरोज़गारों की ये फौज किस दिन काम आएगी! वैसे भी भूखा इन्सान तो 100 रु रोज में भी काम को राजी हो जाएगा। काम नहीं करेगा तो खाएगा क्या? मरता क्या नहीं करता! ये कठोर तथ्य सरकार द्वारा अपने ही लोगों पर किए गए अपराध को बहुत गंभीर और घिनौना बना देते हैं। विस्थापित मजदूरों के साथ किया गया यह एक विश्वासघात है। इतिहास इसे याद रखेगा। केंद्र और राज्य सरकारें इस आपराधिक संलिप्तता के आरोप से बच नहीं सकतीं।

मजदूर आन्दोलन की घोर विफलता

मेहनतकश अवाम को संगठित करने, उन्हें जागरुक करने, उनके अधिकारों के लिए लड़ने और अंतत: उनके शोषण उत्पीड़न की इस पूंजीवादी व्यवस्था से मुक्ति के संघर्ष के लिए प्रेरित करने के काम से सम्बद्ध होने का दावा करने वाला हर इन्सान, प्रताड़ित और अपमानित, हमेशा अगली कतार में रहने वाले इन लड़ाकों, विस्थापित मजदूरों के साथ हुए इस जुल्म, बर्बर, अन्याय और विश्वासघात के आरोप से बच नहीं सकता। कोई भी इस जिम्मेदारी से नहीं भाग सकता। इन जांबाज लेकिन बुरी तरह सताए गए मजदूरों को हक है कि‍ वे सबसे जवाब तलब करें; उनसे भी जिन्होंने उनकी जिन्दगी में ये तबाही लाई है, उनके जीवन को उजाड़ा है, उनसे भी जो उनके हमदर्द होने उनके कॉमरेड होने की डींगें मारते हैं और उनसे भी जो पेट भरे घर बैठे उनकी प्रताड़ना, जिल्लत और उनके अपमान के जुलूस को पूरी संवेदनहीनता के साथ टीवी पर किसी मनोरंजक सीरियल की तरह देख रहे थे। उन्हें संगठित करने, उनके अधिकारों के बारे में उन्हें जागृत करने, शिक्षित करने आज तक उनके पास कौन गया है? दिन रात कमर तोड़ और हाड़ घिसाऊ मेहनत करने के बाद भी वे ही बे-घर, बे-पैसा क्यों रहते हैं? क्यों हर रोज सुबह उनके बच्चों को स्कूल जाने के बजाए काम पर जाना पड़ता है। हर मन्दी में, हर बीमारी में हमेशा उन्हें ही क्यों मरना होता है। उन्हें और क्या करना होगा जो वो  नहीं कर रहे? उनका अपराध क्या है? दिन रात मेहनत करने के बाद भी उन्हें ही क्यों भूखे पेट सोना पड़ता है? हर बरसात में हर साल उन्हें ही क्यों मक्खी मच्छरों की तरह मरना होता है? उनके हिस्से की जमीन, जायदाद, बाजार, मॉल, स्कूल कॉलेज, अस्पताल कहां हैं? पीढ़ी दर पीढ़ी उनके बच्चे ही क्यों बे-पढ़े रह जाते हैं? ये खूनी खेल कब तक यूं ही चलता रहेगा? ये विडम्बना उनकी ही क्यों है कि‍ या तो वे वायरस से मरें या भुखमरी से?

विपन्न विस्थापित मजदूरों के ‘कल्याण’ के लिए ‘उनकी’ सरकार ने नाम लेने के लिए ही सही जो कुछ भी किया है, क्या वो लागू हुआ है? आईये देखें। विस्थापित मजदूरों के हितों को साधने के लिए, “अंतर्राज्यीय विस्थापित मजदूर (रोजगार और सेवा शर्तों का नियमन) कानून (15 पेज) 1979 को वजूद में आया। इस कानून के 5वें अध्याय का नाम है, “अंतर्राज्यीय मजदूरों को मिलने वाले वेतन, कल्याण और दूसरी सुविधाएं” और इसमें इन मजदूरों के लिए ये सुविधाएं देने की बात कही गई है:

  1. वेतन दर और अंतर्राज्यीय मजदूरों की अन्य सेवा शर्तों की दशा
  2. विस्थापन भत्ता
  3. यात्रा भत्ता आदि
  4. दूसरी सुविधाएं
  5. वेतन देने की जिम्मेदारी
  6. कुछ मामलों में मुख्य मालिक की देनदारी
  7. पिछली देनदारियां

उससे अगला, मतलब छठा अध्याय लेबर इंस्पेक्टर को इन सुविधाओं का अनुपालन सुनिश्चित करने का निर्देश देता है।

20 और 21 फरवरी 2009 को नई दिल्ली में हुई भारतीय श्रम सम्मलेन द्वारा गठित कार्यकारी ग्रुप की अनुशंसा पर एक त्रिपक्षीय ग्रुप (श्रम संगठन, श्रम मंत्रालय और मालिक पक्ष) गठित किया गया था जिसका काम था कि‍ वो ऊपर वर्णित 1979 के कानून के क्रियान्वयन की समीक्षा करे। इस ग्रुप ने इस कानून के विभिन्न प्रावधानों का और विस्थापित मजदूरों को झेलनी पड़ रहीं सभी समस्याओं का अध्ययन किया, इस कानून को लागू करने में आ रही परेशानियों को भी नोट किया और अपनी विस्तृत रिपोर्ट 23–24 नवम्बर 2010 को संपन्न हुए अगले त्रिपक्षीय सम्मलेन में तत्कालीन श्रम मंत्री हरीश रावत के सम्मुख प्रस्तुत की। तब से आज तक सभी ‘पक्ष’ इस रिपोर्ट पर आराम से गहरी नींद सो रहे हैं, इसपर कोई भी कार्यवाही नहीं हुई। इसके आलावा हमारी कानून की किताबों की शोभा बढाने के लिए “असंगठित मज़दूरों की सामाजिक सुरक्षा कानून 2008 ( UWSS Act ) भी मौजूद है! इन सब कानूनों ने इन विस्थापित मजदूरों को कौन सी सामाजिक सुरक्षा पहुंचाई, सब के सामने है! सभी ‘पक्षों’ के इन नुमाइंदों को, लगता है, इन बेहाल मजदूरों को ही एक दिन गला पकड़कर नींद से उठाना पड़ेगा। लगता है वो दिन अब दूर नहीं।

इन कानूनों में जो भी सजा हुई है, क्या उसमें से कुछ भी लागू हुआ है, ज़रा सा भी इन मज़दूरों को मिला है? उत्तर है; नहीं। क्या ये तथ्य हम सबके लिए जो खुद को इस सर्वहारा वर्ग को संगठित कर शोषण-उत्पीडन से हमेशा हमेशा के लिए इनके मुक्ति संघर्ष में सहभागी होने का दावा करते हैं शर्मनाक नहीं है? समाज के हर तबके ने इन बहादुर लेकिन बे-हाल मजदूरों को बीच मझधार छोड़ दिया है। इस कड़वी सच्चाई को कोई पाखण्डी ही नकार सकता है।

सबने साथ छोड़ दिया, वे फिर भी लड़े

सूरत और बडौदा: अकेले सूरत शहर में कुल 12 लाख विस्थापित मजदूर काम करते हैं। पूरा कपड़ा उद्योग और हीरा उद्योग इन मजदूरों के दम पर ही चलता है। काम नहीं, खाने को नहीं, जो दिया जाता है वो सड़ा हुआ है और अपमानजनक तरीके से दिया जाता है, आगे कब काम शुरू होगा कुछ मालूम नहीं, अपने घर जाना चाहते हैं तो पुलिस डंडे मारती है। ये सब कब तक सहन करें? यूपी, बिहार और उड़ीसा के रहने वाले कई सौ मजदूरों ने इस ज़ुल्म और बर्बरता के खिलाफ़ आखिरकार बगावत कर दी। दिनांक 9, 11 और 14 अप्रेल 2020 को सूरत शहर के तीन इलाकों, वराच्छा, लसकाना और पान्दोल में मजदूरों और हथियारबंद पुलिस के बीच सड़क पर जोरदार संघर्ष हुआ, जिसमें सैकड़ों मजदूर जख्‍मी हुए। 70 मजदूरों को हिरासत में लिया गया और उनमें से 8 को गिरफ्तार किया गया। सूरत के पुलिस कमिश्नर श्री आर बी ब्रह्मभट को स्वीकार करना पड़ा, “इन विस्थापित मजदूरों को लॉक डाउन के दौरान उनके घरों में बंद रखना बहुत ही मुश्किल काम है। पुलिस को इस काम में बहुत कठिनाईयों का सामना करना पड़ रहा है.” गुजरात के दूसरे औद्योगिक शहर बरोदा में भी पुलिस और मजदूरों के बीच संघर्ष की खबरें मिडिया में प्रकाशित हुईं थीं।

मुम्बई में बान्द्रा और मुम्ब्रा: दिनांक 14 अप्रेल को जिस दिन फिर से 18 दिन का लॉक डाउन घोषित किया गया, मुम्बई में काम करने वाले कई लाख विस्थापित मजदूरों में बांद्रा में रहने वाले हजारों (सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 1500) मजदूर कर्फ्यू जैसे लॉक डाउन की परवाह ना करते हुए बांद्रा स्टेशन पर पहुंच गए। वे अपने गांव जाना चाहते थे और मिडिया में रिपोर्ट्स छपी थी की यूपी-बिहार के लिए कुछ रेलगाड़ियां चलाई जाने वाली हैं। मुम्बई की हथियारबंद पुलिस ने उन्हें रोका और घेर लिया। उन भूखे मजदूरों पर लाठियां बरसाई गईं जिसमें कई मज़दूरों के सिर फूटे। पुलिस के बर्बर हमले का इन मजदूरों ने निहत्थे ही मुकाबला किया। घंटों सड़क पर जमकर संघर्ष हुआ। भूखे, पिटे और जख्‍मी मजदूरों में से ही पुलिस ने कुल 40 को हिरासत में लिया जिनमें से 11 एक्टिविस्ट्स को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस और मजदूरों के बीच बिलकुल ऐसी ही भिड़न्त मुम्बई की ही दूसरी मजदूर बस्ती मुम्बरा में हुई जो ठाणे जिले में आती है।

नई दिल्ली/ एन सी आर: दिल्ली और आसपास राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में कई जगह पुलिस और मजदूरों के बीच तीखी झड़पें हुईं। ऐसी ही एक बड़ी घटना में सबको खाना ना दिए जाने, कम और खराब खाना दिए जाने और उनके साथ अपमानजनक बर्ताव किए जाने को लेकर पुलिस और मजदूरों के बीच कड़ा संघर्ष हुआ जिसमें 4 रैनबसेरों को आग लगी। पुलिस ने मजदूरों पर हमला किया और उन्हें बेतहाशा पीटा। अपनी जान बचाने के लिए 4 मजदूर यमुना में कूद गए जिनमें से 3 बाद में बाहर आ गए लेकिन एक का कुछ पता नहीं चला। अगले दिन सुबह जब उस मजदूर की लाश यमुना से निकालकर उसी स्थान पर लाई गई तो अपने कॉमरेड की लाश देखकर मजदूर फिर भड़क गए। फिर से पुलिस और मजदूरों के बीच तीखा संघर्ष हुआ। बहुत सारे मजदूर जख्‍मी हुए और उनमें से कई को कड़ी धाराओं में गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया।

मजदूरों के इसी तरह के डेस्पेरेट संघर्ष देश के विभिन्न भागों जैसे नोएडा, गाजियाबाद, अहमदाबाद, हैदराबाद, बंगलुरु, कोट्टायम केरल में भी हुए।

सबसे महत्वपूर्ण बात: कोरोना महामारी के दौरान भी हिन्दू-मुस्लिम नफरत को भड़काने के लगातार प्रयास हुए लेकिन कहीं भी विस्थापित मजदूर इस फासिस्ट एजेंडे के शिकार नहीं हुए। एक भी जगह एक भी घटना ऐसी नहीं हुई जो ये साबित करे कि मजदूर हिन्दू-मुस्लिम के रूप में मजहब के आधार पर एक दूसरे से लड़े। रोटी के लिए ऐसे कठिन वक्‍त और बे-इन्तेहा मुसीबतें झेलते हुए भी कहीं भी मजदूर आपस में खाने के बंटवारे या किसी भी मुद्दे पर आपस में नहीं लड़े। वर्ग की एकता कहीं भी टूटने नहीं दी। मजदूर वर्ग की एकता की शानदार मिसाल प्रस्तुत की।

मुनाफे के भूखे पूंजीवादी गिद्ध कोविड-19 की इस भयानक महामारी का भी पूरा दोहन करने के अवसर को हाथ से जाने देने के मूड में बिलकुल नहीं हैं। मजदूर के काम के घंटे 8 से सीधे 12 करने के प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही गुजरात चैम्बर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्रीज ने सरकार को कहा है कि कोरोना संकट की वजह से उनके व्यवसायों को हुए भारी नुकसान को देखते हुए अगले कम से कम एक साल तक सभी ट्रेड यूनियन गतिविधियों पर रोक लगाई जानी चाहिए। पूंजी द्वारा हो रहे संयुक्त प्राणघातक हमलों का उचित जवाब देने का मजदूरों के पास ये एक ऐतिहासिक अवसर है। इस मरणासन्न पूंजीवादी व्यवस्था को इसकी सदियों से संचित गन्दगी के साथ जमीन में गहरा गाड़ने का ये ऐतिहासिक अवसर मजदूर वर्ग के पास है। वैसे भी इस वक्‍त केवल दो ही पर्याय हैं: समाजवाद या विश्व का सम्पूर्ण विनाश। आम जनमानस के लिए भी ये सच्चाई इतनी स्पष्ट अवस्था में कभी नहीं रही जि‍तनी आज है।

हर एक संकट (संभावित प्रासंगिक भटकाव एवं प्रतिगमन सहित) प्रखर और विकसित होते वर्ग संघर्ष के वेग को बढाता है, इसको नंगा कर देता है, जो सड़ चुका उसे नष्ट कर देता है। संकट को इस नज़रिए से देखा जाना चाहिए…क्या प्रगतिशीलता और दूसरी लाभदायक विशिष्टताएं इस संकट में मौजूद हैं,..हर एक संकट कुछ को तोड़ देता है और कुछ को लोहे जैसा मजबूत बनाता है…जो सड़ चुका है और जो मजदूर आन्दोलन में बाधक बनता है वो विखंडित हो जाता है और संकट इन्सान को समाजवादी क्रांति की ओर बढ़ने के लिए दृढ़ बनाता है।
(लेनिन, नवीन लेख एवं पत्राचार का पहला रुसी अनुवाद, 1930, पृष्ठ 9)

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 1/ मई 2020) में छपा था

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