कोविड-19 महामारी – स्वास्थ्य सेवा व राजनीति संबंधी कुछ टिप्पणियाँ

प्रसाद वी. //

अभी अभी दुनिया भर में लोग कोविड से लड़ रहे हैं। लगभग 40 लाख इससे संक्रमित हो चुके हैं। यूरोप अमेरिका के विकसित पूंजीवादी देशों में मृत्यु दर अप्रत्याशित रूप से अधिक है। अभी तक न तो इस बीमारी के इलाज की दवा है न ही कोई टीका बना है। मानव समाज ने अब तक इसके प्रति प्रतिरोधक क्षमता भी अर्जित नहीं की है। अतः फिलहाल यह बीमारी मानवता के लिए एक बड़ा खतरा है।

8 दिसंबर 2019 को वुहान, चीन से कोरोना संक्रमण के पहले मामले की रिपोर्ट विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दी थी। 27 दिसंबर को इससे पहली मृत्यु हुई। 30 दिसंबर को एक रोगी के गले से लिए गए नमूने से वाइरस की पहचान की गई। 12 जनवरी 2020 को चीनी वैज्ञानिकों ने वाइरस का जीन ढांचाक्रम बनाकर विश्व स्वास्थ्य संगठन को भेजा। वाइरसों का नामकरण उनके जीन ढांचा क्रमानुसार किया जाता है, ताकि निदान के लिए परीक्षण, टीके, दवाई, आदि बनाने में मददगार हो। इसके अनुसार इसका नाम सीवियर एक्यूट रेस्पिरेटरी सिंड्रोम कोरोनावाइरस 2 (सार्स-सीओवी-2) रखा गया।

वुहान में इसके फैलने की गति से ही इसके संक्रामक होने की पुष्टि हो गई थी, यह भी कि बीमारी के प्रबंधन के लिए गहन चिकित्सा कक्षों (आईसीयू), ऑक्‍सीजन आपूर्ति व वेंटीलेटरों की जरूरत है तथा बड़ी तादाद में बिस्तरों वाले अलहदा वार्ड की जरूरत होगी। किन्तु जर्मनी व दक्षिण कोरिया को छोड़कर अमरीका, फ्रांस, इटली, ब्रिटेन, स्पेन जैसे किसी देश ने इसकी तैयारी नहीं की, और महामारी से निपटने में पूरी तरह असफल हुए। बेल्जियम, रूस, नीदरलैंड, आदि भी इसी राह पर हैं।

हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन व क्लोरोक्वीन के लिए डोनाल्ड ट्रंप ने जिस तरह भारत सरकार को धमकी दी वह अभी अमरीकी प्रशासन द्वारा इससे निपटने में नाकामयाबी की कुंठा को दर्शाता है। ये दोनों मलेरिया-रोधी दवा हैं और कोविड के खिलाफ इनके असर का कोई सबूत अब तक नहीं  है, बल्कि ये हृदय के लिए अत्यंत हानिकारक हैं। पहले से ही कोविड से मृत बहुत सारे मरीज साथ में हृदय संबंधी दिक्कतों से भी पीड़ित मिले हैं, अतः ये दवायें और भी खतरनाक हो सकती हैं। फिर भी वे बिना सही परीक्षण के ये दवाएं सबको दे रहे हैं। अतः स्पष्ट है कि अमरीका सिर्फ हथियारों एवं पुलिस-फौज की ही सुपर पावर है। महामारी से निपटने में वह कई पूंजीवादी देशों से ही नहीं, उभरते हुये देशों से भी पीछे है। अन्य विकसित पूंजीवादी देशों की भी यही दशा है। हमें इसके कारणों की पड़ताल करनी जरूरी है।

कोविड-19 और नवउदारवाद का दिवालियापन

अमरीका, आदि देश इस बात के नमूने हैं कि जहां भी स्वास्थ्य क्षेत्र में नवउदारवादी नीतियां लागू की गईं वहां जनजीवन अधिक तकलीफदेह हो गया है। 1990 के दशक से ही कई देशों में पहले से कुछ हद तक मौजूद सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं को बरबाद किया गया है। इस नजरिये अनुसार बाजार शक्तियां ही सभी समस्याओं का समाधान कर सकती हैं। लेकिन कोविड-19 का तजुरबा दिखाता है कि बाजार शक्तियां हल के बजाय समस्या को और गंभीर कर उससे बचाव में बाधा बन सकती हैं। अमरीका व अन्य देश चार दशक से स्वास्थ्य सहित सार्वजनिक सेवाओं को बदनाम करने में लगे थे ताकि उनका निजीकरण कर सकें क्योंकि पूंजीवाद के आकाओं के मुताबिक नवउदारवाद का कोई विकल्प नहीं। किन्तु कोविड के दो मुख्य केन्द्रों चीन व अमरीका के इसके निपटने के तरीकों पर गौर करें तो नवउदारवाद का सत्यानाशी चरित्र पूरी तरह उजागर हो जाता है।

संक्रमण के आरंभ काल में चीन ने रोगाणु की रोकथाम के लिए अब तक के इतिहास के लिए कुछ नए कदम उठाये। उस पूरे वक्त अमरीकी शासन चीनी प्रयासों की निंदा में जुटा रहा। किन्तु कुछ महीनों के अथक प्रयत्नों से चीन महामारी को रोकने में सक्षम हुआ। इसके उलट, अमरीकी शासन अगंभीर बना रहा जिसकी कीमत अब उनकी जनता को चुकानी पड़ रही है और बिना इलाज के वे हजारों की तादाद में मृत्यु का शिकार हो रहे हैं क्योंकि वे इलाज का खर्च वहन नहीं कर सकते। अमरीका में अधिकांश निजी अस्पताल हैं और मध्यम वर्ग के पास स्वास्थ्य बीमा है। मरीज के आने पर पहले इलाज के बजाय अस्पताल उसकी आर्थिक क्षमता आंकता है जिसमें बीमा पॉलिसी भी शामिल है। इस आकलन के आधार पर ही डॉक्टर इलाज करते हैं। कोविड-19 के इलाज के लिए वहां 40 लाख रुपए औसत खर्च आ रहा है। अतः बहुत सारे मरीज इलाज करा ही नहीं रहे हैं। ट्रंप जैसे नेताओं की बेशर्मी को देखकर अब दुनिया की सबसे अमीर अर्थव्यवस्था में भी कुछ भले लोग अस्पताल बिलों के भुगतान के लिए चंदा जुटा रहे हैं। पूरी व्यवस्था को बाजार का गुलाम बना देने का यही नतीजा है।

यहां सवाल उठता है कि अपने मीडिया और वैश्विक प्रभाव का प्रयोग कर अमरीका चीन विरोधी भावनाएं क्यों भड़का रहा है? स्पष्ट है कि अमरीकी व्यवस्था और शासन अपने ही लोगों के सामने नंगा हो गया है। उन्हें इसका दोष किसी और के मत्थे मढ़ना है। इस जरिये वे अपनी नाकामयाबी को छिपाने और अमरीका में स्वास्थ्य सेवाओं की बरबादी को औचित्यपूर्ण ठहराने का प्रयास कर रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्टें बताती हैं कि महामारी से निपटने के चीनी उपाय अमरीका से कहीं श्रेष्ठ थे जिसकी वजह चीन के भूतपूर्व समाजवादी काल में निर्मित विशाल राज्य संचालित स्वास्थ्य सेवायें हैं।

किसी पूंजीवादी देश में अगर कोई नेता या राज्याध्यक्ष मानवीय भावनाओं के चलते अपनी आबादी को महामारी से बचाना भी चाहे तो भी वो लाचार होता है क्योंकि उन्हें हर स्थिति में अधिकतम मुनाफे के पूंजीवादी व्यवस्था के नियम का पालन करना ही होता है। महामारी में उन्हें दवा कंपनियों व निजी अस्पतालों पर निर्भर रहने की मजबूरी है जो मुनाफे के लिए चलते हैं। इससे जनता की हालत बदतर होती जाती है। यहां तक कि स्पेन जैसे पूंजीवादी देश ने भी इस बात को समझकर अस्थायी रूप से ही सही निजी अस्पतालों का राष्ट्रीयकरण करने का फैसला लिया।

कोविड पर पूंजीपतियों की प्रतिक्रिया दिखाती है कि वे मुनाफे की असीम लालसा से प्रेरित होते हैं। अमरीकी व अन्य दवा कंपनियां पूरा प्रयास में जुटी हैं कि किसी संभावित इलाज या टीके पर अपना एकाधिकार कायम कर मुनाफा वसूल सकें। अमरीकी दवा कंपनी गीलीयड अपनी एक दवा को कोविड का इलाज प्रचारित करने के साथ ही चीनी कंपनियों को इसके इस्तेमाल से रोकने के लिए कानूनी लड़ाई मे उतर पड़ी है और इससे उसके भारी लाभ की आशा में उसका शेयर दाम आसमान छूने लगा है। वहीं, अमरीकी सरकार ने टीके के विकास में जुटी एक जर्मन कंपनी को बड़ी रकम की पेशकश की ताकि उसके एकमात्र विपणन अधिकार हासिल कर सके, जिसके नाते उसका जर्मन सरकार से टकराव भी हो गया।

दक्षिणपंथी राजनीति का सामान्य सिद्धान्त है कि वे किसी समस्या के सामने आने पर उसके लिए किसी ‘और’ – अल्पसंख्यक, कमजोर, दूसरा देश/राष्ट्रीयता, आदि – पर दोष डालकर बहुसंख्यकवादी भावनाएं भड़काने का प्रयास करते हैं। ट्रंप प्रशासन द्वारा ‘चीनी वाइरस’, ‘चीनी कम्युनिस्ट वाइरस’, आदि भड़काऊ जुमलों के जरिये महामारी का दोष चीन के मत्थे मढ़ने की कोशिश जारी है। ठीक वही चीज भारत में भी देखी जा सकती है। मोदी सरकार भी बीमारी के फैलने का दोष एक समुदाय पर डाल सांप्रदायिक शत्रुता भड़काने में जुटी है। आम लोगों के जीवन के लिए ऐसी दक्षिणपंथी राजनीति बहुत जहरीली है।  

वैश्विक स्वास्थ्य सेवायें – फर्जी रिपोर्ट का पर्दाफाश

कोविड-19 महामारी के आरंभ में अमरीकी न्यूक्लियर थ्रेट इनीशिएटिव और जॉन होपकिंस स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ ने 2019 के लिए वैश्विक स्वास्थ्य सुरक्षा सूचकांक जारी किया था। इसके अनुसार अमरीका पहले व इंग्लैंड दूसरे स्थान पर था जबकि दक्षिण कोरिया 9वें, चीन 51वें तथा अफ्रीकी देश तली पर थे। पर कोविड का तजुरबा साफ दिखा रहा है कि पहले दो स्थानों पर रखे गए यूएस/यूके दोनों समस्या से निपटने में सबसे खराब साबित हुये हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की सलाह अनुसार न सिर्फ व्यापक जोच करने में दोनों बुरी तरह नाकामयाब हुये बल्कि इलाज के जरूरी उपकरण, दवाओं से लेकर अपने स्वास्थ्य कर्मियों को मास्क, आदि जरूरी सुरक्षा सुविधायें देने में भी दोनों फिसड्डी निकले। इसके मुकाबले चीन, दक्षिण कोरिया, सिंगापूर, वियतनाम जैसे एशियाई देशों ने इन दोनों से कहीं बेहतर काम किया। चीन और क्यूबा दोनों महामारी से निपटने में अग्रणी सिद्ध हुये और दोनों ने दुनिया भर में मदद के लिए अपने मेडिकल विशेषज्ञों की टीमें भी भेजीं। यह दिखाता है कि विभिन्न देशों की क्षमताओं संबंधी ऐसे सब मीडिया प्रचारित चार्ट और सूचकांक कितने फर्जी तरीके से तैयार किए जाते हैं।

केरल मॉडल कैसे काम करता है

भारत में कोविड से निपटने में कुछ गंभीर प्रबंधन दिखाने वाली एकमात्र केरल सरकार है। इसके कुछ हद तक बेहतर नतीजे भी आए हैं। किन्तु इसका पूरा श्रेय मौजूदा सरकार को देना संकीर्ण राजनीतिक मकसद का परिणाम है। इसके लिए इसकी बेहतर साक्षारता दर और अन्य राज्यों की तुलना में श्रेष्ठ स्वास्थ्य सेवा को देना होगा। केरल 30 जनवरी को ही कोविड मामले वाला प्रथम राज्य था। फिर बहुत भारी तादाद में विदेश में काम करने वाले केरल निवासियों की वजह से भी राज्य के सामने मुश्किल पेश आने का जोखिम था, खासकर इसलिए कि इनमें से एक बड़ी संख्या कोविड मरीजों के संपर्क में आने वाले स्वास्थ्य क्षेत्र, विशेषतया यूरोप, में कार्यरत है। लेकिन इस चुनौती को स्वीकार करते हुये राज्य ने बाकी देश से दो हफ्ते पहले 10 फरवरी को ही कोविड प्रभावित देशों से आने वाले मुसाफिरों के लिए 14 दिन के क्वारंटीन का नियम लागू कर दिया। नवजागरण के गहरे प्रभाव और 1950 के दशक से काफी वर्षों तक वाम शासन वाले इस राज्य ने सार्वजनिक शिक्षा व स्वास्थ्य में अन्य राज्यों की तुलना में बेहतर निवेश किया है अतः यहां साक्षरता दर ऊंची है और स्वास्थ्य सेवायें बेहतर काम करती हैं। नवजात मृत्यु दर, टीकाकरण, आदि कसौटियों पर इसका स्थान भारत में ऊपर है। अस्पतालों की व्यवस्था के साथ ही प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्रों पर विशेषज्ञों की उपलब्धता भी अधिक है। फिर भी यह जोड़ना आवश्यक है कि उच्च साक्षरता और सार्वत्रिक शिक्षा के बगैर स्वास्थ्य सेवायें इतने बेहतर परिणाम नहीं दे पातीं।

राज्य की स्वास्थ्य सेवा की मजबूती के कारण ही यह विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफ़ारिश अनुसार व्यापक जांच करने में सफल हुआ जबकि केंद्रीय सरकार निरंतर व्यापक जांच कर पाने को असाध्य मान रही थीं। अप्रैल के प्रथम सप्ताह में ही केरल 15 हजार जांच कर चुका था। इसकी तुलना में कहीं अधिक आबादी और लगभग बराबर मरीजों वाले आंध्रप्रदेश ने 8 हजार और इसके दो गुने मरीजों वाले तमिलनाडु ने 12,700 जांचें ही की थीं।

यहां यह भी गौरतलब है कि हाल के दशकों में वाम व दक्षिण दोनों सरकारों ने पिछली सदी के दशकों के संघर्षों से निर्मित इस स्वास्थ्य सेवा को ढहाने की पूरी कोशिश की है पर इसके विरुद्ध बने जनमत और प्रतिरोध आंदोलनों के कारण वे ऐसा करने में कामयाब नहीं हो पाईं। 1990 के बाद से ही केरल में भी निजी अस्पतालों में भारी पूंजी निवेश हुआ है जिनके स्वार्थों को पूरा करने हेतु वाम व दक्षिण दोनों सरकारों ने अपनी सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा को बदनाम करने की हरचंद कोशिश की है। परंतु, बड़ी तादाद में बड़े निजी अस्पतालों वाले केरल में विपत्ति के वक्त हमेशा यह सिद्ध हुआ कि वे जनहित में कुछ नहीं कर सकते। हर बार यह चुनौती सरकारी अस्पताल व्यवस्था और उसके स्वास्थ्य कर्मियों ने ही स्वीकार की है। तथ्य तो यही है कि ऐसी व्यवस्था के अभाव में विपत्ति के वक्त कोई सरकार प्रभावकारी काम नहीं कर सकती।

क्यूबा: अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता का प्रतीक

क्यूबा ने इस बीच सबका ध्यान खींचा है। एक छोटा सा ‘समाजवादी’ देश जिसने अमरीका के अमानवीय और गैरकानूनी प्रतिबंधों के बावजूद अपनी अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य सेवाओं को विकसित किया है। इन प्रतिबंधों से उसे उसके 14 वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद के बराबर अर्थात 1 लाख करोड़ डॉलर नुकसान का आंकलन है, फिर भी अमरीकी नियंत्रण के विरुद्ध उसका संघर्ष समाप्त नहीं हुआ है। क्यूबा को 1980 के दशक का डेंगू प्रकोप (जो उनके अनुसार अमरीका ने ही फैलाया था) इन्हीं प्रतिबंधों की वजह से बिना दवाओं के झेलना पड़ा था। उस दौरान उन्होने इंटरफेरोन अल्फा 2बी नामक एंटी-वाइरल दवा विकसित की जिसके प्रयोग से चीन ने कोविड से बहुत सी जानें बचाईं हैं। पर क्यूबा पर प्रतिरोध और उसके इस दवा को बेचने के अधिकार से वंचित किए जाने की वजह से पश्चिमी पूंजीवादी देश इस दवा से परिचित ही नहीं हैं। फिर भी अभी अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता प्रदर्शित करने हेतु क्यूबा ने इटली सहित कई देशों में अपनी मेडिकल टीम भेजी है।

आम तौर पर 50 हजार क्यूबाई डॉक्टर 60 से अधिक देशों में अपनी सेवायें देते हैं। हर संकट में क्यूबा के डॉक्टर अग्रिम मोर्चे पर रहते आए हैं। क्यूबा के विदेश मंत्री ने हाल में ही फिडेल कास्त्रो को उद्धृत करते हुये ट्वीट किया, “अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में हम कार्यों के द्वारा एकजुटता दिखाते हैं, सुंदर शब्दों से नहीं।“ क्यूबा की मेडिकल ब्रिगेडें अभी विश्व भर में कोविद मरीजों का इलाज कर रही हैं। 22 मार्च को ही 52 डॉक्टरों व नर्सों की एक टीम इटली में सर्वाधिक कोविड संकट वाले लोम्बार्दी में इलाज के लिए पहुंची। मध्य मार्च में जब 1,000 मुसाफिरों वाला ब्रिटिश क्रूज जहाज 5 कोविड मरीजों के कारण बहामा के पास फंस गया था और अमरीका व कैरिबियन का कोई देश मदद को तैयार नहीं था, तब क्यूबा ने उसे अपने बंदरगाह में आने और यात्रियों के उतरने की व्यवस्था की। अधिकतर यात्री तो विमान से यूके चले गए पर मरीजों का इलाज क्यूबा के अस्पतालों में ही हुआ। क्यूबा विदेश मंत्रालय ने अपने बयान में कहा, ”यह एकजुटता, स्वास्थ्य को मानवाधिकार मानने साझा चुनौतियों के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय साझेदारी को मजबूत करने का वक्त है।”

गांव, शहर, राज्य, या देश, आज कोई भी अकेले महामारी से नहीं निपट सकता। सैंकड़ों तरह से जुड़े सैंकड़ों देशों वाली मौजूदा दुनिया में सिर्फ वैश्विक पहलकदमी से ही कोविड-19 जैसी महामारी से लड़ा जा सकता है। पर इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता व भाईचारा चाहिये। इसीलिए अभी दुनिया में हावी दक्षिणपंथी राजनीति द्वारा प्रसारित घृणा की संस्कृति का कोई भविष्य नहीं है हालांकि ट्रंप और मोदी जैसे नेताओं को अपने असहिष्णु कार्यक्रम के तहत विभिन्न अल्पसंख्यकों के खिलाफ घृणा फैलाने हेतु इस महामारी का इस्तेमाल करते देखा जा सकता है। वहीं क्यूबा जैसे एक छोटे देश को अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता व भाईचारे का ठोस उदाहरण बनते देखा जा रहा है। फिर बिना किसी सामाजिक नियंत्रण के व्यक्तिगत स्वतंत्रता को मान्यता देने वाली अमरीकी-यूरोपीय संस्कृति की एक अंतर्राष्ट्रीय महामारी से निपटने में कोई भूमिका नहीं है। इस महामारी के विरुद्ध मानवता की विजय हेतु जरूरी शर्ते हैं – सामाजिक मालिकाने वाली स्वास्थ्य सेवा, शिक्षित जनता, अंतर्राष्ट्रीय एकजुटता की संस्कृति एवं मौजूदा पूंजीवाद द्वारा व्यापक जनता के जीवन पर लादी गई अमानवीय दशाओं के खिलाफ जनमत का निर्माण।

नवउदारवाद और नई वाइरल बीमारियां

सर्वहारा के महान नेता फ़्रेडरिक एंगेल्स ने सौ साल से अधिक पूर्व मानव-प्रकृति अंतरसंबंधों का सार बताया था। उनके ‘वानर से नर में रूपांतरण में श्रम की भूमिका’ में मानव के प्रकृति के साथ लघु कालीन शोषणकारी संबंधों के अंतर्विरोधों और इससे अनिवार्य तौर पर जनित होने वाली दीर्घकालीन समस्याओं को इस तरह वर्णित किया गया है।

“प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए, क्यों कि वह हर ऐसी विजय का हम से प्रतिशोध लेती है। यह सही है कि प्रत्येक विजय से प्रथमतः वे ही परिणाम प्राप्त होते हैं जिन का हम ने भरोसा किया था, पर द्वितीयतः और तृतीयतः उस के परिणाम बिल्कुल ही भिन्न तथा अप्रत्याशित होते हैं, जिन से अक्सर पहले परिणाम का असर जाता रहता है। मेसोपोटामिया, यूनान, एशिया माइनर, तथा अन्य स्थानों में जिन लोगों ने कृषि योग्य भूमि प्राप्त करने के लिए वनों को बिल्कुल ही नष्ट कर डाला, उन्होंने कभी यह कल्पना नहीं की थी कि वनों के साथ आर्द्रता के संग्रह-केन्द्रों और आगारों का उन्मूलन कर के वे इन देशों की मौजूदा तबाही की बुनियाद डाल रहे हैं। एल्प्स के इटालियनों ने जब पर्वतों की दक्षिणी ढलानों पर चीड़ के वनों को (ये दक्षिणी ढलानों पर खूब सुरक्षित रखे गए थे) पूरी तरह काट डाला, तब उन्हें इस बात का आभास नहीं था कि ऐसा कर के वे अपने प्रदेश के दुग्ध उद्योग पर कुठाराघात कर रहे हैं। इस से भी कम आभास उन्हें इस बात का था कि अपने कार्य द्वारा वे अपने पर्वतीय स्रोतों को वर्ष के अधिक भाग के लिए जलहीन बना रहे हैं तथा साथ ही इन स्रोतों के लिए यह सम्भव बना रहे हैं कि वे वर्षा ऋतु में मैदानों में और भी अधिक भयानक बाढ़ें लाया करें। यूरोप में आलू का प्रचार करने वालों को यह ज्ञात नहीं था कि असल मंडमय कंद को फैलाने के साथ-साथ वे स्क्रोफुला रोग का भी प्रसार कर रहे हैं। अतः हमें हर पग पर यह याद कराया जाता है कि प्रकृति पर हमारा शासन किसी विदेशी जाति पर एक विजेता के शासन जैसा कदापि नहीं है, वह प्रकृति से बाहर के किसी व्यक्ति जैसा शासन नहीं है, बल्कि रक्त, मांस, और मस्तिष्क से युक्त हम प्रकृति के ही प्राणी हैं, हमारा अस्तित्व उस के मध्य है और उस के ऊपर हमारा सारा शासन केवल इस बात में निहित है कि अन्य सभी प्राणियों से हम इस मानों में श्रेष्ठ हैं कि हम प्रकृति के नियमों को जान सकते हैं और ठीक-ठीक लागू कर सकते हैं।”

यह नजरिया बुर्जुआ क्रांति द्वारा उस वक्त तक प्रस्तुत यांत्रिक भौतिकवादी नजरिए से मूलतः भिन्न है। जहां बुर्जुआ वर्ग के लिए मानवता का प्रकृति के साथ नाता एक पक्षीय है, एंगेल्स अनुसार यह पारस्परिक अंतर्व्याप्त संबंध है। चुनांचे, मानवता को प्रकृति के साथ अत्यंत सावधानी से व्यवहार करना चाहिये। अपने मुनाफे की असीम लालसा में बुर्जुआ इसको अक्सर भूल जाता है। इस नये संकट का मूल भी सीधे प्रकृति में है, हमें उसके कुछ पक्षों की पड़ताल करनी होगी। पशुओं से मानवों तक वाइरस के पहुंचने का सही मार्ग अभी हमें मालूम नहीं। अपने घरेलू राजनीतिक दबावों के कारण अमरीका के पीछे-पीछे विभिन्न देश उसके बगैर ही एक दूसरे पर दोष धर रहे हैं। लेकिन नवउदारवाद के सिद्धांत के अनुसार मांस उत्पादन में मुनाफे के एकमात्र मकसद होने का महामारी से संबंध अभी चर्चा से पूरी तरह उपेक्षित है।

स्पष्ट है कि कोविड-19 वाइरस पशुओं से मानव तक पहुंचा है। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछली सदी का ही इतिहास देखें तो सर्वाधिक मारक बीमारियां इसी प्रकार फैली वाइरल बीमारियां रही हैं। स्पेनिश फ्लू से एशियन फ्लू, हांगकांग फ्लू, एड्स, निपाह, स्वाइन फ्लू, कोविड-19 सभी इसके उदाहरण हैं। हजारो-लाखों पशु-पक्षियों और बड़ी इमारतों-सुविधाओं वाली आधुनिक औद्योगिक फार्मिंग वाइरसों के प्रसार के लिए अनुकूल दशायें उत्पन्न करती हैं क्योंकि पशु-पक्षियों की ये प्रजातियां इन्हें मिलने, संकरित हो नई किस्मों को जन्म देने और मानवों में पहुंचने की स्थितियां प्रदान करती हैं। फ्लू वाइरसों का परिवार इस परिघटना को कई बार दोहरा चुका है। वन्य प्रजातियों के पूर्व क्षेत्र में कृषि के प्रसार ने भी नये, घातक वाइरसों के साथ इस संपर्क की स्थिति को जन्म दिया है। उदाहरण के लिये, इबोला का वाहक चमगादड़ों की एक प्रजाति है जिसने अपने सामान्य आवास से वंचित होने पर पाम ऑइल बागानों में अपना नया आवास बना लिया। इस वाइरस के आवास क्षेत्र में पाम ऑइल बागानों के अतिक्रमण के साथ इबोला बीमारी के फैलाव की घटनायें जुड़ी हैं।

मुख्य बात यह है कि कोविड-19 जैसे संक्रमणों का मूल कारण अभी स्थानीय नहीं बल्कि वैश्विक कृषि-आधारित उद्योग की कार्यपद्धति से संबंधित है। रोब वैलेस ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘बिग फार्म्स मेक बिग फ्लू’ में इस विषय पर लिखा है कि ‘ये (महामारियां) धन उत्पादन को सर्वोच्च प्राथमिकता देने वाले पर्यावरणीय व्यवस्था का अनिवार्य नतीजा’ है। वैलेस कहते हैं कि इन बीमारियों का नामकरण स्वाइन या एवियन फ्लू की तरह वाइरस प्रजाति पर नहीं बल्कि जिस बहुराष्ट्रीय कंपनी के मलिकाने वाली इकाई में इनका जन्म हुआ उनके नाम पर रखा जाना चाहिये। इससे समस्या के मूल कारण पर ध्यान तो जायेगा।

कोविड-19: स्पेनिश फ्लू के सबक

प्रथम विश्वयुद्ध की समाप्ति के वक्त 1918-20 में स्पेनिश फ्लू नामक इंफ्लुएंजा महामारी से विश्व में 5-10 करोड़ लोगों की मृत्यु हुई थी। हालिया अध्ययन बताते हैं कि इसमें से 40% मृत्यु भूख और पोषण के अभाव में लोगों की प्रतिरोधक क्षमता में क्षरण से हुईं थीं। ‘सिर्फ तालाबंदी से महामारी से लड़ा जा सकता है’ के विचार वाले नेताओं के लिये यह एक अहम सबक होना चाहिये था। एक शताब्दी बाद आज के भारत की लगभग यही दशा है। तालाबंदी के अचानक ऐलान के बाद लाखों की तादाद में प्रवासी श्रमिकों को दिल्ली जैसे शहरों से अपने गांवों के लिये सैंकड़ों-हजारों किलोमीटर चलकर जाना पड़ा है। इन श्रमिकों को भी महामारी का डर है पर उनका कहना है कि वे भोजन के बगैर क्यों मरें? उनकी नजर में दिल्ली जैसे शहरों में भूख से मरने से अपने प्रियजनों के नजदीक संक्रमण से मरना बेहतर है। नतीजा यह है कि स्वतंत्र भारत ने देश विभाजन के बाद से ऐसी विशाल संख्या में प्रवास नहीं देखा था जो अभी देखने को मिला है।

मुख्य समस्या है कि गरीब मेहनतकश जनता के प्रति भारत सरकार का रवैया पूरी तरह अमानवीय है। साथ में हमारे समाज में एक अमानवीय उच्च मध्यम वर्गीय हिस्सा है जो जनमत बनाने में बड़ी भूमिका निभाता है। इनका मत ही गरीब लोगों के प्रति सरकारी रवैये में प्रतिबिम्बित होता है। सरकार को लगता है कि तालाबंदी एक झटके में वाइरस को निर्मूल कर सकती है। किन्तु स्पेनिश फ्लू का तजुरबा सिखाता है कि ऐसा होने की संभावना नहीं है।

स्पेनिश फ्लू संक्रमण की 1918, 1919 व 1920 में तीन लहरें आईं, पहली में मौतों की तादाद कम थी, जबकि दूसरी-तीसरी में मृत्यु दर ऊंची थी। दूसरी लहर अपने प्रसार में बहुत विस्तृत थी। पहले लहर में संक्रमित होने वालों ने बाद के लिये प्रतिरोधक शक्ति विकसित कर ली थी। दूसरी लहर में वे प्रभावित नहीं हुये। इसका असर और नये व्यक्तियों पर हुआ और इसमें मृत्यु दर उच्चतम थी। कोविड-19 संक्रमण की भी ऐसी कई लहरें आ सकती हैं। यह विषाणु आरएनए वाइरस है जो तेजी से म्यूटेट कर प्रतिकूल स्थितियों में खुद को जिंदा रख सकता है। अभी प्राप्त जानकारी के अनुसार वाइरस के तीन रूप मौजूद हैं। नये म्यूटेशन भी संभव हैं। ऐसी स्थिति में कोई भी दवा निष्प्रभावी हो सकती है और पहले संक्रमित हुये व्यक्ति दोबारा संक्रमित हो सकते हैं।

ऐसी संभावना से बचाव के लिये वाइरस का निरंतर अध्ययन करने की जरूरत है जिससे इसमें होने वाले म्यूटेशन का पता लगता रहे। महामारी को रोकने का एकमात्र तरीका व्यापक जांच और संक्रमित व्यक्तियों को अलहदा करना ही है। किन्तु अतिदक्षिणपंथी भारत सरकार की नीति का परिणाम है कि जनसंख्या के अनुपात में जांच की संख्या भारत में अत्यंत कम है।

संयुक्त राष्ट्र की हालिया रिपोर्ट का एक और पहलू भारत पर सर्वाधिक लागू होता है – अगर सर्वाधिक पीड़ित क्षेत्रों में भोजन एवं अन्य मानवीय मदद के लिये तेजी से काम नहीं किया गया तो 25 करोड़ से अधिक आबादी भुखमरी के कगार पर पहुंच सकती है। रिपोर्ट कहती है कि विकासशील देशों की स्वास्थ्य सेवायें पहले ही चरमरा चुकी हैं जबकि एक वैश्विक मंदी खाद्य आपूर्ति शृंखला को बाधित कर सकती है। इसका सर्वाधिक प्रभाव असंगठित क्षेत्र में काम करने वालों, विस्थापितों तथा शरणार्थियों पर होगा। बढ़ती बेरोजगारी से क्रय शक्ति कम होगी और बहुत से लोग गरीबी-भुखमरी का शिकार हो जाएंगे।

कोविड-19 वाइरस – सभी धर्मों और भगवानों की अप्रासंगिकता 

कोविड-19 महामारी के प्रभाव में सभी धार्मिक सभाएं बंद हो गईं हैं। वेटिकन से मक्का-मदीना और हिन्दू मंदिरों तक सब जगह प्रार्थना, पूजा, नमाज आदि बंद हो गए है। कोई धार्मिक नेता भगवान से राब्ता कायम कर दवाई खोजने या सबका स्वास्थ्य सही कर उन्हें मृत्यु से बचाने का दावा नहीं कर पा रहे हैं। ब्राह्मण पुजारी खुद मास्क पहन कर पुजा कर रहे हैं और कई जगह तो देवी-देवताओं की मूर्तियों को भी मास्क पहना दिये गये हैं। आम तौर पर जो लोग किसी भी बीमारी-अस्वस्थता के वक्त मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारे, आदि पूजा स्थलों की ओर भागते हैं वे भी अभी अस्पताल और क्वारंटीन की ओर ही जा रहे हैं। इस तरह टाठी स्पष्ट हैं: अल्लाह, गॉड, भगवान बीमारियाे ठीक नहीं सकते, बीमारियों के इलाज के लिये वैज्ञानिकों और डॉक्टरों की जरूरत होती है। मनुष्य की रक्षा रहस्यमयी शक्तियों से नहीं ज्ञान की शक्तियों से ही की जा सकती है। धार्मिक लोग भी इस समय अपने भगवानों-देवताओं की ओर मदद के लिये नहीं देख रहे, उन्हें भी दवा या टीके का इंतजार है। उन्हें भी मालूम है कि अगर कोई इलाज खोज सकता है तो वे वैज्ञानिक ही हैं जो अभी इलाज और टीके के लिये शोध में जुटे हुये हैं।  

बाबाओं या मानवीय देवताओं की स्थित तो और भी बदतर है। देश में ऐसे बहुत से हिन्दू जिंदा ‘देवता’ या बाबा हैं जो बहुत सी बीमारियों का इलाज करने का दावा करते हैं और बहुत से मध्यम वर्गीय लोग उनके पास भक्त रूप में जाते थे। ऐसे सब बाबाओं ने इस धोखाधड़ी के जरिये बड़ी दौलत इकट्ठा कर ली है। किन्तु अब वे खुद अपने भक्तों से संक्रमण के डर से भयभीत हैं और उन्होने खुद ही अपनी दुकानें बंद कर दी हैं। संक्षेप में कहें तो सारे धर्म और बाबा ही फिलहाल अप्रासंगिक हो गये हैं।

नवउदारवाद के विरुद्ध, समाजवाद के लिये जन आंदोलन ही समाधान है

स्पष्ट है कि पूंजीवाद न सिर्फ महामारी के जन्म और फैलाव की अनुकूल स्थितियों को जन्म देता है, बल्कि नवउदारवादी नीतियों के दौर में पूंजीवाद द्वारा इसके लिये प्रस्तुत समाधान अपर्याप्त ही नहीं, संकट को और भी गहराने वाले हैं। हर महामारी की तरह पूंजीवाद ने कोविड को भी हवा खाद पानी से पुष्ट किया है। क्योंकि मौजूदा स्वास्थ्य सेवा लाभ के मकसद से संचालित है अतः यह कभी भी पर्याप्त नहीं हो सकती। खास बात यह कि पूंजीवादी वैश्वीकरण और नवउदारवाद ने ही पूंजीवाद के जनविरोधी रवैये को मजबूती दी है। चुनांचे स्वाभाविक है कि हम मौजूदा नवउदारवाद और वैश्वीकरण से अपना विश्लेषण शुरू करें। इन नीतियों ने जनता के बड़े हिस्से के जीवन में भारी तबाही और बरबादी पैदा की है। जब तक स्वास्थ्य सेवाओं पर नियंत्रण रखने वाली बड़ी दवा कंपनियों और अस्पताल शृंखलाओं के विरुद्ध शक्तिशाली जनआंदोलन खड़े नहीं किए जाते तब तक हम पूंजीवाद में किसी मानवीय राहत की आशा नहीं कर सकते।

ऐसे जनआंदोलनों के अभाव में नवउदारवाद पूंजीवाद की आम दिशा और प्रवृत्ति बन बन चुका है। अतः कोई भी जन व वर्ग आंदोलन जो अपने लक्ष्य को पूंजीवाद के अंदर सीमित करता है वह अंतत कामयाब नहीं हो सकता। इसलिए इन आंदोलनों को अपने दीर्घकालीन लक्ष्य को स्पष्ट करना होगा। यह लक्ष्य एक नई व्यवस्था से कम कुछ नहीं हो सकता। एक नई समाज व्यवस्था – समाजवाद – जो आबादी की विशाल बहुसंख्या हेतु कल्याण एवं जीवन की बेहतर दशाएं दे सके। समाजवाद सम्पूर्ण योजना पर आधारित ऐसी व्यवस्था है। समाजवाद उत्पादक शक्तियों के विकास द्वारा जनता की आवश्यकताओं को पूरा करने पर आधारित व्यवस्था है। ऐसी एक व्यवस्था ही लंबे वक्त तक जनता के हितों को आगे बढ़ा और सुरक्षित कर सकती है।

समाजवाद समाज को पुनर्गठित करेगा, एक ऐसी अर्थव्यवस्था की स्थापना करेगा जहां संसाधनों का आबंटन भुगतान क्षमता पर नहीं बल्कि सामाजिक अवश्यकता के आधार पर होगा। श्रमिकों के नियंत्रण में उत्पादन के साधन होंगे तो ऐसी स्थिति में कभी भी आवश्यक वस्तुओं का उत्पादन तेजी से बढ़ाया जा सकेगा, सम्पूर्ण स्वास्थ्य सेवाओं को डॉक्टरों, नर्सों, कर्मियों व मरीजों के द्वारा न्यायसंगत ढंग से संचालित किया जायेगा। ऐसी व्यवस्था आज की व्यवस्था से पूर्णतया भिन्न होगी क्योंकि आज अमीर पूंजीपति ही अस्पतालों, दवा कंपनियों, मेडिकल उपकरण निर्माताओं, और बीमा कंपनियों को नियंत्रित कर अहम फैसले लेते हैं। ऐसी व्यवस्था में हर व्यक्ति किसी संकट की स्थिति में जरूरत अनुसार जांच और उचित इलाज हासिल कर सकेगा। अतः समाधान यही है कि जन आंदोलनों और वर्ग संघर्षों का अल्पकालीन लक्ष्य नवउदारवाद को पराजित करना और अंतिम लक्ष्य वर्तमान व्यवस्था को उखाड़ फेंकना हो।

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 1/ मई 2020) में छपा था

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