कार्ल मार्क्स का जीवन, विचार व काम श्रमिकों की मुक्ति के लिए संगठित होने का आह्वान है!

कार्ल मार्क्स का जन्म 5 मई को 202 वर्ष पहले 1818 में हुआ था। दुनिया को उन्होंने जो विज्ञान प्रदान किया था वह आज तक बहुत ही सजीव रूप में हमें प्रेरित करता है। मार्क्सवाद जिंदा है क्योंकि वह कोई एकमात्र अंतिम सत्य बताने का दावा नहीं करता। बल्कि, वह एक ऐसा विज्ञान है जो हर वक्त की वस्तुगत स्थितियों और तत्कालीन घटनाओं के द्वंद्वात्मक भौतिकवादी विश्लेषण के आधार पर मजदूर वर्ग और उसकी हिरावल कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यों को मार्गदर्शित करता है। मार्क्स ने 1848 में फ्रेडरिक एंगेल्स के साथ मिलकर ‘कम्युनिस्ट मेनिफेस्टो’ को लिखा था, जो मजदूर वर्ग का सर्वप्रथम राजनीतिक घोषणा पत्र है और दुनिया भर के मजदूरों को आज तक प्रेरित करता है। “दुनिया के मजदूरों एक हो! श्रमजीवियों के पास अपनी जंजीरों के सिवाय कुछ और खोने को नहीं है। हमारे पास जीतने के लिए पूरी दुनिया है” ये नारे सारी दुनिया के मजदूर वर्ग आंदोलन में आज भी गूंजते हैं। मार्क्स के जीवन और कार्य के सार को बताते हुये इस कार्य में उनके जीवन भर के सहयोद्धा एंगेल्स ने कहा था –

“जैसे कि जैव प्रकृति में डार्विन ने विकास के नियम का पता लगाया था, वैसे ही मानव-इतिहास में मार्क्स ने विकास के नियम का पता लगाया था। उन्होंने इस सीधी-सादी सचाई का पता लगाया – जो अब तक विचारधारा की अतिवृद्धि से ढंकी हुई थी – कि राजनीति, विज्ञान, कला धर्म, आदि में लगने के पूर्व मनुष्य-जाति को खाना-पीना, पहनना-ओढ़ना और सिर के उपर साया चाहिये। इसलिये जीविका के तात्कालिक भौतिक साधनों का उत्पादन और फलतः किसी युग में अथवा किसी जाति द्वारा उपलब्ध आर्थिक विकास की मात्रा ही वह आधार है जिस पर राजकीय संस्थाएं, कानूनी धारणाएं, कला और यहां तक कि धर्म-संबंधी धारणाएं भी विकसित होती हैं। इसलिए इस आधार के ही प्रकाश में इन सब की व्याख्या की जा सकती है, न कि इससे उल्टा, जैसा कि अब तक होता रहा है।”

”परन्तु इतना ही नहीं, मार्क्स ने गति के उस विशेष नियम का पता लगाया जिससे उत्पादन की वर्तमान पूंजीवादी प्रणाली और इस प्रणाली से उत्पन्न पूंजीवादी समाज, दोनों ही नियंत्रित हैं। अतिरिक्त मूल्य के आविष्कार से एकबारगी उस समस्या पर प्रकाश पड़ा, जिसे हल करने की कोशिश में किया गया अब तक सारा अन्वेषण – चाहे वह पूंजीवादी अर्थशास्त्रियों ने किया हो या समाजवादी आलोचकों ने, अन्ध-अन्वेषण ही था। …”

”ऐसे वैज्ञानिक थे वह। परन्तु वैज्ञानिक का उनका रूप उनके समग्र व्यक्तित्व का अर्द्धांश भी न था। मार्क्स के लिये विज्ञान ऐतिहासिक रूप से एक गतिशील, क्रांतिकारी शक्ति था। …. मार्क्स सर्वोपरि क्रांतिकारी थे। जीवन में उनका असली उद्देश्य किसी न किसी तरह पूंजीवादी समाज और उससे पैदा होनवाली राजकीय संस्थाओं के ध्वंस में योगदान करना था, आधुनिक श्रमजीवी वर्ग को आजाद करने में योग देना था, जिसे सबसे पहले उन्होंने ही अपनी स्थिति और आवश्यकताओं के प्रति सचेत किया और बताया कि किन परिस्थितियों में उसका उद्धार हो सकता है। संघर्ष करना उनका सहज गुण था। और उन्होंने ऐसे जोश, ऐसी लगन और ऐसी सफलता के साथ संघर्ष किया जिसका मुकाबला नहीं है। …अन्ततः उनकी चरम उपलब्धि थी महान अन्तर्राष्ट्रीय मजदूर संघ की स्थापना – यह इतनी बड़ी उपलब्धि थी कि इस इस संगठन का संस्थापक, यदि उसने कुछ भी और न किया होता, उस पर उचित ही गर्व कर सकता था।”

”इस सब के फलस्वरूप मार्क्स अपने युग के सबसे अधिक विद्वेष तथा लांछना के शिकार बने। निरंकुशतावादी और जनतंत्रवादी, दोनों ही तरह की सरकारों ने उन्हें अपने राज्यों से निकाला। पूंजीपति, चाहे वे रूढ़िवादी हों चाहे घोर जनवादी, मार्क्स को बदनाम करने में एक दूसरे से होड़ करते थे। मार्क्स इस सबको यूं झटक कर अलग कर देते थे जैसे कि वह मकड़ी का जाला हो, उसकी ओर ध्यान न देते थे, आवश्यकता से बाध्य होकर ही उत्तर देते थे। मैं यहां तक कह सकता हूं कि चाहे उनके विरोधी बहुत-से रहे हों, परन्तु उनका कोई व्यक्तिगत शत्रु शायद ही रहा हो।”

”उनका नाम युगों-युगों तक अमर रहेगा, वैसे ही उनका काम भी अमर रहेगा!”

किन्तु मार्क्स का शुरू किया वह काम अभी पूरा नहीं हुआ है। आज सारी दुनिया में मेहनतकश लोगों को बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि पूंजीवाद घनघोर एवं अंतहीन संकट में है और इस संकट के बोझ को मेहनतकशों पर लाद रहा है। साथ ही जैसे-जैसे यह संकट गहन हो रहा है, पूंजीवाद खुद अपने ही स्वतंत्रता, भ्रातृत्व, समानता जैसे  ऐलानों, संविधानों, क़ानूनों और श्रमिक वर्ग के संघर्षों से जो खंडित, सीमित जनवादी अधिकार जनता को हासिल हुये भी थे उन सबको पैरों तले रौंदते हुये अधिकाधिक फासीवादी बर्बरता की ओर बढ़ रहा है।

मार्क्सवाद ही वह विज्ञान है जिसके सहारे हम इस संकट और उसके आधारभूत कारणों को समझ सकते हैं और उसे हमेशा के लिए खत्म करने के उद्देश्य से संगठित हो सकते हैं। इसके लिए मजदूर वर्ग को पूंजीपति वर्ग के हाथों से उत्पादन के साधनों को ले लेना होगा और वर्तमान तथा भावी पीढ़ियों की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए अर्थव्यवस्था को नयी दिशा देनी होगी – पूंजीपतियों के मुनाफे के लिए उत्पादन के बजाय सामूहिक स्वामित्व में सामूहिक जरूरतों की पूर्ति के लिए योजना के आधार पर सामूहिक श्रम से उत्पादन वाली अर्थव्यवस्था निर्मित करनी होगी। जैसा कि मार्क्स ने कहा है, “दार्शनिकों ने सिर्फ दुनिया का अलग-अलग तरीकों से विश्लेषण किया है; परंतु मुख्य बात है दुनिया को बदलना”। आज पहले से कहीं ज्यादा, हालतें इस बदलाव की मांग कर रही हैं। मार्क्सवाद के विज्ञान के बिना हम इस बदलाव को कामयाब करने में असमर्थ रह जायेंगे।

मार्क्सवाद का वह अत्यावश्यक सबक, जिसके सहारे हम तत्कालीन दुनिया को न सिर्फ समझ सकते हैं बल्कि बदल भी सकते हैं, वह वर्ग संघर्ष का नियम है। समाज दो वर्गों के बीच में बंटा हुआ है – पूंजीपति वर्ग और श्रमजीवी वर्ग। इन दो वर्गों के बीच संघर्ष राजनीतिक सत्ता के लिए है। पूंजीपति वर्ग राजनीतिक सत्ता को अपने हाथों में बनाये रखना चाहता है, जबकि मजदूर वर्ग को पूंजीपतियों से राजनीतिक सत्ता को छीनकर अपने हाथों में लेना होगा, ताकि मानव जाति को पूंजीवाद और बेरोजगारी व साम्राज्यवादी जंग समेत पूंजीवाद की तमाम बीमारियों से मुक्त किया जा सके। वर्तमान हालतों को जो ताकतें नहीं बदलना चाहती हैं, वे इस वर्ग संघर्ष को नकारती हैं। आज हमें चारों तरफ से यह प्रचार सुनने को मिलता है कि समाज में कोई वर्ग नहीं है बल्कि अच्छे और बुरे लोग हैं। हमें कहा जाता है कि संघर्ष अच्छे और बुरे विचारों के बीच में है और बुरे पर अच्छे की जीत सुनिश्चित करने से हमें रिहायी मिल जायेगी!

मार्क्सवाद वैज्ञानिक तौर पर पूंजीवाद के संकट के निहित आधार को समझाता है – कि उत्पादन के साधनों की निजी मालिकी और उत्पादन की सामाजिक प्रक्रिया के बीच में अंतर्विरोध ही इस संकट का आधार है। यह पूंजीवादी उत्पादन की विशेषता है जो यह सुनिश्चित करता है कि एक तरफ अमीर और अमीर होते रहेंगे तथा मजदूर और भी अधिक गरीब व कंगाल। यह पूंजीवादी व्यवस्था के पहले समय-समय पर होने वाले पर आज अंतहीन संकटों की शृंखला की वजह से ही है, जिनका समाधान पूंजीवादी व्यवस्था को निर्मूल किये बिना नहीं हो सकता है। कार्ल मार्क्स इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि भूतपूर्व सामाजिक व्यवस्थाओं की तरह, पूंजीवादी व्यवस्था भी सामयिक व्यवस्था है, जिसका स्थान समाजवादी व्यवस्था लेगी और जिससे आगे चलकर वर्गविहीन कम्युनिस्ट समाज का निर्माण होगा। वर्ग संघर्ष ही विकास की प्रेरक शक्ति है और पूंजीवाद के अंदर इस वर्ग संघर्ष से अवश्य ही सर्वहारा अधिनायकत्व की स्थापना होगी।

यह लेख मूलतः यथार्थ : मजदूर वर्ग के क्रांतिकारी स्वरों एवं विचारों का मंच (अंक 1/ मई 2020) के संपादकीय में छपा था

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